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खुद्दार कहानी:लंदन की लग्जरी लाइफ छोड़ भारत लौटे NRI कपल, अब गांव को गोद लेकर सैकड़ों लोगों की जिंदगी संवार रहे हैं

6 महीने पहलेलेखक: सुनीता सिंह

कहते हैं किसी बड़े बदलाव की शुरुआत एक खूबसूरत मकसद से होती है। एक ऐसे ही बेहतर मकसद के लिए पुणे के आशीष कलावार लंदन की लाखों की नौकरी छोड़ अपनी पत्नी रुता के साथ देश वापस आ गए। उन्होंने महाराष्ट्र के एक गांव को गोद लिया जो बुनियादी सुविधाओं से दूर था।

जहां 9 साल पहले न पानी-बिजली थी, न ही स्कूल की सुविधा। आज वहां हर घर में टॉयलेट है। वहां के बच्चे डिजिटल क्लास और मॉडर्न एजुकेशन हासिल कर रहे हैं। NRI दंपति ने कुछ ही सालों में 50 से ज्यादा बच्चों को इंजीनियर, रिसर्चर, शेफ , यहां तक IAS बनाने में मदद की है।

इसके अलावा प्रभाकर पचपुते, जो एक इंटरनेशनल आर्टिस्ट हैं, उन्हें भी इसी दंपति की मदद मिली।

आज की खुद्दार कहानी में जानते हैं आशीष -रुता की प्रेरणात्मक कहानी जिन्होंने दूसरों की मदद के लिए अपनी ऐशो-आराम की जिंदगी छोड़ देश वापस आ गए ....

जूते पॉलिश करने वाले लड़के ने जीने का नजरिया बदला

आशीष कलावार और रुता कलावार 2012 से शिवप्रभा चैरिटेबल ट्रस्ट के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं।
आशीष कलावार और रुता कलावार 2012 से शिवप्रभा चैरिटेबल ट्रस्ट के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं।

42 साल के आशीष कलावार तकरीबन 12-13 साल पहले ऑफिशियल काम से बोकारो गए थे। वापस आते समय ट्रेन का स्टेशन पर इंतजार कर रहे थे तब उनके साथ एक वाकया हुआ जिसने उनकी जिंदगी बदल दी। आशीष बताते हैं “ जब मैं बोकारो स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार कर रहा था, तब एक 10-12 साल का लड़का मेरे पास आया और मुझसे जूते पॉलिश करवाने के लिए रिक्वेस्ट करने लगा। मैंने उस लड़के से कहा कि ये उम्र तुम्हारे स्कूल जाने की है न कि काम करने की। इस पर वो बोला कि वो स्कूल जाने के लिए ही काम करता है, कमाए हुए पैसों से वो अपने स्कूल की फीस भरता है।

उसकी बात सुनकर मैंने उससे जूते पॉलिश करवाए और उसको डबल पैसे दिए। ज्यादा पैसों की वजह से वो बच्चा बहुत खुश हो गया। उसकी खुशी मेरे जिंदगी का टर्निंग पॉइंट थी। मुझे तब लगा दूसरों के लिए कुछ करने से ज्यादा खुशी मिलती है। ”

इसके बाद आशीष अपनी नौकरी और रोजमर्रा की जिंदगी में व्यस्त हो गए, पर कहीं न कहीं उनके मन में उस लड़के और उसके जैसे और बच्चों के लिए कुछ करने की चाह पनपती रही।

लंदन में तमाम ऐशो आराम के बावजूद जिंदगी में कुछ मिसिंग था

रुता लंदन जाने से पहले ISRO बैंगलोर में बतौर इंजीनियर काम कर रहे थीं।
रुता लंदन जाने से पहले ISRO बैंगलोर में बतौर इंजीनियर काम कर रहे थीं।

आशीष और उनकी पत्नी रुता कलावार (42), दोनों इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर हैं। रुता लंदन जाने से पहले ISRO बैंगलोर में बतौर इंजीनियर काम कर रहे थीं। आशीष कनाडा, सिंगापुर, चीन जैसे देशों में काम करने के बाद रुता के साथ लंदन सेटल हो गए। जहां दोनों महीने के 7- 8 लाख रूपए कमाते थे। दोनों के पास एक आलिशान घर, एक बढ़िया गाड़ी और जीवन के वो सारे साधन थे जिसे आम इंसान खुशियों का मापदंड समझता है। इन सबके बावजूद उनकी जिंदगी में कुछ मिसिंग था।

