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आज की पॉजिटिव खबर:महाराष्ट्र के प्रल्हाद नदी किनारे पड़े पत्थरों से बनाते हैं क्रिएटिव आर्ट, देशभर में ऑनलाइन मार्केटिंग, कई अवॉर्ड भी जीते

नई दिल्ली12 दिन पहलेलेखक: मेघा

हम जब कभी नदी किनारे जाते हैं, तो अक्सर हमें ढेर सारे पत्थर दिखाई पड़ते हैं। इन पत्थरों का शायद ही कोई खास इस्तेमाल होता है। जरा सोचिए अगर इन पत्थरों की मदद से क्रिएटिव आर्ट तैयार की जाए, मूर्ति तैयार की जाए, सोशल अवेयरनेस क्रिएट किया जाए तो कैसा रहेगा? है न यूनीक आइडिया। महाराष्ट्र के परभणी जिले में रहने वाले प्रल्हाद भगवानराव पवार ने यह पहल की है। एक बात साफ कर दें कि उनका नाम प्रह्लाद नहीं प्रल्हाद है।

प्रल्हाद पिछले 5 साल से नदी किनारे पड़े पत्थरों से अलग-अलग तरह के क्रिएटिव प्रोडक्ट बना रहे हैं। देशभर में उनके प्रोडक्ट की डिमांड भी है। इससे उनकी अच्छी कमाई हो जाती है। इतना ही नहीं अपनी क्रिएटिविटी से वे लोगों के बीच जागरूकता भी फैला रहे हैं। इसको लेकर उन्हें कई अवॉर्ड भी मिल चुके हैं।

बचपन से ही नदी किनारे पड़े पत्थरों से कलाकारी का शौक था

प्रल्हाद बताते हैं कि हम लोगों की डिमांड के मुताबिक कस्टमाइज्ड प्रोडक्ट भी तैयार करते हैं। इसमें कस्टमर्स जैसा बोलते हैं, वैसा आर्ट हम डिजाइन कर देते हैं।
प्रल्हाद बताते हैं कि हम लोगों की डिमांड के मुताबिक कस्टमाइज्ड प्रोडक्ट भी तैयार करते हैं। इसमें कस्टमर्स जैसा बोलते हैं, वैसा आर्ट हम डिजाइन कर देते हैं।

33 साल के प्रल्हाद बताते हैं कि हमारा ज्यादातर समय गांव में ही बीता है। बचपन में हम लोग नदी किनारे घूमने और खेलने जाते थे। हमारे यहां गोदावरी नदी है। तब हम लोग अपने दोस्तों के साथ नदी किनारे पड़े पत्थरों से खेलते थे और कुछ न कुछ कलाकारी करते रहते थे। धीरे-धीरे मेरी दिलचस्पी बढ़ने लगी और मैं अलग-अलग तरह की डिजाइन क्रिएट करने लगा। हालांकि तब बहुत ही शुरुआती लेवल पर था और इस तरह के आर्ट प्लेटफॉर्म की प्लानिंग नहीं थी और न ही उतनी हमें समझ थी।

प्रल्हाद बताते हैं कि साल 2016 में उन्होंने पहली बार इन पत्थरों की मदद से एक महिला की कलाकृति तैयार की। जिसे उनके एक परिचित ने खरीद लिया और आगे के लिए भी इस तरह के प्रोडक्ट की डिमांड की। प्रल्हाद के लिए यह टर्निंग पॉइंट रहा। वे कहते हैं कि तब जो मैंने आर्ट तैयार किया था वह आज के मेरे आर्ट के मुकाबले सामान्य ही था, लेकिन वह यूनीक था और नया आइडिया था। इसलिए जिसने भी उसे देखा उसे पसंद आया। इसके बाद मुझे लगा कि इस आर्ट को पैशन के साथ ही प्रोफेशनल लेवल पर भी शुरू किया जा सकता है।

