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भास्कर एक्सप्लेनर:ज्ञानवापी में शिवलिंग मिलने के दावे के बावजूद हिंदू पक्ष का केस हो सकता है खारिज, जानिए वो कानून

5 महीने पहलेलेखक: आदित्य द्विवेदी

ज्ञानवापी मस्जिद विवाद में हिंदू पक्ष का दावा खारिज हो सकता है। अंजुमन इंतेजामिया प्रबंध समिति ने सुप्रीम कोर्ट में एक अपील दायर करके कहा है कि ज्ञानवापी परिसर का सर्वे कराने वाला वाराणसी सिविल कोर्ट का आदेश स्पष्ट रूप से द प्लेसेज ऑफ वर्शिप (स्पेशल प्रोविजंस) एक्ट 1991 का उल्लंघन है।

इसके बाद ज्ञानवापी विवाद की पूरी बहस इसी कानून के इर्द-गिर्द टिकी हुई है। भास्कर एक्सप्लेनर में हम द प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट और उससे जुड़े सभी पहलुओं को आसान भाषा में बता रहे हैं...

क्या है द प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991?
द प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट उपासना स्थलों को बदले जाने से रोकता है। एक्ट के मुताबिक 15 अगस्त 1947 को उपासना स्थल जिस धार्मिक रूप में थे वो बरकरार रहेगा। यानी आजादी के वक्त अगर कोई मस्जिद थी, तो बाद में उसे बदलकर मंदिर या चर्च या गुरुद्वारा नहीं किया जा सकता। ये कानून 11 जुलाई 1991 को लागू किया गया। इसमें कुल 8 सेक्शन हैं जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण 4 बातें इस प्रकार हैं...

सेक्शन-3: 15 अगस्त 1947 के बाद धार्मिक स्थलों में कोई बदलाव नहीं
प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा 3 कहती है कि धार्मिक स्थलों को उसी रूप में संरक्षित किया जाएगा, जिसमें वह 15 अगस्त 1947 को था। अगर यह सिद्ध भी होता है क‍ि वर्तमान धार्मिक स्थल को इतिहास में किसी दूसरे धार्मिक स्थल को तोड़कर बनाया गया था, तो भी उसके वर्तमान स्वरूप को बदला नहीं जा सकता।

सेक्शन 4(2): 15 अगस्त 1947 से पहले के विवाद पर कोई नया मुकदमा नहीं
15 अगस्त 1947 को मौजूद किसी भी उपासना स्थल के धार्मिक चरित्र को बदलने के लिए किसी भी अदालत में पेंडिंग कोई भी मुकदमा या कानूनी कार्यवाही खत्म हो जाएगी और कोई नया मुकदमा या कानूनी कार्यवाही शुरू नहीं की जाएगी। अगर उपासना स्थल में बदलाव 15 अगस्त 1947 के बाद हुआ है, तो ऐसे में कानूनी कार्यवाही की जा सकती है।

सेक्शन-5: राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर लागू नहीं
द प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट के कोई प्रावधान अयोध्या के रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर लागू नहीं होंगे।

सेक्शन-6: 3 साल तक की सजा का प्रावधान
अगर कोई व्यक्ति इस एक्ट के सेक्शन-3 का उल्लंघन करता है तो उसे तीन साल तक की सजा और जुर्माना भरना पड़ सकता है।

अब सवाल उठता है कि 1991 में नरसिम्हा राव सरकार को ऐसा कानून लाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके लिए उस वक्त की राजनीतिक और धार्मिक हलचल को समझना होगा।

1984 में दिल्ली में पहली बार हुई धर्म संसद में हिंदू पक्ष को अयोध्या, काशी और मथुरा पर दावा करने को कहा गया। इसके बाद से ‌BJP ने अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को राजनीतिक आंदोलन का रूप देना शुरू कर दिया।

बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा शुरू कर दी। 29 अक्टूबर को उन्हें अयोध्या पहुंचना था, लेकिन इससे पहले 23 अक्टूबर को उन्हें समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया।
बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से अयोध्या के लिए रथयात्रा शुरू कर दी। 29 अक्टूबर को उन्हें अयोध्या पहुंचना था, लेकिन इससे पहले 23 अक्टूबर को उन्हें समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया।

BJP के समर्थन वाली केंद्र की वीपी सिंह सरकार गिर गई। चुनाव हुए, कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार आई, लेकिन इस दौरान मंदिर निर्माण का आंदोलन बढ़ता ही चला गया। अयोध्या विवाद इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच चुका था। इसी बीच अयोध्या के साथ ही काशी-मथुरा का मामला भी उठने लगा।

तब केंद्र सरकार को लगा कि देशभर के अलग-अलग धार्मिक स्थलों को लेकर ऐसे विवाद बढ़े तो हालात बेहद खराब हो जाएंगे। ऐसे में नरसिम्हा राव सरकार 11 जुलाई 1991 को प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 लेकर आई। एक्ट का मकसद अयोध्या रामजन्मभूमि आंदोलन की बढ़ती तीव्रता और उग्रता को शांत करना था।

