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खुद्दार कहानी:बिरेन कभी घर-घर घूमकर साड़ी बेचते थे, मुश्किल से ढाई रुपए की कमाई होती थी; आज करोड़ों की कंपनी के मालिक हैं

नई दिल्ली10 महीने पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र

पश्चिम बंगाल के फुलिया जिले के रहने वाले बिरेन बसक का जन्म बांग्लादेश के तंगेल में हुआ। उनके पिता बुनकर थे, जैसे-तैसे साड़ी बेचकर परिवार का गुजारा करते थे। साल 1962 में दंगों के चलते उन्हें बांग्लादेश छोड़ना पड़ा। वे पश्चिम बंगाल के फुलिया में आकर बस गए। तब वे अपने पिता के साथ खाली हाथ आए थे।

13 साल की उम्र और 6वीं में पढ़ते थे। यहां आने के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी और पिता के साथ एक बुनकर के यहां काम करने लगे। वे फुलिया और कोलकाता में घर-घर घूमकर साड़ी बेचते थे। आज उनकी खुद की कंपनी है, देश-विदेश में उनकी पहचान है। सालाना करोड़ों की कमाई है। पद्मश्री सहित कई अवॉर्ड उन्हें मिल चुके हैं। आज की खुद्दार कहानी में पढ़िए बिरेन बसक के अर्श से फर्श तक पहुंचने की दास्तान...

दिनभर साड़ी बेचने के बाद भी 2.5 रुपए की कमाई होती थी
70 साल के बिरेन अपने 6 भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। वे बताते हैं कि जब मैं पिता के साथ भारत आया तो हम खाली हाथ थे, हमारे पास कुछ भी नहीं था। आगे की जिंदगी मुश्किल थी, इसलिए पढ़ाई छोड़कर पिता के साथ बुनाई का काम करने लगा। तब मैं घूम-घूमकर साड़ी बेचा करता था।

मैं अपने भाइयों के साथ रोज सुबह 5 बजे जागता था, लोकल ट्रेन पकड़कर हम कोलकाता जाते थे। वहां गलियों में घूमकर साड़ी बेचा करते थे। पूरे दिन साड़ी बेचने के बाद हम देर शाम की आखिरी ट्रेन से वापस फुलिया लौट आते थे। यह हमारा रोज का काम था। दिनभर साड़ी बेचने के बाद मुश्किल से 2.5 रुपए की आमदनी होती थी।

बिरेन बसक की पहचान देश के मशहूर बुनकरों में होती है। आज वे खुद एक ब्रांड हैं।
बिरेन बसक की पहचान देश के मशहूर बुनकरों में होती है। आज वे खुद एक ब्रांड हैं।

बिरेन कहते हैं कि तंगहाली तो बहुत थी, लेकिन हमारे पास इसके सिवा कुछ ऑप्शन भी नहीं था। परिवार का खर्च चलाने के लिए कहीं न कहीं से इनकम की जरूरत थी। आमदनी कम थी, इसलिए शुरू से ही हम लोग छोटी-छोटी जरूरतों की कुर्बानियां देते रहे। यहां हमारे कुछ रिश्तेदार रहते थे, जिनकी मदद से हम गुजारा कर रहे थे।

एक दिन में बदल गई जिंदगी
बिरेन कहते हैं कि एक बार हम दोनों भाई कोलकाता में साड़ी बेच रहे थे। तभी किसी मार्केट में हमें एक महिला मिली। वे किसी मंत्री की पत्नी थीं। उन्होंने हमें इस तरह साड़ी बेचते देखा तो अपने पास बुलाया। हमसे बात की और हमारी साड़ी को देखा। उन्हें हमारी साड़ी पसंद आई। उस महिला ने हमें अपने घर बुलाया।

बिरेन बताते हैं कि अगले दिन जब मैं उस महिला के घर पहुंचा तो सरप्राइज्ड रह गया। वहां पहले से कई महिलाएं मौजूद थीं। उन महिलाओं ने मुझसे साड़ी खरीदीं, धीरे-धीरे इलाके की दूसरी महिलाएं भी वहां आ गईं। देखते ही देखते उनकी पूरी साड़ियां बिक गईं। बिरेन के लिए वह दिन टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। सभी साड़ियां बिक गईं, अच्छी खासी कमाई हुई।

बिरेन बसकी की बुनाई खास होती है। वे भारत की ऐतिहासिक विरासतों और हस्तियों की तस्वीर का इस्तेमाल अपनी कारीगरी में करते हैं।
बिरेन बसकी की बुनाई खास होती है। वे भारत की ऐतिहासिक विरासतों और हस्तियों की तस्वीर का इस्तेमाल अपनी कारीगरी में करते हैं।

वे बताते हैं कि उस दिन के बाद से हमारी कमाई में इजाफा होने लगा। लोग हमें जानने लगे। हम अच्छी खासी मात्रा में साड़ी लेकर कोलकाता जाते थे और हमारा सामान बिक भी जाता था। 1980 आते-आते हमारे पास अच्छा खासा बजट हो गया। इसके बाद हमें लगा कि सड़कों पर घूमकर साड़ी बेचने की बजाय हमें खुद की दुकान खोलनी चाहिए।

