करिअर फंडाइंदिरा गांधी के जीवन से 5 सबक:विरोधियों ने ‘गूंगी गुड़िया’ तक कहा…शब्दों में नहीं, काम से दिया जवाब

12 दिन पहले

भारत के सभी प्रधानमंत्रियों की सूची में इंदिरा गांधी का नाम विशिष्ट रूप से चमकता है।

कई भारतीय उन्हें 1975 में लगाए गए राष्ट्रीय आपातकाल के काले दिनों के लिए याद करते हैं, जिसके लिए जनता ने उन्हें 1977 के चुनावों में दंडित भी किया।

जबकि कई भारतीय उन्हें पाकिस्तान से मुक्ति के लिए बांग्लादेश के संघर्ष में निभाई गई उत्कृष्ट भूमिका के लिए याद करते हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व के अध्ययन लायक अन्य पहलू भी हैं।

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भारत की आयरन लेडी इंदिरा गांधी से 5 जीवन-पाठ

1) अपनी खुद की विरासत बनाएं: इंदिरा भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बेटी थीं। लेकिन कांग्रेस पार्टी में उनकी स्थिति सुरक्षित नहीं थी। 1964 में नेहरू जी की मृत्यु के बाद, और 1966 में शास्त्री जी के निधन के बाद, कांग्रेस पार्टी के भीतर एक तीव्र सत्ता संघर्ष छिड़ गया, और इंदिरा को वरिष्ठ नेताओं (जैसे मोरारजी भाई देसाई) ने ‘गूंगी गुड़िया’ कहकर मजाक उड़ाया। इंदिरा घबराई नहीं, बल्कि एक गेमप्लान बनाया। उन्होंने महसूस किया कि उनके विरोधियों को धन देने वालों में से कई ब्रिटिश काल के तत्कालीन रियासतों के शाही परिवारों से थे। इसलिए उन्होंने एक तीर से दो निशाने लगाने का फैसला किया। उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया और ‘गरीबी हटाओ’ की शुरुआत की। समाजवाद से प्रेरित अनेक योजनाएं लाई गईं। भारतीय उन्हें बहुमत से सत्ता में लाए। मोरारजी भाई और उनका गुट हाशिये पर चला गया।

मोरारजी देसाई, इंदिरा गांधी की सरकार में उप प्रधानमंत्री थे। लेकिन उनका लगातार विरोध भी करते थे।
मोरारजी देसाई, इंदिरा गांधी की सरकार में उप प्रधानमंत्री थे। लेकिन उनका लगातार विरोध भी करते थे।

सीख - जीवन की जंग में सभी को व्यक्तिगत रूप से लड़ना है।

2) समस्याओं को रणनीतिक रूप से देखें: 1970 के दशक की शुरुआत भारत के लिए बहुत मुश्किल थी, क्योंकि पाकिस्तान ने चीन के माओ त्से-तुंग और अमेरिकी नेतृत्व (निक्सन और किसिंजर) के बीच आइस-ब्रेकर बैठक की व्यवस्था करने का काम किया था। यह भारत की सुरक्षा गणना के लिए अशुभ था।

यह बैठक 1972 में होने वाली थी और इसके खतरे भांपते हुए इंदिरा गांधी ने 1971 में ही सोवियत संघ के साथ एक संधि कर ली। यह भारतीय विदेश नीति की घोषित गुटनिरपेक्ष प्रकृति के बावजूद किया गया। निक्सन हमेशा इंदिरा से नफरत करते थे और वे यह जानती थीं। सोवियत संघ के साथ गठबंधन करने का उनका फैसला पूरी तरह से सही साबित हुआ, जब बांग्लादेश में मुक्ति का युद्ध छिड़ गया। यह सोवियत पनडुब्बियां थीं जो सही समय पर हिंद महासागर में सामने आईं, जिसने अमेरिकी सातवें बेड़े को डरा दिया, जो संभवतः बंगाल की खाड़ी में हस्तक्षेप करने आए थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के साथ इंदिरा गांधी की ये तस्वीर 9 नवंबर, 1971 की है, जब इंदिरा गांधी अमेरिका के दौरे पर गई थीं।
अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के साथ इंदिरा गांधी की ये तस्वीर 9 नवंबर, 1971 की है, जब इंदिरा गांधी अमेरिका के दौरे पर गई थीं।