आशीष कहते हैं, “लंदन में मैं और रुता लगातार तरक्की कर रहे थे, हमारे पास सब कुछ था, लेकिन हम खुश नहीं थे। इसी बीच 2012 में हमें कुछ समय के लिए हमारा भारत आना हुआ। तब हमने कई NGO का दौरा किया। मैं कई सोशल वर्कर्स से मिला। इन लोगों के काम से मुझे प्रेरणा मिली कि मैं भी दूसरों के लिए कुछ कर सकूं। तभी मैं अमोल सैनवार से मिला जो ‘शिवप्रभा चैरिटेबल ट्रस्ट’ नाम से NGO चला रहे थे। वो गांव के लोगों की मदद करने के लिए काम कर रहे थे। अमोल जी से मिलने के बाद मुझे गांव वालों के साथ जुड़ कर काम करने की प्रेरणा मिली ”

लोनवड़ी गांव में सोलर पैनल वाटर पंप लगवाने से शुरुआत की

आशीष बताते हैं गांव में खेती को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने बाहर से कई कृषि विशेषज्ञ बुलवाया, जिनकी मदद से गांव में अच्छी खेती हो रही है।
आशीष बताते हैं गांव में खेती को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने बाहर से कई कृषि विशेषज्ञ बुलवाया, जिनकी मदद से गांव में अच्छी खेती हो रही है।

2012 में आशीष और रुता अमोल सैनवार के साथ मिल कर महाराष्ट्र के औरंगाबाद के एक छोटे से गांव लोनवड़ी में बदलाव लाने के लिए गांव को गोद ले लिए। लोनवड़ी पहाड़ी पर बसा एक छोटा सा गांव है जहां 2012 से पहले बिजली, पानी, सड़क, और स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं थीं।

आशीष बताते हैं, “ हमारे गांव आने से पहले यहां के लोगों को पानी जैसी मूल सुविधा के लिए जंगल जाना पड़ता जहां बच्चों पर कई बार जंगली जानवरों ने अटैक किया था। तब मैंने ये तय किया कि सबसे पहले यहां पानी की समस्या को दूर करने के लिए कुछ करूंगा। लोनवड़ी में हमने सबसे पहले सोलर वाटर पंप लगवाया।

इसके लिए मैंने अपनी सेविंग्स लगाई और लंदन में बसे दोस्तों से मदद भी ली। सोलर पैनल वाटर पंप की मदद से गांव में ही पानी आने लगा और इस तरह गांव वाले भी हमसे जुड़ कर काम करने लगे। फिर हमें वापस लंदन आना पड़ा। वापस जाने के बाद भी मेरा और रुता का मन लोनवड़ी में ही लगा रहता था। तो हमने परमानेंट यहां आकर बसने का मन बना लिया।”

आशीष और रुता लंदन में अपनी नौकरी छोड़ देश हमेशा के लिए आ गए और वो अपने पुश्तैनी घर जो की पुणे में हैं वहां रहने लगे।

पति-पत्नी मिलकर 9 साल में गांव की तस्वीर बदल दी

आशीष गांव के बड़े -बच्चों सभी को मेडिटेशन भी सिखाते हैं। आशीष के अनुसार मेडिटेशन की वजह से गांव वालों की जिंदगी में बेहतर बदलाव देखने को मिल रहा है।
आशीष गांव के बड़े -बच्चों सभी को मेडिटेशन भी सिखाते हैं। आशीष के अनुसार मेडिटेशन की वजह से गांव वालों की जिंदगी में बेहतर बदलाव देखने को मिल रहा है।

पानी की समस्या के बाद आशीष को लगा गांव के स्कूल के लिए कुछ करना चाहिए। सुविधाओं के अभाव में वहां के बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। गांव में लाइट नहीं होने के कारण बच्चे पढ़ नहीं पाते थे। आशीष ने NGO के साथ मिलकर बच्चों को सोलर लैंप दिया, जिससे बच्चे रात को भी पढ़ने लगे।

