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स्टार राइटरप्रोफेसर शहाबुद्दीन के उस सवाल ने सिखा दिया:मुश्किल कितनी भी बड़ी हो, हार न मानो…हल जरूर निकलेगा

2 महीने पहले
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आनंद कुमार का नाम भारत में शिक्षा के क्षेत्र से जुड़ा हर व्यक्ति जानता है, फिर चाहे वह शिक्षक हो या छात्र। गरीब बच्चों के लिए शुरू किए गए सुपर-30 प्रोग्राम के जरिये मिसाल कायम करने वाले आनंद कुमार के पढ़ाए 510 बच्चों में से 422 का 2018 तक IIT में सलेक्शन हो चुका था। उनके काम पर डिस्कवरी चैनल डॉक्युमेंट्री बना चुका है। उनके जीवन पर फिल्म ‘सुपर-30’ बन चुकी है, जिसमें अभिनेता ऋतिक रोशन ने उनका किरदार निभाया था। आज वह अपने जीवन की एक घटना के जरिये बता रहे हैं कि कैसे मुश्किलों का हल निकालना जीवन के प्रति आपका नजरिया बदल सकता है…

मेरी जिंदगी में न जाने ऐसी कितनी घटनाएं घटी हैं जो सालों बाद भी मेरे दिमाग में आज भी घूमती रहती हैं। न चाहते हुए भी रह-रहकर याद आती रहती हैं। बस इतना ही नहीं…वो घटनाएं मेरे लिए प्रेरणास्रोत बनकर मुझे बहुत कुछ सिखाती भी रहती हैं।

जब भी मुझे मौका मिलता है, मैं अपने विद्यार्थियों को उसके सार को समझाते हुए उन घटनाओं से कुछ सिखाने की कोशिश भी करता हूं। मैं सोचता हूं कि शायद यही वजह रही है जिससे मेरे विद्यार्थी मैथमेटिक्स के साथ-साथ जिंदगी की समस्याओं से घबराते नहीं हैं। वे आत्मविश्वास से भरे होते हैं और उन्हें लगता है कि समस्या का हल जरूर निकलेगा, चाहे इसके लिए कितना भी समय देना पड़े या फिर कितनी भी मेहनत करनी पड़े। एक दिन सवेरा जरूर होगा और आने वाला वो कल भी हमारा ही होगा।

बात 30 साल से भी ज्यादा पुरानी है। कॉलेज के जमाने की। मैं पटना यूनिवर्सिटी के बिहार नेशनल कॉलेज का छात्र था और मेरे दो मित्र राकेश और नितिन बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग के। दोनों मेरे अच्छे मित्र थे और सच कहें सब मैथमेटिकल फ्रेंड थे। खूब मैथमेटिक्स पर चर्चा होती थी। चाय पीते हुए, टहलते हुए, यहां तक कि साइकिल से कॉलेज जाते हुए भी। बड़ा मजा आता था।

बिहार नेशनल कॉलेज जहां आनंद कुमार पढ़ते थे, 1889 में स्थापित हुआ था। यह बिहार के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक है।
बिहार नेशनल कॉलेज जहां आनंद कुमार पढ़ते थे, 1889 में स्थापित हुआ था। यह बिहार के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक है।

उस जमाने में बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में एक बहुत ही सीनियर और विद्वान मैथमेटिक्स के प्रोफेसर थे मोहम्मद शहाबुद्दीन। दीन-दुनिया से अलग। मैथमेटिक्स की दुनिया में खोए-खोए रहने वाले।

शहाबुद्दीन सर हर शनिवार को क्लास में ब्लैकबोर्ड पर एक सवाल लिख देते थे। कठिन सवाल। बहुत ही कठिन। फिर उसके बाद विद्यार्थियों को ललकारते हुए कहते थे कि देखना चाहता हूं कौन इस सवाल को सॉल्व करके सोमवार को दिखाता है। जो इसको सॉल्व कर देगा, उसे मैं मान जाऊंगा। शहाबुद्दीन सर ने इतिहास बनाया था, कोई भी सवाल का हल नहीं निकाल पाता था। और फिर सर बड़े आराम से मजे लेते हुए सोमवार को उसे ब्लैकबोर्ड पर मुस्कुराते हुए सॉल्व करते थे।

इस बात की जानकारी जब मुझे मेरे दोनों मित्रों के जरिये हुई तब मैं चैलेंज से भर गया। मेरा भी मन बार-बार उस चुनौतीपूर्ण सवाल को देखने का होने लगा। जमाना तो वह फोन और वॉट्सएप का था नहीं। तब हम मित्रों ने तय किया कि हम लोग हर शनिवार शाम को पटना के शहीद स्मारक के पास मिलेंगे और दोनों मित्र मुझे शहाबुद्दीन सर वाला सवाल कॉपी करने के लिए देंगे।