सबक - समस्याओं का अनुमान लगाया जाना चाहिए और रणनीतिक रूप से निपटा जाना चाहिए।

3) बिना किसी डर के अपने दिल की बात कहें: इंदिरा गांधी भारत में फार्मेसी और दवा उद्योग में काम करने वाली मुनाफाखोर बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर खुले तौर पर सवाल उठाने वाली पहली महिला थीं। वह गरीब भारतीयों के लाभ के लिए सस्ती दवाएं चाहती थीं। उन्होंने खुले तौर पर कम से कम दवाओं में पेटेंट-मुक्त व्यवस्था की मांग की। साथ ही, कई परिचालन समस्याओं के बावजूद, समाजवाद के प्रति उनकी प्रतिबद्धता काफी मजबूत थी। बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने से भारत के दूर-दराज के गांवों में औपचारिक बैंकिंग प्रणाली पहुंच के भीतर दिखाई देने लगी। 1970 के दशक के बाद से बने उस विशाल नेटवर्क का उपयोग बाद में जन-धन खातों जैसी बहुत अधिक महत्वाकांक्षी योजनाओं को लॉन्च करने के लिए किया गया था। 1971 से बनाए गए पर्यावरण कानूनों के लिए उनके समर्थन ने ही अनेक प्रगतिशील वन्य जीवन, वायु, जल और पर्यावरण कानूनों का का मार्ग प्रशस्त किया।

20 जुलाई, 1969 के अखबार की ये क्लिपिंग बैंकों के राष्ट्रीयकरण के फैसले का महत्व बताती है।
20 जुलाई, 1969 के अखबार की ये क्लिपिंग बैंकों के राष्ट्रीयकरण के फैसले का महत्व बताती है।

सीख - राजनीतिक दर्शन को केवल शब्दों में नहीं, कार्यों में दिखना चाहिए।

4) हार से वापसी: आपातकाल के भयानक प्रयोग के बाद 1977 के आम चुनाव में वे बुरी तरह हार गईं और सभी ने उनका साथ छोड़ दिया। यह खुले तौर पर कहा गया कि उनका राजनीतिक करिअर समाप्त हो गया है और वह कभी वापसी नहीं कर सकतीं। लेकिन वह बिना हिम्मत हारे बस इंतजार कर रही थीं। चूंकि आंतरिक संघर्षों के कारण जनता पार्टी का पतन हो गया, उन्होंने 1980 में जबरदस्त वापसी की।

ये तस्वीर 1980 में चुनाव में भारी बहुमत मिलने के बाद की है, जब समर्थकों ने इंदिरा गांधी का फूलों से स्वागत किया।
ये तस्वीर 1980 में चुनाव में भारी बहुमत मिलने के बाद की है, जब समर्थकों ने इंदिरा गांधी का फूलों से स्वागत किया।

सीख - कभी हार मत मानो।

5) विशेषज्ञता का सम्मान करें: जब बांग्लादेश से भारत में लाखों शरणार्थी आने लगे तो तनाव अपने चरम पर पहुंच गया। मदद की गुहार लगाने के बावजूद भारत को पश्चिमी देशों से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। मुक्ति बाहिनी को सैन्य रूप से समर्थन देने का निर्णय लिया गया था, लेकिन भारतीय सेना ने मानसून का मौसम समाप्त होने तक प्रतीक्षा करने की सलाह दी। वे ऐसा करने के मूड में नहीं थीं, लेकिन अंततः पेशेवर राय का सम्मान किया और वह एक सही निर्णय साबित हुआ।

भारत के पहले फील्ड मार्शल जनरल सैम मानेकशॉ इस तस्वीर में इंदिरा गांधी के साथ दिख रहे हैं। बांग्लादेश युद्ध के दौरान उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
भारत के पहले फील्ड मार्शल जनरल सैम मानेकशॉ इस तस्वीर में इंदिरा गांधी के साथ दिख रहे हैं। बांग्लादेश युद्ध के दौरान उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है।

सीख - दूसरों की पेशेवर विशेषज्ञता का सम्मान करें।

स्वतंत्रता के बाद के भारत में उनकी कई उपलब्धियों के कारण और साथ ही उनकी सभी कमियों-गलतियों के लिए, इंदिरा गांधी का नाम उज्ज्वल है।

आज का संडे मोटिवेशनल करिअर फंडा है कि इंदिरा गांधी का जीवन इस बात का जीता जागता उदाहरण है कि एक दृढ़निश्चयी व्यक्ति जीवन में लगातार क्या हासिल कर सकता है।

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