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आज की पॉजिटिव खबर:धान की पराली से मशरूम तैयार करती हैं MBA ग्रेजुएट जयंती; सालाना 20 लाख रु. कमाई, 35 लोगों को रोजगार भी दिया

नई दिल्ली2 वर्ष पहले

छत्तीसगढ़, पंजाब, ओडिशा, यूपी और बिहार सहित कई राज्यों में धान की खेती बड़े लेवल पर होती है। किसान फसल काटने के बाद इसकी पराली को या तो जला देते हैं या खेतों में ही छोड़ देते हैं। इससे खेत को तो नुकसान होता ही है, साथ ही पर्यावरण भी प्रभावित होता है। ओडिशा के बारगढ़ जिले की रहने वाली जयंती प्रधान ने इस समस्या को दूर करने के लिए एक पहल की है। वे बेकार पड़ी पराली से मशरूम की खेती और वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने का काम रही हैं। इससे वे हर साल 20 लाख रुपए की कमाई कर रही हैं।

38 साल की जयंती MBA ग्रेजुएट हैं। वे कहती हैं कि मैं एक किसान परिवार से ताल्लुक रखती हूं। पिता चाहते थे कि पढ़-लिखकर कुछ करूं। इसलिए MBA की डिग्री भी ली, लेकिन मैं किसी कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने के बजाय फार्मिंग में करियर बनाना चाहती थी। इसलिए नौकरी के लिए कभी कोशिश नहीं की।

जयंती कहती हैं कि हमारे इलाके में ज्यादातर लोग धान की खेती करते हैं। इससे बहुत अच्छी कमाई नहीं हो पाती है। इसलिए मैंने तय किया कि कुछ ऐसी खेती की जाए जो सिर्फ जीविका चलाने का साधन न होकर कमाई का भी जरिया हो। जिससे दूसरे लोगों को भी रोजगार से जोड़ा जा सके।

जयंती धान की पराली से मशरूम तैयार करती हैं। इसे पैडी स्ट्रॉ मशरूम कहा जाता है। इसमें लागत कम होती है।
जयंती धान की पराली से मशरूम तैयार करती हैं। इसे पैडी स्ट्रॉ मशरूम कहा जाता है। इसमें लागत कम होती है।

जयंती कहती हैं कि हमारे यहां पराली एक बड़ी समस्या है। किसान इसको लेकर परेशान रहते हैं, उनके लिए यह बेकार की चीज है। वो या तो इसे कहीं फेंक देते हैं या जला देते हैं। मैंने जब थोड़ा बहुत इधर-उधर सर्च किया तो पता चला कि मशरूम की खेती के लिए जो बेड तैयार किया जाता है, उसमें इस पराली का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके बाद 2003 में मैंने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से ट्रेनिंग ली और पैडी स्ट्रॉ मशरूम उगाना शुरू कर दिया।

पहले लोगों को मुफ्त में मशरूम बांटे, फिर मार्केटिंग शुरू की

जयंती कहती हैं कि शुरुआत के कुछ महीने मैंने आसपास के इलाकों में लोगों को मुफ्त में मशरूम खाने के लिए दिया। जब उनको मेरे प्रोडक्ट पसंद आए तो अगली बार से लोग खुद ही ऑर्डर करने लगे। इसके साथ ही हमने लोकल मार्केट में भी कॉन्टैक्ट किया। कई रिटेलर्स से बात की और उन्हें हम मशरूम उपलब्ध कराने लगे। इसके बाद अगले साल से हमने प्रोडक्ट बढ़ा दिया। अभी हम लोग सोशल मीडिया के जरिए भी मार्केटिंग करते हैं। हमने इसको लेकर वॉट्सऐप ग्रुप भी बनाया है। जिसके माध्यम से लोग अपना ऑर्डर देते हैं।

साल 2008 में कालाहांडी के रहने वाले बीरेंद्र प्रधान से जयंती की शादी हो गई। बीरेंद्र तब सरकारी नौकरी करते थे, लेकिन जब उन्होंने देखा कि जयंती बेहतर कर रही हैं और उन्हें सपोर्ट की जरूरत है तो बीरेंद्र ने नौकरी छोड़ दी। वे भी जयंती के साथ खेती में लग गए।

तैयार किया महिला समूह, 100 से ज्यादा महिलाएं जुड़ीं

जयंती ने 35 लोगों को रोजगार दिया है। इसके साथ ही वो स्थानीय महिलाओं को मशरूम की खेती की ट्रेनिंग भी देती हैं।
जयंती ने 35 लोगों को रोजगार दिया है। इसके साथ ही वो स्थानीय महिलाओं को मशरूम की खेती की ट्रेनिंग भी देती हैं।