1985 में भाई के साथ मिलकर शुरू की खुद की कंपनी
साल 1985 में बिरेन ने अपने भाई के साथ मिलकर कोलकाता में एक जमीन ली और खुद की दुकान की नींव रखी। वे लोकल बुनकरों के साथ मिलकर खुद की दुकान पर साड़ियों की बुनाई करने लगे। उनके यहां से दूसरे छोटे व्यापारी साड़ी खरीदकर दूसरे शहरों में बेचने लगे। इस तरह धीरे-धीरे उनका कारोबार बढ़ने लगा। पहले साल ही उनकी अच्छी-खासी कमाई हुई। कोलकाता के बाहर भी उनके प्रोडक्ट की सप्लाई होने लगी। कोलकाता के अच्छे बुनकरों में उनकी पहचान होने लगी।

हालांकि सफलता के बीच उन्हें एक सेटबैक भी लगा। भाई के साथ मनमुटाव हो गया। जिसके बाद उन्हें बंटवारा करना पड़ा। दोनों भाइयों की दुकान अलग-अलग हो गई। बिरेन कोलकाता से अपनी दुकान छोड़कर फुलिया लौट आए।

बंटवारे के बाद लौट आए फुलिया

प्रधानमंत्री मोदी बिरेन बसक की तारीफ कर चुके हैं। बसक को पद्मश्री सम्मान भी मिल चुका है।
प्रधानमंत्री मोदी बिरेन बसक की तारीफ कर चुके हैं। बसक को पद्मश्री सम्मान भी मिल चुका है।

बिरेन कहते हैं कि जब मैं कोलकाता से फुलिया लौटा तो हमारे पास ठीक-ठाक बजट था। हमने लोकल बुनकरों से बात की और अपने साथ उन्हें जोड़ लिया। फिर एक छोटी सी दुकान से काम शुरू किया। धीरे-धीरे बुनकरों की संख्या बढ़ने लगी। चूंकि बिरेन की अच्छी-खासी पहचान हो गई थी, लोग उनके बारे में जानने लगे थे। इसलिए उन्हें कारोबार बढ़ाने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। जल्द ही देशभर में उनका नेटवर्क फैल गया और लाखों में कमाई होने लगी।

इसके बाद बिरेन ने अलग-अलग पैटर्न पर साड़ी तैयारी करनी शुरू कर दी। उन्होंने रामायण की कहानी को बयां करते हुए एक साड़ी तैयार की। इसे तैयार करने में करीब ढाई साल का वक्त लगा। इसके लिए लिम्का बुक में उनका नाम भी दर्ज हुआ। इसके बाद उन्होंने गणेश भगवान, कृष्ण भगवान और स्वामी विवेकानंद को लेकर कई साड़ियां तैयार कीं। इससे उनकी अच्छी-खासी पहचान बन गई। एक तरह से उनका ट्रेडमार्क बन गया।

कई हस्तियों के लिए तैयार कर चुके हैं साड़ी

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ बिरेन बसक। वे उनके लिए खास साड़ी तैयार कर चुके हैं।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ बिरेन बसक। वे उनके लिए खास साड़ी तैयार कर चुके हैं।

बिरेन बसक फिलहाल अपने हाथ से बुनी हुई साड़ियों की देशभर में मार्केटिंग कर रहे हैं। उनके साथ 5 हजार से ज्यादा बुनकर जुड़े हैं। जबकि कई लोग उनके साथ जुड़कर खुद की जीविका चला रहे हैं। वे बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली, मशहूर फिल्म निदेशक सत्यजीत रे, अभिनेत्री मौसमी चटर्जी सहित कई हस्तियों के लिए साड़ी तैयारी कर चुके हैं। स्टेट और नेशनल लेवल पर उन्हें कई अवॉर्ड्स भी मिल चुके हैं।

शून्य से शिखर तक पहुंचने की ये खास कहानी भी जरूर पढ़िए
राजस्थान के बाड़मेर जिले की रहने वाली रूमा देवी, नाम जितना छोटा काम उतना ही बड़ा, जिसके सामने हर बड़ी उपलब्धि छोटी पड़ जाए। 4 साल की थीं तब मां चल बसीं, पिता ने दूसरी शादी कर ली और चाचा के पास रहने के लिए छोड़ दिया। गरीबी की गोद में पल रही रूमा को हंसने-खेलने की उम्र में खिलौनों की जगह बड़े-बड़े मटके मिले, जिन्हें सिर पर रखकर वो दूर से पानी भरकर लाती थीं। 8वीं में पढ़ाई छूट गई और 17 साल की उम्र में शादी।

पहली संतान हुई वो भी बीमारी की भेंट चढ़ गई। रूमा के सामने मुश्किलों का पहाड़ था, सबकुछ बिखर गया था लेकिन उन्होंने हौसले को नहीं टूटने दिया। खुद के दम पर गरीबी से लड़ने की ठान ली और घर से ही हैंडीक्राफ्ट का काम शुरू किया। आज वे अपने आप में एक फैशन ब्रांड हैं। देश-विदेश में ख्याति है और 22 हजार महिलाओं की जिंदगी संवार रही हैं। (पढ़िए पूरी खबर)

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