आशीष बताते हैं, “2012 में जब मैं यहां आया था तब न ही बच्चे स्कूल जाते थे न हीं पढ़ाई होती थी। हमने धीरे - धीरे काम शुरू किया। बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और आज यहां के स्कूल को हमने डिजिटल स्कूल में बदल दिया है। सभी बच्चों के पास स्मार्ट फोन या लैपटॉप की सुविधा है। मेरे कुछ दोस्त जो विदेशों में हैं वो भी इन बच्चों को ऑनलाइन पढ़ाते हैं।”

आशीष के अनुसार पानी और स्कूल से बड़ी समस्या लोगों का नशा है। गांव के ज्यादातर पुरुष खेती किसानी करते थे। तनाव और थकान की वजह से शाम को अक्सर शराब का नशा करते दिखाई देते थे।

रुता कहती है,“हमने गांव के लोगों का नशा छुड़ाने के लिए उन्हें मेडिटेशन से जोड़ा। जब आप मेडिटेशन या साधना करते है तो आप में एक अजीब सी पॉजिटिविटी आती है जो आपको हर नेगेटिव चीजों से दूर रहने को मजबूर कर देती है। केवल 6 महीनों में गांव के 80% लोगों ने नशा करना बंद कर दिया।”

50 से ज्यादा बच्चों को किसी न किसी मुकाम पर पहुंचाया

प्रभाकर पचपुते को पढ़ने और आगे बढ़ने में आशीष के NGO ने मदद की। आशीष कहते हैं अगर हम सब मिल कर गांव के लिए थोड़ा-थोड़ा काम करें तो गांव से कई टैलेंट बाहर आएंगे।
प्रभाकर पचपुते को पढ़ने और आगे बढ़ने में आशीष के NGO ने मदद की। आशीष कहते हैं अगर हम सब मिल कर गांव के लिए थोड़ा-थोड़ा काम करें तो गांव से कई टैलेंट बाहर आएंगे।

आशीष बताते हैं इन 9 सालों में गांव में बहुत कुछ बदल गया है। यहां सुविधाओं के अलावा लोगों का नजरिया जिंदगी के प्रति बहुत बदला है। यहां के लोग एक पॉजिटिव लाइफ जीते हैं और यहां के बच्चे कुछ बड़ा करने का सपना देखते हैं।

आशीष बताते हैं, “ यहां के बच्चों में शहर के बच्चों से ज्यादा हुनर है। शायद यही वजह है कि कुछ ही सालों में यहां के करीब 50 बच्चे पढ़- लिख कर आत्मनिर्भर बन गए हैं। ज्यादातर बच्चे इंजीनियर हैं, कुछ बड़े होटल में शेफ हैं तो कुछ ने रिसर्च में अपना करियर बनाया है।

चंद्रपुर गांव के प्रभाकर पचपुते नाम का एक लड़का था जिसके पिता सब्जी बेचते थे। प्रभाकर का इंट्रेस्ट आर्ट में था, लेकिन उनके पिता के पास बच्चे को पढ़ाने के लिए पैसे नहीं थे। हमने प्रभाकर को फाइन आर्ट्स पढ़ने में आर्थिक मदद की और आज वह इंटरनेशनल लेवल आर्टिस्ट बन गया है। उनकी पेंटिंग का एग्जीबिशन तकरीबन 20 देशों में लगाया जा चुका है। ऐसे हमारे पास कई प्रतिभाशाली बच्चे हैं।”

आशीष भारत लौटने के बाद शिवप्रभा ट्रस्ट के साथ जुड़कर काम कर रहे हैं। आय के बारे में पूछने पर आशीष बताते हैं वह अपनी सेविंग्स और दो घर के किराए पर आधारित हैं। अब उनकी लाइफ लंदन की लाइफ से बिलकुल अलग , बहुत सिंपल, लेकिन सुकून भरी है। ट्रस्ट के लिए वो कई जगह से फंड रेज करते हैं।

आशीष कहते हैं अगर हम सब समाज में शिकायत करने के बजाय थोड़ा -थोड़ा हाथ बढ़ाएंगे तो समाज बदलेगा। बुराई करना आसान है बदलाव में हिस्सा लेने से बुराई भी खत्म हो जाएगी।