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पंजाब के 5 जिलों के 5 गांवों से रिपोर्ट:जट और दलित सिखों में बंटे हैं पंजाब के गांव-गांव, गुरुद्वारों से लेकर श्मशान तक अलग

2 महीने पहलेलेखक: वैभव पलनीटकर

‘आंगन में मां अकेली बैठी हुई थीं। जट आए और उसके पैर काट दिए। वो चारपाई से नीचे गिरकर...... (लंबी सांस लेते हुए) वही पड़े-पड़े छटपाटने लगीं। जटों ने बगल में रखी पानी की टंकी भी तोड़ दी। खून और पानी मिल गया। पूरा आंगन सिर्फ लाल दिख रहा था।'

'लेकिन बात यही खत्म नहीं हुई थी। हम घायल को मां को अस्पताल ले जा पाते कि उससे पहले ही गांव के गुरुद्वारे से झूठा ऐलान किया गया- जटों पर दलितों ने हमला कर दिया है। एक जट की मौत हो गई है। ये खबर आग की तरह फैली और दलितों पर कहर ढानाशुरू हो गया।’ ये बयान है दक्षिणी पंजाब के संगरूर जिले के झल्लूर गांव रहने वाले दलित किसान बलविंदर सिंह का और जिस घटना को वो बयां कर रहे थे वो है 5 अक्टूबर, 2016 की। 5 साल पहले ये गांव जटों और दलितों के बीच खूनी संघर्ष का केंद्र बना था।

इस पूरे संघर्ष की शुरुआत पंचायत की श्यामलात जमीन में से रिजर्व कोटे की जमीन को ठेके पर पाने के अधिकार से शुरू हुई। पंजाब विलेज कॉमन लैंड्स (रेगुलेशन) एक्ट 1961 के मुताबिक पंचायती जमीन का एक तिहाई हिस्सा दलितों के लिए आरक्षित है। ये जमीन बोली लगाकर सिर्फ दलितों को ही ठेके पर दिए जाने का नियम है, लेकिन जमीन पर जट किसान ही किसी दलित को मोहरा बनाकर प्रॉक्सी बोली लगाते हैं और जमीन पर खेती जट ही करते हैं। इसी के खिलाफ बलविंदर और आस-पास के गांव के किसान लामबंद हुए और उन्होंने अपने जमीन पर खेती करने के अधिकार के लिए आवाज उठाई। आज झल्लूर गांव में गुरुदेव कौर के नाम का स्मारक बना हुआ है और पुस्तकालय भी चलता है।

अक्टूबर में सिंघू बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन में दलित सिख लखबीर सिंह की निहंगों ने हत्या कर दी थी। इसे लेकर पंजाब की सियासत गरमा गई। हालांकि दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए राजनीतिक दलों ने अपना ट्रंप कार्ड चल दिया है। जहां अकाली दल ने बसपा से गठबंधन करके दलित को पहली बार डिप्टी CM बनाने का ऐलान किया हैं, वहीं कांग्रेस ने चुनाव से ठीक तीन महीने पहले कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाकर दलित चेहरे चरणजीत सिंह चन्नी को CM बनाकर पंजाब के अलावा पूरे देश में दलितों में एक बड़ा सियासी संदेश दिया है। पंजाब में दलित समुदाय को रिझाने के लिए तमाम सियासी दलों की ओर से जो दांव खेले जा रहे हैं। इस बीच दैनिक भास्कर ने पंजाब के पांच जिलों के पांच गांवों में घूम-घूमकर ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की, जिसको पढ़कर आप भी चौंक जाएंगे। आजादी के 70 साल बाद भी आज भी पंजाब में देश के दूसरे हिस्से की तरह दलित भी हाशिए पर है। तीन रिपोर्ट की इस सीरीज की पहली रिपोर्ट में हम गांव के स्तर पर गुरुद्वारे, श्मशान, धर्मशाला में होने वाले भेदभाव की तस्वीर आपके सामने रखेंगे।

