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Sunday जज्बात:पापा ने दूसरी औरत के लिए मुझे टॉर्चर किया, मां ने दोगुनी उम्र के आदमी को बेच दिया; भागती न तो क्या करती

2 महीने पहले

मैं शिखा पवार कोल्हापुर की रहने वाली हूं। 18 साल उम्र है। मेरे पापा ने दूसरी औरत के लिए मुझ पर अत्याचार किए, सगी मां ने शादी के नाम पर मुझे बेच दिया। तब मैं 16 साल की थी, दूल्हा दोगुनी उम्र का था। शादी से आधा घंटा पहले मुझे पता चला तो मैंने मां से पूछा कि यह तू क्या करने जा रही हो? मां ने कहा कि मैं मजबूर हूं। मुझे वो रिश्ता मंजूर नहीं था, लेकिन तब मेरे पास शादी करने के सिवा कोई ऑप्शन नहीं था। इसलिए तय किया कि शादी के बाद ससुराल से ही भाग जाऊंगी और दूसरे ही दिन ससुराल वालों को चकमा देकर वहां से भाग गई।

अब मैं अपनी कहानी बताती हूं। मेरे पापा मराठा थे और मां दलित। उन्होंने सिर्फ नवीं क्लास तक पढ़ाई की थी और मिस्त्री का काम करते थे। जबकि मां बीए पास, दिखने में सुंदर और अच्छे खानदान से थी। एक कॉलेज में काउंसलर की नौकरी करती थी। दोनों की लव मैरिज थी। पता नहीं मां ने मेरे पापा के अंदर क्या देखा कि उनसे शादी कर ली। मैं जब भी अपनी मां के बारे में सोचती हूं तो मुझे लगता है औरतें मूर्ख होती हैं जो प्रेम करती हैं।

दोनों ने कोर्ट मैरिज की थी। जब पापा घर पर मां को लाए तो दादी ने विरोध किया। वे कहती थीं कि तेरी औरत दलित है। समाज क्या कहेगा, लोग हम पर ताने कसेंगे। वे अक्सर मां के खिलाफ पापा को भड़काती रहती थीं। हालांकि, पापा ने मां का स्टैंड लिया और दादी से साफ कह दिया कि मैं अपनी पत्नी को घर से नहीं निकाल सकता हूं। इस तरह एक साल कलह-क्लेश में ही निकल गया।

मेरी मां नौकरी करने जाती थी। अब दादी ने मेरी मां के चरित्र पर हमले शुरू कर दिए। वे पापा से कहने लगी कि तेरी औरत यहां-वहां जाती है। आज फलां से बात कर रही थी, आज उससे, इससे हंस रही थी। जबकि ऐसी कोई बात नहीं थी। पापा ने दादी की बात पर यकीन कर लिया। इसके बाद मेरी मां से उनका झगड़ा शुरू हो गया। यहां तक कि पिता ने मां की पिटाई भी शुरू कर दी।

तंग आकर मां ने फैसला किया कि वो अब इस घर से चली जाएंगी। तब तक मैं पैदा हो चुकी थी। मां के घर छोड़कर जाने के फैसले से पापा ने उन्हें समझाया और कहा कि हम लोग यहां से अलग घर ले लेते हैं। इसके बाद वे मां और मुझे लेकर घर से निकल गए। अब सब कुछ ठीक चल रहा था। तीन साल बीत गए, लेकिन इसके बाद आसपास के लोग पापा पर तंज कसने लगे। वे लोग कहने लगे कि अपने परिवार को लेकर बूढ़े मां-बाप से अलग हो गया, उन्हें अकेला छोड़ दिया।

