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बात बराबरी की:संतान पैदा करना दुनिया की सबसे बड़ी उपलब्धि है, बेऔलाद औरत तो टूटे हुए मोती से भी बेकार है

नई दिल्ली5 दिन पहले
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रोमन दार्शनिक और डॉक्टर प्लिनी द एल्डर (Pliny the Elder) ने शादी के लिए तैयार युवकों को नसीहत दी थी कि वे किसी खूबसूरत या नेकदिल लड़की पर न्योछावर हो उससे रिश्ता जोड़ने की भूल न कर बैठें, बल्कि पहले उसे अच्छी तरह परख लें। परखने का एक खास तरीका था, जो तय करता था कि लड़की शादी के बाद कितनी जल्दी और कितनी ज्यादा बार औलाद पैदा कर सकेगी। कहना न होगा कि एक बेहद ऊलजुलूल सोच के चलते कितनी ही युवतियां न चाहकर भी अविवाहित रहीं। उन्हें बंजर कहा गया और उनकी परछाई को काला साया तक बोल दिया गया।

ये रोमन डॉक्टर मानता था कि मासिक धर्म के दौरान आता खून दुनिया का सबसे गंदा खून होता है, जो हर लहलहाती चीज को खत्म कर देता है। खेत सूख जाए, नई शराब खराब हो जाए या लोहा जंग खा जाए, तुरंत कोई न कोई स्त्री घेरे में आ जाती।

पुरानी दुनिया की 'बंजर' औरतों से नफरत अब भी बाकी है। हाल ही में झारखंड से एक खबर आई, जिसमें शादी के कई सालों तक मां न बन पाने पर पति ने महिला की कमर से नीचे के हिस्से को लोहे की दहकती रॉड से दाग दिया। महिला किसी तरह बचकर घर से निकली और उसी हालत में अपने मायके वालों को खबर दी। फिलहाल महिला गंभीर हालत में अस्पताल में है। कयास लग रहे हैं कि बुरी तरह जलने और देर से इलाज मिलने के कारण वह शायद ही बच सके।

सालभर पहले बिहार के आरा में भी मिलती-जुलती घटना हुई, जब 32 साल की एक महिला को बच्चा न होने के कारण जिंदा जलाने की कोशिश की गई थी। दक्षिण भारत के तमिलनाडु में शादी के बाद संतान नहीं पैदा करने वाली औरतों को चेन से बांधकर पीटने की कई घटनाएं सुनाई आती रही हैं।

सालों पहले मासिक धर्म शुरू होते ही लड़की की शादी हो जाती और तुरंत बाद ही बच्चे का इंतजार शुरू हो जाता। बच्चे पैदा करने का क्रम रुक-रुककर तब तक चलता, जब तक कि जज्जाघर में ही औरत की मौत न हो जाए। या फिर उसकी कोख जर्जर न पड़ जाए। फिर 19वीं सदी में बर्थ कंट्रोल की तकनीकें आ गईं। औरतें पढ़-लिख गईं और अपने शरीर पर अपना हक मांगने लगीं। तब फ्रेंच डॉक्टरों ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई।

उसमें तय किया गया कि औरतें हक मांगें, हम दरियादिली दिखाते हुए उन्हें छूट भी देंगे, लेकिन ये छूट पहले से बंधी-बंधाई रस्सी जितनी होगी। औरत उतनी ही दूर जा सकेगी, जितनी लंबी रस्सी उनके गले में बंधी है। डॉक्टरों ने आजादी के नारे लगाती औरतों को डराने के लिए एक खोज भी कर डाली। कहा गया कि औरतों के शरीर में एक घड़ी होती है, जो टिकटिकाती रहती है। औरत भले ताजिंदगी अपने बाल काले और त्वचा को जवां रख सके, लेकिन उसकी कोख 35 पार करते ही बूढ़ी हो जाती है। तो भलाई इसी में है कि औरतें वक्त रहते संतान पैदा कर डालें।

जी हां, 35 पार का ये डेटा, जो हम आज भी सुन रहे हैं, वह 17वीं सदी के फ्रांस से आया है। घाघ डॉक्टरों ने चर्च से कुछ डेटा निकाले और ऐलान कर दिया कि एक उम्र के बाद औरतें बच्चे पैदा करने की सोचें तो या तो वे नाकामयाब रहती हैं, या फिर संतान शारीरिक-मानसिक तौर पर कमजोर पैदा होती है। औरतों में हड़बड़ाहट लाने के इरादे से रचा गया लगभग 300 साल पुराना ये डेटा आज भी क्लिनिक से लेकर आम घरों तक टहलता रहता है।

शादी के तुरंत बाद मां न बन पाने वाली युवतियों के इलाज का भी बंदोबस्त हुआ करता था। उन्हें मां बन चुकी स्त्रियों से लेकर घोड़ों और किन्नरों का मूत्र मिलाकर पिलाते। मान्यता थी कि इससे बंजर जमीन भी उपजाऊ हो जाएगी। इसके अलावा व्रत-पाठ जैसे तमाम ढकोसले थे, जो औरत को सेहतमंद कोख देने का वादा करते, लेकिन किसी ने भी कभी पुरुषों की नपुंसकता की बात नहीं की। अगर बात हुई भी तो लुक-छिपकर।

ताजा आंकड़े बताते हैं कि संतान न होने के लिए पुरुष और स्त्री दोनों लगभग बराबर के जिम्मेदार हैं। भारत की बात करें तो ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (AIIMS) के मुताबिक, 3 दशक पहले भारतीय पुरुषों में स्पर्म काउंट 60 मिलियन प्रति मिलीलीटर हुआ करता था, वहीं अब वो घटकर 20 मिलियन पर आ गया है। इसका सीधा असर संतान जन्म पर दिख रहा है। देश में हर साल लगभग 18 मिलियन जोड़े संतान-जन्म को लेकर जूझ रहे हैं जो पिछले कुछ सालों में सबसे ज्यादा है।

21वीं सदी का मुर्गा बांग देते-देते ऊबकर सो चुका। मेडिकल साइंस खूब तरक्की कर चुका। ज्ञान की आंधी हर तरफ हरहरा रही है, लेकिन किताबें कोई तावीज तो नहीं, कि इधर हाथ में बांधा और उधर दिमाग के किवाड़ पट से खुल जाएं। तो बस, दिमाग का ताला खूब कसकर बंद किए हुए हम बेऔलाद औरत को कभी जला रहे हैं तो कभी तलाक दे रहे हैं।

साल 1860 में अमेरिका के संभ्रांत घराने की एक नामालूम (तब) औरत मेरी चेसनट ने अपनी डायरी में कुछ बेहद उदास बातें लिखी थीं। ज्यादातर वाकये घरेलू थे। एक हिस्से में मेरी ने अपने पति और सास की बातचीत का जिक्र किया था। पति ने अपनी मां को सराहते हुए कहा था कि दुनिया में कई बच्चे लाना उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। पति ने आगे जोड़ा- बेऔलाद औरत टूटे मोती से भी बेकार है। मेरी तब वहीं थीं- बेऔलाद और टूटी हुईं। सालों बाद मेरी की डायरी को पुलित्जर पुरस्कार मिला। मेरी तब दुनिया से जा चुकी थीं। बेऔलाद होने की शर्मिंदगी सीने पर लिए।

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