पहले थोड़ा सा डेटा जान लीजिए- 2011 की जनगणना के मुताबिक पंजाब में 31.9% दलित आबादी है। इसमें से 19.4% दलित सिख हैं और 12.4% हिंदू दलित हैं। वहीं कुल दलित आबादी में से करीब 26.33% मजहबी सिख, 20.7% रविदासी और रामदासी, 10% अधर्मी और 8.6% वाल्मीकी समाज से आते हैं।

पंजाब के पांच जिलों के पांच गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट-

संधुआं, चमकोर साहिब, रूपनगर: इलाके अलग, गुरुद्वारे अलग, दलितों के गुरुद्वारे के बर्तन इस्तेमाल करने नहीं दिए जाते

रूपनगर जिले में आने वाला कस्बा चमकोर साहिब पंजाब के नए नवेले और पहले दलित मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी का विधानसभा क्षेत्र है। जब हम जातिगत बंटवारे की पड़ताल करने चमकोर साहिब के संधुआं गांव में पहुंचे, तो ऐसी चीजें दिखीं, जिसके बारे में देश की बाकी आबादी को कम ही पता है। खेती किसानी से समृद्ध और संपन्न दिखने वाले गांव में करीब 1500 की आबादी है, लेकिन गांव में जाति के आधार पर इलाके बंटे हुए हैं। इलाकों के अलावा गुरुद्वारे भी बंटे हुए हैं। गांव की पूरी की पूरी जमीनें जट सिखों के पास ही हैं और दलित सिख मजदूरी करते हैं। जट सिखों वाला इलाका अच्छा खासा विकसित दिखता है, बड़े-बड़े घर हैं, गाड़ियां हैं और चमक-धमक है। वहीं जैसे ही हम दलितों वाले इलाके में प्रवेश करते हैं, छोटे-छोटे घर, गंदगी का आलम नजर आने लगता है।

संधुआं में जट गुरुद्वारे के सामने हमें मिले बुजुर्ग जगीर सिंह, जो रिटायर्ड आर्मीमैन हैं और जट सिख समुदाय से ताल्लुख रखते हैं। जब हमने जगीर सिंह से सीधे ही पूछ लिया कि पंजाब के गांव जातिगत आधार पर बंटे दिखते हैं, इस मामले में आपका गांव कैसा है? तो उन्होंने कहा- ‘हमारे यहां किसी भी सिख में कोई फर्क नहीं है।’ हमें उनकी ये बात हजम नहीं हुई तो हमने पूछ लिया कि आपके पीछे जो नानकसर गुरुद्वारा है उसे सब जट गुरुद्वारा क्यों मानते हैं? गुरुद्वारे की कमेटी में कितने लोग हैं और उसमें कितने जट और कितने नॉन जट हैं? जवाब में उनकी जबान लड़खड़ाने लगी- ‘गुरुद्वारा कमेटी में कुल 10 लोग हैं और सारे ही जट हैं, लेकिन गुरुद्वारे में कोई भी मत्था टेक सकता है।’ हमने पूछा कि गांव के एक हिस्से में एक ही इलाके में जट और दूसरे इलाके में दलित रहते हैं ये बंटवारा क्यों है? उन्होंने जवाब दिया- ‘ये तो पुराने जमाने से चला आ रहा है’।

इसके बाद हम गांव के उस हिस्से की तरफ बढ़े जहां ज्यादातर दलित रहते हैं। पतली-पतली गलियों से गुजरते हुए हम हरकिशन सिंह के घर पहुंचे, वो अपने घर की रंगाई का काम कर रहे थे। हरकिशन दलित सिख हैं। हरकिशन बताते हैं कि ‘आप किसी भी जट सिख से पूछेंगे कि गांव में जातिगत बंटवारा है या नहीं तो वो यही कहेंगे कि सब मिलजुलकर रहते हैं, लेकिन गांव में जात-पात जमकर फैला हुआ है और इसके आधार पर भेदभाव भी होता है। मैं जब बचपन में स्कूल जाया करता था तो दूसरी जात के हमारे सहपाठी हमें जातिसूचक शब्दों से संबोधित करते थे और हमें इस बात का बहुत बुरा लगता था।’ इतना कहते ही हरकिशन भावुक हो जाते हैं।

