पॉजिटिव स्टोरीअंतिम संस्कार के स्टार्टअप से 20 करोड़ का बिजनेस:अर्थी को कंधा देने से लेकर पंडित-मौलवी तक की एडवांस बुकिंग

2 महीने पहलेलेखक: नीरज झा

न यहां किसी की मौत हुई है और ना ही किसी के रोने की आवाज सुनाई दे रही है, लेकिन सागर पवार और शंकर मसके अपने चेहरे पर गंभीर भाव लिए नारियल की रस्सी से बांस की अर्थी तैयार कर रहे हैं।

इनके पीछे खड़े संजय रामगुडे़ अंतिम संस्कार से जुड़ी सभी विधियों को लेकर एक किताब उलट-पलट कर रहे हैं। दरअसल, संजय ही ‘सुखांत फ्यूरनर’ के फाउंडर एंड डायरेक्टर हैं जिसकी चर्चा पिछले कुछ दिनों से है। अंतिम संस्कार से जुड़ी सभी व्यवस्थाएं देने वाला ये स्टार्टअप 'सुखांत' सोशल मीडिया पर वायरल है।

अर्थी पर बिखरे फूल-पत्ती, 10 हजार से लेकर 40,000 रुपए तक में अंतिम संस्कार की सारी विधियां, कफन से लेकर अर्थी को कंधा देने के लिए चार लोग, बाल मुंडवाने के लिए नाई, अलग-अलग धर्मों के लिए पंडित, मौलवी, पादरी… और यहां तक कि अस्थि विसर्जन। यानी किसी के जीवन की अंतिम यात्रा का पूरा साजो-सामान।

इसी मॉडल को समझने और बदलते दौर के साथ इसकी जरूरत क्यों पड़ी, जानने के लिए हम पहुंचे मुंबई। जगह- वकोला पुलिस स्टेशन के ठीक पीछे 'सुखांत फ्यूरनर' का ऑफिस।

बाहर कैंपस में एंबुलेंस खड़ी है। प्रकाश यादव, सागर पवार, शंकर मसके और राम वैताल अंतिम संस्कार के सामान इकट्ठा कर रहे हैं। मैनेजर मैथ्यू अंतिम संस्कार के लिए आने वाले कॉल्स और टीम को मॉनिटर कर रहे हैं। पूछने पर पता चलता है कि आज सुबह ही 4 लोगों की टीम एंबुलेंस में अंतिम संस्कार के सामान लेकर नासिक गई है।

सुखांत के फाउंडर संजय के साथ बातचीत शुरू होती है। आखिर अर्थी को कंधा देने, अंतिम संस्कार की पूरी विधि करने के लिए एक कंपनी की जरूरत क्यों पड़ी?

संजय रामगुड़े का दावा है कि भारत में अंतिम संस्कार की प्री प्लानिंग करने वाली उनकी ये पहली कंपनी है। वो कहते हैं, 'सबसे पहले मैं एक चीज क्लियर करना चाहता हूं। हमारे जिस स्टॉल को दिल्ली में लगने वाले ‘इंटरनेशनल ट्रेड फेयर’ का बताया जा रहा है, वो मुंबई के ठाणे में 12-13 नवंबर को हुए एक बिजनेस अवॉर्ड शो का है।

तस्वीर में यमराज के गेटअप में संजय रामगुड़े हैं। ठाणे में होने वाले शो में उन्हें महाराष्ट्र के मंत्री उदय सावंत ने 'एक्सीलेंस बिजनेस अवार्ड' से सम्मानित किया था।
तस्वीर में यमराज के गेटअप में संजय रामगुड़े हैं। ठाणे में होने वाले शो में उन्हें महाराष्ट्र के मंत्री उदय सावंत ने 'एक्सीलेंस बिजनेस अवार्ड' से सम्मानित किया था।

संजय 40 साल तक बतौर सिनेमेटोग्राफर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर काम कर चुके हैं।

सुखांत' की शुरुआत को लेकर वे बताते हैं, '30 साल पहले बनारस में मणिकर्णिका घाट के आसपास एक फिल्म की शूटिंग कर रहा था। मैंने देखा कि एक तरफ लोगों के आंसू डबडबा रहे हैं। चिता को मुखाग्नि देते वक्त परिजनों के हाथ कंपकपा रहे हैं और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कराने से जुड़े लोग पैसों की लूट कर रहे हैं।

जिसका जवान बेटा मर गया है, भरी जवानी में बाप ने दुनिया छोड़ दी है, उस परिवार से भी रकम की बोली लगाई जा रही है।

नाई सिर में लगे बाल के एक हिस्से की शेविंग करके छोड़ दे रहा है, ताकि उसे बाकी हिस्से को क्लीन करने के लिए ज्यादा पैसे मिले। सिर्फ शेविंग के लिए नाई 2,000 रुपए तक मांग ले रहा है। यही हाल पंडित से लेकर चिता सजाने वाले तक का है।'