जयंती ने स्थानीय महिलाओं का एक समूह तैयार किया है। इसमें 100 से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हुई हैं। जयंती इन्हें पैडी स्ट्रॉ मशरूम की खेती और प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग देती हैं। ये महिलाएं अपना प्रोडक्ट तैयार करने के बाद जयंती के पास पहुंचा देती हैं। फिर जयंती उसे मार्केट में सप्लाई करती हैं। हर महीने 200 क्विंटल से ज्यादा मशरूम का प्रोडक्शन ये महिलाएं करती हैं। इसके साथ ही उन्होंने 35 लोगों को रोजगार भी दिया है जो खेती और प्रोडक्ट्स की प्रोसेसिंग में जयंती की मदद करते हैं। अभी वे मशरूम से प्रोसेसिंग के बाद आचार, पापड़ जैसे एक दर्जन प्रोडक्ट तैयार करके स्थानीय मार्केट में भेजती हैं।

जयंती बताती हैं कि मशरूम तैयार करने के बाद जो पराली बच जाती है, हम उसका उपयोग वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने में करते हैं। इसका फायदा ये होता है कि हमें खाद के लिए किसी और सोर्स पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है और पराली की समस्या का निपटारा भी हो जाता है।

पैडी स्ट्रॉ मशरूम की खेती कैसे करें?

पैडी स्ट्रॉ मशरूम यानी पराली से तैयार किया जाने वाला मशरूम। आमतौर पर धान वाले प्रदेशों में इसकी खेती की जाती है। इसके लिए मशरूम के बीज यानी स्पान, बड़ी मात्रा में पराली, बांस, प्लास्टिक और पानी की जरूरत होती है। सबसे पहले पराली को छोटे-छोटे बंडल में बांध लिया जाता है। उसके बाद एक रात तक उसे पानी में भिगो के रखा जाता है। अगले दिन खुले में या हवादार जगह पर मशरूम उगाने के लिए बेड तैयार किया जाता है। ये बेड बांस की मदद से तैयार किए जाते हैं। इसमें अलग-अलग तीन से चार लेयर में पराली डाला जाता है। उसके ऊपर स्पान डालकर चारों तरफ से फैला दिया जाता है और फिर पराली को प्लास्टिक से कवर कर दिया जाता है। 8 से 10 दिन के भीतर मशरूम तैयार हो जाता है।

अब इंटीग्रेटेड फार्मिंग पर जोर

जयंती के पास अभी एक हजार से ज्यादा बत्तख हैं, जिनसे वह हर दिन 2-3 हजार रुपए की कमाई करती हैं।
जयंती के पास अभी एक हजार से ज्यादा बत्तख हैं, जिनसे वह हर दिन 2-3 हजार रुपए की कमाई करती हैं।

जयंती और बीरेंद्र मिलकर अब मशरूम कल्टीवेशन के साथ ही इंटीग्रेटेड फार्मिंग पर जोर दे रहे हैं। उन्होंने बारगढ़ के साथ ही कालाहांडी में भी अपनी यूनिट लगाई हैं। जयंती बताती हैं कि हम बारगढ़ में मशरूम की खेती और वर्मीकम्पोस्ट तैयार करते हैं। साथ ही एक नर्सरी भी शुरू की है। जबकि कालाहांडी में मछली पालन, मुर्गी पालन, बकरी पालन और ऑर्गेनिक सब्जियों की खेती करते हैं। इसके लिए हमने पांच एकड़ जमीन पर तालाब खुदवाया है।

इंटीग्रेटेड फार्मिंग कैसे करें?

इंटीग्रेटेड फार्मिंग इन दिनों काफी ट्रेंडिंग है। ज्यादातर किसान मुनाफे के लिए ये तरीका अपनाते हैं। इसमें एक साथ कई चीजों की प्रैक्टिस की जाती है। जैसे आपने अपनी जमीन को तीन-चार हिस्सों में बांट दिया है। एक हिस्से में ऑर्गेनिक सब्जियों की खेती, दूसरे हिस्से में ट्रेडिशनल खेती, तीसरे हिस्से में तालाब और चौथे हिस्से में पशुपालन। ये सभी एक-दूसरे पर निर्भर रहने वाले कंपोनेंट्स हैं। आप फलों और सब्जियों की खेती करते हैं तो आपके पशुओं के लिए चारे की कमी नहीं होगी। दूसरी तरफ इन मवेशियों के गोबर का उपयोग ऑर्गेनिक खाद के रूप में कर सकते हैं। इससे कम लागत में अधिक कमाई होती है। साथ ही समय की भी बचत होती है। इसी तरह तालाब का उपयोग मछली पालन के साथ ही सिंचाई के लिए भी किया जा सकता है।

जयंती प्रधान को सम्मानित करते तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह।
जयंती प्रधान को सम्मानित करते तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह।
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