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संडे जज्बातलाहौर में मुसलमानों ने हिंदू-सिखों को काट डाला:ट्रेनों में भरकर लाशें भेजीं; हवेली छोड़ भारत भागना पड़ा

14 दिन पहलेलेखक: जोगिंदर सिंह तूर

मैं जोगिंदर सिंह तूर, पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट में एडवोकेट हूं। आजादी के 75 साल गुजर गए, लेकिन मेरे लिए बंटवारे का दर्द जस का तस है। हर तरफ खौफ, चीख-पुकार, लहूलुहान लोग और बिखरी पड़ी लाशें। सब कुछ आंखों में तैरता रहता है, जैसे कल की ही बात हो। कई बार तो रात में एकाएक उठकर बैठ जाता हूं। हम जिंदा हिंदुस्तान तो आ गए, लेकिन मन लाहौर में ही रह गया। आज भी उसी बारे में सोचता रहता हूं।

1947 की बात है, तकरीबन 10 साल मेरी उम्र रही होगी। 5वीं में पढ़ रहा था। हम लाहौर के गांव ढोलन में रहते थे। 100 एकड़ जमीन थी हमारी। उस जमाने में अमीरी का एक पैमाना यह भी हुआ करता था कि किसके पास कितने बैल हैं। हमारे पास कुल 14 बैल, 10 भैंसें और 4 ऊंट थे। हम इलाके के जाने-माने रईस परिवारों में गिने जाते थे।

गांव में मुसलमान भी सिखों की तादाद में बराबर थे, लेकिन खेत ज्यादा होने की वजह से सिख ताकतवर थे। मुसलमान हमारे खेतों में काम करते थे। गांव में कभी हिंदू-मुसलमान मजाक में भी हमने नहीं सुना था। मेरे सभी पड़ोसी भी मुसलमान थे।

ये हमारे परिवार की तस्वीर है, जो भारत आने के बाद 1966 में हमने खिंचवाई थी। मैं दूसरी लाइन में (सबसे बाएं) बैठा हूं। मेरे ठीक बगल में बापूजी हैं।
ये हमारे परिवार की तस्वीर है, जो भारत आने के बाद 1966 में हमने खिंचवाई थी। मैं दूसरी लाइन में (सबसे बाएं) बैठा हूं। मेरे ठीक बगल में बापूजी हैं।

स्कूल से आने के बाद मैं ऊंट पर सवार होकर बापूजी के पास खेत पर चला जाता था। वहां मुस्लिम परिवार के बच्चों के साथ खेलता था। अगर रात हो गई, तो एक-दूसरे के घर पर खाना भी खा लेता। एक दफा चाचा बहुत बीमार हो गए। घर में हकीम को बुलाया गया। हकीम साहब ने ऐसी दवाई दी जिसे कबूतर के खून के साथ ही लेना था।

हम सोच में पड़ गए कि अब कबूतर का खून कहां से लाएं। उस वक्त पड़ोस वाली आपा भी हमारे घर पर ही थीं। उन्होंने हकीम वाली बात सुन ली। वो फौरन अपने घर गईं और एक कबूतर लेकर आ गईं। उन्होंने कबूतर मारकर बापूजी को उसका खून दिया। ऐसा था हम लोगों का प्यार।

उधर बंटवारे की चिंगारी सुलग रही थी। हमारे घर में भी चर्चा चल रही थी कि पाकिस्तान बनेगा या नहीं, पाकिस्तान बन गया तो लाहौर छोड़ा जाए या नहीं, हिंदुस्तान जाएंगे तो कहां जाएंगे... वगैरह-वगैरह।

जैसे-जैसे अगस्त का महीना करीब आ रहा था, वैसे-वैसे खौफ भी बढ़ता जा रहा था। दंगों का शोर पास के गांवों तक पहुंच चुका था। सिखों ने घरों से बाहर निकलना बंद कर दिया था। गुलजार रहने वालीं गलियां वीरान हो गई थीं। मुझे भी घर से बाहर निकलने नहीं दिया जाता था।

