बात बराबरी की:औरत ने हंसकर किसी से बात क्या कर ली कि गुस्ताखी हो गई, झट से उसे कैरेक्टर सर्टिफिकेट दे दिया जाता है

नई दिल्ली5 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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मई 1536 की सुबह ब्रिटेन के शाही महल में अफरातफरी मची हुई थी। दासियां रो रही थीं, लेकिन इतनी ही जोर से कि किसी पुरुष दास तक आवाज न पहुंचे। सैनिक मुस्तैदी से यहां-वहां घूमते हुए पक्का कर रहे थे कि किसी स्त्री चेहरे पर दर्द के निशान न हो, वर्ना उसे भी दोषी से मिला हुआ माना जाएगा और मौत मिलेगी।

ये सजा का दिन था। किसी चोर-उचक्के या देशद्रोही नहीं- रानी एने बोलिन को सजाए-मौत। जुर्म ये कि पति किंग हेनरी VIII को उनके चरित्र पर शक था।

प्रेमिकाएं रखने के शौकीन राजा को शक था कि उनकी दूसरी पत्नी एने कभी वफादार नहीं रहीं। वो महल में आते ही प्रेमी बनाने-छोड़ने लगीं। ये चरित्रहीनता इतनी आगे बढ़ गई कि रानी ने उनके मंत्रियों-संतरियों तक से रिश्ते बना लिए।

गुस्साए हुए राजा ने आनन-फानन पत्नी का सिर काटे जाने की सजा सुनाई। महल के भीतर नहीं, खुले में, लंदन टावर पर ताकि दर्शक स्त्रियां वक्त रहते संभल जाएं। गौर कीजिए, राजा के पास इसका कोई सबूत नहीं था, सिर्फ शक के आधार पर क्वीन को सजा मिली।

लगभग 35 साल की रानी पर लंबा शोध कर चुकी ब्रिटिश इतिहासकार क्लेअर रिज्वे के मुताबिक मरने से पहले एने बोलिन ने गिड़गिड़ाने या रहम मांगने की बजाय अलविदा-भाषण दिया और सिर झुकाकर खड़ी हो गईं। रानी के आखिरी शब्द थे- प्यारी जनता! मैं यहां मरने आई हूं क्योंकि अपने पति की नजरों में गुनहगार हूं। मुझे माफी नहीं चाहिए। मैं मौत में ज्यादा इज्जत देखती हूं। दुआ करूंगी कि राजा का शासन लंबा चले।

एने की मौत के काफी बाद राजा को अपनी भूल समझ आई, लेकिन इससे कुछ खास फर्क नहीं पड़ा। सिवाय इसके कि उन्होंने अपनी मृत पत्नी की याद में उसके बचपन के घर को सहेज दिया। इंग्लैंड के हेवर कासल में इस रानी की काफी सारी यादें संजोई हुई हैं, जो सैलानियों के लिए भी खुली हैं। क्वीन के खिलौनों से लेकर प्रार्थना की किताबें तक हैं।

रानी के मरने की वजह भी बताई जाती है, लेकिन मौत देने वाले राजा के बारे में खास बात नहीं होती। गुस्सा या नफरत तो दूर की बात।

महिलाओं के चरित्र का सर्टिफिकेट अक्सर पुरुष जारी करते हैं। वे बताते हैं कि फलां स्त्री भरोसेमंद नहीं, वो हर किसी से हंस-हंसकर बातें करती है। फलां रात में बाहर जाती है। फलां के घर का किवाड़ हरदम बंद रहता है। फलां का दरवाजा खुला ही रहता है। कुल मिलाकर, स्त्री जो भी करे, उसके चरित्र से जोड़ दिया जाता है। ये काम कॉर्पोरेट में काम करने वाले से लेकर दिहाड़ी मजदूर और यहां तक कि राजनेता भी बराबर की लगन से कर रहे हैं।

हाल में बिहार में सत्ता परिवर्तन पर कमेंट करते हुए एक वरिष्ठ नेता ने कह दिया कि अमेरिका में लड़कियां जैसे बॉयफ्रेंड बदलती हैं, वही हाल बिहार के मुख्यमंत्री का है। गद्दी पर बने रहने के लिए कभी इससे, कभी उससे मदद लेते रहते हैं। ये बयान प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया गया। इसके बाद सभा में चुप्पी नहीं छाई, विरोध में मुट्ठियां भी नहीं लहराईं, बल्कि ठहाके गूंज उठे।

बीते महीने छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक पति ने अपनी पत्नी के गले पर कांच मारकर हत्या कर दी, क्योंकि उसे उसके चरित्र पर संदेह था। कुछ रोज पहले हरियाणा के कैथल में पति ने अपनी बीवी को चाकू से गोद दिया, क्योंकि उसे उसका चाल-चलन ठीक नहीं लगता था।

कितने ही मामले हैं, जहां नाम-चेहरे-स्थान बदल जाएंगे, लेकिन वजह एक ही रहेगी। स्त्री पर शक। नेक और बदचलन स्त्री की पहचान के कई तरीके इंटरनेट पर मौजूद हैं। देखिए, तय कीजिए और तसल्ली से शक कीजिए।

अमेरिका के जनरल सोशल सर्वे (GSS) 2018 के मुताबिक रिश्तों के मामले में महिलाएं, पुरुषों से कहीं ज्यादा भरोसेमंद होती हैं। इसका एक मतलब ये भी है कि पुरुष महिलाओं से कम वफादार होते हैं।

सर्वे 18 से लेकर 80 तक के आयु वर्ग के बीच अलग-अलग श्रेणियों में हुआ। हर एजग्रुप में समान पैटर्न दिखा, जहां ज्यादातर पुरुषों ने माना कि वे अपनी प्रेमिका या पत्नी के अलावा एक से ज्यादा महिलाओं से जुड़े हुए हैं। वहीं महिलाओं का ‘धोखा’ ज्यादातर उन मामलों में दिखा, जहां पार्टनर उन पर हिंसा करता था।

ऐसे एक नहीं, हजार शोध हैं, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है तो इस बात से कि स्त्री कितना और किससे हंसती-बोलती है, कितने तीखे तर्क कर पाती है। या कितनी गुमसुम रहती है।

जाते हुए आखिरी किस्सा! साठ के दशक में ब्रिटेन में एक अभियान शुरू हुआ, जिसे नाम मिला रेस्क्यू ऑफ फॉलन वुमन। यानी पतित स्त्रियों को बचाने की मुहिम। जैसे विलुप्त होते पेड़-पौधे बचाए जाते हैं, उसी अंदाज में महिलाओं को बचाया जाने लगा।

तब विलियम ग्लेडस्टोन ब्रिटेन के PM हुआ करते थे। उन्होंने भी इस सनक को रोकने की बजाय बड़ी फंडिंग कर डाली ताकि नीली आंखों वाली अंग्रेज महिलाएं रास्ता न भटकें। उन्हें धार्मिक किताबें पढ़ाई जातीं और घरेलू कामकाज सिखाए जाते, जिससे वे सही रास्ते पर चलती रह सकें।

सालों बाद प्रोग्राम बंद हुआ, लेकिन सोच के दरवाजे भी बंद ही रहे। तभी तो नेताओं के पाला बदलने की तुलना लड़कियों के पार्टनर बदलने से की जा सकी- मजाक के बहाने ही सही!

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