संजय की टीम के बाकी लोगों में से कोई बोतल में गंगाजल भर रहा है, तो कोई चंदन, धुप-बत्ती और माचिस पैक कर रहा है। पूछने पर संजय जवाब देते हैं, पता नहीं होता है न कि कब कहां से कॉल आ जाए। किसी के मरने का कोई टाइम तो फिक्स है नहीं।

संजय हमें अपने एक छोटे से केबिन में जाते हैं। वो बताते हैं, ' 2014 में लगा कि जो आइडिया फिल्म शूटिंग के दौरान 30 साल पहले आया था, उस पर काम शुरू किया जाए। कुछ नया करूं। फिल्म इंडस्ट्री से होने की वजह से क्रिएटिव माइंड रहा है। सोचा कि इस तरह की कोई कंपनी शुरू की जाए, जो 24 घंटे सातों दिन अंतिम संस्कार की सारी चीजें, विधियों को एक हाथ से उपलब्ध करवाती हो।'

मैंने जब अपने दोस्तों को इसके बारे में बताया, तो उन्हें भी लगा कि मुंबई जैसे महानगरों में इसकी जरूरत तो है। मैंने सोचा कि जिस तरह से अलग-अलग कामों के लिए NGO होते हैं, उसी तरह अंतिम संस्कार के लिए भी कोई सेटअप होना चाहिए।

3 साल तक मैंने अकेले इस पर रिसर्च शुरू किया। कई रात बनारस के घाटों पर जलती चिताओं के बीच रहा। करीब 20 दिनों तक पंडितों-डोमों के बीच खाना-पीना, उठना-बैठना तक चला।

उनके यहां किसी व्यक्ति के प्राण निकल जाने के बाद की सभी रस्मों को देखा, इसे सीखा कि कैसे वो इस शव का अंतिम संस्कार कर रहे हैं। मतलब शव को अर्थी पर बांधने, चिता सजाने से लेकर शव को नहलाने और मुखाग्नि देने तक।

कंपनी की शुरुआत की तो सभी अलग-अलग धर्मों में होने वाले अंतिम संस्कार की जगहों को छान मारा। कभी किसी मुसलमान की मय्यत में जाना होता, तो कभी किसी क्रिश्चियन के अंतिम संस्कार में।

तो लाश के बीच डर नहीं लगा?

ये सवाल मेरे मुंह से अचानक निकल पड़ता है।

संजय मुस्कुराने लगते हैं। कहते हैं, 'बचपन से ही लाशों से डर नहीं लगा। इसी के बीच पला बढ़ा। मां मुंबई के जेजे हॉस्पिटल में नर्स थी, हम उस हॉस्पिटल के आजू-बाजू (अगल-बगल) में रहते थे। दिनभर घूमते थे। सामने हॉस्पिटल का शवगृह था। मैं उजले कपड़े में लिपटे लाशों के बीच से गुजर जाता था।

अब हमारी कंपनी की जरूरत क्यों आज के दौर में आन पड़ी है, ये आपको बताता हूं। वे कहते हैं, 'सबसे बड़ी दिक्कत है कि नई जेनरेशन को अंतिम संस्कार की विधि के बारे में पता नहीं है। उन्होंने कभी देखा ही नहीं, तो कैसे मालूम होगा। मुझे खुद मालूम नहीं था।'

हिंदू रीति-रिवाज के मुताबिक होने वाले अंतिम संस्कार की ये सामग्रियां हैं। इसमें कफन, बांस की बनी अर्थी से लेकर घड़ा, कलश, गंगाजल, चंदन, धुप-बत्ती... सब कुछ है।
हिंदू रीति-रिवाज के मुताबिक होने वाले अंतिम संस्कार की ये सामग्रियां हैं। इसमें कफन, बांस की बनी अर्थी से लेकर घड़ा, कलश, गंगाजल, चंदन, धुप-बत्ती... सब कुछ है।

संजय कहते हैं, 'बर्थडे पार्टी, किसी की शादी-ब्याह में तो हम पूरे परिवार के साथ जाते हैं, लेकिन मय्यत में घर से कोई एक ही जाता है, या वो भी नहीं। जो जाता है, उसे भी पता नहीं होता। लोग शव को अछूत तो मानते ही हैं, अंतिम संस्कार की सामग्री को भी इसी नजरिए से देखते हैं, दो कदम दूर भागते हैं जैसे ये भूत-प्रेत हो।

लोगों के पास समय भी नहीं है कि वो किसी के अंतिम संस्कार में शामिल हों।

जिसके घर कोई मर गया है, उसे पता नहीं है कि अंतिम संस्कार में कौन-कौन सी चीजों की जरूरत पड़ती है। मुश्किल के उस दौर में वो इधर-उधर भागना शुरू करता है। यदि परिजन मार्केट से सामान खरीदकर भी ले आए, तो भी उन्हें पूरी प्रक्रिया के बारे में पता नहीं होता।

लेकिन सभी चाहते हैं कि उनके पूर्वज को पूरे आदर-सम्मान के साथ आखिरी विदाई दी जाए। जब हम जीने के लिए होम लोन लेते हैं, मेडिक्लेम लेते हैं तो फिर जीवन के अंतिम चरण के लिए कोई प्लान क्यों नहीं।'

