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बात बराबरी की:प्रिया की अकबर पर जीत वो आवाज है, जो फुसफुसाहटों को चीख में बदल सकती है; लड़ो औरतों प्रिया की तरह लड़ो

नई दिल्ली12 दिन पहले
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तारीखें महज पर्व-उत्सवों से नहीं बनतीं, उनके यादगार होने की कई दूसरी वजहें भी होती हैं, जो किसी त्योहार से बड़ी होती हैं। 17 फरवरी ऐसा ही एक दिन रहा। दिल्ली की अदालत ने इस रोज एमजे अकबर के खिलाफ यौन शोषण का आरोप लगाने वाली पत्रकार प्रिया रमानी को मानहानि के आरोप से बरी कर दिया। पूर्व केंद्रीय मंत्री एमजे अकबर पर प्रिया ने साल 2018 में MeToo मुहिम के दौरान यौन शोषण का आरोप लगाया था। इसके बाद एक-एक करके 20 महिलाएं अकबर के खिलाफ आईं, जिनमें कई वरिष्ठ पत्रकार भी हैं। वे सभी उस दौरान अकबर की मातहत हुआ करती थीं।

हो-हल्ला मचने पर अकबर ने इस्तीफा तो दे दिया, लेकिन तनफनाते हुए प्रिया पर पलटवार भी कर दिया। अकबर को गुस्सा था कि प्रिया के कारण उन जैसे सम्मानित शख्स की हंस के पंख जैसी शफ्फाक छवि पर धब्बा लगा। अकबर के वकील ने ये तर्क भी दिया कि साल 1993 में हुए शोषण पर पीड़िता ने इतने सालों तक क्यों चुप्पी साध रखी थी। लब्बोलुआब ये कि जिस कटघरे में अकबर को होना था, वहां प्रिया खड़ी कर दी गई। ये ठीक वैसा ही है, जैसे छिपकली को मारने की कोशिश करने वाला ये कहते हुए बखेड़ा कर दे कि देखो, छिपकली कितनी धूर्त है, मरने के बाद भी उसकी पूंछ तड़फड़ा रही है।

अदालत ने प्रिया को मानहानि के केस से बरी करने के दौरान कई अहम बातें भी कही। इनमें से एक बात ये थी कि सामाजिक प्रतिष्ठा वाले शख्स के बारे में ये पक्का नहीं हो जाता कि वो यौन शोषण नहीं करेगा। दुनिया का सबसे सम्मानित व्यक्ति भी पाखंडी हो सकता है और मौका पाकर बच्ची तक को दबोच सकता है। दूसरी बात ये कही गई कि पीड़िता चाहे तो सालों बाद भी अपनी तकलीफ अदालत के सामने ला सकती है। कोर्ट उससे ये कतई नहीं पूछेगी कि इतने समय आप चुप क्यों रहीं। वो उससे यौन शोषण का ताजा सबूत जुटाने को कहकर हिम्मत नहीं तोड़ेगी, बल्कि उन हालातों को परखेगी, जब बंद कमरे में उसके साथ हादसा हुआ होगा।

होटल का बंद कमरा, कॉन्फ्रेंस रूम का बंद दरवाजा या फिर सरपट भागती ट्रेन का बंद शौचालय। कहीं भी बंद किवाड़ लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं। मुंदे हुए ये दरवाजे जाने कितनी ही चीखों और तकलीफों को भी कसकर बंद रखते हैं। अदालत ने भी ये माना।

फैसले के बाद प्रिया ने कहा- मेरी जीत से महिलाओं को खुलकर बोलने का हौसला मिलेगा...! छोटा-सा वाक्य लेकिन बेहद ताकतवर। कल्पना करें, पढ़ाई के तुरंत बाद कैंपस सिलेक्शन के तहत नौकरी पाई 20-22 साल की लड़की की। सैकड़ों किलोमीटर दूर किसी अनजान शहर में काम करती उस लड़की का मर्यादावादी बॉस कब हौसलाअफजाई करते हुए यौन शोषक बन जाता है, वो समझ ही नहीं पाती। कई हफ्ते और महीने यही समझते लग जाते हैं कि जो हुआ, वो पिता का प्यार या प्रेमी का स्पर्श नहीं था, बल्कि गंदी सोच में लिथड़े हुए हाथ थे। समझने के बाद शिकायत का रास्ता चुनना कब 'सलीबाना' नहीं। सबसे पहला और खूंखार सवाल आता है- पहले क्यों नहीं बताया?

