ब्लैकबोर्डपाकिस्तान में हवन करते धुआं उठा तो मार डालते हैं:भारत में न काम मिलता है न इलाज, लेकिन सुकून है कि बेटियां सुरक्षित हैं

3 महीने पहलेलेखक: दिल्ली के आदर्श नगर से मृदुलिका झा

काम मांगो तो लोग कागज मांगते हैं। हमारे पास हरे रंग का पासपोर्ट है। देखते ही सब भड़क जाते हैं। कई बार भीड़ ने हमें बांधकर पुलिस बुला ली कि उन्होंने भेष बदलकर आए खूंखार पाकिस्तानी आतंकवादियों को पकड़ लिया है। जैसे-तैसे जान बची।

दिल्ली की ढलती शाम में मेरी एक पीठ से बात हो रही है। ये रामजी हैं, जो चेहरा दिखाने को राजी नहीं। डरते हैं कि यहां सच बताया तो वहां छूटे परिवार के चीथड़े बिखर जाएंगे। वे बहुत धीरे से कहते हैं- हम पाकिस्तान से हैं, लेकिन पाकिस्तानी नहीं। यही हमारा मुल्क है। ये बताते-बताते गला छिल गया, लेकिन मारते हुए न उनके हाथ रुके, न यहां की नागरिकता मिल सकी।

पीठ हल्के-हल्के हिल रही है। आवाज भर्राई हुई।

पाकिस्तान से धार्मिक वीजा पर भारत आए हिंदू शरणार्थी गुजरात-राजस्थान के अलावा दिल्ली में भी बसे हुए हैं। ‘बसे हुए’ यानी- जहां मलबा फेंका जाता है, उस जमीन के एक कोने को झाड़-बुहारकर कच्ची झोपड़ियां बना डालीं। आंगन में तुलसी चौरा लगाया और छतों पर तिरंगा। बसाहट के नाम पर इतना ही इंतजाम।

बारिश में नाले के पानी के साथ इनके आंगन में सांप-बिच्छू भी डोलने लगते हैं। बिजली न होने से गर्मियों में लू से मौतें होती हैं। अस्पताल में भर्तियां नहीं होतीं और न ही कोई काम देता है क्योंकि आखिर नमक तो इन्होंने पाकिस्तान का खाया!

दिल्ली के आदर्श नगर में पाकिस्तान से आए करीब 150 हिंदू शरणार्थियों का परिवार रहता है। ये लोग उन जगहों पर कच्ची झोपड़ी बनाकर रहते हैं, जहां कूड़ा-कचरा फेंका जाता है।
दिल्ली के आदर्श नगर में पाकिस्तान से आए करीब 150 हिंदू शरणार्थियों का परिवार रहता है। ये लोग उन जगहों पर कच्ची झोपड़ी बनाकर रहते हैं, जहां कूड़ा-कचरा फेंका जाता है।

आउटर रिंग रोड से होते हुए जब हम यहां पहुंचते हैं तो तीखी गंध एकबारगी बौखला देती है। मलबे-कूड़े-आवारा पशुओं और ‘अ-नागरिकता’ की गंध।

बस्ती के भीतर जाने के लिए कोई सड़क नहीं, पूरा मलबा ही रास्ता है। कूड़े के ढेर पर पांव रखते हुए आगे पहुंची तो हमारी मुलाकात एक बच्ची से हुई। नाम- अमरता! गहरी काली आंखों और गुलमुल्ले गालों वाली ये बच्ची इसी मिट्टी की पैदाइश है, लेकिन उसके पास कागज नहीं। उसे मिट्टी में ही खेलता हुआ छोड़कर हम आगे बढ़ते हैं, जहां 28 साल के तीरथ हमारा इंतजार कर रहे हैं।

तीरथ! हंसते हुए कहते हैं- देखिए, मेरे तो नाम में ही भारत बसा है, तब भी मेरा पासपोर्ट हरा का हरा ही रहा। वे पासपोर्ट दिखाते हुए रिक्वेस्ट करते हैं कि उसे धुंधला कर दिया जाए, वर्ना पहचान जाहिर हो जाएगी। फिर ‘वहां’ तबाही मचेगी।

सिंध टडोंलियार का ये नौजवान अपने चार बच्चों का हवाला देते हुए कहता है- इन्हीं के चलते भागना पड़ा। पाकिस्तान में बच्चियों का कोई रखवाला नहीं। कोई भी उठा ले जाएगा और उसके बाद खबर तक नहीं मिलेगी। बच्ची के नाम से लेकर पहचान तक सब कुछ बदल दिया जाएगा। विरोध करो तो बाकियों का भी वही हाल होगा।

हमारी औरतें बाहर नहीं निकल पाती थीं, चाहे जितनी उम्र की हों। सब्जी या एक माचिस भी लानी हो, तो हमारे लौटने का इंतजार करतीं। खतरा हर दिन के साथ बढ़ रहा था। हमने कागज बनवाए और निकल भागे।

तो अब? अब तो खुश हैं?