हरकिशन की मां जसविंदर कहती हैं कि- ‘चमार लोगों को गुरुद्वारे के बर्तन नहीं दिए जाते हैं, उन गुरुद्वारों में हमें उस तरह से इज्जत नहीं मिलती है। ऊंची जाति के लोग अच्छा बर्ताव नहीं करते हैं। गांव के ज्यादातर सरपंच भी जट ही होते हैं, तो हमारी सुनवाई की वो उम्मीद भी खत्म हो जाती है।’

भराड़ीवाल गांव, अमृतसर: गुरुद्वारों के साथ, श्मशान स्थल भी अलग, ‘मजहबी सिखों को निचली जाति का समझा जाता है’

अमृतसर शहर से सिर्फ 5 किलोमीटर दूर बसे गांव भराड़ीवाल में भी जट सिखों और दलित सिखों के बीच की दरार खुलकर दिखती है। जट सिखों और मजहबी सिखों के इलाके गांव के स्तर पर बंटे हुए दिखते हैं। बाकी दूसरे गांव की तरह ही ही इस गांव की भी ज्यादातर जमीन जट सिखों की ही है और मजहबी सिख जटों के यहां मजदूरी करने जाते हैं। गांव में जिस तरफ जट सिख रहते हैं, वहां पर बड़े-बड़े मकान, पक्की सड़कें और भव्यता दिखती है, वहीं जैसी ही हम दलित सिखों वाले इलाके में पहुंचते हैं, छोटे-छोटे घर, खराब सड़के और गुरबत साफ दिखती है। ये फर्क सिर्फ घरों और सड़कों में ही नहीं बल्कि गुरुद्वारों और यहां तक शमशान घाट के स्तर पर भी दिखता है। जब हम जाट सिखों के गुरुद्वारे पहुंचे तो गुरुद्वारे की भव्यता साफ दिख रही थी, मजबूत कंस्ट्रक्शन, चमकती हुई तलवारों के प्रतीक, आलीशान सजावट। वहीं जब हम मजबही सिखों के गुरुद्वारे गए एक क्षण को यकीन ही नहीं हुआ कि ये गुरुद्वारा है। कच्चा सा कंस्ट्रक्शन, कोई रंग रोगन तक नहीं और कोई मेनटेनेंस नहीं। यही फर्क हमें शमशान स्थलों के स्तर पर भी दिखा। जट शमशान स्थलों पर सीमेंट का फर्श, बैठने के लिए सीटें, चारों तरफ बाऊंड्री वॉल थी, लेकिन मजहबी सिखों के शमशान स्थल एकदम उजड़े हुए मिले।

जट गुरुद्वारे के ग्रंथी सुरजीत सिंह से जब हमने पूछा कि गांव में दो गुरुद्वारे क्यों है, जबकि गुरुनानक ने तो सबको एक ही मानने का संदेश दिया था? जवाब में वो कहते हैं कि- ‘गुरुनानक का संदेश तो यही था कि किसी में कोई भेदभाव ना हो, लेकिन लोग चाहते हैं कि उनके जटों का अलग गुरुद्वारा हो और मजहबी सिखों का अलग गुरुद्वारा हो। हमारे गांव में शमशान घाट भी दो बना रखे हैं, एक जटों का है और दूसरा मजहबियों का। जटों और मजहबियों के बीच शादी भी नहीं होती है। हम कोशिश कर रहे हैं कि गांव में एक ही गुरुद्वारा हो, लेकिन दोनों तरफ के ही लोग मानते नहीं है। इसके पीछे राजनीति का खेल है।’

इसके बाद जब हम मजहबी सिखों के गुरुद्वारे गए तो उजड़ी सी गुरुद्वारे की इमारत पर ताला जड़ा हुआ था। गुरुद्वारे के ही सामने ही हमें मिली बुधवंती, जो कि एक मजहबी सिख हैं। हमने उनसे भी पूछा कि गांव में अलग-अलग गुरुद्वारे क्यों होते हैं? जवाब में वो बोलीं- ‘ये गुरुद्वारे जातियों के आधार पर बंटे हुए हैं। जैसा इतिहास से चला आ रहा है वैसा ही अब भी चल रहा है।’ पास में अपने घर के सामने गोबर से लिपाई कर रही बूढ़ी महिला हमारे पास आकर बोलीं- ‘मजहबी सिखों को निचली जाति का समझा जाता है। वहीं जट अपने आप को ऊंची जाति का समझते हैं।’

