बात बराबरी की:वजनदार स्त्री या तो गुस्से की वजह बनती है, या मजाक की; न तो उसे प्रेम मिलता है, न तरक्की

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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कुछ रोज पहले मेरठ में तलाक का अजीबोगरीब मामला सुनाई पड़ा, जहां पीड़िता का कहना है कि शादी के बाद वजन बढ़ने के कारण शौहर ने उसे तलाक दे दिया। 28 साल की महिला का कहना है कि बच्चे के जन्म के बाद से उसका वजन लगातार बढ़ने लगा। नाखुश पति आए-दिन इस पर फसाद करता। आखिरकार मोटापा न थमने के कारण पति ने उसे तीन तलाक दे दिया।

मामला अब पुलिस के पास है। तीन तलाक साल 2019 में ही अपराध घोषित हो चुका। आरोप की जांच होगी और केस सही साबित होने पर आरोपी पर कई धाराएं लगेंगी। बात खत्म! नहीं! यहीं से असल बात शुरू होती है।

बढ़े हुए वजन की स्त्री या तो गुस्से की वजह बनती है, या फिर मजाक की। या फिर किसी के दिल में झेलम-चिनाब का पानी हरहरा रहा हो तो वह उसे दया की नजर से देख लेता है। ज्यादातर मामलों में न तो उसे प्रेम मिलता है, न तरक्की।

जी हां, गली-मुहल्लों या शादी-ब्याह में ही नहीं, नौकरियों में भी इंटरव्यू या प्रमोशन के समय वजनदार महिलाएं किनारे सरका दी जाती हैं।

अमेरिकी एंप्लॉयर रिव्यू साइट फेयरीगॉडबॉस ने साल 2020 में 500 हायरिंग प्रोफेशन्स का इंटरव्यू किया। कंपनी ये समझना चाहती थी कि ज्यादा या कम वजन की महिला कैंडिडेट को एचआर वाले किस तरह देखते हैं। सर्वे में शामिल 20% एचआर प्रोफेशनल्स ने कहा कि उन्हें मोटी स्त्रियां सुस्त लगती हैं और इसलिए वे उन्हें इंटरव्यू में रिजेक्ट कर देते हैं।

18% लोगों ने मोटापे पर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। 22% ने बढ़े हुए वजन वाली महिलाओं पर संदेह जताया कि वे आए दिन छुट्टी करती होंगी। कुछ ही लोग थे, जिन्होंने कहा कि वे वजनदार महिला उम्मीदवार को उसकी स्किल से परखेंगे, न कि वजन से।

तो क्या बिल्कुल यही भेदभाव भारी शरीर वाले पुरुषों के साथ भी होता है? बिल्कुल नहीं! इससे उलट उन्हें घर-गृहस्थी वाला और ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है। चीन की सेचवान (Sichuan) यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के मुताबिक, महिला कैंडिडेट का वजन अगर आंखों को चुभनेवाला है तो उसे नौकरी मिलने की संभावना 15.2% कम हो जाती है।

वहीं पुरुषों के मामले में वजन का ज्यादा होना कोई दिक्कत नहीं, बल्कि ये उनके सैटल्ड होने के प्रमाण की तरह देखा जाता है। स्टडी में ये भी माना गया कि मोटापा महिलाओं के रोजगार में कुछ वैसे ही आड़े आता है, जैसे सेना में भर्ती की इच्छा रखने वालों की आंखों पर मोटा चश्मा चढ़ा होना।

नौकरी की बात छोड़कर अगर हम आम घरों या रिश्तों में झांके तो भी ज्यादा फर्क नहीं दिखता। मेरठ का ही मामला देखें तो पत्नी ने आरोप लगाया कि संतान जन्म के बाद बढ़ते हुए मोटापे से पति नाराज रहने लगा। पति की ये नाराजगी, ये झुंझलाहठ मेरठ के अनाम घर-बार से लेकर मुंबई के मशहूर खानदान तक दिखती है। अगस्त के आखिर में ही रणबीर कपूर ट्रोल हो गए थे, क्योंकि उन्होंने अपनी प्रेग्नेंट पत्नी के वजन पर भद्दी टिप्पणी कर दी थी। खुले में। कैमरे के सामने। और हंसते हुए।

