पॉजिटिव स्टोरीआया था मजदूरी करने, बन गया करोड़पति:दोस्तों से उधार लेकर लेदर प्रोडक्ट बनाना शुरू किया, अब सालाना एक करोड़ टर्नओवर

11 दिन पहले

एशिया का सबसे बड़ा स्लम एरिया मुंबई का धारावी। इसकी संकरी गलियों में आज आपको लेकर चलती हूं। बारिश की वजह से नाले बजबजा रहे हैं।

इसी गली में 10x10 का एक कमरा है, जिसमें जाने के लिए लोहे की ऐसी घुमावदार सीढ़ियां हैं कि चढ़ने पर मानो गिर जाऊंगी।

दरअसल, इसमें लेदर बैग मैन्युफैक्चरिंग कंपनी ‘शान वर्ल्ड वाइड’ की एक यूनिट है। अंदर घुसने पर इसके मालिक कनवीर कमर फैजी से मुलाकात होती है। कारीगर लेदर के रंग-बिरंगे बैग तैयार कर रहे हैं। मशीनों की घड़घड़ाती आवाजें सुनाई दे रही हैं।

कनवीर कभी मजदूरी करने के लिए मुंबई अपने रिश्तेदारों के साथ आए थे, और आज उनकी कंपनी का सालाना टर्नओवर एक करोड़ का है। वो लेदर के बंडल पर बैठते हुए उन दिनों की ओर लौटते हैं। कहते हैं, 2010 में गांव के कुछ दोस्तों के साथ मुंबई घूमने आया था। कारोबार भी करना चाहता था, लेकिन पैसे नहीं थे।

तो यहीं धारावी में अपने गांव के लोगों के साथ दो महीने रहा और किसी तरह से टाटा इंडिकॉम में 7,000 रुपए महीने की नौकरी करने लगा। सिम कार्ड बेचने का काम करता था।

कनवीर अपने उस संघर्ष के दिनों में आगे दाखिल होते हैं। बताते हैं, इतने पैसों में तो गुजारा करना मुश्किल था। 2013 में लोगों को लोन देने वाली एक कंपनी जॉइन कर ली, लेकिन हर रोज खटकता था कि ऐसे कब तक चलेगा। यहां 14,000 रुपए तनख्वाह मिलती थी।

तो लेदर इंडस्ट्री में कैसे आना हुआ?

पूछते ही मानो कनवीर को वो दिन याद आ गए हों कि कैसे वो अपने रिश्तेदारों की फैक्ट्रियों में रातें गुजारा करते थे।

कहते हैं, हमारे यहां के 80% लोग लेदर के प्रोडक्ट्स बनाने का काम करते हैं। मुझे अपने जानने वालों की फैक्ट्रियों में सोना-रहना होता था। यहां रहने पर पता चला कि इस बिजनेस में अच्छा स्कोप हो सकता है।

कनवीर कमर फैजी कहते हैं, इस बिजनेस को करने के कई फायदे हैं। नफा-नुकसान आसानी से पता लग जाता है। हमारे गांव के ही कई लोग इसी बिजनेस को कर रहे हैं।

तो आपके पास पैसे इतने थे कि एक कंपनी खड़ी की जा सके? कनवीर बताते हैं, मजदूरी करने वाले व्यक्ति के पास कितना सेविंग होता है। कहते हैं- खाने-रहने के बाद कुछ बच जाए, तो बड़ी बात।

अपने रिश्तेदारों से एक लाख 10 हजार रुपए का कर्ज लेकर बिजनेस स्टार्ट किया था। लेदर बैग बनाने के लिए शुरुआत में धारावी से ही कच्चे माल मंगवाने शुरू किए। फिर धीरे-धीरे जब बिजनेस बढ़ने लगा, तो दूसरे शहरों में जाकर लेदर की क्वालिटी के बारे में पता करने लगा।