नुशहरा गांव, तरनतारन: कपड़ों से लोग पहचान लेते हैं कि ये कौन जट है और कौन दलित, तबके का फर्क गांव में घूमने पर अलग ही समझ आता है

भराड़ीवाल गांव की तरह ही हालात हमें तरन तारन के नुशहरा गांव में मिले। नुशहरा एकदम पाकिस्तान बॉर्डर से लगा हुआ गांव है और ये गांव सिंघू बॉर्डर पर मारे गए लखबीर सिंह का पड़ोसी गांव है। जट सिखों और दलित सिखों में गांव में सीधा बंटवारा है। गांव में करीब 2200 वयस्क लोग रहते हैं जिनमें से करीब 1400 जट सिख हैं तो वहीं बचे हुए 800 दलित सिख रहते हैं। गांव के जट सिख सुखदेव सिंह बताते हैं कि ‘नुशहरा में करीब पूरी की पूरी जमीन जट सिखों की ही है। गुरुद्वारे से लेकर पंचायत तक जटों का ही ज्यादा प्रभुत्व है। जटों और महजबियों के श्मशान घाट भी अलग-अलग हैं।’

गांव के एक इलाके में जट सिख रहते हैं, वहीं दूसरे इलाके में महजबी सिख रहते हैं। दोनों के रहने के इलाकों में जमीन आसमान का फर्क समझ में आता है। जट इलाके में बड़ा आलीशान गुरुद्वारा, बड़े-बड़े भव्य घर, पक्की सड़कें, नालियां ढकी हुईं, वहीं इसके उलट जैसे ही हम दलित सिखों वाले इलाके में प्रवेश करते हैं, बदहाल गुरुद्वारा, झोपड़ीनुमा घर और गरीबी का आलम। उच्च तबके और निम्न तबके का फर्क साफ नजर आता है।

हम एक झोपड़ीनुमा घर में घुसे तो हमें वहां मिले 80 साल के धरमसिंह। हमने उनसे पूछ लिया कि मजहबी और जट सिख में क्या फर्क होता है? नाराज होकर बोलने लगे- ‘बहुत ज्यादा फर्क होता है। जटों की जमीनें होती हैं। जटों को मजदूरी नहीं करनी पड़ती। वहीं मजहबी सिख गरीब होता है। गुरुद्वारे से लेकर श्मशान सब कुछ अलग ही होता है।’

गांव के एक जट सिख परमजीत सिंह रास्ते पर चलते-चलते हमें बताते हैं कि- ‘जटों और दलितों के बीच पहनावे का फर्क भी होता है। जटों की पगड़ी मोटी होती है और अच्छे से बनी-ठनी होती है, उनकी मूछों पर ताव होता है। वहीं मजहबियों की पगड़ी थोड़ी छोटी और हल्की गोल होती है।’

मट्टी गांव, मांसा: ‘हमें अलग बर्तनों में खाना दिया जाता है, जटों की धर्मशाला में हमें रुकने या आयोजन करने नहीं दिया जाता’

जानकार बताते हैं कि सबसे ज्यादा दलित दक्षिणी पंजाब के मालवा वाले क्षेत्र में रहते हैं और यहां पर दलितों की स्थिति पंजाब के बाकी हिस्से से ज्यादा खराब है। हम मांसा जिले के मट्टी गांव पहुंचे। करीब 2000 आबादी वाले गांव में पंजाब के दूसरे गांवों की तरह ही जट और दलित सिखों में साफ बंटवारा दिखता है। पंजाब के दूसरे गांवों के मुकाबले यहां पर दलितों की हालत और ज्यादा खराब दिखी।

