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Sunday जज्बात:कॉरपोरेट नौकरी छोड़ वनवासी बनने निकला तो मां बोली- ऐसा कोई करता है क्या, लेकिन मैं अकेला ही जंगल उगाता गया

10 महीने पहलेलेखक: मोहनजीत धालीवाल

मैं विनर रहा हूं, अंडर 19 हॉकी में नेशनल तक खेला हूं। फिर बड़े होने पर कुछ अपना काम किया और उसके बाद कॉर्पोरेट में आ गया। मैं बिड़ला रिटेल स्टोर का पंजाब हेड था। धीरे-धीरे सारा दिन एक ही जगह कंप्यूटर पर काम करते निकल जाता। आउट डोर नहीं रहा, जबकि मैं स्कूल-कॉलेज में स्पोर्ट्स में एक्टिव रहता था। एक दफा हम सब लोग हेमकुंड साहिब (चमोली, उत्तराखंड) गए। मेरे मामा जी योग करते थे। वे 60 साल के थे और मैं 35 साल का। दोनों रनिंग के लिए निकले, मामा जी ने दो-तीन किलोमीटर की लीड ले ली। मुझसे चला ही नहीं गया।

मैंने सोचा कि मैं वो ही हूं जो नेशनल खेलता था, दो-तीन घंटे तक नहीं थकता था, लेकिन पांच से सात साल की कॉर्पोरेट और सिटी लाइफ ने मुझे क्या कर दिया। यह मेरे साथ क्या हो गया। आखिर ऐसे कब तक काम चलेगा। दिल में तो कई सालों से था कि अपना जंगल उगाया जाए, लेकिन धक्का उस दिन लगा और उसी दिन फाइनल पुश भी मिला। वादा किया कि अब नहीं बैठना है कंप्यूटर के सामने। स्पार्किंग पाॅइंट पहले से था और सोच लिया कि देखा जाएगा, आर या पार।

स्कूल-कॉलेज में स्पोर्ट्स में काफी एक्टिव रहता था। कॉर्पोरेट में आने के बाद धीरे-धीरे लाइफ दफ्तर में कंप्यूटर तक सिमटकर रह गई।
स्कूल-कॉलेज में स्पोर्ट्स में काफी एक्टिव रहता था। कॉर्पोरेट में आने के बाद धीरे-धीरे लाइफ दफ्तर में कंप्यूटर तक सिमटकर रह गई।

पंजाब के फतेहगढ़ साहिब में कुछ जमीन पहले से थी। इसको लेकर प्लान करना शुरू किया। दिमाग में यही था कि अब कंप्यूटर और सिटी लाइफ छोड़कर फिजिकल काम करना है। मुश्किलें तो बहुत आईं। मैं शुरू में अकेला रह गया। जैसे आप पहले परिवार और समाज में रह रहे होते हैं, लेकिन अचानक आपका मन बदल जाता है तो परिवार आपके खिलाफ हो जाता है। ऐसा मेरे साथ भी हुआ। परिवार मेरे खिलाफ हो गया। कुछ रिश्तेदारों ने साथ दिया। मेरी बहन ने मुझे सपोर्ट किया। क्योंकि वह खुद कॉर्पोरेट कल्चर में काम करती थी और उसे पता था कि कॉर्पोरेट की जिंदगी आगे जाकर बहुत कष्ट देने वाली है।

इसलिए बहन ने शुरू से ही साथ दिया। मेरी मां को समझ नहीं थी और उनके अंदर डर था, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझाया। वह खुलकर साथ नहीं देती थीं। उनका कहना था कि इस काम को बाकी लोग नहीं कर रहे हैं। तुम अकेले क्यों कर रहे हो, जरूर कुछ न कुछ गड़बड़ है। रही वाइफ की बात तो वाइफ को आज तक समझ नहीं आया कि मैं क्या कर रहा हूं। वह आज तक यहां नहीं आई।

हर काम को करने में चैलेंज तो फेस करना ही पड़ता है। मैंने भी किया, लेकिन अब लोग मेरे काम की तारीफ करते हैं।
हर काम को करने में चैलेंज तो फेस करना ही पड़ता है। मैंने भी किया, लेकिन अब लोग मेरे काम की तारीफ करते हैं।

वह समझ ही नहीं पा रही कि यह सब क्या हो रहा है, क्यों हो रहा है, मैंने भी ज्यादा समझाने की कोशिश नहीं की। अब मैं चाहता हूं कि वह अपनी जिम्मेदारी खुद उठाए। बच्चे पर भी प्रेशर नहीं है कि वह मेरे इस काम में मेरा साथ दे। मेरे एक दोस्त ने एक दफा कहा था कि मछली पत्थर चाट कर ही वापस आती है, यानी मछली तब तक वापस नहीं आती है जब तक उसे समुद्र का बिल्कुल किनारा नहीं मिल जाता है। सो देखते हैं कि क्या होता है।