जब भी औरत यौन शोषण के खिलाफ मुंह खोलती है, शूरवीरों का पूरा गिरोह इकट्ठा हो दनादन आंकड़े और नजीरें उगलने लगता है। इससे भी काम न बने, तो जिंदा सबूत या चश्मदीद गवाह लाने को कह देता है। सालों पुराने वो कपड़े, जिन्हें पहने होने के दौरान पीड़िता के साथ यौन शोषण हुआ। या फिर वो मिनट और सेकंड, जब वाकया हुआ। वो सारी कवायद होती है, जो आरोप लगाने वाली का हौसला और रहा-सहा आत्मसम्मान भी चिंदी-चिंदी कर दे।

लगभग तीन साल पहले पूरी दुनिया में MeToo कैंपेन तहलका मचा रहा था। इसकी आंच भारत में भी हिम्मत बंधाने लगी, तब मेरे ही एक सहकर्मी ने हंसी-हंसी में कहा था- 'अब तो सारी लड़कियों को बहन कहना होगा, तभी छुटकारा है'। वो सहकर्मी खाया-अघाया हुआ नहीं था। मुश्किल से 26 साल की उम्र का लड़का, जिसकी आवाज कुछ सालों पहले ही भर्राई होगी। वो लड़का अगर ये सोच रखता है तो समझना मुश्किल नहीं कि पक्के खिलाड़ी क्या करते होंगे। तब दफ्तरों में महिला शौचालयों के बाहर पॉश (Prevention of Sexual Harassment) के नियम-कायदे चिपक गए थे, जिन्हें देखकर गुजरते हुए पुरुष सहकर्मी मूंछों ही मूंछों में हंसते। दफ्तर और HR के हवा-हवाई कायदे भला क्या ही बिगाड़ लेंगे, जब अब तक कुछ नहीं हो सका।

यौन शोषण के तुरंत बाद ही औरतें क्यों नहीं बता देतीं- इस पर तो लगातार बात होती रही। टोकरी भर-भरके मनोवैज्ञानिक और अपराधशास्त्र के जानकार इस पर रिसर्च कर रहे हैं। सबकी बातों का एक ही निचोड़ है- शर्म। यौन प्रताड़ना की शिकार औरत शर्म से भर जाती है। साइकोलॉजी टुडे (Psychology Today) नामक साइंस पत्रिका के मुताबिक इंसानों में ये आम भावना होती है कि वे अपने साथ हुई हर घटना, हर हादसे के लिए खुद को जिम्मेदार मानता है। महिलाओं में ये भावना ज्यादा होती है। ऐसे में वे मान बैठती हैं कि कहीं न कहीं उन्होंने कुछ ऐसा उकसाने वाला किया होगा, जो वे यौन शोषण का शिकार हुईं। यहां तक कि पांच साल की बच्ची से बलात्कार करने वाला अधेड़ पुरुष निहायत बेशर्मी से ये तर्क देता है कि बच्ची खुद ऐसा चाहती थी।

दफ्तरों में ये ग्लानि कई गुना होकर आती है। पुरुषों के वर्चस्व वाले बाहरी संसार में औरतों के काम को वैसे भी दखलंदाजी की तरह देखा जाता है। ऐसे में कम पैसों और कम ओहदे पर काम करती औरत को डर होता है कि वो अपने पुरुष सहकर्मी की शिकायत करे तो, आज नहीं तो कल उसकी नौकरी चली जाएगी, भले ही सहकर्मी पर कोई कड़ा एक्शन लिया जाए या नहीं। दूसरा डर इससे भी भयावह है। एक बार यौन शोषण का आरोप लगा चुकी औरत की 'कुख्याति' उसके बायोडाटा से पहले ही दूसरे दफ्तरों तक पहुंच चुकी होती है। फिर डरे हुए बॉस उसे कहीं भी काम नहीं देते। हंसते हुए वे कहते हैं कि क्या पता फलां औरत उनकी इमेज भी खराब कर दे। भारत में MeToo कैंपेन के दौरान भी बहुतों ने सोशल मीडिया पर भी इस तरह का डर जाहिर किया था।

काम के अनौपचारिक क्षेत्रों में हालात और खराब हैं। फिलहाल लगभग 195 मिलियन महिलाएं इसी सेक्टर में काम करती हैं। बीड़ी बनाते, अगरबत्ती या चूड़िया बनाते हुए या फिर दूसरे के खेतों में फसल काटने के दौरान वे इस बात के लिए तैयार हो चुकी होती हैं कि पगार से पहले उनका यौन शोषण भी हो सकता है। साल 2019 में महाराष्ट्र के बीड जिले का नाम खूब उछला था। वहां दूसरे के खेतों में काम करने जाने वाली 4000 से ज्यादा महिलाओं ने अपनी बच्चेदानी निकलवा ली थीं। ये सभी महिलाएं 18 से 40 साल तक की थीं। उनके पास इसकी ठोस वजह भी थी। बच्चेदानी हटेगी तो न तो पीरियड होंगे और न ही काम से छुट्टी लेनी होगी। दूसरा कारण इससे बड़ा है। कोख ही नहीं रहेगी तो साइट पर हो रहे बलात्कारों से बच्चा ठहरने का डर नहीं होगा।

गौर कीजिए, कम पैसों में हाड़ जलाती इन औरतों को बलात्कार का उतना डर नहीं, जितना गर्भ ठहरने और शर्मिंदा होने का। इनके पास कोई राहत नहीं। इनके पास कोई HR भी नहीं, जो शौचालय के बाहर यौन शोषण के बारे में बताएगा। इनके पास शब्द तो हैंं, लेकिन आवाज गुम है। अब प्रिया की अकबर पर जीत यही आवाज है, जो फुसफुसाहटों को चीख में बदल सकती है। लड़ो औरतों, लड़ो। प्रिया की तरह लड़ो। एक औरत की तरह लड़ो।

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