संजय बताते हैं, 'हमने ठाना तो करके दिखाया। शुरुआत में करीब 20 लाख रुपए इंवेस्ट किया, लेकिन बदनामी और छुआछूत का शिकार भी होना पड़ा।

लोग बोलते हैं, मय्यत उठाना है क्या? ओछी नजरों से देखते हैं। जिनके यहां हम जाते हैं, उनके अगल-बगल के लोग दूर खड़े होकर सिर्फ देखते रहते हैं। वो अपने पड़ोसी के गुजर जाने पर आते नहीं है। उन्हें पता तक नहीं होता है कि उनके पड़ोसी की मौत हो गई है, ये तो हमारी सोसाइटी हो चली है।

ऐसा भी होता है कि माता-पिता अपने गांव या शहर के किसी फ्लैट में रहते हैं, यहां उनकी मौत हो जाती है और उनके बच्चे विदेशों में रह रहे होते हैं। अचानक आ भी नहीं सकते।

जिनका कोई कंधा देने वाला नहीं होता है, हम उन्हें भी कंधा देते हैं। जिनका कोई राम नाम सत्य है- कहने वाला नहीं होता, हम कहते हैं। जिनका कोई रोने वाला नहीं होता, हम रोते हैं, आंसू बहाते हैं। सभी धर्मों का उनके विधि-विधान से अंतिम संस्कार करते हैं।'

इतने में हमारी नजर प्रकाश यादव पर जाती है।

वो लंच करने के लिए बैठे हुए हैं। अन्न का निबाला लेते हुए कहते हैं, किसी बुजुर्ग के गुजर जाने पर उतना भय तो नहीं लगता, लेकिन छोटे-नौजवान बच्चों के शव को कंधा देने पर शरीर कांप उठता है। हम 4 जने अर्थी उठाए होते हैं, फिर भी वो पहाड़ की तरह लगता है। कफन फाड़ने पर कलेजा दरक जाता है, लेकिन ये तो चक्र है। क्या ही कर सकते हैं।

कई बार तो अंतिम संस्कार से आने के बाद खाने के लिए बैठता हूं, तो निबाला हाथ में ही अटक जाता है, मुंह तक कौर जाते-जाते ठहर जाता। मानो शरीर, मांस का नहीं, मूर्ति का बना हो।

दोस्त बोलते हैं, अरे! ये मय्यत में जाता है दूर रहो इससे, लेकिन जिनके यहां जाता हूं, उनके परिजन बोलते हैं, 'आप लोग पुण्य का काम कर रहे हैं।'

संजय कोरोना महामारी में तो हमने कोरोना वॉरियर्स का काम किया।

एक वाकया मुझे याद है, मुंबई का ही एक स्टूडेंट ऑस्ट्रेलिया पढ़ने गया था, उसके कुछ दिन बाद कोरोना की वजह से लॉकडाउन लग गया और इसी बीच उसकी मां का देहांत हो गया। घर के बाकी लोग भी कोविड पॉजिटिव थे, अब वो बच्चा वापस तो लौट नहीं सकता था। हमने उस मां का अंतिम संस्कार किया। अस्थि विसर्जन तक किया। उन्हें इन सारी विधियों का वीडियो भेजा।

कोरोना में हमने 260 लोगों का अंतिम संस्कार किया था।

संजय 2018-19 का भी एक वाकया दोहराते हैं। एक बार लीलावती हॉस्पिटल से एक कॉल आया था, कॉल मरने वाले के नाना ने किया था। उन्होंने कहा कि हमें अंतिम संस्कार कराना है। दूसरे अंतिम संस्कार में जाने की तरह हम अपने प्रैक्टिस के मुताबिक 4 लोग हॉस्पिटल पहुंचे। साथ में बड़ी एंबुलेंस और उसमें रखा अंतिम संस्कार का पूरा सामान।

जब उजले कपड़े में लिपटा डेड बॉडी सामने आया, तो हमलोग दहल उठे। वो नवजात बच्चे का शव था। वो हमारे लिए पहला तजुर्बा था कि जिस बच्चे ने एक सेकंड भी इस दुनिया को नहीं देखा, उसका भी हमे अंतिम संस्कार करना पड़ेगा। शव को गोद में लेकर जाना होगा, कंधा देना पड़ेगा।

अभी हमारी सर्विस मुंबई, ठाणे, नवी मुंबई, पुणे और नासिक में है। हम पूरे महाराष्ट्र में इसे शुरू करने पर काम कर रहे हैं। इसके बाद देशभर में इसकी शुरुआत करेंगे। अब तक 5000 से ज्यादा अंतिम संस्कार कर चुके हैं।

संजय कहते हैं, हिंदू के लिए पंडित, मुस्लिम धर्म के लिए मौलवी, क्रिश्चियन के लिए फादर, जैन के लिए जैन गुरु... इस तरह से सभी धर्म के गुरु हमारे संपर्क में होते हैं। हम 19 लोग काम कर रहे हैं। जिसका जो धर्म, उसके मुताबिक अंतिम यात्रा, लेकिन जाना तो एक ही जगह है।

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