एक दिन नजर बचाकर कुएं पर दोस्तों के साथ खेलने चला गया। वहां देखा कि मेरी क्लास में पढ़ने वाला लड़का, जो मेरा जिगरी यार था, वो कुएं पर बरछी लिए घूम रहा था। मैं उसके पास पहुंचा और खुशी से बोला कि चल खेलते हैं। उसने गुस्से से मेरी तरफ देखकर बरछी लहराया और बोला कि 'इससे मार दूंगा तुझे...।' मैं बहुत ज्यादा डर गया। भागते हुए घर आया और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। मेरी सांस फूल रही थी।

अगले दिन खबर आई कि मुसलमान सिखों और हिंदुओं की गाय-भैंस खोलकर ले जा रहे हैं। चाचा ने कहा कि हम अपने जानवरों को बचाने के लिए छत पर पहरा देंगे। वे फरीदकोट से खरीदी हुई राइफल लेकर छत पर चढ़ गए। वहां से हमारा कुआं दिखाई देता था। हमारे जानवर वही बंधे रहते थे। मैं भी चाचा के साथ खड़ा था।

तभी एक मुसलमान हमारा मवेशी खोलने के लिए आया, चाचा ने उस पर गोलियां दागनी शुरू कर दीं। इस बीच कुछ और मुसलमान वहां पहुंच गए। दोनों समुदायों में झड़प हुई। इसमें एक मुसलमान को बरछी लग गई।

उसकी आंतें बाहर लटकने लगीं। कुछ लोगों ने उसे हमारे घर के सामने बने सीमेंट के थड़े पर लाकर बैठा दिया। मैंने पहली दफा इस तरह किसी की आंत को लटकते हुए देखा। मुझे अब तक वो सीन जस का तस याद है।

दूसरे गांवों में भी यह बात फैल गई कि ढोलन में एक मुसलमान को बरछी से मारा गया है। धीरे-धीरे माहौल गरमाने लगा। तब तक भारत-पाकिस्तान के बीच बॉर्डर लाइन खींची जा चुकी थी।

हिंदुओं और सिखों के गांवों पर हमले तेज हो चुके थे। घर पर मशविरा हुआ कि अब हमें गांव छोड़ना पड़ेगा। यहां रहने का मतलब मौत को गले लगाना था। घर की औरतों की अस्मत लुटते हुए देखना था।

गांव में ऐलान हुआ कि गांव ढोलन से जो लोग हिंदुस्तान जाना चाहते हैं, वे रेलवे स्टेशन के साथ लगती अनाज मंडी पर शाम 4 बजे तक इकट्ठा हो जाएं। वहां से काफिला हिंदुस्तान की ओर रवाना होगा। बापू जी ने तय किया कि हम सब भी अब यहां नहीं रहेंगे। हमारा 20 लोगों का संयुक्त परिवार था। जैसे ही पड़ोसी मुसलमान परिवार को पता लगा कि हम जा रहे हैं, वो घर आ गए।

हाथ जोड़कर कहने लगे कि इस काफिले पर मुसलमानों ने हमला करने की योजना बनाई है। आप लोग इस काफिले के साथ मत जाओ, यहीं रह जाओ, हम आपकी रक्षा करेंगे। बापू जी ने घर में और काफिले में जा रहे लोगों से यह बात बताई। कोई गांव में रुकने के लिए राजी नहीं हुआ। वे सिर्फ एक परिवार को ही वापस ला सके।

काफिला रवाना हो गया। बापू जी काफिले को देखते रहे। हम घर वापस आ गए। वो मुसलमान परिवार हमारे ही घर में रहने लगे ताकि कोई हम पर हमला न कर सके।

रात के करीब 12 बज रहे थे। बाहर से आवाज आई कि दरवाजा खोलो, हम जख्मी हो गए हैं। ये वे ही लोग थे जो हिंदुस्तान जाने के लिए काफिले में निकले थे। बापूजी ने दरवाजा खोला, तो सामने देखा कि जख्मी लोगों की भीड़ थी।

