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बात बराबरी की:बस स्टॉप पर खड़ी लड़की लाल लिपस्टिक लगाए तो कॉलगर्ल, देर शाम बाहर निकले तो कैरेक्टरलेस, ये सोच ठीक नहीं

नई दिल्ली2 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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आठ साल की थी, जब स्कूल से लौटने के रास्ते एक आदमी ने भद्दा इशारा किया। मैं पैदल थी। जुलाई की तेज धूप में एकदम अकेली। वो स्कूटर पर साथ-साथ चलने लगा। इशारे का मतलब नहीं पता था, लेकिन कुछ था, जो डरा रहा था। दौड़ी तो घर आकर ही रुकी। बाद के कई दिन रोते-चिड़चिड़ाते बीते, लेकिन किसी से कुछ बता नहीं सकी। बताने की कोई बात थी ही नहीं! तिसपर वो कस्बा था, जहां घर की बात बाजार तक पहुंच जाती।

37 साल की उम्र! दोपहर का वक्त था, जब मेट्रो में बगल की सीट पर एक शख्स आकर बैठा। मैं फोन में डूबी हुई थी तभी घुटनों से कुछ टकराया। ये उसका हाथ था। गलती से टकरा गया होगा! मैंने खुद को बहलाया। वो हाथ अब की बार छुट्टा टहलने लगा। मैंने फोन छोड़ा और लपककर हाथ पकड़ लिया। मेट्रो में तब दो-चार ही मुसाफिर रहे होंगे। सबके सब देखने लगे। उनकी आंखों में उस पर गुस्सा कम, मुझ पर शक ज्यादा था। बेकार में ‘सीन क्रिएट’ कर रही है।

गुस्सा दिखाकर मैं वाकई सीन क्रिएट कर रही थी। इसकी बजाय मुझे हिलक-हिलककर रो पड़ना था। यही रूल है। औरत आंखें डबडबाकर देखेगी तो आन की आन में जवांमर्दों की पांत की पांत रक्षा के लिए कूच कर जाएगी। वे न केवल उसे बचाएंगे, बल्कि अपनी तरह की शक्ल-सूरत वाले बदमाश को सबक भी सिखाएंगे। यहां तक कि जाते-जाते लड़की को घर ड्रॉप करने का उदार ऑफर भी दे डालेंगे।

लड़कियों को तो चर्चा की पुतलियां बनने का शौक है। बिन चार आदमियों का ध्यान खींचे उन्हें चैन कहां आता है! ऐसा ही एक काम हाल में दिल्ली की एक लड़की ने भी किया। अपने साथ हुई निहायत ‘घरेलू घटना’ को उसने ट्विटर पर डाल दिया, वो भी पुलिस-प्रशासन को टैग करते हुए।

पूरा मामला कुछ ऐसा है... 2 जून को मेट्रो से सफर करते हुए एक शख्स ने एक युवती का यौन शोषण करने की कोशिश की। लड़की ने वक्त रहते इरादा भांप लिया और बचकर निकल आई। हालांकि इसके बाद टसुएं बहाते हुए चुपचाप घर बैठने की बजाय वो ट्वीट पर ट्वीट करने लगी। आखिरकार प्रशासन इनवॉल्व हुआ। लगभग 100 पुलिसवालों ने 136 मेट्रो स्टेशन्स के सीसीटीवी फुटेज खंगाले और महीनेभर की मशक्कत के बाद आरोपी गिरफ्त में आ गया।

ये अपनी तरह का अनोखा मामला है। हिम्मत करके शिकायत करना और शिकायत पर कार्रवाई भी हो जाना। हार्वर्ड इंटरनेशनल लॉ जर्नल की स्टडी के मुताबिक सड़क पर चलती हर औरत, लगभग 12 मिनट में किसी न किसी किस्म का शोषण झेलती है। उसे कभी घूरा जाता है। कभी छुआ जाता है। कभी भद्दा कमेंट किया जाता है। कभी ‘कॉम्प्लिमेंट’ किया जाता है। सब कुछ एकदम अहिंसक तरीके से। ऐसे कि कहीं जरा-सी खरोंच तक न आए।

अजी! ताजमहल की सैर पर जाएं तो संगमरमर को भी खुरचकर अपना नाम उकेर दें, ऐसे मर्द आपको सिर्फ सीटी बजाकर, या कमेंट करके छोड़ देते हैं, ये क्या कम बड़ी बात है! इसके बाद भी लड़कियां बखेड़ा खड़ा करती रहती हैं।