तानों से तंग आकर और समाज की शर्म से मेरे पापा ने फैसला किया कि वे अपने मां-बाप के घर जाएंगे। इस बीच मेरा एक भाई भी हो गया था। घर आने के बाद दादी ने एक नया इलजाम मां पर लगाना शुरू कर दिया। वो अक्सर कहती थीं कि यह लड़का किसका है? ये कैसे पैदा हो गया? इस गंदे झगड़े से तंग आकर मां ने फैसला लिया कि घर छोड़कर हम दोनों बच्चों को लेकर यहां से चले जाएंगे। कुछ दिनों बाद वो हम भाई-बहन को लेकर नाना के यहां आ गईं।

मुझे हमेशा ऐसा लगा कि मां से ज्यादा गलती पापा की है। वे चाहते तो मुझे बिकने से बचा सकते थे, लेकिन उन्होंने मेरी परवाह नहीं की।
मुझे हमेशा ऐसा लगा कि मां से ज्यादा गलती पापा की है। वे चाहते तो मुझे बिकने से बचा सकते थे, लेकिन उन्होंने मेरी परवाह नहीं की।

इसके बाद मां को वापस लेने के लिए पापा आए। उनके रिश्तेदारों न समझा कर भेजा था कि बच्चे तुम्हारे हैं, तुम उन्हें लेकर आओ। बच्चों की खातिर तुम्हारी बीवी भी तुम्हारे पीछे-पीछे आ जाएगी। यहां आने के बाद उन्होंने नाना से कहा कि वो बच्चों को लेकर यहां से जा रहे हैं। अगर उनकी बेटी को बच्चे चाहिए तो मेरे साथ चलकर घर में रहना होगा। मां तैयार नहीं हुई। इसके बाद पापा हम दोनों को लेकर वहां से घर आ गए।

मैं उस वक्त पांच साल की थी और मेरा भाई 9 महीने का था। पापा ने हमें हमारी बुआ के हवाले कर दिया। बुआ हमें बहुत प्यार करती थी, लेकिन दादी सिर्फ मेरे भाई को प्यार करती थी। उसे ही गोद में लेती थी। क्योंकि वह लड़का था। पापा अब घर पर बहुत ज्यादा नहीं रहते थे। सिर्फ रात में कुछ देर के लिए आते थे। मैं पापा से कहती थी कि मुझे मेरी मां चाहिए तो वो कहते कि अगर वो तुम्हारी मां है तो जरूर आएगी।

एक दिन की बात है मैं स्कूल में थी। पापा मुझे लेने के लिए आए और कहने लगे कि तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है। आओ दिखाता हूं। वो मुझे स्कूल के पास एक अपार्टमेंट में ले गए। मुझे लगा कि पापा ने हमारे लिए शायद नया घर खरीदा है। वही दिखाने के लिए ले जा रहे हैं। जब मैं वहां गई तो देखा कि एक औरत खाना बना रही थी।पापा ने मुझसे कहा कि आज से यह तुम्हारी मां है। मुझे बहुत गुस्सा आया और मैं रोने लगी। मुझे मेरी मां चाहिए थी कोई दूसरी औरत नहीं।

फिर मुझे लगा कि आखिर मेरा बाप कब तक मेरी मां का इंतजार करता। मैंने खुद को समझाया कि बुआ के साथ ही रह लूंगी। कुछ देर बैठने के बाद वहां से चली गई। मैंने घर जाकर बुआ और दादी को बताया कि पापा ने दूसरी शादी कर ली है। उन लोगों ने मुझसे कहा कि तुम लोग चिंता न करो। हम लोग तुम्हारे साथ हैं। फिर पापा कभी-कभी घर आने लगे। मैं भी अपने भाई को लेकर पापा के घर चली जाती थी। वो औरत मुझसे ठीक से बात करती थी।

मेरी बुआ ने उस औरत से बोल दिया था कि मेरा भाई बेशक तुम्हारा पति है, लेकिन वो इन बच्चों का बाप भी है। इसलिए इनसे इनका बाप छीनने के बारे में सोचना भी नहीं। इस तरह दो साल बीत गए। हमारे लिए जो भी थीं हमारी बुआ थीं। बहुत प्यार दिया बुआ ने, लेकिन एक दिन वो बीमार हो गईं। उन्हें पेट में दर्द रहता था, लेकिन हमारी देखभाल में वो इसे इग्नोर करती रहीं। बुआ की किडनी फेल हो गई और अस्पताल में तीसरे दिन उनकी मौत हो गई।

