टोक्यो में बैठे नेताजी ने आजाद कराया था मोइरांग:26 दिन चली जंग में INA ने अंग्रेजों को चटाई धूल, फहराया था तिरंगा

2 महीने पहलेलेखक: मोइरांग से मुबाशिर राजी

'इसलिए हम आजाद हैं’ सीरीज की 11वीं कड़ी में पढ़िए मणिपुर में हुए युद्ध की ऐतिहासिक कहानी…

मणिपुर की राजधानी इंफाल से करीब 35 किलोमीटर दूर विष्णुपुर जिले में मोइरांग नाम की जगह है। मार्च 1944 की एक सुबह कांगलेन नाम का एक बूढ़ा मोइरांग से करीब 5 किलोमीटर दूर त्रोंग्लोबी के जंगल में किसी काम से गया था, जहां वो अचानक जापानी सैनिकों से टकरा गया। हालांकि उसका डर तब खुशी में बदल गया, जब जापानी सेना के साथ उसे सुभाष चंद्र बोस की INA यानी आजाद हिंद फौज के सैनिक नजर आए।

जब कांगलेन की मुलाकात जापानी सैनिकों से हुई, तो पहले वे डर गए। बाद में जब उन्हें पता चला कि ये नेताजी के सैनिक हैं, तब उनकी जान में जान आई। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती
जब कांगलेन की मुलाकात जापानी सैनिकों से हुई, तो पहले वे डर गए। बाद में जब उन्हें पता चला कि ये नेताजी के सैनिक हैं, तब उनकी जान में जान आई। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती

मोइरांग इतिहास का वो पन्ना है, जहां आमने-सामने की जंग में पहली बार भारतीय सेना ने ब्रिटिश सेना को धूल चटा दी थी। ब्रिटिश सेना पीछे हटने के लिए मजबूर हो गई और जापानी सेना की मदद से INA ने मोइरांग और आस-पास के 1500 वर्ग मील, यानी करीब 3885 वर्ग किलोमीटर के इलाके को आजाद करा लिया था। हालांकि खुद सुभाष चंद्र बोस ने मोइरांग की धरती पर कभी कदम नहीं रखा था।

दिल्ली से दूरी ने आजाद मोइरांग की कहानी को भुलाया

मोइरांग के INA मेमोरियल कॉम्प्लेक्स में नेताजी की ये प्रतिमा लगी है।
मोइरांग के INA मेमोरियल कॉम्प्लेक्स में नेताजी की ये प्रतिमा लगी है।

जब मैं इंफाल से मोइरांग की तरफ ट्रैवल करता हूं, तो हरे-भरे गांव और पहाड़ियों से गुजरते हुए लोक्तक झील से घिरे इतिहास के एक टुकड़े में दाखिल हो जाता हूं। मार्च 1944 से जुलाई 1944 के बीच जब यहां के लोग जापानी सेना और INA के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना से जंग लड़ रहे थे, उसी दौरान पूरे देश में अहिंसा को हथियार बनाकर आजादी का संघर्ष भी चल रहा था।

मोइरांग, दिल्ली से पहले आजाद हुआ, लेकिन ये कहानी 2400 किलोमीटर की दूरी तय नहीं कर पाई। इसी छोटे से शहर के म्यूजियम, वॉर मेमोरियल और लोगों की यादों में सिमटकर रह गई।

सुभाष चंद्र बोस ने 1945 में INA के शहीदों की याद में सिंगापुर में एक स्मारक बनवाया था, जिसे अंग्रेज सेना ने कब्जा करने के बाद तबाह कर दिया। 23 सितंबर 1969 को इंदिरा गांधी ने सिंगापुर में बने INA के स्मारक की तर्ज पर मोइरांग में भी एक स्मारक बनवाया, जो आज भी यहां मौजूद है।

INA के म्यूजियम में आज भी तब की धरोहरों को सहेज कर रखा गया है। यहां वॉर से जुड़ी अलग-अलग तस्वीरें लगी हैं। जिसके नीचे लिखा है- INA IN ACTION
INA के म्यूजियम में आज भी तब की धरोहरों को सहेज कर रखा गया है। यहां वॉर से जुड़ी अलग-अलग तस्वीरें लगी हैं। जिसके नीचे लिखा है- INA IN ACTION

बर्मा के रास्ते भारत में घुसी थी जापानी सेना

ये वो दौर था जब सुभाष चंद्र बोस टोक्यो में थे और ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आजादी की जंग के लिए सोवियत संघ, नाजी जर्मनी और जापान में एक मजबूत साथी की तलाश कर रहे थे। सेकेंड वर्ल्ड वॉर ने उनके लिए हालात थोड़े आसान बना दिए थे। 21 अक्टूबर 1943 को नेताजी ने सिंगापुर में भारत की प्रोविजनल गवर्नमेंट की घोषणा की। दो दिनों बाद ही प्रोविजनल गवर्नमेंट ने ब्रिटेन और मित्र देशों की सेना के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी।