योजना के मुताबिक गांव के बाहर नहर पर पहुंचने के बाद मुसलमानों ने काफिले पर हमला कर दिया था। जो जख्मी लोग भाग कर हमारी हवेली पर आ सके वो आ गए। हमारी हवेली काफी बड़ी थी और 250 तक लोग रह सकते थे।

बापूजी ने गांव के एक बुजुर्ग हकीम अली मोहम्मद के घर संदेशा भेजा कि वे हवेली पर आकर जख्मी लोगों को मरहम-पट्टी करें। वो हकीम सारी रात जख्मी हिंदुओं और सिखों की मरहम पट्टी करता रहा।

मुझे आज भी उस बुजुर्ग की छोटी-छोटी सफेद दाढ़ी, सिर पर सफेद पगड़ी और उसकी लंबी कद-काठी याद है। ऐसा लगता है कल की ही बात है।

काफिले में परिवार के 16 लोग हिंदुस्तान के लिए रवाना हुए थे, जिनमें से 10 लोग मारे गए। हमें पता लगा कि एक अकेली 19-20 साल की लड़की जख्मी हालत में किसी तरह से काफिले से बचकर अपने घर वापस लौटी है।

कुछ मुसलमानों ने उसके घर के बाहर ताला लगा दिया था। ताकि जब माहौल ठंडा हो, तो उसे उठाकर ले जाएंगे। मैं भले 10 साल का था, लेकिन हालात ने मुझे मैच्योर बना दिया था। मैं फौरन उस लड़की का हाल जानने के लिए घर से निकल गया।

उसके दरवाजे पर पहुंचा तो देखा कि वो दीवार के सहारे घुटनों पर सिर रखकर बैठी है। आज तक उसका चेहरा नहीं भूल सका।

मैंने घर आकर दादा जी को बताया। उनका गांव में रसूख अच्छा था। उनका नाम त्रिलोक सिंह था, लेकिन गांव में लोग उन्हें शाह जी बोला करते थे। दादा जी ने एक आदमी को भेजकर उसके घर का ताला तुड़वाया। ताला तोड़ने वाला शख्स मुसलमान था। उसने बाइज्जत उस लड़की को हमारे घर पहुंचा दिया।

उधर हिंदुस्तान से जख्मी मुसलमानों का काफिला हमारे आसपास के गांवों में पहुंच रहा था, जिन्हें देखकर मुसलमानों का खून खौल रहा था। बाबूजी का भी कहना था कि हिंदुस्तान में मुसलमानों के साथ अच्छा नहीं हो रहा है।

अब तो ये नौबत आ गई थी कि जो भी हिंदू या सिख घर से बाहर निकल रहा था, मारा जा रहा था। पड़ोस में रहने वाले बैंका की हत्या मुसलमानों ने कर दी थी। खेत में कटी हुई टांग के साथ उसकी लाश बिखरी पड़ी थी। उसे देखकर मैं और चाचा तो सिहर गए। दौड़ते-भागते घर पहुंचे।

अब तो पड़ोसी मुसलमानों को दूसरे मुसलमानों ने तंग करना शुरू कर दिया कि तुम लोगों ने सिखों को पनाह दी है। पड़ोसियों ने बापूजी से अपनी बेबसी जाहिर की। उनका कहना था कि अब हालात उनके वश में नहीं हैं। दूसरे गांव वालों ने ढोलन पर हमले की तैयारी कर ली है, अब हम उन्हें रोक नहीं सकेंगे।

बापूजी कभी खुद को देखते, तो कभी मेरी दो बड़ी बहनों और घर की दूसरी औरतों को।

कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। यहां से निकलकर भागने का भी माहौल नहीं था। सबके चेहरे पीले पड़े थे। तभी पड़ोसी मुसलमान बोले कि बुरा न मानो तो एक रास्ता है बचने का। आप लोग अपने सिर के बाल कटवा लो, हम गांव में ऐलान कर देंगे कि ये लोग मुसलमान बन गए हैं।