वो कहते हैं, मुझे आज भी याद है कि 20,000 रुपए एडवांस देकर 4,000 रुपए महीने के रेंट पर ये कमरा लिया था। तीन लोगों के साथ काम करना शुरू किया था। प्रोडक्ट तो बनाने लगा, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती इसे बेचने की थी।

कनवीर कमर फैजी को आज भी वो दिन याद है जब वो क्लाइंट्स को अपना प्रोडक्ट दिखाने के लिए रोज भागा करते थे।

वो कहते हैं, हमेशा ऑर्डर की तलाश में इधर-उधर भटकता रहता था कि कोई बड़ा काम मिल जाए, क्योंकि शुरुआत में तो सिर्फ छोटे-छोटे काम ही मिल रहे थे। 10-20 प्रोडक्ट बनाने के ही ऑर्डर मिलते थे। हर रोज अपने कारीगरों को काम देना मुश्किल हो रहा था।

तो बड़ी अपॉर्चुनिटी कैसे मिली? कनवीर एक दिलचस्प वाकया उन दिनों का बताते हैं। कहते हैं, एक दिन अपना पासपोर्ट रिन्यू करवाने गया था। मेरी आदत थी कि कहीं भी जाने पर अपने प्रोडक्ट और काम के बारे में लोगों से बातें करूं।

वो कहते हैं, संयोग ही कहूंगा कि जिस व्यक्ति को मैं अपने काम के बारे में बता रहा था, वो गो ब्रांड का अकाउंटेंट था। हम दोनों के बीच बातचीत होने लगी और उन्होंने अगले ही दिन अपनी कंपनी में आने का न्योता दे दिया। 10 लाख का ऑर्डर मिल गया।

फिर क्या, देखते ही देखते, और भी बड़ी कंपनियां जुड़ती चली गईं। एलबॉर्न इंटरनेशनल, अल्फा डिजिटल, सन फार्मा जैसी कंपनियों के ऑडर्स मिलने लगें। दरअसल, इन कंपनियों को अपने इम्प्लॉई समेत दूसरे क्लाइंट्स को गिफ्ट देने के लिए लेदर प्रोडक्ट की जरूरत होती है।

धीरे-धीरे कंपनी की ग्रोथ करोड़ों में पहुंच गई। साल 2016 में सालाना टर्नओवर एक से डेढ़ करोड़ के बीच होने लगा था।

इतना कहते-कहते कनवीर कमर थोड़ा ठहरने लगते हैं। चेहरे पर मायूसी छाने लगती है।

एक छोटी-सी खिड़की से बाहर की धारावी बस्ती की ओर दिखाते हुए कहते हैं, कोरोना की वजह से सब कुछ ठप हो गया था। ऑर्डर मिलने बंद हो गए। एक कमरे में हम 20-20 लोग रहते थे।

दरअसल, बिहार-यूपी के मजदूरों को फैक्ट्री मालिकों ने निकाल दिया था। उन्हें मैं अपने साथ रखता था। अपने 3 वर्कर्स के साथ मैं भी पूरे परिवार को लेकर दरभंगा चला गया। 20 लाख का ऑर्डर स्टोर में रखे-रखे सड़ गया, लेकिन मैंने हार नहीं मानी।

घर पर रहते हुए भी अपने कस्टमर्स को कॉल कर उनसे बातचीत करता रहता था। जब सब कुछ थोड़ा नॉर्मल हुआ तो हम फिर वापस मुंबई आ गए।

हर दिन कंपनियों में जाकर उनसे काम मांगने लगा। कहता था, काम दे दीजिए, कारीगर खाली बैठे हैं। गिड़गिड़ाना पड़ता था। फिर अल्फा डिजिटल, सन फार्मा जैसी कंपनियों से ऑर्डर मिलने लगे। धीरे-धीरे फिर से काम चल पड़ा।अब हम अपना ब्रांड 'EXOX' के नाम से लॉन्च करने जा रहे हैं।

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