फिर रात भर चाहे कुछ भी हो जाए पूरी मेहनत कर, पूरी ताकत लगाकर सवाल के हल के साथ अगले दिन सुबह 6 बजे शहीद स्मारक के पास मिलेंगे। हमेशा हम तीनों मित्र देर रात तक जागते थे और जब तक सवाल का हल न निकल जाए प्रयास करते रहते थे। अगला दिन रविवार, छुट्टी का दिन होता था। इसलिए सुबह उठने की कोई जल्दबाजी भी नहीं होती थी। यह सिलसिला वर्षों तक चला और मैं किसी भी दिन कभी भी फेल नहीं हुआ।

चाहे 4 घंटे लगे हों या फिर 6 घंटे, मैं सवाल का हल निकालकर ही शहीद स्मारक पहुंचा। मेरे मित्रों को अब मुझ पर भरोसा हो गया था कि आनंद जरूर सवाल का हल निकाल लेगा चाहे सवाल कितना भी कठिन क्यों न हो। मित्र मेरी खूब वाहवाही करते थे और सच कहूं तो तब मुझे अच्छा भी लगता था। साथ ही साथ मेरा कॉन्फिडेंस भी काफी बढ़ गया था। पता नहीं क्यों, धीरे-धीरे मुझे ऐसा यकीन होने लगा कि प्रॉब्लम कितना भी कठिन क्यों न हो मैं जरूर इसका सॉल्यूशन खोज ही लूंगा।

यह तस्वीर आनंद कुमार के सुपर-30 प्रोग्राम के शुरुआती दौर की है।
यह तस्वीर आनंद कुमार के सुपर-30 प्रोग्राम के शुरुआती दौर की है।

एक शनिवार की बात है। बारिश का मौसम था। रिमझिम-रिमझिम बारिश हो रही थी और हम तीनों मित्र भीगते हुए भी उस शनिवार को मिले थे। प्रॉब्लम शेयर हो गया और फिर अगली सुबह मिलने की बात भी तय हो गई। उस दिन मैंने जल्दी ही खाना खा लिया था कोई 8 बजे के आस-पास। फिर उसके बाद लग गया सवाल हल करने में।

उस दिन सवाल बड़ा कठिन लग रहा था। बहुत ही कठिन। कुछ पता ही नहीं चल रहा था कि बढ़ें तो कैसे। सवाल ट्रिग्नोमेट्री का था। सारे फॉर्मूला और ट्रिक नाकाम हो गए। कोई रास्ता नहीं निकल रहा था।

गौरियामठ मोहल्ले में रेलवे लाइन के किनारे स्वर्गीय रामबाबू शर्मा के मकान में पहली मंजिल पर बने बहुत तंग छोटे से दो कमरे के मकान में मैं अपने संयुक्त परिवार के साथ रहता रहता था। धीरे-धीरे रात हो गई थी। एक छोटे से कमरे में चार लोग सोते थे।

मेरे अलावा सभी सोना चाह रहे थे। मैं कमरे के एक कोने में छोटी जगह में एक छोटा सा लैंप जलाकर सवाल हल करने में लगा हुआ था। कुछ देर के अंतराल में अर्धनिद्रा में सब कह भी रहे थे कि सो जाओ कल पढ़ लेना, लेकिन फिर भी मैं यह कहते हुए कि थोड़ी देर में सो जाऊंगा, लगा हुआ था सवाल हल करने में।

तरह-तरह के आइडिया मेरे दिमाग में आ रहे थे और मैं उसे कॉपी के पन्ने पर लिख रहा था, लेकिन समाधान फिर भी नहीं मिल रहा था। धीरे-धीरे समय बीता जा रहा था कि अचानक बिजली चली गई। मुझे लगा- अब क्या होगा।

घर में न तो एसी था न ही कोई कूलर। पंखा ही एक मात्र सहारा था। बरसाती उमस भरी गर्मी से राहत पाने के लिए उस कमरे में कोई वेंटिलेशन का उपाय भी तो नहीं था। उमस भरी गर्मी बर्दाश्त से बाहर होने लगी। लगा जैसे अब दम ही घुट जाएगा। अक्सर ऐसा लगता था गर्मी के दिनों में जब बिजली चली जाती थी।

