अनाथ से Toraa की मालकिन बनने की कहानी:पति ने कई बार इतना मारा कि मैं लहूलुहान हो जाती और वो देखते रहते... मां कहती थीं, मर क्यों नहीं जाती

16 दिन पहलेलेखक: नीरज झा

जब 13-14 साल की हुई, तो मां बहुत पिटाई करने लगी। कहने लगी, पता नहीं क्यों ले आई इसे। किस गटर से उठा लिया। लड़का होता तो बात ही कुछ और होती। गलती हो गई कि इसे एडॉप्ट कर लिया।

मुझे नहीं पता कि मेरा जन्म कहां हुआ। पुलिस ने बताया कि जब मैं मिली थी, तो कुछ महीनों की भी नहीं, कुछ दिन की बच्ची थी। दो-तीन साल अनाथालय में रखा गया। फिर मां एडॉप्ट करके अपने गांव महाराष्ट्र के भिवंडी ले आईं।

कल्पना वंदना (आनंदी) जब ये बातें हमारे साथ शेयर करती हैं, तो कई बार उनकी जुबान अटकने लगती है। थोड़ा रुकती हैं फिर कहती हैं, एक अनाथ से सक्सेसफुल एंटरप्रेन्योर बनने के बीच कई पड़ाव आए, जब मैंने खुद को खत्म करने तक की ठान ली।

लेकिन, आज कोल्हापुरी साड़ी और अन्य प्रोडक्ट्स बेचने वाली ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म Toraa (तोरा) की मालकिन हूं। सब कुछ अच्छा रहा तो 2-3 साल में इसका टर्नओवर करोड़ों में हो जाएगा, अभी लखपति तो हूं ही। दरअसल, ये खुद के वजूद की लड़ाई है।

कल्पना कहती हैं, मेरे हालात में ऐसी सैकड़ों औरतें हैं, जो अपने वजूद के लिए लड़ रही हैं। इस दौर से गुजर रही हैं। मेरे साथ ऐसी दर्जनों महिलाएं काम कर रही हैं। चाहती हूं कि प्रत्येक महिला इंडिपेंडेंट हो।
कल्पना कहती हैं, मेरे हालात में ऐसी सैकड़ों औरतें हैं, जो अपने वजूद के लिए लड़ रही हैं। इस दौर से गुजर रही हैं। मेरे साथ ऐसी दर्जनों महिलाएं काम कर रही हैं। चाहती हूं कि प्रत्येक महिला इंडिपेंडेंट हो।

हर किसी की शुरुआत तो बचपन से ही होती है, कहते हुए कल्पना उन दिनों में लौट जाती हैं। बताती हैं, 13-14 साल की उम्र तक सब कुछ अच्छा चल रहा था। मां का भरपूर प्यार मिला। वो आंगनबाड़ी टीचर थीं। गांव में परिवार की अच्छी पहचान थी।

कभी ऐसी प्रॉब्लम नहीं हुई कि घर में खाना नहीं है। गांव के बाकी बच्चों के मुकाबले मैं कुछ ज्यादा ही खुशनसीब थी। जो खाने-पीने की चीजें दूसरों के घरों में मेहमानों के आने पर बनता था, वो मेरे यहां हर रोज रहता था।

लेकिन धीरे-धीरे मां को मुझसे बहुत सारी उम्मीदें बढ़ने लगीं। ये प्यार कम होने लगा। अपनापन ढलान पर आ गया। दरअसल, उन्हें लड़का चाहिए था। बाहर खेलने जाने पर मेरी पिटाई होने लगी।

अचानक मां के बिहेवियर में बहुत सारे बदलाव आने लगे। वो ताने मारा करती थीं। कहती थी, तू मर क्यों नहीं जाती है। घर से चली जा… तू कभी खुश नहीं रहेगी।

दरअसल, मैं उनका अपना खून जो नहीं थी।

तो आप घर से निकल गईं? कल्पना कहती हैं, मां की पर्सनल लाइफ में भी कई सारी चीजें खराब चल रही थीं। उनका डिवोर्स होने वाला था। कोर्ट-कचहरी का मामला चल रहा था। वो अपना सारा गुस्सा मुझ पर निकाल रही थीं।

घर के आर्थिक हालात भी बहुत खराब हो चुके थे। फिर 10th के बाद मैं जॉब करने लगी। घर लेट से लौटती थी। शायद मैं थोड़ी खूबसूरत दिखती थी, तो गांव के लोगों का नजरिया भी बदलने लगा। जिसे मैं भाई बोलती थी, वो गंदी नजरों से देखने लगे।

कई परेशानियों के बाद कल्पना घर से निकलकर एक पीजी में रहने लगी। हालांकि, जॉब के साथ-साथ उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। वो कहती हैं, दर्जनों किताबें पढ़ना मुझे पसंद रहा है।
कई परेशानियों के बाद कल्पना घर से निकलकर एक पीजी में रहने लगी। हालांकि, जॉब के साथ-साथ उन्होंने पढ़ाई जारी रखी। वो कहती हैं, दर्जनों किताबें पढ़ना मुझे पसंद रहा है।

कल्पना अपनी आगे की पढ़ाई-लिखाई के बारे में बताती हैं। कहती हैं, जॉब में अच्छे पैसे मिलते थे, लेकिन लगा कि यदि ज्यादा पढ़ूंगी तो पैसे और जॉब- दोनों बेहतर मिलेंगे।