कोरोना से पहले साल 2020 में शुरू किया स्टार्टअप

कोरोना काल में प्रल्हाद ने अलग-अलग जगहों पर स्टॉल लगाकर लोगों को कोरोना से बचने के लिए भी जागरूक किया है।
कोरोना काल में प्रल्हाद ने अलग-अलग जगहों पर स्टॉल लगाकर लोगों को कोरोना से बचने के लिए भी जागरूक किया है।

बस क्या था, प्रल्हाद ने नदी किनारे पड़े पत्थरों से डिजाइन तैयार करना शुरू कर दिया। वे अलग-अलग जगहों पर प्रदर्शनी लगाकर अपने आर्ट की मार्केटिंग करने लगे। इसी बीच 2017 में उन्हें महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की तरफ से एक फेलोशिप मिली। तीन साल की फेलोशिप के दौरान उन्हें आर्ट के बारे में कई चीजें देखने को मिलीं। अलग-अलग थीम पर सामाजिक अभियान से जु़ड़ी चीजों को देखकर वे काफी इंस्पायर्ड हुए।

प्रल्हाद कहते हैं कि तब मुझे रियलाइज हुआ कि जितना बेहतर हम सोचेंगे, चीजों को विजुअलाइज करेंगे तब और बेहतर आर्ट बनेगा। क्योंकि हर आर्ट के पीछे कोई न कोई मैसेज या मकसद जरूर होता है। इसके बाद साल 2020 में उन्होंने अपने स्टार्टअप की शुरुआत की। वे नदी किनारे पड़े पत्थरों से मूर्ति, सोशल अवेयरनेस से जुड़े आर्ट, होम डेकोरेशन आइटम्स तैयार करने लगे। वे कहते हैं कि इसके लिए मुझे किसी तरह की ट्रेनिंग की जरूरत नहीं पड़ी। हर दिन कुछ न कुछ नया करने की ललक से ही मैं आगे बढ़ता गया। लोग जैसा सजेस्ट करते गए वैसा मैं भी करता गया।

यह आर्ट प्रल्हाद ने बच्चों में एजुकेशन अवेयरनेस फैलाने को लेकर क्रिएट की है। इसी तरह उन्होंने स्वच्छता को लेकर भी डिजाइन तैयार की है।
यह आर्ट प्रल्हाद ने बच्चों में एजुकेशन अवेयरनेस फैलाने को लेकर क्रिएट की है। इसी तरह उन्होंने स्वच्छता को लेकर भी डिजाइन तैयार की है।

कैसे तैयार करते हैं क्रिएटिव आर्ट
इस आर्ट के लिए प्रल्हाद गोदावरी नदी, बोरी नदी और बेतवा जैसी नदियों से पत्थर इकट्ठा करते हैं। सबसे पहले वे अपनी थीम सेट करते हैं, उसके बाद थीम के अनुसार सही आकार और डिजाइन में पत्थर ढूंढ़ते हैं। खास बात यह है कि वे बिना किसी पत्थर को काटे उसके प्राकृतिक रूप से ही आर्ट तैयार करते हैं। पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए स्पेशल गोंद का इस्तेमाल करते हैं। वे अपने आर्ट को 9×12 आकार के साइज में फ्रेम करते है। एक नियमित फ्रेम को बनाने में तीन दिन तक का समय लगता है। जबकि एक फ्रेम बनाने में 1000 से 1200 रुपए लगते हैं।

वे बताते हैं कि पत्थरों से क्रिएटिव आर्ट बनाना पेबल आर्ट के अंतर्गत आता है। यह एक बहुत ही अनोखी कला है। ये देखने में जितना आसान लगता है असल में उतना ही कठिन होता है। थीम के हिसाब से उसी आकार के पत्थरों को खोजना और उसे ढांचे में तैयार करना बहुत मुश्किल होता है।