ऐसी स्थिति में एक ही रास्ता होता था- सड़क के किनारे रमेश शर्मा जी के दुकान के सामने अमरूद के पेड़ के नीचे ठेले पर रात गुजारने का। वहां थोड़ी अच्छी बरसाती हवा मिल जाती थी। दरअसल, रमेश शर्मा जी का लकड़ी का कारोबार था और लकड़ी ढोने के लिए कुछ ठेले वाले दुकान के सामने रात में सोते थे।

मैं अपने भाई और पिता जी के साथ दो चादर और दो तकिया लेकर सड़क के किनारे गया और देखा कि संयोग से दो ठेले खाली हैं। हम लोगों ने चादर बिछाया और वहीं लेट गए। किसी को नींद नहीं आ रही थी और उम्मीद यही थी कि बिजली आ जाएगी।

लेकिन मेरी उम्मीद कुछ और थी। मैं सोच रहा था कि जितनी जल्दी हो बिजली आ जाए और किसी तरह से मेरे सवाल का हल मुझे मिल जाए। मेरी नींद गायब थी और अगर कभी थोड़ी झपकी लगती भी थी तो बरसाती मच्छर के काटते ही मैं जाग जाता था। और फिर मैथमेटिक्स की दुनिया में चला जाता था। बगल के ठेले पर देखा कि पिताजी की भी आंखें खुली हैं और वे आसमान की ओर किसी उम्मीद में देख रहे हैं।

इस तस्वीर में आनंद कुमार अपने माता-पिता के साथ हैं। आनंद कुमार के पिता पोस्टल डिपार्टमेंट में क्लर्क थे।
इस तस्वीर में आनंद कुमार अपने माता-पिता के साथ हैं। आनंद कुमार के पिता पोस्टल डिपार्टमेंट में क्लर्क थे।

लगभग 4 बज गए थे और लग रह था कि अब बिजली नहीं आएगी। अब सुबह होने में कुछ ही देर रह गई थी। अचानक रोशनी से आंखें चौंधिया गईं। बिजली आ गई थी। वापस चादर समेट कर हम लोग घर आ गए। पंखे की घनघन आवाज और हवा में सभी लोग गहरी नींद में आ गए थे।

लेकिन मेरी नींद उड़ चुकी थी। मैं कमरे के छोटे से कोने में लैंप की रोशनी में भिड़ा हुआ था उस सवाल से। कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था उस दिन। परेशान हो गया था। पूरी कॉपी भर गई थी। फिर थोड़ी देर बाद कानों में चिड़ियों की चहचहाहट की आवाज आने लगी और देखा कि सवेरा हो गया है। लेकिन अभी भी सभी सोए हुए थे।

शहीद स्मारक पर मित्रों से मिलने का समय भी हो चुका था। एक मन तो कर रहा था कि आज नहीं जाऊं। फिर यह भी लग रहा था कि आज तक कभी ऐसा हुआ नहीं कि मैं नहीं गया। फिर मैं अपने मन को समझाने लगा कि मेरे मित्र तो सवाल के हल के बगैर भी आते हैं। क्या हुआ, असफलता का भी स्वाद चखना चाहिए। कोई बात नहीं, स्वामी विवेकानंद ठीक ही तो कहते हैं कि असफलता से नहीं घबराना चाहिए। न जाने मन में क्या-क्या बातें आ रही थीं।

आखिरकार मैं चल पड़ा शहीद स्मारक की ओर। कोई एक किलोमीटर से भी कम दूरी पर था शहीद स्मारक। उस दिन कदम बढ़ ही नहीं रहे थे। एक-एक कदम बढ़ाना बड़ा मुश्किल हो रहा था। युवा मन न जाने क्या-क्या सोच रहा था। लग रहा था कि क्या सोचेंगे मेरे दोस्त। आज तो भारी बेइज्जती हो जाएगी। सारा किया धरा का धरा रह जाएगा। सोचेंगे कि आनंद से भी सवाल नहीं बना।

इन तमाम ख्यालातों के साथ ही साथ वह सवाल भी मेरे मन में लगातार घूम रहा था। अचानक से फिर एक आइडिया आया और मैंने अपनी जेब से तुरंत कागज कलम निकाल कर कुछ लिखा और देखा कि वह सवाल तो हल हो गया। मुझे यकीन नहीं हो रहा था। दो बार, तीन बार देखा सच में सवाल हल हो गया था।

अचानक सारी थकान खत्म हो गई। मैं उत्साह से भर गया। खुशियों का ठिकाना नहीं था उस दिन। लग रहा था मैंने दुनिया की सबसे बड़ा जंग जीत ली। कोई बड़ा आविष्कार हो गया है। और फिर क्या मैं शहीद स्मारक की तरफ दौड़ चला।

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