बेबेजी ने कहा कि जो होता है होने दो, कोई बाल नहीं कटवाएगा। बापूजी और दादा जी का कहना था कि अपनी जिद की वजह से हम इतने लोगों को नहीं मरवा सकते। घर की औरतों की इज्जत नीलाम होते नहीं देख सकते। सभी ने अपने-अपने बाल कटवा लिए। गांव में अफवाह फैल गई कि ढोलन गांव के सिख मुसलमान बन गए हैं। कुछ दिन ऐसे निकल गए।

खैर यह भी ज्यादा दिनों तक नहीं चला। उन लोगों को पता चल गया कि ये सब सिखों ने अपनी जान बचाने के लिए किया है। ये लोग तो अब भी गुरबाणी पढ़ते हैं। हमसे कहा गया कि तुम लोग गाय का मांस खाओगे, तभी हम मुसलमान मानेंगे।

बापूजी इस पर भी राजी हो गए। गांव में गाय काटी गई। उसका मांस चूल्हे पर चढ़ाया गया। अंदर ही अंदर सब रो रहे थे, अरदासें कर रहे थे। तभी हमारे गांव में हिंदुस्तान से जख्मी मुसलमानों का भूखा-प्यासा काफिला पहुंचा। जो गाय का मांस हमारे लिए पकाया गया था, वो उन मुसलमानों को खिला दिया गया। तब जाकर हमने चैन की सांस ली।

अगली रात तकरीबन 12 बजे की बात है। किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया। बापूजी ने दरवाजा खोला तो देखा कि एक हथियारबंद फौजी सामने खड़ा है। दरअसल मेरे ताया का एक बेटा उस काफिले के साथ किसी तरह सरहद पार फिरोजपुर पहुंच गया था। उसने वहां फौजियों से मदद मांगी कि मेरा परिवार पाकिस्तान में है। मैं उसे यहां लाना चाहता हूं।

फिरोजपुर में वह छावनी पहुंचा और वहां के कमांड ऑफिसर से मिला। उन्हें हमारे गांव का सारा हाल बताया। कमांड ऑफिसर अच्छे इंसान थे। उन्होंने मेजर रैंक के एक ऑफिसर को यह जिम्मेदारी दी कि वे ढोलन से हिंदुओं और सिखों को सुरक्षित भारत लेकर आए। वह ऑफिसर करीब 10 जवानों के साथ ढोलन आया। भारत से फौज आने का संदेश पूरे गांव में फैल गया।

ये मेरी पत्नी मंजीत कौर हैं। 1967 में हमारी शादी हुई थी। मन हल्का करने के लिए इनसे भी बंटवारे का दर्द शेयर करता रहता हूं।
ये मेरी पत्नी मंजीत कौर हैं। 1967 में हमारी शादी हुई थी। मन हल्का करने के लिए इनसे भी बंटवारे का दर्द शेयर करता रहता हूं।

लोग रेलवे स्टेशन पर इकट्ठा होना शुरू हो गए। आखिरी बार सभी ने हवेली को देखा और सारा सामान छोड़कर सिर्फ पोटली में बंधा खाना और शरीर पर पहने कपड़े के साथ वहां से निकल पड़े। जैसे लाहौर की तहसील पर हमारा काफिला पहुंचा, तो वहां के थानेदार ने रोक लिया, ताकि मुसलमान इकट्ठा हो जाएं और हमें मार डालें।

हमारे फौजी अफसर ने कहा कि अगर काफिला आगे नहीं जाने दिया, तो थाने को जला देंगे। थानेदार डर गया। उसने काफिले को जाने के लिए रास्ता दे दिया। हम घने जंगल के रास्ते से आगे बढ़ने लगे, तभी कुछ दूर पर हाथों में बरछी और गंडासे लिए कुछ लोग दिखे। वे हमारी तरफ तेजी से बढ़ रहे थे।

बापूजी काफी घबराए हुए थे। फौजी ऑफिसर ने कहा कि आप परेशान नहीं होइए। मैं चाहता हूं कि वे लोग मेरी मशीन गन की रेंज में आ जाए, फिर फायरिंग करेंगे, लेकिन जैसे ही हमलावरों की नजर मशीन गन पर गई, वे पीछे हट गए।