अगर मैं अवनी NGO में नहीं गई होती तो पता नहीं मेरे साथ क्या होता और मैं कहां होती।
अगर मैं अवनी NGO में नहीं गई होती तो पता नहीं मेरे साथ क्या होता और मैं कहां होती।

सबसे ज्यादा तकलीफ मुझे हुई। रो-रो कर बुरा हाल हो गया। मुझे लगा कि हम भाई-बहन सड़क पर आ गए। अब हमारा क्या होगा? हमें कौन संभालेगा? हम भाई-बहन की हालत देखकर पापा हमें अपने साथ ले गए। वहां सौतेली मां हमें ठीक से खाना देती और हमारा ख्याल रखती थी, लेकिन तीसरे दिन जब मैं स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही थी तो उन्होंने मुझसे कहा कि वो थक गई हैं। स्कूल जाने से पहले मैं थोड़े से बर्तन धो दूं।

मैंने मन में सोचा कि मैं जब अपनी बुआ की मदद कर सकती हूं तो इनकी भी थोड़ी मदद कर दूं। उन्होंने घर के सारे बर्तन निकाल कर रख दिए। मैंने सबकी सफाई भी कर दी। इसके बाद दूसरे दिन भी वैसा ही हुआ। तीसरे दिन भी उन्होंने कहा कि स्कूल जाने से पहले कपड़े धोकर और झाड़ू-पोंछा करके जाना। मैंने इनकार कर दिया। मैंने कहा कि अगर ऐसे काम मैं करती रही तो स्कूल कैसे जाऊंगी? लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी और उल्टे मेरी पिटाई भी कर दी। उसने मुझे झाड़ू से खूब पीटा।

दोपहर में पापा जब खाना खाने आए तो पूछने लगे कि स्कूल क्यों नहीं गई? इस पर सौतेली मां ने कहा कि इसकी तबीयत ठीक नहीं थी। इस तरह से मैं आठ दिन तक स्कूल नहीं गई। मुझे मौका नहीं मिल रहा था कि मैं पापा से यह सब कैसे कहूं। मैंने एक चिट्ठी लिखी और मेरे भाई ने उसे पापा की जेब में रख दिया। पापा ने वो चिटठी पढ़ ली। उन्होंने सौतेली मां से पूछा तो वो कहने लगी कि यह हम दोनों को अलग करना चाहती है। इसकी बुआ भी ऐसा ही चाहती थी। उस औरत ने ऐसी नौटंकी कर दी कि पापा कुछ नहीं बोल सके।

दादी सब जानती थी कि मेरे साथ यहां क्या हो रहा है। उसने किसी तरह से मेरी मां का पता लगाया। फिर उन्होंने मेरे पापा से कहा कि शिखा को एक दिन के लिए मेरे साथ भेज दो, कहीं जाना है, मैं अकेले नहीं जा सकती हूं। इस तरह मैं दादी के पास आ गई। इसके बाद दादी मुझे मां के पास लेकर गई। मां को देखकर उससे मिलने का वैसा मन नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था। पापा ने हमें हमेशा मां के खिलाफ भड़काया ही था।

खैर मैं मां से मिली और उनका फोन नंबर लिया। मैं अपनी एक दोस्त के घर जाकर उसकी मां के फोन से अपनी मां को कभी-कभी फोन कर लिया करती थी। उससे बताती थी कि कैसे सौतेली मां हमारा बुरा हाल किए हुए है। एक दिन मां ने मुझसे कहा कि तुम मेरे पास आ जाओ। मैं स्कूल गई और वहां से भागकर सीधे अपनी मां के पास चली गई। इसके बाद मां ने पापा को फोन करके बता दिया कि शिखा मेरे पास है और अब यहीं रहेगी।

