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'चुनाव बूथ' बने क्वारैंटाइन सेंटर:प्रवासी मजदूर बिना क्वारैंटाइन सीधे अपने घर पहुंच रहे; पंचायत चुनाव से बढ़ा गांवों में कोरोना, दो कहानियों से जानिए सच

नई दिल्ली6 महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी
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कोरोना की दूसरी लहर का खौफ और लॉकडाउन से रोजी-रोटी छिन जाने का दुख। इन्हीं वजहों से प्रवासी बड़े शहरों से अपने गांव लौट रहे हैं। स्टेशनों की भीड़ ये साफ बयां कर रही है। लेकिन इस बार माहौल थोड़ा अलग है। पिछले साल प्रवासियों को क्वारैंटाइन सेंटर में रखा गया। लेकिन इस बार ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। लोग बिना रोक-टोक अपने घर पहुंच रहे हैं। इसको हम दो कहानियों से समझते हैं…

पहली कहानी है पवन सिंह की। वे दिल्ली के खानपुर में गत्ते की फैक्ट्री में सुपरवाइजर थे। लॉकडाउन लगते ही उन्होंने बोरिया बिस्तर बांधा और बुलंदशहर पहुंच गए। उन्हें लगा इस बार भी उन्हें क्वारैंटाइन होना पड़ेगा, क्योंकि पिछली बार उन्हें एक स्कूल में 12 दिनों तक क्वारैंटाइन रहना पड़ा था। लेकिन, इस बार वे बिना किसी रोक-टोक अपने गांव डिबाई पहुंच गए। उनके साथ उसी गांव के 3 और लड़के भी थे।

दूसरी कहानी कमलेश कुमार की। कमलेश दिल्ली में नांगलोई स्थित एक सिलाई फैक्ट्री में काम करते थे। जब दिल्ली में एक हफ्ते के लिए लॉकडाउन लगा तो वे घबरा गए। वे अपने साथियों साथ गांव जाने का प्लान बनाने लगे। हालांकि, सरकार ने जब कहा कि लॉकडाउन नहीं बढ़ेगा तो वे रुक गए, जबकि उनके बाकी साथी गांव के लिए निकल गए।

जब लॉकडाउन एक हफ्ते के लिए फिर से बढ़ा तो, कमलेश ने तय किया कि अब वे यहां नहीं रुकेंगे। वे 26 अप्रैल को नई दिल्ली से चलने वाली हमसफर एक्सप्रेस में सवार हुए और बिना किसी रोक-टोक के गोरखपुर स्थित अपने गांव अहिरौली पहुंच गए। कमलेश को न कोविड रिपोर्ट दिखानी पड़ी और न ही क्वारैंटाइन होना पड़ा।

दिल्ली में लॉकडाउन लगने के बाद प्रवासी मजदूर अपने घर लौट रहे हैं। इस दौरान उन्हें पिछले साल की तरह सख्ती के दौर से नहीं गुजरना पड़ रहा है।
दिल्ली में लॉकडाउन लगने के बाद प्रवासी मजदूर अपने घर लौट रहे हैं। इस दौरान उन्हें पिछले साल की तरह सख्ती के दौर से नहीं गुजरना पड़ रहा है।

क्या पंचायत चुनावों की वजह से इस बार प्रवासी मजदूरों को नहीं किया गया क्वारैंटाइन?
बुलंदशहर के जिला अधिकारी रविंद्र कुमार कहते हैं, ‘पिछले साल सभी प्रवासी मजदूरों को क्वारैंटाइन पीरियड पूरा करना पड़ता था। सारे स्कूल और पंचायत भवन क्वारैंटाइन सेंटर में बदल दिए दिए गए थे। गांव आने वालों की लिस्ट तैयार की जा रही थी। लेकिन, इस बार ऐसा कोई आदेश नहीं है।' इस पर हमने गोरखपुर के जिला अधिकारी के. विजयन पांडियन से सवाल किया तो उनका भी यही जवाब था। उन्होंने कहा कि अगर बाहर से आया कोई व्यक्ति हमारे पास टेस्ट के लिए आएगा तो हम टेस्ट करवाने में उसकी मदद जरूर करेंगे।

गाजीपुर के एक प्रशासनिक अधिकारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर कहा, 'इस बार प्रशासन की तरफ से यह बात सरकार के सामने रखी गई थी। लेकिन, पंचायत चुनाव की वजह से इस पर ध्यान नहीं दिया गया। पंचायत चुनाव रद्द करने की सिफारिश भी कई अधिकारियों ने की थी। लेकिन, उनकी अनदेखी कर दी गई। दरअसल, जो स्कूल और भवन पिछले साल क्वारैंटाइन सेंटर में बदले गए थे इस बार वे सभी बूथ सेंटर में बदल दिए गए हैं। पूरा प्रशासन चुनाव के प्रबंधन में लगा है।