जापानी सत्ता से समर्थन मिलने के बाद नेताजी भारत के क्षेत्र में प्रवेश के लिए तकरीबन तैयार थे। 18 मार्च 1944 को जापान की सेना और INA की एक टुकड़ी बर्मा के रास्ते भारत में घुसी। खासतौर पर मणिपुर से एंट्री ली। जापान ने मणिपुर में INA की मदद के लिए करीब 3 हजार सैनिक भेजे थे। ब्रिटिश सेना के भी करीब 3 हजार जवान इस इलाके में तैनात थे।

26 दिनों में ब्रिटिश सेना को पीछे धकेला, 54 गांवों ने दिया साथ

मोइरांग कॉलेज के पॉलिटिकल साइंस डिपार्टमेंट के रिटायर्ड HOD युमखाइबम मधु सिंह बताते हैं- मणिपुर के इस इलाके में 3 अलग-अलग मोर्चे पर लड़ाई लड़ी गई थी। INA वॉर म्यूजियम में मौजूद रिकॉर्ड के मुताबिक इस युद्ध में इलाके के 54 गांव शामिल थे। मोइरांग इन्हीं में से एक था। 13 अप्रैल 1944 को ब्रिटिश सेना पीछे हट गई और अगले ही दिन 1500 वर्ग के इस हिस्से को भारत का पहला आजाद इलाका घोषित कर दिया गया।

INA म्यूजियम में लगी इस पट्टी पर उस ऐतिहासिक जंग और तिरंगा फहराने की तारीख दर्ज है।
INA म्यूजियम में लगी इस पट्टी पर उस ऐतिहासिक जंग और तिरंगा फहराने की तारीख दर्ज है।

14 अप्रैल 1944 को शाम 5:30 बजे INA के कर्नल शौकत अली मलिक ने यहां तिरंगा लहराया था। हालांकि मोइरांग में आज वाला तिरंगा नहीं फहराया गया था, ये INA का तिरंगा था, जिस पर चक्र की जगह एक टाइगर मौजूद था। शौकत अली मलिक INA की खुफिया विंग के प्रमुख थे और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप ‘बहादुर’ के लीडर भी थे।

शौकत ने झंडा फहराने के बाद कहा था- ‘’मणिपुर के लोगों... ये भारतीय भूमि की पहली जगह है, जहां अंग्रेजों को हराकर INA ने आजादी दिलाई है। यहां भारतीय सेना और जापानी सेना के जवानों ने शहादत दी है, ये आज से पावन भूमि है।’’

INA की खुफिया विंग के प्रमुख शौकत अली INA का तिरंगा फहराते हुए। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती
INA की खुफिया विंग के प्रमुख शौकत अली INA का तिरंगा फहराते हुए। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती

अब वापस उसी बूढ़े कांगलेन की कहानी पर लौटते हैं...

कांगलेन से INA सैनिकों के बारे में सुनने के बाद इस कहानी में कोइरेंग सिंह की एंट्री हुई। ये वही कोइरेंग हैं, जो 1 जुलाई 1963 को मणिपुर के पहले चीफ मिनिस्टर भी बने। जब INA इस इलाके में पहुंची तो मोइरांग और आस-पास के इलाकों के लीडर कोइरेंग ही थे। साथ ही वे निखिल मणिपुरी महासभा के एक्टिव मेंबर भी थे।

14 अप्रैल को जब मोइरांग की पवित्र जगह कांगला पर तिरंगा फहराया गया तो कोइरेंग भी कर्नल शौकत अली के साथ मौजूद थे। कांगला में जब झंडा फहराया जा रहा था, तब वहां 50 से 60 लोग मौजूद थे।

इसके बाद INA ने मोइरांग में एक एडवांस हेडक्वार्टर बनाया। इसे एच नीलामणि सिंह के घर पर स्थापित किया गया था। गोलियों के छेद से भरे हुए इस स्ट्रक्चर को आज भी देखा जा सकता है। तमाम टूरिस्ट इसे देखने पहुंचते हैं। बाद में एच नीलामणि मणिपुर के कैबिनेट मिनिस्टर भी बने।

इसी झंडे को INA ने 14 अप्रैल 1944 को फहराया था। फरवरी 1942 में इसकी स्थापना रास बिहारी बोस ने सिंगापुर में की थी। अगस्त 1943 में उन्होंने इसकी कमान नेताजी को सौंप दी थी।
इसी झंडे को INA ने 14 अप्रैल 1944 को फहराया था। फरवरी 1942 में इसकी स्थापना रास बिहारी बोस ने सिंगापुर में की थी। अगस्त 1943 में उन्होंने इसकी कमान नेताजी को सौंप दी थी।

