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चीन में चल रहे अंगों के धंधे की कहानी:पैसों के लिए निकाले जाते हैं कैदियों के ऑर्गन्स, हर साल करीब 1 लाख ट्रांसप्लांट

2 महीने पहलेलेखक: आदित्य द्विवेदी

बचपन में आपने अकसर बड़े-बुजुर्गों से सुना होगा कि उधर मत जाना वरना ‘झोली बाबा’ आ जाएगा। जब हम पूछते झोली बाबा क्या करेगा? तो जवाब मिलता कि वो बच्चों को झोले में भरकर ले जाता है और उनकी आंख, नाक, कान निकालकर बेच देता है।

चीन इस वक्त वही झोली बाबा बन चुका है, जो अपने ही देश के कैदियों के किडनी, लिवर और हार्ट जैसे अंगों का धंधा कर रहा है। दुनिया इसे ‘फोर्स्ड ऑर्गन हार्वेस्टिंग’ कहती है। इसके सबसे बड़े शिकार बन रहे हैं फालुन गोंग और उइगर मुसलमान जैसे हाशिए पर पड़े समुदाय, जिन्हें चीन सरकार अपने लिए रोड़ा मानती है।

आज की मंडे मेगा स्टोरी में चीन के इस स्याह कारनामे की पूरी कहानी जानेंगे…

चीन सरकार का दावा है कि देश में हर साल करीब 10,000 ऑर्गन ट्रांसप्लांट किए जाते हैं। ये संख्या सरकारी है। अलग-अलग इंडिपेंडेंट सोर्सेज का दावा है कि चीन में गुप्त तरीके से हर साल 25,000 से 50,000 लोगों का मर्डर करके करीब 60 हजार से 1 लाख ऑर्गन ट्रांसप्लांट किए जाते हैं। अब सवाल उठता है कि चीन ने इतने बड़े पैमाने पर फोर्स्ड ऑर्गन हार्वेस्टिंग का धंधा कैसे खड़ा किया है? इसे समझने कि लिए हमें पूरी टाइमलाइन जाननी होगी...

फालुन गोंग चीन का एक समुदाय है जिसकी शुरुआत 1992 में आध्यात्मिक गुरू ली होंगजी ने की थी। ये लोग मेडिटेशन की एक खास पद्धति की प्रैक्टिस करते हैं, जिससे बड़े-बड़े रोग मिटने के दावे किए जाते हैं। शुरुआत होने के महज 7-8 साल में इसे मानने वाले की संख्या 10 करोड़ तक पहुंच गई थी। यानी चीन का हर 12 में से 1 व्यक्ति फालुन गोंग का अनुयायी था। तभी चीन में उस वक्त के प्रेसिडेंट जिआंग जेमिन ने फालुन गोंग समुदाय को चीन की शांति के लिए खतरा घोषित कर दिया। इसके बाद से ही लगातार इस धर्म के मानने वालों का दमन जारी है।

उइगर मुस्लिम चीन का एक अल्पसंख्यक समुदाय है जो शिनजियांग प्रांत में रहता है। चीन इन्हें स्वदेशी समूह मानने से इनकार करता है और इन पर आतंकवाद और अलगाववाद के आरोप लगाता रहा है। इसलिए उइगर मुस्लिमों के साथ भेदभाव होता है और उन्हें प्रताड़ित किया जाता है।

चीन में फोर्स्ड ऑर्गन हार्वेस्टिंग के लिए जेल में बंद फालुन गोंग और उइगर जैसे कमजोर तबकों को मारना कई पुराने अनैतिक मेडिकल प्रैक्टिसेज की याद दिलाता है। इतिहास में जाने से पहले एक पोल पर हम आपकी राय जानना चाहते हैं...

आइए, अब इतिहास की कुछ क्रूर मेडिकल प्रैक्टिस के बारे में जानते हैं...