फिर 12th के बाद मुंबई के एक कॉलेज से मास कम्युनिकेशन का कोर्स किया। पासआउट होने के बाद कई मीडिया और पीआर कंपनी के साथ काम किया।

फिर आपने ‘तोरा’ की शुरुआत कैसे की? कल्पना इसके पीछे का एक दिलचस्प किस्सा बताती हैं। कहती हैं, कॉलेज के दिनों में भी मुझे साड़ी पहनना बेहद पसंद था। इंस्टाग्राम पर हर रोज अपनी कुछ फोटोज शेयर करती थी। एक दिन साड़ी में एक तस्वीर शेयर की, जो मेरे कई दोस्तों को काफी पसंद आई।

उन लोगों ने भी साड़ियों की डिमांड कर दी। तीन-चार साड़ियां तो मैंने ऐसे ही दोस्तों को भेज दीं। फिर मुझे डिमांड-सप्लाई का फॉर्मूला दिखा। साड़ी की डिमांड थी तो अपना स्टार्टअप शुरू करने का आइडिया आया।

‘जिंदगी में सब कुछ अच्छा चल रहा था…’, इतना कहकर वो ठहर जाती हैं।

तो ये कल्पना वंदना के साथ ‘आनंदी’ नाम कब जुड़ा? कल्पना इस सवाल पर मुस्कुराने लगती हैं, लेकिन इस मुस्कुराहट में भी एक गुस्सा नजर आता है। कहती हैं, इसके पीछे भी मेरी शादी है। हसबैंड का दबाव था कि मुझे अपना नाम बदलना ही पड़ेगा।

सोचा थी शादी के बाद सब कुछ बदल जाएगा। जिंदगी थोड़ी बेहतर हो जाएगी, लेकिन ये और खराब हो गई।

कल्पना अपनी मैरिड लाइफ के बारे में और बातें बताती हैं। कहती हैं, 2018-19 में मेरी एक दोस्त ने सलाह दी कि, एक अच्छा लड़का है शादी कर लो। लाइफ अच्छी हो जाएगी।

कल्पना कहती हैं, मैं चाहती थी कि जिससे शादी हो, उसे मेरे बारे में सब कुछ पता हो, ताकि बाद में रिश्ते खराब न हों।
कल्पना कहती हैं, मैं चाहती थी कि जिससे शादी हो, उसे मेरे बारे में सब कुछ पता हो, ताकि बाद में रिश्ते खराब न हों।

मैंने अपने होने वाले हसबैंड को सारी बातें बता दी। उन्हें उस वक्त कोई एतराज नहीं था। हमारी शादी हो गई।

लेकिन, उसके बाद मेरी जिंदगी एक नौकरानी की तरह बीतने लगी। हसबैंड का नेटवर्क मार्केटिंग का बिजनेस था, जिसमें वो लोगों को झूठ बोलकर, बड़ी-बड़ी बातें कह कर फंसाते थे। महीनों घर से बाहर रहना होता था।

एक बार मैं भी उनके साथ मलेशिया गई थी। वहां हम दोनों के बीच कई बार लड़ाई-झगड़े हुए। हसबैंड ने कहा, इंडिया जाने के बाद हम दोनों डिवोर्स ले लेंगे।

दरअसल, हसबैंड चाहते थे कि मैं अपना बिजनेस छोड़ दूं। हर तरह से टॉर्चर होने लगी। सिर को दीवार से टकराकर, बाल को खींचकर… कई बार उन्होंने इतना मारा कि मैं लहूलुहान हो जाती थी और वो देखते रहते थे।

एक बार तो उन्होंने सारी सीमाएं ही पार कर दीं। लोग ऐसा बोलते हैं कि घर में एक बच्चे के आ जाने के बाद मैरिड लाइफ में थोड़े बदलाव आ जाते हैं। मैंने हसबैंड से इस बारे में बात की। सुनते ही उन्होंने मेरी बहुत पिटाई की। बोला, ‘तुम्हारी औकात नहीं है मां बनने की।’

बाल पकड़कर खींचते हुए थाने तक ले गए। पुलिस से शिकायत की कि मैं मेंटली डिसटर्ब औरत हूं। ये सिलसिला लंबा चलता रहा। कई बार मुझे घर से बाहर निकाला गया। फिर एक दिन मैंने हसबैंड को घर से बाहर निकाल दिया।

कई बार ऐसा हुआ कि मेरे पास पैसे नहीं होते थे। घर के सारे खर्च मुझे देने होते थे। एक बार की बात है। अकाउंट में मात्र 375 रुपए थे। घर का किराया देना था। मकान मालिक ने घर खाली करने को कह दिया, जिसके बाद मैं फिर कोल्हापुर आ गई।

और तब से अपने बिजनेस में जुटी गई। देश के अधिकांश राज्यों में मेरे कस्टमर्स हैं। अब कोल्हापुरी साड़ी और अन्य प्रोडक्ट प्रोड्यूस कर रही हैं। लोगों को जॉब दे रही हूं।

कल्पना वंदना इन दिनों एक तरफ अपने बिजनेस पर काम कर रही हैं। वहीं, दूसरी तरफ ब्रेस्ट कैंसर से भी लड़ रही हैं। कहती हैं, मई-जून में रिपोर्ट आई की मैं पॉजिटिव हूं। ट्रीटमेंट चल रहा है। उम्मीद है कि जल्द ठीक हो जाऊंगी।

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