प्रल्हाद अपने घर पर ही सभी प्रोडक्ट तैयार करते हैं। इसमें उनकी वाइफ और परिवार के बाकी लोग भी मदद करते हैं।
प्रल्हाद अपने घर पर ही सभी प्रोडक्ट तैयार करते हैं। इसमें उनकी वाइफ और परिवार के बाकी लोग भी मदद करते हैं।

सोशल मीडिया के जरिए कर रहे हैं मार्केटिंग
मार्केटिंग के लिए प्रल्हाद सोशल मीडिया और वॉट्सऐप ग्रुप का इस्तेमाल ज्यादा करते हैं। वे अपनी कलाकृति की फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड करते हैं, वहां से लोग मनपसंद प्रोडक्ट के लिए ऑर्डर देते हैं। कई लोग तो अपनी डिमांड के मुताबिक उनसे कस्टमाइज्ड प्रोडक्ट भी तैयार करवाते हैं। इसके बाद वे प्रोडक्ट की अच्छी तरह से पैकेजिंग करके कुरियर की मदद से कस्टमर्स के पास भेज देते हैं।

इसके अलावा वे अलग-अलग जगहों और मेलों में जाकर अपना स्टॉल भी लगाते हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में वे अपना स्टॉल लगा चुके हैं। उनके एक प्रोडक्ट की प्राइस 1500 के करीब होती है।

कई सरकारी अभियानों के नारों पर बना चुके हैं कलाकृति

इस खास आर्ट के लिए प्रल्हाद को कई लोग सम्मानित कर चुके हैं। भोपाल में एक कार्यक्रम के दौरान MP के CM शिवराज सिंह के साथ प्रल्हाद।
इस खास आर्ट के लिए प्रल्हाद को कई लोग सम्मानित कर चुके हैं। भोपाल में एक कार्यक्रम के दौरान MP के CM शिवराज सिंह के साथ प्रल्हाद।

प्रल्हाद के पास अभी 100 से ज्यादा कलाकृतियां हैं। हाल ही में शिक्षक दिवस और गणेश चतुर्थी के मौके पर उन्होंने पत्थर से कई आर्ट क्रिएट किए हैं। उनकी एक अन्य कलाकृति 'माई टीचर रॉक्स!' में एक शिक्षक को 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान के तहत लड़कियों को पढ़ाते हुए दिखाया गया है। दूसरे आर्ट में एक युवा लड़की को पौधे को पानी देते हुए और फेसमास्क में एक महिला को 'स्वच्छ सर्वेक्षण 2021' के तहत सड़क पर झाड़ू लगाते हुए दिखाया गया है।

हालांकि कोविड महामारी की वजह से उनकी कलाकृति की बिक्री धीमी पड़ चुकी है। वे चाहते हैं कि उनके इस पेबल आर्ट को ज्यादा से ज्यादा पहचान मिले। उन्हें उम्मीद है कि सरकार आगे आएगी और परभणी जैसी जगहों की छिपी सुंदरता को दिखाने में उनके जैसे कलाकारों की मदद करेगी।

अगर इस तरह के आर्ट और क्रिएटिविटी में आपकी दिलचस्पी है तो यह खबर आपके काम की है
आसमान में उड़ती चिड़िया और उसके पंख तो आपने जरूर देखे होंगे, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन पंखों पर कलाकारी भी की जा सकती है। उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले की रहने वाली 24 साल की आफरीन खान इन्हीं पंखों पर अपनी क्रिएटिव पेंटिंग्स से एक से बढ़कर एक चीजें तैयार कर रही हैं। देशभर में उनकी पेंटिंग्स की गूंज है। इतना ही नहीं भारत के बाहर भी कई देशों में वे अपनी क्रिएटिविटी दिखा चुकी हैं। बड़े लेवल पर उनकी पेंटिंग्स की डिमांड भी है। इससे उनकी अच्छी-खासी कमाई भी हो जाती है। (पढ़िए पूरी खबर)

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