हमारे सवाल पर वे कुछ देर के लिए चुप हो जाते हैं। शायद पाकिस्तान का भूत अब भी पीछा नहीं छोड़ रहा। चेहरे पर हाथ फेरते हुए कहते हैं- हम तो भाग आए, लेकिन बाकी परिवार वहीं रह गया। रात पिताजी से बात हुई। बारिश में मकान ढह रहा है। वे परेशान थे कि कौन-कौन सी मुसीबत संभालें। वहां माइनॉरिटी की हालत आवारा जानवरों से भी बेकार है। खेती हम करते हैं, पैसे वे कमाते हैं। रात-बिरात घर पर हमले हो जाते हैं। कभी पैसे लूटे जाते हैं, कभी औरतें।

यहां क्या मुश्किलें हैं?

दोहराए हुए सवाल का जवाब आता है- कई तकलीफें हैं। बिजली नहीं। पानी नहीं। मच्छर जान लेते हैं। काम मिलता नहीं, क्योंकि यहां की पहचान नहीं है, लेकिन तब भी पहले से ठीक हैं। मच्छर खून पिएगा, ज्यादा से ज्यादा मलेरिया ला देगा। गंदा पानी पीकर पेट ही खराब रहेगा। तो क्या! हमारी औरतें-बच्चे तो बिना डर जी रहे हैं।

इसी बीच रसोई से कहवा लेकर तीरथ की पत्नी आती हैं। दुबली और गजब की फुर्तीली ये महिला इसरार करती है कि लौटते हुए रात का खाना उनके यहां ही खाकर जाऊं। कहती हैं- हम तुम्हारे घरवालों के लिए भी बांध देंगे।

ये तीरथ का रसोई घर है। मिट्टी की चार दीवारों पर टिन की छप्पर। बीच में मिट्टी का ही चूल्हा, जिसे बीच-बीच में फूंककर तीरथ की पत्नी आग भड़कातीं (जलातीं) हैं।
ये तीरथ का रसोई घर है। मिट्टी की चार दीवारों पर टिन की छप्पर। बीच में मिट्टी का ही चूल्हा, जिसे बीच-बीच में फूंककर तीरथ की पत्नी आग भड़कातीं (जलातीं) हैं।

छज्जे पर पुरानी रस्सी के सहारे नक्काशीदार बर्तन झूल रहा है। ये कटोरदान है। पाकिस्तान के सिंध की पहचान। बिल्लियों और चींटियों से बचाने के लिए इस पर रोटियां रखी जाती हैं। ऊंचाई इतनी कि घर का सबसे बड़ा बच्चा उचककर रोटी निकाल सके और बाकी बच्चों को खिला सके।

छूकर देखती हूं तो कहती हैं- उधर से दो ही चीजें लेकर आए, ये कटोरदान और वहां की चादरें। बाकी सब कुछ छूट गया। परिवार भी!

अभी इनसे बात हो ही रही है तभी कुछ गिरने की आवाज होती है। कच्ची छत से चूहा टपका है। मैं चिंहुंककर पीछे हटती हूं, तो तीरथ कहते हैं- एक चूहा गिरा तो आप डर गईं! यहां हमारे बच्चे सांप-बिच्छुओं के बीच सोते हैं।

लौटने को हूं, जब तीरथ ढोलक निकाल लाते हैं और थाप देते हुए सिंध का कलवाड़ सुनाते हैं, वहां की हिंदू बिरादरी का स्थानीय संगीत। वे रमे हुए हैं।

यहां से निकलकर हम रामजी से मिले। करीब 30 साल (उम्र हालांकि ज्यादा दिखती है) के रामजी चेहरा न दिखाने की शर्त पर बात कर रहे हैं। वे कहते हैं कि यहां रहने वाले हमारे एक भाई ने उधर का सच बताया, तो वहां उसके परिवार के दो जवान लड़कों का गला रेत दिया गया। बाकी लोगों का पासपोर्ट छिन गया। तब से हम वहां की बात नहीं करते।

6 साल पहले धार्मिक वीजा पर भारत पहुंचे रामजी लगातार वीजा बढ़ा रहे हैं, क्योंकि वापस नहीं लौटना चाहते। वे याद करते हैं- जब बॉर्डर पार कर रहे थे, आखिरी कदम था, जो पाकिस्तान में था। उसके बाद का कदम हमें इंडिया पहुंचा रहा था। वो एक कदम हमेशा याद रहेगा। जेल से छूटे लोग आजादी का असल मतलब जानते हैं। हम भी एक किस्म की जेल से निकलकर आए।