मैं अपनी धुन और फैसले का पक्का आदमी हूं। हां शुरू में अपने इस फैसले के साथ बहुत अकेला हो गया था। अकेले जंगल उगाता, घर बनाने के लिए खुद लकड़ियां लाता। शरीर से थकता था, लेकिन दिल से नहीं थका। जिद थी। कभी हताश नहीं हुआ। मेरा परिवार और समाज नहीं रहा, लेकिन यह अलग तरह का समाज है, शहर वाले समाज में सिर्फ मानव, मानव होते हैं। जबकि इस समाज में मानव, हरियाली, जानवर सब हैं। धीरे-धीरे दिल लगने लगता है। लगने लगता है कि हमारी भी कम्युनिटी है। हालांकि शुरू में लगता था कि कट गए। फिर धीरे-धीरे अपने जैसे लोग मिलने लगे। जो कुछ नया सीखना चाहते हैं, रैट रेस से बाहर निकलना चाहते हैं।

ये जगप्रीत सिंह हैं। दिल्ली में जॉब करते थे। अब मेरे ही साथ ये भी जंगल की सैर पर निकले हैं।
ये जगप्रीत सिंह हैं। दिल्ली में जॉब करते थे। अब मेरे ही साथ ये भी जंगल की सैर पर निकले हैं।

आज हालात ऐसे हैं कि हर वीकेंड पर मेरे इस जंगल को देखने और यहां वक्त बिताने के लिए कॉर्पोरेट से लोग आते हैं। शुरू में यही लोग बोलते थे कि क्या कर रहे हो यह। यह एक लाइफ स्टाइल है। जैसे जैसे करते हैं, समझ में आता रहता है। बाकी परिवार को आप समझा सकते हैं। मेरे घर पर अब सब्जी यहां से जाने लगी है। मेरी हेल्थ अच्छी रहने लगी है। हालांकि मैंने किसी को कुछ नहीं समझाया। हेल्थ को आउटसोर्स नहीं करना चाहिए, अगर आपसे कोई नाराज भी होता है तो हो जाए।

सिटी और जंगल की लाइफ में फर्क तो है। यह लाइफ इतनी आसान नहीं, टफ है, लेकिन कुछ साल बाद फ्लो में आ जाती है। हेल्थ गई तो बाकी सारा सिस्टम हिल जाता है। बाकी सिस्टम हिल जाए लेकिन हेल्थ रह जाए तो बाउंस बैक कर सकते हैं। हां इस जंगल की लाइफ में एक रात में रिजल्ट नहीं आते हैं। बहुत काम करना पड़ता है। मुझे बहुत टाइम लगा। फैसला लेने में दस साल लग गए, लेकिन अब सब फ्लो में आ रहा है।

अब मेरा काम देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। लोग अपने बच्चों को भी जंगल की सैर के लिए साथ लेकर आते हैं।
अब मेरा काम देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं। लोग अपने बच्चों को भी जंगल की सैर के लिए साथ लेकर आते हैं।

मुझे सिटी के सिर्फ मोनो कल्चर वाले इंसानों के समाज की जरूरत ही नहीं क्योंकि यहां मेरा अपना समाज बनता जा रहा है। यहां तक कि मेरे बाद मुझे देख कॉर्पोरेट से तीन चार मेरे दोस्तों ने यहां जमीन खरीद ली है और जंगल उगा रहे हैं। बाड़ा बढ़ता जा रहा है। हमारे पास पैसा नहीं है, लेकिन अच्छी सेहत है।

मैंने राहुल सांकृत्यान को पढ़ा और जापान के एक किसान मैसो सिला कोका मेरे आदर्श हैं। कोका का फार्मूला था नो टिल फार्मिंग। इंसान को हर हाल में जंगल की ही तरफ लौट कर आना होगा, यही अंत है, यही सॉल्यूशन है। मैं आज आ गया, मुझे देख धीरे-धीरे लोग आ रहे हैं। बाकी लोग खुद आएंगे कल। आप मेरे दोस्तों से पूछो कि वह कैसा महसूस कर रहे हैं।

जहां तक खर्च की बात है तो शहर में जीने के लिए अगर एक लाख चाहिए तो यहां 25,000 चाहिए। वह भी धीरे-धीरे आने लगता है। सब्जियों और मेडिसनल प्लाटंस से। मेरे जंगल में अब पेड विजिटर आने लगे हैं। मेरा दवाओं पर खर्च नहीं है।

मोहनजीत धालीवाल जाने-माने फॉरेस्ट ग्रोवर हैं। उन्होंने पंजाब के फतेहगढ़ साहिब में 5 एकड़ जमीन को फूड फॉरेस्ट के रूप में तब्दील कर दिया है। उन्होंने अपनी कहानी भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर की है।