और तो और गाजीपुर में 4 ब्लॉक विकास अधिकारी, DM के PA और उनकी पत्नी कोरोना संक्रमण के बाद क्वारैंटाइन हैं। और भी कई अधिकारी संक्रमित हैं। दरअसल, क्वारैंटाइन के निर्देश का पालन करवाने के लिए न तो स्टाफ है और न ही जगह। लेकिन, प्रशासन पंचायत चुनाव करवाने में व्यस्त है। स्कूल और पंचायत भवन बूथ सेंटर, बाहर से आने वाले स्टाफ के लिए गेस्टहाउस में तब्दील कर दिए गए हैं।

कोरोना सुपर स्प्रेडर बनेंगे प्रवासी मजदूर?
शहरों से गांवों, कस्बों और जिलों में बिना क्वारैंटाइन हुए सीधे अपने घर पहुंचने वाले यह मजदूर क्या कोरोना प्रसार का जरिया नहीं बनेंगे? इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) में सीनियर साइंटिस्ट और रिसर्च मैनेजमेंट, पॉलिसी, प्लानिंग और कोआर्डिनेशन के मुखिया डॉ. रजनीकांत कहते हैं, 'खतरा तो बड़ा है, अगर एक भी प्रवासी मजदूर कोरोना पॉजिटिव हुआ तो इसे फैलते देर नहीं लगेगी। वैसे भी महामारी का तीसरा टार्गेट गांव-कस्बे और छोटे शहर ही हैं।'

शहरों में काम करने वाले मजदूरों के घर लौटने से अब गांवों में भी कोरोना फैलने का खतरा बढ़ रहा है। मामले बढ़ने लगे हैं।
शहरों में काम करने वाले मजदूरों के घर लौटने से अब गांवों में भी कोरोना फैलने का खतरा बढ़ रहा है। मामले बढ़ने लगे हैं।

डॉ.रजनीकांत कहते हैं, पहली वेव में बड़े शहर महामारी का शिकार बने, क्योंकि तब वायरस फ्लाइट से ट्रैवल कर यहां पहुंचा। दिल्ली, मुंबई जैसी जगहों पर ही लोग ज्यादातर दूसरे देशों में फ्लाइट से ट्रैवल करते हैं। दूसरी वेव में दूसरे दर्जे में आने वाले शहर जैसे इलाहाबाद, लखनऊ, कानपुर जैसे शहर कोरोना का शिकार हुए। क्योंकि फर्स्ट वेव के बाद घबराकर लोग यहां पहुंचे थे। लेकिन तब प्रशासन सख्त था। मजदूरों को क्वारैंटाइन करने का फैसला काफी समझदारी भरा था। लेकिन, इस बार ऐसा नहीं है। इसलिए अब गांव-कस्बों और छोटे शहरों में महामारी घुसने लगी है।

पलायन का असर कब तक दिखने लगेगा, संक्रमण का प्रसार कितने दिनों में दिख सकता है?

डॉ.रजनीकांत कहते हैं, 'देखिए अगर कोई व्यक्ति संक्रमित हुआ है तो इसका असर 5-6 से लेकर 14-15 दिनों तक दिखने लगता है। इसलिए अगर पलायन कर अपने गांव-कस्बे तक पहुंचने वाले किसी मजदूर में महामारी का संक्रमण हुआ है तो एक हफ्ते से दो हफ्ते न केवल संक्रमित व्यक्ति के लिए, बल्कि आसपास के लोगों के लिए खतरनाक हो सकते हैं। दो हफ्ते के भीतर यह व्यक्ति कई लोगों को संक्रमित कर सकता है।

अगर मरना ही है तो अपने गांव जाकर मरेंगे
दिल्ली से गोरखपुर के अहिरौली गांव पहुंचे कमलेश कहते हैं कि अब यह लॉकडाउन खुलने वाला नहीं है। यह महीनों चलेगा। हमारे मालिक ने भी कह दिया कि दूर वाले लोग अभी चले जाएं। अगर यहां बीमार पड़ गए तो न ऑक्सीजन मिलेगी और न दवाई। यहां तो मरना तय है। अगर मरना ही है तो फिर अपने गांव जाकर मरें।

वे कहते हैं, 'पिछली बार जो मजदूर यहां से देर से निकले थे, उनके भूखों मरने की नौबत आ गई थी। उन्हें न तो राशन ही मिल रहा था और न ही काम। सरकार ने भवन निर्माण मजदूरों के लिए 5,000 रु. देने की घोषणा की थी, लेकिन उन्हें भी ये पैसे नहीं मिल रहे थे। केवल उन्हीं को पैसा मिल रहा था, जिनका सोर्स था। किसी को रजिस्ट्रेशन न होने का बहाना बनाकर ऑफिस से भगाया जा रहा था तो किसी को पूरे कागज न होने के नाम पर।

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