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चुनाव विशेषज्ञ संजय कुमार से बातचीत:बंगाल में मुद्दा था तो बस ये कि 'दीदी' चाहिए या नहीं, 3M यानी मुस्लिम, महिला और ममता के चलते BJP पर भारी पड़ी TMC

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी
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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (TMC) 213 सीटों के साथ तीसरी बार सत्ता में आ गई है। ममता बनर्जी ने तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ भी ले ली है। CPM और कांग्रेस का गठबंधन खाता भी नहीं खोल सका। हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले ऊंची छलांग लगाई।

2016 में 3 सीटें भाजपा के खाते में आईं थीं, वहीं 2021 में यह आंकड़ा 77 हो गया। स्ट्रॉन्ग एंटी इनकंबेंसी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के आरोप के बावजूद भी बंगाल में ममता बनर्जी को तीसरी बार चुने जाने की वजहें क्या रहीं?

ऐसे ही सवालों को लेकर दैनिक भास्कर ने पॉलिटिकल एनालिस्ट और सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) में प्रोफेसर संजय कुमार से बातचीत की। पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश...

पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजों में कौन से फैक्टर सबसे ज्यादा प्रभावी रहे?

बंगाल चुनाव नतीजों का विश्लेषण करने के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि 3M फैक्टर- मुस्लिम, महिला और ममता, बंगाल के चुनाव पर हावी रहे। पहली बात जो TMC के पक्ष में गई, वह यह कि भाजपा के पास कोई ऐसा बड़ा बंगाली चेहरा नहीं था जो ममता को चुनौती दे सके। इस बात का ममता को सबसे ज्यादा फायदा मिला।

पिछले चुनावों का ट्रेंड इस बार भी जारी रहा। हर वर्ग और हर समुदाय की महिला वोटरों ने ममता बनर्जी को वोट किया। ऐसा क्यों?

सभी वर्गों की महिलाओं का अच्छा-खासा वोट ममता को मिला। इसके अलावा 75 फीसद मुस्लिम समुदाय का वोट भी ममता की झोली में गिरा। मतुआ समुदाय पर भाजपा ने दांव लगाया, बहुत कोशिश भी की। लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा TMC के खाते में गया।

कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की 'लोकप्रियता' ने चुनाव नतीजों में बड़ी भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दो दर्जन से ज्यादा रैलियां भी इस असर को कम नहीं कर पाईं। वैसे भी पिछले राज्य चुनावों के विश्लेषण बताते हैं कि नरेंद्र मोदी का मैजिक केंद्र के मुकाबले राज्य में कम ही चलता है।

चुनाव प्रचार में विकास के मुद्दे गायब थे, व्यक्तिगत और पार्टी आधारित आरोप-प्रत्यारोप का दौर खूब चला, क्या इसने भी चुनाव नतीजों को प्रभावित किया?
बिल्कुल, अगर आप भाजपा नेताओं के भाषणों को ध्यान से सुनें तो इनमे 'ममता पर अटैक' साफ सुनाई देता है। भाषा की मर्यादा तक खत्म हो गई थी। भाजपा ने बहुत ज्यादा आक्रामक रुख अपनाया। आरोप-तंज के मामले में भाजपा ने एक तरह से 'ओवर डू' किया। उधर, ममता बनर्जी ने भी अपने विकास कार्यों को गिनाने की जगह वार पर पलटवार की राजनीति के तहत प्रचार किया। भाजपा ने प्रचार के दौरान जीतने की स्थिति में विकास कार्यों का कोई भी खाका पेश नहीं किया। नतीजा यह हुआ कि पूरा चुनाव ममता के इर्द-गिर्द सिमट गया। अंतिम चरणों में ममता ने खूब सहानुभूति बटोरी। जिसका नतीजा यह हुआ कि अंतिम दौर की 35 सीटों में से 31 टीएमसी को मिलीं।

पांच साल में 3 से 77 सीटों तक की यात्रा भाजपा के लिए बड़ी उपलब्धि है या 200 के आंकड़े को पार करने के दावे को पूरा न कर पाना नाकामयाबी है?
मेरे नजरिए से नतीजों को देखें तो TMC के मुकाबले भाजपा थोड़ी कमजोर ही ठहरती है, बावजूद इसके भी भाजपा ने सीटों के लिहाज से तकरीबन 75 गुना ऊंची छलांग लगाई। विश्लेषण के दौरान सामने आए दो आंकडे़ इसे प्रमाणित करते हैं।

पहला, वोट प्रतिशत देखें तो जहां भाजपा को कुल वोटों का तकरीबन 38 फीसद मिला तो वहीं, TMC को तकरीबन 48 फीसद मिला। वोट प्रतिशत के लिहाज से देखें तो TMC को 10 फीसद के करीब ज्यादा वोट मिले। यानी जनता ने भाजपा के मुकाबले TMC को ज्यादा पसंद किया। दूसरा, भाजपा की 22 सीटें ऐसी थीं जहां जीत का मार्जिन 5000 से कम था। यानी अगर एक फीसद वोट भी इधर-उधर होता तो भाजपा 55 सीटों पर ही जीत हासिल कर पाती। 36 सीटें ऐसी थीं जहां अंतर 10000 के करीब रहा। यानी TMC से भाजपा की जीत का अंतर बहुत ज्यादा नहीं था। लिहाजा भाजपा अपने दावे के मुकाबले वोट प्रतिशत को अपने पाले में लाने में भी कमजोर ही नजर आती है।

क्या मौजूदा सरकार के कामकाज को लेकर जनता ने कोई मूल्यांकन नहीं किया?
देखिए, बंगाल के लोगों में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार को लेकर नाराजगी थी, लेकिन यह मुद्दे इतने हावी नहीं थे कि वोटों में तब्दील हो सकें। वैसे भी लोगों को लगता है कि अगर उन्हें बुनियादी चीजें, सड़क, बिजली, पानी मिल रहा है तो फिर भ्रष्टाचार बहस का मुद्दा तो होता है, लेकिन सरकार चुनने में इसकी भूमिका नहीं होती। इसलिए कट मनी, तोलाबाजी जैसे आरोप TMC का नुकसान नहीं कर पाए।

कांग्रेस और लेफ्ट खाता भी नहीं खोल पाए, इसका फायदा किसे मिला?
जाहिर है, TMC को इसका फायदा मिला। महामारी का हवाला देकर राहुल गांधी ने अंत में चुनाव प्रचार बंद कर दिया। लेफ्ट तो वैसे भी सुस्त ही था। इनके वोट भी TMC को मिले। अगर ये दोनों, यानी तीसरा मोर्चा चुनाव दम से लड़ता तो TMC को नुकसान होता। भाजपा का इसमें फायदा था।

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