तब तक रात हो चुकी थी। तय हुआ कि नहर के पास ही हमारा काफिला रुकेगा। हम लोग भूखे ही सो गए। फौजी ऑफिसर रातभर हमारी रखवाली करते रहे और इधर-उधर फायरिंग करते रहे, ताकि कोई हमला नहीं करे। उनकी गोलियों की गूंज आज भी मेरे कानों में जिंदा है।

अगले दिन सुबह होते ही हमारा काफिला आगे बढ़ने लगा। दोपहर बाद हम लोग फिरोजपुर पहुंच गए। यानी अब हम हिंदुस्तान की जमीं पर दाखिल हो चुके थे। हमारे लिए नई शुरुआत तो थी, लेकिन सब कुछ गंवाने के बाद, सब कुछ खोने के बाद। कुछ दिन वहां रुकने के बाद हम 6 महीने कुरुक्षेत्र में रहे, फिर हमें नाभा में जमीनें दी गईं।

जिंदगी ऐसे ही चलती रही। हम लोगों ने खेती करनी शुरू कर दी थी। करीब 17 साल बाद यानी 1964 में किसी काम से सहारनपुर गया था। काम खत्म करने के बाद घर वापस लौटने के लिए स्टेशन पर बैठा अमृतसर फ्लाइंग मेल का इंतजार कर रहा था।

तभी अचानक किसी ने आवाज दी कि बाबूजी 30 पैसे दे दो। सामने दुबला-पतला मैले कपड़े में एक जवान शख्स खड़ा था। वो गिड़गिड़ा रहा था कि 30 पैसे दे दीजिए।

कुछ देर बाद उसकी आंखों से आंसू झरने लगे। वो ऐसे रो रहा था कि मैं भी अंदर से हिल गया। इसके बाद उसने अपनी कहानी सुनाई। कहने लगा- मेरा नाम दिलबाग सिंह था। लोग मुझे बग्गा बुलाते थे। पहलवानी का शौक था। गांव के लोग मुझे खाने के लिए घी और बादाम देते थे।

फिर बंटवारें की आग भड़की। दंगे शुरू हो गए। जो लोग मुझे अखाड़े में कंधे पर बैठाकर पूरा गांव घुमाते थे, उन्होंने मेरे घर में घुसकर पूरे परिवार को काट दिया। मैं उस दिन घर पर नहीं था, तो जान बच गई।

मेरा इस धरती पर कोई नहीं है। तब से भीख मांगता हूं। उसकी हालत देखकर मैं भी रोने लगा कि मेरे साथ भी पाकिस्तान में यही सब हुआ था। मैंने पूछा कि 30 पैसे के क्या करने हैं? वो बोला कि अफीम लेनी है। रोटी तो कहीं न कहीं से मिल ही जाती है। मैंने अपने किराए के पैसे पास रखकर सारे पैसे उसे दे दिए।

इन दिनों मेरा लाहौर कुछ ऐसा दिखता है। सोशल मीडिया पर कभी-कभी लाहौर की तस्वीर दिख जाती है। फिर बचपन की यादें आखों के सामने तैरने लगती हैं।
इन दिनों मेरा लाहौर कुछ ऐसा दिखता है। सोशल मीडिया पर कभी-कभी लाहौर की तस्वीर दिख जाती है। फिर बचपन की यादें आखों के सामने तैरने लगती हैं।

मेरा देश तो पाकिस्तान था, मेरी जन्मभूमि था। मरने से पहले मैं एक दफा पाकिस्तान जाकर उस पड़ोसी परिवार का शुक्रिया करना चाहता हूं, जिसने इतने दिन तक हमारी इफाजत की। मैं बंटवारे की कहानियां सभी को सुनाता हूं, ताकि थोड़ा तो हमारा दर्द कोई बांटे। बंटवारा दुर्भाग्य था, जो आज हिंदू-मुसलमान करने वाले कभी महसूस नहीं कर सकते।

जोगिंदर सिंह तूर ने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की हैं।

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