बखेड़ा मचाने तक ही नहीं, अब तो वे रिसर्च भी करने लगी हैं कि ‘हार्मलेस मेल-मिलाप’ के क्या नुकसान हैं। सोशल साइंटिस्ट दीपा नारायण ने स्ट्रीट एब्यूज पर ‘चुप’ नाम से किताब लिखी। इसकी मानें तो सड़क, रेस्त्रां, लिफ्ट, कॉफी शॉप, दुकान, मॉल या बस स्टॉप पर खड़ी हर लड़की पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर का शिकार रहती है। वो कई-कई बार अश्लील कमेंट्स सुनती है और धीरे-धीरे डरने लगती है।

वो डरती है कि लाल लिपस्टिक लगाएगी तो कॉलगर्ल कहलाएगी। शाम ढले निकलेगी तो बेचरित्र कहलाएगी। छोटे कपड़े पहने तो इनवाइट करती दिखेगी। लंबे चोगे पहने तो बहनजी कहलाएगी। हंसते हुए डरती है। पैर पसारते हुए झिझकती है। यहां तक कि हिम्मत करते डरती है। बस में कोई छेड़े- वो हिम्मत करके शोहदे को सबक नहीं सिखाएगी, बल्कि चुप रह जाएगी।

धीरे-धीरे वो होकर भी अदृश्य होने लगती है। कोशिश करने लगती है कि मर्दों की दुनिया- सड़क-कैफे-बाग-बगीचे-दफ्तर-ट्राम-बस- में कम से कम जगह घेरे। औरत जितनी कम जगह घेरेगी, उसका होना पुरुषों को उतना कम अखरेगा।

चलिए, देसी राग छोड़कर फिरंग कहानियां सुनते हैं। अक्टूबर 2021 की बात है, जब फिलाडेल्फिया की तरफ बढ़ती ट्रेन में एक औरत का रेप हुआ। रात के 10 बजे थे। ट्रेन में भीड़-भाड़ थी। इसके बाद भी रेप हुआ। पीड़िता के घटना को रिपोर्ट करने पर साउथईस्टर्न पेनस्लिवेनिया ट्रांसपोर्टेशन अथॉरिटी ने एक्शन लिया और आरोपी को खोज निकाला।

आरोपी ने दोष मानते हुए कहा कि वो औरत को ‘बस’ छूना चाहता था। चूंकि वो विरोध करने लगी, यहां तक कि अपनी सीट बदलने उठ गई, तब उसे गुस्सा आ गया, और वो ‘जरा आगे’ बढ़ गया। मानो वो औरत नहीं, रास्ते का कोई नजारा, या कोई पेड़-फुनगा थी, जिसे देखना-छूना मर्द का अधिकार था। उसने इनकार किया। इसे गुस्सा आ गया।

दफ्तर से घर तक के रास्ते के अलावा लंबे रास्तों पर जाना और खतरनाक है। अगर आप औरत हैं, और सैर-सपाटे का शौक रखती हैं तो निकलते हुए बैग-पासपोर्ट और कैश रखना काफी नहीं। इससे भी ज्यादा जरूरी है कि आपके पास कायदों की कॉपी रहे। इंटरनेट पर महिलाओं के लिए सोलो ट्रैवल टिप्स डालते ही धड़ाधड़ साइट्स खुलेंगी, जो उन्हें सेफ्टी के टोटके सुझाती हैं।

मिसाल के तौर पर कनाडा की सरकारी वेबसाइट की हेडलाइन है- वुमन्स सेफ ट्रैवल गाइड! नीचे पढ़ने पर लंबी-चौड़ी लिस्ट है कि यात्रा के दौरान औरत कितनी कम या ज्यादा औरत बनकर रहे ताकि सुरक्षित वापस लौट सके।

लगभग हर उदार देश की वेबसाइट ट्रैवल टिप्स के नाम औरतों को यही सिखा रही है। अगर आप अकेली औरत हैं तो संभल जाइए, दुनिया बहुत खूंखार है। आप ऐसे कपड़े पहनिए। वैसे हंसिए। और तैसे बोलिए। या सबसे बढ़िया है कि बाहर ही मत निकलिए। घर पर रहिए, सेफ रहिए।