घर के कोने में देवी-देवताओं की छोटी-छोटी तस्वीरें सजाकर रोज पूजा-पाठ करते रामजी खुश तो हैं, लेकिन सुखी यहां भी नहीं।

तेज हवा चलती है, तो घर की छत उड़कर कई मीटर दूर जा गिरती है। न पक्का घर बना सकते हैं, न पक्का काम खोज सकते हैं। पाकिस्तान छूटा, लेकिन वहां की पहचान नहीं छूटी।

घर के एक कमरे में अनौपचारिक स्कूल चलता है, जहां वे उन बच्चों को पढ़ाते हैं, जिनकी भर्ती के लिए स्कूल राजी नहीं होते। सामने आंगनबाड़ी का बोर्ड लगा है। साथ का एक शख्स बताता है- सरकारी लोग आए। कहा कि आंगनबाड़ी शुरू करवाएंगे तो छोटे बच्चों को भरपेट खाना मिलेगा। हमने हां कर दी। बोर्ड लटकाकर गए, फिर लौटे ही नहीं।

तिरछा लटका ये बोर्ड इन शरणार्थियों की तरह ही अपनी शुरुआत का इंतजार कर रहा है।

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बस्ती में छिटपुट सामान की एक दुकान है, जहां बच्चों के लिए कुरकुरे-नमकीन मिलते हैं। वहीं पास में हरि ओम साहू मिलते हैं, जो यहां के लोगों के लिए 2013 से काम कर रहे हैं। मैं पूछती हूं- किसी NGO से जुड़े हैं? वे मना कर देते हैं। अपने परिवार की देखभाल के लिए हमें किसी NGO की जरूरत नहीं।

बेहद उत्साही ये नौजवान एक संस्था में स्विमिंग कोच है और बाकी वक्त इस बस्ती को देता है।

वे कहते हैं- कई दिक्कतें हैं। कागज नहीं तो भरोसा नहीं। इनके पास पासपोर्ट के अलावा कुछ है नहीं। वो दिखा दें तो शक हो जाता है। दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। कहीं इमारत टूटे तो मलबा उठाते हैं। कहीं कूड़ा बीनते हैं।

बहुत से लोग हरिद्वार, सोमनाथ होकर आए कि जैसे भगवान ने अपनाया, यहां के लोग भी उन्हें अपना लेंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। कई लोग वापस पाकिस्तान लौट गए, उसी नरक में रहने के लिए। वे कहते हैं- राजस्थान, गुजरात से तो बहुत लोग लौटे, लेकिन कितने ये नहीं पता।

तब भी लोग यहां क्यों आ रहे हैं! हरि ओम कहते हैं- लाख दुख हो, लेकिन मजहबी आजादी तो यहां है। वहां ये हाल था कि चुपके से हवन करते हुए अगर धुआं पड़ोसी के घर चला जाए, तो बेरहमी से मारा जाता था। 12-13 साल की माइनॉरिटी लड़कियां उठाकर मदरसे में रख दी जातीं और फिर चार बच्चों के पिता से शादी करवा दी जाती थी। यहां कई ऐसे परिवार आए।

हमसे बात करेंगे? नहीं! अब वे हर बात पर डरते हैं। छोटा-सा जवाब आता है।

बहुत कोशिश के बाद बस्ती की एक महिला बोलने को तैयार होती है। नाम- गंगा। छींट का लाल दुपट्टा ओढ़े ये महिला छूटते ही कहती है- वहां मुंह उघाड़कर कभी बात नहीं कर सकते थे। सड़क पर निकलो तो साथ में एक मर्द और चेहरे पर इत्ता लंबा घूंघट होना चाहिए। तब भी कोई उठा ले जाएगा।

गंगा बाकायदा घूंघट लेकर दिखाती हैं और उठाते हुए कहती हैं- हम औरत थीं, वहां यही खतरा था।

गंगा अब हर बात पर हंसती हैं, भले पानी के टैंकर आने पर खून-खच्चर मच जाए, या फिर सड़क पिघलाने वाली गर्मी में बगैर बिजली रहना पड़े। बस एक ही आस- भारत हमें अपना ले।

ऊपरवाले का नाम लेते और मांगते हैं कि जब दिल से भारत के हैं तो कागज भी दिलवा दें- वे कहती हैं।

बाहर निकलते हुए आदर्श नगर का नीला बोर्ड दिखता है। साथ में पॉलिटिकल पार्टियों के बैनर कई मुनादियां कर रहे हैं, लेकिन पाकिस्तान छोड़कर आए हिंदुओं के लिए इनमें से कुछ नहीं। वे खतरे से तो बाहर हैं, लेकिन यकीन का समंदर पार करना अभी बाकी है।

अब इस क्रिएटिव से होकर भी गुजर जाइए...

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