1. नाजियों के यहूदियों पर मेडिकल एक्सपेरिमेंट्स

हिटलर की सेना में एक एक्सपेरिमेंट डिवीजन था, जिसने नाजी कैंप में करीब 70 रिसर्च प्रोजेक्ट चलाए। इसकी निगहबानी जोसेफ मेंगले नाम के खूंखार आर्मी डॉक्टर के हाथ में थी। ये तस्वीर नाजियों के एक कंसंट्रेशन कैंप जाने वाले रास्ते की है।
हिटलर की सेना में एक एक्सपेरिमेंट डिवीजन था, जिसने नाजी कैंप में करीब 70 रिसर्च प्रोजेक्ट चलाए। इसकी निगहबानी जोसेफ मेंगले नाम के खूंखार आर्मी डॉक्टर के हाथ में थी। ये तस्वीर नाजियों के एक कंसंट्रेशन कैंप जाने वाले रास्ते की है।

US होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूजियम के मुताबिक डॉ. मेंगले मरीजों की आंखें निकालकर जमा करता था। यहूदियों पर संक्रामक बीमारियों और रासायनिक हथियारों के टेस्ट किए गए। कम तापमान और कम दवाब वाले चेंबर में डालकर विमानों से जुड़े एक्सपेरिमेंट किए गए।

2. चीनी लोगों पर जापान की यूनिट 731 का कहर

जापानी इंपीरियल सेना ने बायोलॉजिकल हथियारों के टेस्ट के लिए चीन के आम लोगों को चुना। जिम्मेदारी यूनिट 731 के पास थी जिसके चीफ फिजीशियन जनरल शिरो इशी थे। वही इसका नेतृत्व कर रहे थे। इस तस्वीर में जनरल शिरो दिख रहे हैं।
जापानी इंपीरियल सेना ने बायोलॉजिकल हथियारों के टेस्ट के लिए चीन के आम लोगों को चुना। जिम्मेदारी यूनिट 731 के पास थी जिसके चीफ फिजीशियन जनरल शिरो इशी थे। वही इसका नेतृत्व कर रहे थे। इस तस्वीर में जनरल शिरो दिख रहे हैं।

जापानी सेना ने चीनी लोगों पर प्लेग, एंथ्रेक्स, डिसेंट्री, टायफाइड, पैराटायफाइड और कालरा जैसी बीमारियों के एक्सपेरिमेंट किए। इसमें करीब 2 लाख लोग मारे गए। 1990 में जापान ने अपनी यूनिट 731 की करतूतों को माना। 2018 में इस यूनिट में शामिल लोगों के नाम का खुलासा किया गया।

3. बच्चों को अलग-थलग कर देने वाली द मॉन्सटर स्टडी

1939 में यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा के रिसर्चर्स ने थ्योरी दी कि हकलाना एक सीखा हुआ व्यवहार है। इस बात को साबित करने के लिए एक एक्सपेरिमेंट किया गया, जिसे द मॉन्स्टर कहते हैं। ये एक सांकेतिक तस्वीर है।
1939 में यूनिवर्सिटी ऑफ आयोवा के रिसर्चर्स ने थ्योरी दी कि हकलाना एक सीखा हुआ व्यवहार है। इस बात को साबित करने के लिए एक एक्सपेरिमेंट किया गया, जिसे द मॉन्स्टर कहते हैं। ये एक सांकेतिक तस्वीर है।

इसमें अनाथ बच्चों को अलग-थलग कर दिया गया। उनसे लगातार कहा जाता कि वो कुछ दिन में हकलाना शुरू कर देंगे। रिसर्चर्स बच्चों को हकलाने के लक्षण बताते थे। इस एक्सपेरिमेंट में किसी बच्चे ने हकलाना शुरू नहीं किया, लेकिन वो बेचैन और शांत रहने लगे। इस स्टडी में बचे तीन बच्चों ने 2007 में आयोवा यूनिवर्सिटी पर केस कर दिया।

ग्राफिक्सः हर्षराज साहनी

References:-

https://wienerholocaustlibrary.org/exhibition/science-and-suffering-victims-and-perpetrators-of-nazi-human-experimentation/

https://www.bmj.com/content/bmj/293/6548/641.full.pdf

https://www.cdc.gov/tuskegee/timeline.htm

https://dafoh.org/forced-organ-harvesting-in-china/

https://onlinelibrary.wiley.com/doi/full/10.1111/ajt.16969

https://theconversation.com/killing-prisoners-for-transplants-forced-organ-harvesting-in-china-161999

https://www.chinaorganharvest.org/overview/

https://www.chinaorganharvest.org/timeline/

https://ethan-gutmann.com/

https://www.livescience.com/13002-7-evil-experiments.html

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