ये अवनी है। इसी NGO में मैं रहती हूं। धीरे-धीरे मेरे सपने को पंख लग रहे हैं। सीए की तैयारी कर रही हूं और पूरी उम्मीद है कि मुझे कामयाबी भी मिलेगी।
ये अवनी है। इसी NGO में मैं रहती हूं। धीरे-धीरे मेरे सपने को पंख लग रहे हैं। सीए की तैयारी कर रही हूं और पूरी उम्मीद है कि मुझे कामयाबी भी मिलेगी।

एक साल तक मैं मां के पास रही। मां की एक दोस्त थी। उसके बेटे की शादी नहीं हो रही थी। वो मुझसे दोगुनी उम्र का था। उसने मां से कहा कि तुम अपनी बेटी की शादी मेरे बेटे से कर दो बदले में मैं तुम्हें पैसे दूंगी। मां मेरी शादी के लिए राजी हो गई। सौदा पक्का हो गया, लेकिन यह सब मुझे नहीं बताया गया। मेरी शादी से सिर्फ आधे घंटे पहले मुझे इसकी जानकारी हुई। मुझे कुछ समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूं।

अपनी मां के साथ बहुत झगड़ी कि यह तूने क्या किया मेरे साथ? मैं कहने लगी कि मेरे पास और कोई रास्ता नहीं है, अकेली हूं, बेबस हूं। मेरी मौसी की बेटी ने कहा कि यहां झगड़ा करने से अब कुछ नहीं होगा। शादी तो करनी ही पड़ेगी। उसने मुझे समझाया कि तू शादी कर ले, मैं तेरे साथ ससुराल चलूंगी और वहां से भागने में तेरी मदद करुंगी।

इस तरह मेरी शादी हो गई। विदाई के वक्त मौसी की बेटी मेरे साथ गई थी। हमारे यहां रिवाज है कि शादी के पांच दिन तक दूल्हा-दुल्हन एक साथ नहीं सोते हैं। शादी का दूसरा दिन था। मेरी सास एक ब्यूटी पार्लर में काम करती थी वो काम पर चली गई और मेरे पति भी अपने काम पर चले गए। हमें मौका मिल गया। मेरी मौसी की बेटी ने मुझे पैसे दिए और एक रिक्शा करवा दिया। मैं वहां से भाग गई।

भागकर मैं अपने एक रिश्तेदार के घर आ गई। उन्होंने पापा को फोन करके बताया कि शिखा हमारे घर पर आ गई है। पापा मुझे वहां से ले गए। मैंने बताया कि मुझे शादी नहीं करनी है। मेरे पापा और सौतेली मां ने मुझे बहुत मारा। एक दिन तो वो लोग सारी रात मुझे मारते रहे। मेरे भाई से देखा नहीं गया। कुछ दिन के बाद मेरे भाई ने मुझे कुछ पैसे दिए और कहा कि चल यहां से। उसने मुझे एक खेत का रास्ता दिखाया और कहा कि भाग जा यहां से।

वहां से भागने के बाद मैं कोल्हापुर के मंदिर के सामने जाकर थककर बैठ गई। वहां किसी ने एक संस्था अवनी को फोन किया। मुझे इस संस्था के हवाले कर दिया गया। अब मैं यहां एक साल से सीए की तैयारी कर रही हूं। मेरे लिए मां-बाप अहम नहीं रहे। मुझे मां पर फिर भी प्यार आता है। वो बेबस थी, भले उसने मुझे बेच दिया हो, लेकिन जो कोई बोलता है कि वो तेरा बाप है तो मुझे गुस्सा आता है, मेरे पापा ने मुझे ठीक से संभाला होता तो मैं मां के पास न जाती और न मेरी मां मुझे बेचती। वो सख्ती करते, मारते, लेकिन उनकी जिम्मेदारी थी कि वो मुझे सौतेली मां से बचाते।

शिखा ने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की हैं...