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आज की पॉजिटिव खबर:भोपाल के विजय ने लॉकडाउन में 60 हजार रु. खर्च कर गोबर से डेकोरेटिव मटेरियल बनाना शुरू किया, अब लाखों में कमाई

भोपाल3 महीने पहलेलेखक: निकिता पाटीदार

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2018-19 में भारत में 3.3 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट निकला। ये प्लास्टिक जमीन और पानी में मिलकर पॉल्यूशन क्रिएट करती है। इसी तरह त्योहारों के दौरान गणेश जी और दुर्गा मां की पीओपी की प्रतिमाओं को तालाबों और नदियों में विसर्जित किया जाता है। पीओपी से बनने वाली ये प्रतिमाएं करीब 17 साल तक पानी में पड़ी रहती हैं और इन्हें प्रदूषित करती हैं। प्लास्टिक और पीओपी से बनने वाली इन चीजों का एक बेहतरीन विकल्प ढूंढा है भोपाल के विजय कुमार पाटीदार ने। आज की पॉजिटिव खबर में पढ़िए इंजीनियरिंग छोड़ पर्यावरण संरक्षण का काम कर रहे विजय की कहानी…

इंजीनियरिंग से सोशल वर्क तक का सफर

भोपाल में रहने वाले 29 साल के विजय मूलत: किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। अपने बचपन को याद करते हुए विजय बताते हैं- बेहतर रोजगार के लिए मेरे पिता ने गांव छोड़ा और नौकरी की तलाश में भोपाल आ गए। हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी और मेरी पूरी पढ़ाई सरकारी स्कूल में हुई। हालात संभले तो इंंदौर के DAVV कॉलेज से इंजीनियरिंग की। गेट का एग्जाम क्लियर किया और फिर भोपाल से ही इंजीनियरिंग में मास्टर किया।

विजय किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई सरकारी स्कूल में हुई है।
विजय किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखाई सरकारी स्कूल में हुई है।

पढ़ाई के लिए इधर-उधर परेशान होने वाले विजय अब खुद बच्चों को पढ़ाना चाहते थे। उन्होंने आस-पास की बस्ती में रह रहे बच्चों को पढ़ाना शुरू किया और रोजगार के लिए कॉलेज में बतौर प्रोफेसर पढ़ाया। विजय बताते हैं- इंजीनियरिंग में मास्टर करने के बाद मैंने इस फील्ड में PhD भी करनी चाही, लेकिन बहुत कोशिशों के बाद भी मन नहीं लगता था, क्योंकि मेरी दिलचस्पी सोशल वर्क में थी। लिहाजा मैंने आस-पास के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।

इस दौरान सड़क पर घूम रही गाय पर उनका ध्यान गया। विजय बताते हैं, सड़क पर घूम रही गायों के कारण हादसे भी होते हैं। लोगों ने गाय के लिए गौशालाएं बना रखी हैं। जब इनसे कोई फायदा नहीं होता तो इन्हें फिर इधर- उधर भटकने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके पीछे एक बड़ी वजह इनकी देखभाल और इनसे निकलने वाला वेस्ट, यानी गोबर है। हमनें इसी परेशानी का समाधान निकाला और गाय के गोबर से प्रोडक्ट बनाना शुरू किया।

2020 में जब लॉकडाउन लगा तो विजय को इस बारे में रिसर्च करने का खूब समय मिला। उन्होंने इस फील्ड में काम कर रहे कई लोगों से मुलाकात की और ग्राउंड लेवल पर रिसर्च करना शुरू कर दिया। इस दौरान उन्हें अर्जुन और नीता दीप वाजपेयी का साथ मिला। दोनों की सोशल वर्क के दौरान विजय से मुलाकात हुई थी।

नीता वाजपेयी लंबे समय से सोशल सेक्टर में काम कर रही हैं। अभी विजय के स्टार्टअप में को-फाउंडर हैं।
नीता वाजपेयी लंबे समय से सोशल सेक्टर में काम कर रही हैं। अभी विजय के स्टार्टअप में को-फाउंडर हैं।

पर्याप्त जानकारी मिलने के बाद उन्होंने पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया। इस दौरान दीवाली पर उन्होंने गोबर और मिट्टी से कई तरह के प्रोडक्ट बना कर लोकल मार्केट में सप्लाई करना शुरू किया। महामारी के चलते लगी पाबंदियों के बीच ये ट्रायल सफल रहा।

प्लास्टिक से छुटकारा दिलाते प्रोडक्ट

विजय ने जनवरी 2021 में गौ शिल्प इंटरप्राइजेज नाम से अपनी कंपनी रजिस्टर करवाई, जिसमें वे प्लास्टिक से बनने वाले सामान को गोबर से बना रहे हैं। वे बताते हैं, स्कूलों में होने वाले किसी भी खेल या प्रतियोगिता के विजेता को शील्ड दी जाती है। ये प्लास्टिक से बनी शील्ड प्रदूषण को बढ़ावा देती हैं। हमने इसकी जगह गोबर और मिट्टी से शील्ड तैयार की है। हम गोबर की मदद से राखी, वॉल फ्रेम, घड़ी, फोटो फ्रेम,आइना, सिंहासन, पूजन थाली जैसे 20 अलग-अलग प्रोडक्ट बना रहे हैं। इनसे प्लास्टिक के साथ ही पीओपी यानी कैल्शियम सल्फेट की मूर्तियों से भी छुटकारा मिल सकता है।