बीजेपी ने संसद में कानून का विरोध किया
1991 में नरसिम्हा राव सरकार जब यह कानून लाई तो उस समय संसद में BJP ने इसका पुरजोर विरोध किया। उस समय राज्यसभा में BJP नेता अरुण जेटली और लोकसभा में उमा भारती ने इस एक्ट को संसदीय समिति के पास भेजने की मांग उठाई।

हालांकि, विरोध के बावजूद एक्ट राज्यसभा में पास हो गया। राम मंदिर विवाद पर फैसला आने के बाद काशी और मथुरा सहित देशभर के लगभग 100 मंदिरों की जमीन को लेकर दावेदारी उठने लगी है। हालांकि, प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के कारण दावेदारी करने वाले कोर्ट का रास्ता नहीं चुन सकते। इसी बात पर विवाद है।

सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती दे चुके हैं BJP नेता
BJP नेता और एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने पिछले साल इस प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में कहा गया है कि यह कनून हिंदू, जैन, सिख और बौद्धों के संवैधानिक अधिकारों से उन्हें वंचित करता है। उनके जिन धार्मिक और तीर्थ स्थलों को विदेशी आक्रमणकारियों ने तोड़ा, उसे वापस पाने के कानूनी रास्ते को बंद करता है।

BJP नेता ने एक्ट की धारा 2, 3 और 4 को चुनौती दी है। साथ ही इसे गैर संवैधानिक घोषित करने की मांग की है। याचिका में कहा गया है कि यह एक्ट संविधान के समानता के अधिकार, गरिमा के साथ जीवन के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार में दखल देता है।

ज्ञानवापी मस्जिद पर ताजा विवाद क्या है?

यह ज्ञानवापी के पिछले हिस्से की तस्वीर है। एडवोकेट कमिश्नर की सर्वे रिपोर्ट पेश होने के बाद अदालत अपना आदेश सुनाएगी।
यह ज्ञानवापी के पिछले हिस्से की तस्वीर है। एडवोकेट कमिश्नर की सर्वे रिपोर्ट पेश होने के बाद अदालत अपना आदेश सुनाएगी।

दिल्ली की रहने वाली राखी सिंह और बनारस की रहने वाली लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक की ओर ने वाराणसी की सिविल जज सीनियर डिवीजन की कोर्ट में 18 अगस्त 2021 में एक याचिका दाखिल की।

इसमें कहा गया कि ज्ञानवापी परिसर में हिंदू देवी-देवताओं का स्थान है। ऐसे में ज्ञानवापी परिसर में मां शृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन की अनुमति दी जाए। इसके साथ ही परिसर स्थित अन्य देवी-देवताओं की सुरक्षा के लिए सर्वे कराकर स्थिति स्पष्ट करने की बात भी याचिका में कही गई।

मां शृंगार गौरी का मंदिर ज्ञानवापी के पिछले हिस्से में है। 1992 से पहले यहां नियमित दर्शन-पूजन होता था। बाद में सुरक्षा व अन्य कारणों के बंद होता चला गया। अभी साल में एक दिन चैत्र नवरात्र पर शृंगार गौरी के दर्शन-पूजन की अनुमित होती है।

मुस्लिम पक्ष को शृंगार गौरी के दर्शन-पूजन में आपत्ति नहीं है। उनका विरोध पूरे परिसर का सर्वे और वीडियोग्राफी कराए जाने पर है। इसी बात का विरोध वाराणसी कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक कर रहे हैं।

क्या ज्ञानवापी परिसर का सर्वे गैर-कानूनी है?
द प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने वाले बीजेपी नेता और वरिष्ठ वकील अश्विनी उपाध्याय का मानना है कि ज्ञानवापी परिसर का सर्वे गैरकानूनी नहीं है। उनके मुताबिक एक्ट का सेक्शन-4 कहता है कि पुराने मॉन्यूमेंट पर ये लागू नहीं होता। ज्ञानवापी तो 350 साल पुराना है।

अश्विनी उपाध्याय के मुताबिक 'ज्ञानवापी मस्जिद ही नहीं है, तो उसका धार्मिक कैरेक्टर बदलने की बात ही कहा हैं। मुस्लिम लॉ के मुताबिक मस्जिद उसी जमीन पर बन सकती है जो खुद की है या दान की गई हो या खरीदी गई हो और उस पर पहले से कोई स्ट्रक्चर न हो। ऐसे में ज्ञानवापी को मस्जिद नहीं कहा जा सकता।'

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कपिल मदान का कहना है कि इस सर्वे का कोई मतलब नहीं है। उन्होंने कहा कि विवाद की शुरुआत एक अपील से हुई थी, जिसमें पूरे साल पूजा करने की अनुमति मांगी गई थी। अगर आप सिर्फ पूजा करना चाहते हैं तो ऐसे में ये सर्वे करना और शिवलिंग के दावे करना बेवजह है। प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट का सेक्शन-4 साफ तौर पर कहता है कि आप उपासना स्थल का धार्मिक कैरेक्टर नहीं बदल सकते।