मट्टी गांव के मजहबी सिखों वाले इलाके में जाने पर हमें मिलीं, बुजुर्ग गुरदेव कौर। गुरदेव कौर बताती हैं कि ‘गांव की सारी जमीनें जटों के पास ही हैं, हमें तो बस 200 रुपये की दिहाड़ी मिलती है, जिस दिन काम न करो तो वो भी नहीं मिलता है। जट लोग भी हमारे घर आने से बचते हैं और अगर आते भी हैं तो कुछ खाने-पीने से बचते हैं। ये छुआछूत नहीं है तो क्या है।’ पास में ही खड़ी एक और महिला जसवीर कौर कहती हैं- ‘हम जब जटों के यहां जाते हैं तो हमें अलग बर्तनों में खाना दिया जाता है। वो बर्तन भी हमें खुद ही साफ करने होते हैं। वहीं जट लोग हमारे यहां आते हैं तो खाना नहीं खाते हैं।’

मट्टी गांव में धर्मशाला भी जातियों के आधार पर बंटी हुई है। सरकारी खर्च से बनने वाली धर्मशालाएं जट्टों के लिए अलग हैं और दलितों के लिए अलग। जटों वाली धर्मशालाओं में कोई भी दलित व्यक्ति नहीं रुक सकता और दलितों की धर्मशाला में रुकने के लिए कोई जट जाता ही नहीं। दलितों की धर्मशाला की हालत बेहद खराब है, कमजोर कंस्ट्रक्शन, कोई रंग रोगन नहीं, चारों तरफ गंदगी बिखरी हुई। देखकर लगता नहीं कि इस धर्मशाला में कोई सुकून से आराम भी कर पाएगा। वहीं जटों की धर्मशाला में मजबूत कंस्ट्रक्शन, बढ़ियां रंग रोगन और लोगों को जमावड़ा।

झल्लूर गांव, संगरूर जिला: ‘रिजर्व कोटे की जमीन दलितों को प्रभावी रूप से नहीं मिल पाती, जट किसान प्रॉक्सी बोली लगाते हैं, प्रशासन में ज्यादातर जट हैं, हमारी सुनवाई नहीं होती’

जिस वाकये का जिक्र हमने अपनी रिपोर्ट की शुरुआत में किया था, हमने उस गांव का भी दौरा किया। गांव में रहने वाले दलित सिख बलविंदर बताते हैं कि- ‘5 अक्टूबर को हुए जटों के हमले में मेरी मां बुरी तरह घायल हो गईं। एक महीने बाद चंडीगढ़ में उनकी मौत हो गई।’ ग्राम पंचायतों की जमीनों पर अधिकार जमाने से शुरू हुई इस लड़ाई में आस पड़ोस के गांव के दलित किसान भी शामिल हुए।

जब हमने बलविंदर से पूछा कि गांव में ज्यादातर जमीनें जटों के पास हैं तो दलित सिख क्या करते हैं? जवाब में उन्होंने कहा कि ‘ज्यादातर दलित सिख मजदूरी का काम करते हैं। गांव में करीब 2500 वोट हैं। इसमें से करीब आधे जट हैं और आधे SC समुदाय के लोग हैं। हमारी सिर्फ यही मांग थी कि रिजर्व कोटे की जमीन दलितों को ही प्रभावी रूप से मिले, लेकिन जट लोग किसी दलित का नाम आगे करके उसकी भी डमी बोलियां लगवा देते हैं।’

बलविंदर ने बताया कि- ‘हमारे गांव में एक ही गुरुद्वारा है। गुरुद्वारा कमेटी में भी ज्यादातर जटसिख ही हैं, लेकिन श्मशान घाट जटों और दलितों का अलग-अलग है। गांव के स्कूलों में भी ज्यादातर दलितों के ही बच्चे पढ़ते हैं। जट अमीर होते हैं और वो अपने बच्चों को अच्छे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं।’

आप समझ गए होंगे कि ऊपर से जैसा दिखता है वैसा नहीं है। पंजाब में जातिवाद पर ग्राउंड रिपोर्ट की दूसरी सीरीज में हम प्रशासन से लेकर राजनीति में दलितों के प्रतिनिधित्व की बात करेंगे।