करीब 3 महीने तक आजाद रहा था ये इलाका

14 अप्रैल 1944 को आजाद होने के बाद से 16 जुलाई 1944 तक करीब 3 महीने इस इलाके पर INA और जापानी सेना का कब्जा रहा। इस दौरान यहां कई छोटे-छोटे घरेलू युद्ध हुए। मोइरांग के इस हेडक्वार्टर का इस्तेमाल इन्हीं युद्धों और टोक्यो में नेताजी से संपर्क बनाने के लिए किया जाता था। INA ने यहां से तिदिन लाइन पर करीब तीन महीने तक कंट्रोल बनाए रखा था, ये अब नेशनल हाईवे नंबर 102 है। उन दिनों इंफाल को मोइरांग इलाके से जोड़ने वाले इस रास्ते को ही तिदिन लाइन कहा जाता था।

अंग्रेज सेना ने एक हजार से ज्यादा घर जला दिए थे

युमखाइबम मधु सिंह बताते हैं कि सबसे भयंकर युद्ध निंगथौखोंग में लड़ा गया। ब्रिटिश सेना भले ही पीछे हट गई थी, लेकिन इलाके के उन लोगों पर कड़ी नजर थी जो INA का साथ दे रहे थे। अंग्रेज सेना ने मोइरांग पर भी कहर ढाया और करीब 1000 घरों को जला दिया। हालात ऐसे हो गए थे कि हेडक्वार्टर के अलावा यहां सात या आठ घर ही रह गए थे, सभी लोग जंगलों में भाग गए थे।

INA के उस अभियान में मणिपुर और मोइरांग के आसपास के कई गांवों ने भरपूर साथ दिया था। तस्वीर में गांव वाले INA के सैनिकों को खाना खिला रहे हैं। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती
INA के उस अभियान में मणिपुर और मोइरांग के आसपास के कई गांवों ने भरपूर साथ दिया था। तस्वीर में गांव वाले INA के सैनिकों को खाना खिला रहे हैं। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती

जब युद्ध अपने चरम पर था, तो कोइरेंग सिंह ने गांव वालों की मदद से तीन महीने तक करीब 10 हजार जवानों के खाने का इंतजाम किया। हालांकि पीछे हटने से बौखलाई ब्रिटिश सेना ने इंफाल के पास दो बम गिराए और हवाई मार्ग पर पूरी तरह कब्जा कर लिया। सेकेंड वर्ल्ड वॉर में हुए नुकसान और कुछ स्ट्रैटजिक रीजन के चलते भारत और जापान की सेनाएं मणिपुर में पीछे हट गई थीं। मानसून को भी इसकी बड़ी वजह माना जाता है।

कोइरेंग और कांगलेन को देखते ही गोली मरने का आदेश दिया

INA की मदद करने वाले एम कोइरेंग सिंह और उनके 5 साथियों की रिपोर्ट ब्रिटिश इंटेलिजेंस तक पहुंच चुकी थी। अंग्रेजों ने कोइरेंग सिंह, एच नीलामणि, के गोपाल सिंह, एम सनाबा सिंह और मिस्टर कांगलेन को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया था। मई के तीसरे हफ्ते में ये लोग मोइरांग से रंगून पहुंचे और INA में शामिल हो गए। दावा किया जाता है कि इन सभी से यहां नेताजी खुद आकर मिले थे।

जापान भी नहीं भूला अपने शहीदों को
मोइरांग के पास माइबम लोपचुंग में जापान ने अपने शहीद सैनिकों की याद में 'भारतीय शांति मेमोरियल' बनाया है। जापान के लोग आज भी जापानी सेना में उस दौरान शहीद हुए सैनिकों की याद में मोइरांग आते हैं। भारत-जापान की सेना ने जिन मोर्टार और बम-बारूद का इस्तेमाल किया था, उनमें से कई मणिपुर की अलग-अलग जगहों पर मिलते रहते हैं।

लाइव मोर्टार भी मिले हैं। इन्हें INA के म्यूजियम में संरक्षित किया गया है। इस म्यूजियम को स्थानीय लोगों ने बनाया था जिसे अब राज्य का आर्ट्स एंड कल्चर डिपार्टमेंट चलाता है। म्यूजियम एक्सपर्ट एन दविजमणि सिंह ने बताया कि यहां मैनपावर की बहुत ज्यादा कमी है और फंड्स की जरूरत है। कई बार अनुरोध करने के बाद भी केंद्र सरकार ने INA म्यूजियम की देखरेख की जिम्मेदारी नहीं ली है।

स्पेशल कर्टसी :

  • INA वार म्यूजियम मोइरांग।
  • म्यूजिक गाइड और एक्सपर्ट एन दविजमणि सिंह।
  • लोकल टूर गाइड : ईशो और सूरज चानम।
  • स्पेशल इनपुट : वाई मधु सिंह

एडिटर्स बोर्ड: निशांत कुमार, अंकित फ्रांसिस और इंद्रभूषण मिश्र

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