अपने इस इनिशिएटिव की विशेषता बताते हुए विजय कहते हैं, प्लास्टिक और पीओपी पृथ्वी के लिए बहुत नुकसानदायक है क्योंकि ये कभी गल नहीं सकते। वहीं गोबर एक बहुत जरूरी खाद है और पौधों के लिए जरूरी भी। हम कोशिश करते हैं कि अपने प्रोडक्ट की ड्यूरेबिलिटी कम से कम 10 से 12 साल हो। इसके बाद इन्हें पानी में गलाकर बतौर खाद इस्तेमाल किया जा सकता है।

कैसे बनाते हैं गोबर से प्रोडक्ट?

पर्यावरण सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विजय गोबर से गणेश जी और बाकी देवी-देवताओं की मूर्तियां बना रहे हैं।
पर्यावरण सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विजय गोबर से गणेश जी और बाकी देवी-देवताओं की मूर्तियां बना रहे हैं।

गोबर से डायरेक्ट प्रोडक्ट बनाना मुश्किल होता है। सबसे पहले इससे उपले (कंडे) बनाए जाते हैं। इन्हें खास तौर पर ठंड की धूप में सुखाया जाता है। जिससे ये किसी और मौसम में बनाए गए उपलों की तुलना में ज्यादा मजबूत होते हैं। इसके बाद इन्हें पलवराइज कर पाउडर बनाया जाता है। इसे बारीक छलनी से छाना जाता है जिससे क्वालिटी मेंटेन किया जा सके।

नेक्स्ट स्टेप में इस पाउडर को ग्वार गम के साथ मिक्स किया जाता है। मैदा, लकड़ी, मोम, समेत कुछ औषधियों को मिलाकर ग्वार गम तैयार किया जाता है। सभी चीजों को एक साथ मिलाकर गूंथा जाता है। इस सेमी डायल्यूट पेस्ट को सांचे में डालकर मूर्तियां का आकार दिया जाता है। तैयार मूर्तियों को सुखाया जाता है और ताजा गोबर के साथ फिनिशिंग दी जाती है। ग्वार गम की वजह से मूर्तियां काफी मजबूत हो जाती हैं जो गिरने पर टूटती भी नहीं हैं। रेजर से घिसाई कर इन पर गोंद से कोटिंग की जाती है। फाइनल स्टेप में इन्हें हर्बल कलर से पेंट किया जाता है।

60 लोगों को दिया रोजगार

विजय के अनुसार, गांव में उनके साथ 4 स्व-सहायता समूह जुड़े हैं। जिनसे वे अलग- अलग तरह की सामग्री लेने के साथ ही प्रोडक्ट भी ले रहे हैं। विमेन एम्पावरमेंट को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपनी 60 लोगों की टीम में 55 महिलाओं को रोजगार दिया है।

अपने इस स्टार्टअप के जरिए विजय ने 60 लोगों को रोजगार दिया है। इसमें 90% से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं।
अपने इस स्टार्टअप के जरिए विजय ने 60 लोगों को रोजगार दिया है। इसमें 90% से ज्यादा महिलाएं काम करती हैं।

विजय के साथ काम करने वाले 45 साल के हुकुम सिंह बताते हैं- हमारे शास्त्रों और आयुर्वेद में गाय से मिलने वाली चीजों से स्नान के बारे में लिखा है। हमने इसके बारे में रिसर्च की और अब पांच चीजों को मिलाकर साबुन बना रहे हैं। इसमें मुलतानी मिट्टी, गोबर को प्रोसेस कर बनाया गया इसका पाउडर, कपूर, नीम का तेल और कुछ जड़ी-बूटियां मिलाई जाती हैं। इनके पेस्ट को मोल्ड में डालकर शेप दिया जाता है। ये साबुन स्किन संबंधित परेशानियों से लड़ने में कारगर हैं।

सोशल मीडिया पर की मार्केटिंग

परिवार और दोस्तों के जरिए विजय ने गौ शिल्प के प्रोडक्ट लोगों तक पहुंचाना शुरू किया। धीरे-धीरे लोगों को इस बारे में पता चलने लगा और आज वे मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, केरल जैसे कई राज्यों में अपने प्रोडक्ट भेज रहे हैं। इस दौरान उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के जरिए मार्केटिंग की और अब वे अपनी वेबसाइट पर काम कर रहे हैं। उनके पास 50 से लेकर 2000 रुपए तक के प्रोडक्ट्स हैं। 60 हजार रुपए की इन्वेस्टमेंट के साथ शुरू हुआ यह स्टार्टअप आज लाखों का कारोबार कर रहा है।

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