सोशल मीडिया पर लोगों के भारी एतराज के बाद रणबीर ने सफाई दी कि उनका सेंस ऑफ ह्यूमर बहुत खराब है। चूंकि बेहतरीन अदाकारी करने वाले इस एक्टर को मजाक करना नहीं आता, इसलिए वे अपनी गर्भवती पत्नी को मोटा बोलकर हंसते हैं ताकि पहले ही पत्नी पर दबाव बन जाए कि वो नौ महीने बाद तबले के खोल की तरह कसा और सपाट पेट हासिल कर लेगी।

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन की रिपोर्ट में ऐसी महिलाओं का जिक्र है, जिन्हें गर्भवती होने पर बधाइयों की बजाय बढ़े हुए वजन पर टिप्पणी मिली। स्टडी के मुताबिक, 21% गर्भवतियों को 'मोटापे' पर ताने सुनने के लिए घर से बाहर नहीं जाना पड़ता, बल्कि परिवार में ही कोई न कोई ऐसा 'मजाक' कर देता है।

तकरीबन 25% महिलाओं ने कहा कि उन्हें टीवी या फिल्मों पर दुबली-पतली हीरोइनों को देखकर डर लगा रहता है कि प्रेग्नेंसी के बाद उनका छरहरापन चला न जाए। वहीं 33% ने साफ कहा कि परिवार, दोस्तों से लेकर दफ्तर और अनजान लोग तक वजनी औरतों को कमतर और कमअक्ल मानते हैं।

वैसे बता दें कि प्रेग्नेंसी के दौरान 12 से 16 किलो तक वजन बढ़ना सामान्य है। ये अतिरिक्त वजन नहीं, बल्कि गर्भ में पलते शिशु की जरूरत है। यही वजह है कि गर्भवती का वजन उम्मीद के मुताबिक न बढ़ने पर डॉक्टर परेशान हो उठते हैं। तो बच्चे की आस में ही सही, समाज ने नौ महीनों के लिए ‘मोटी स्त्री को सहना’स्वीकार कर लिया, लेकिन बस नौ महीने।

मियाद पूरी होते ही उसे अपने शरीर से वजन ऐसे हटाना है, जैसे कॉर्पोरेट मीटिंग के बाद सूट-टाई उतरती है। ये और बात है कि खुद मेडिकल साइंस के मुताबिक, वजन, बच्चे के जन्म के अगले 6 से 12 महीनों में घटाया जाना चाहिए।

फिर वही डर आता है कि सालभर मोटी स्त्री नजर के सामने रहेगी तो पुरुषों का महीन सौंदर्यबोध भोथरा न हो जाए! तो लीजिए साहब, इतने ताने दो कि वो खुद ही पेट पर पट्टा बांध ले। तब भी वजन न घटे तो बेरुखी या तलाक जैसे विकल्प भी हैं। जैसा मेरठ में हुआ।

पहले होता ये था कि मजाक उड़ाए जाने के बाद स्त्री खुद को अकेलेपन की कंदरा में कैद कर लेती। वो और खाती। अपनी सेहत पर और लापरवाह होती।

अब तस्वीर थोड़ी-सी बदली है। वजनदार महिलाएं खुद को सूने कमरे या बेतरतीब कपड़ों में कैद नहीं कर रहीं, वे बाहर निकल रही हैं- अपने वजन के साथ सहज और खुश। वे समझने लगी हैं कि मोटापा दरअसल उनकी देह में नहीं, पुरुषवादी सोच में है। वे तो खुद तो सेहतमंद बना लेंगी, लेकिन पुरुष अपनी सोच से मोटापा कब हटाएंगे?

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