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आज की पॉजिटिव खबर:पिछले साल लॉकडाउन में जिन बुनकरों की नौकरी गई उन्हें डिजिटल ट्रेनिंग देकर रोजगार दिलाया, 300 लोगों को दे चुकी हैं ट्रेनिंग

भोपाल10 दिन पहलेलेखक: निकिता पाटीदार

मध्यप्रदेश के महेश्वर की रहने वाली कल्याणी बुनाई का काम करती हैं। कल्याणी के परिवार में उनकी दादी से लेकर माता- पिता, चाचा-चाची सभी बुनाई का काम करते हैं। इन तीन पीढ़ियों ने पिछले 30 सालों से इस कला को अपने दिल से लगा रखा है। कला ने भी उन्हें उतना ही आदर दिया, लेकिन जब लॉकडाउन लगा तो हाथ में कारीगरी के बाद छूटे निशान तो थे, लेकिन जेब सूनी। जब जीवन में उम्मीद खत्म होने लगे तो कहीं न कहीं से राह निकल ही आती है। कल्याणी और उनके परिवार के जीवन में नई उम्मीद जगाई ‘राहा फाउंडेशन’ ने।

ये भारत के 300 से ज्यादा आर्टिस्ट को डिजिटल माध्यम के जरिए पूरी दुनिया से जोड़ रहा है। खास बात यह है कि इन लोगों को दुनिया से रू-ब-रू करवाने वाली दो लड़कियां हैं जो खुद आज तक एक दूसरे से नहीं मिली हैं। राहा की शुरुआत मुंबई में रह रहीं अमृता हल्दिपुर और कैलिफोर्निया में रह रहीं भारतीय मूल की राधिका गुप्ता ने की। राधिका सोशल एंटरप्राइज एडवाइजर हैं और पिछले 12 सालों से फैशन इंडस्ट्री में काम कर रही हैं।

भारत, सिंगापुर और US के कई फैशन स्टार्टअप के साथ राधिका काम कर चुकी हैं। दूसरी ओर, अमृता को मार्केटिंग इंडस्ट्री का 16 साल का एक्सपीरियंस है और वो पिछले 4 सालों से सोशल स्टार्टअप के साथ काम कर रही हैं। अमृता बताती हैं कि उनका लगाव हमेशा से क्रिएटिव बिजनेस आइडिया और हैंडमेड प्रोडक्ट से रहा है। वहीं, राधिका आर्टिजन इकोनॉमी में दिलचस्पी रखती हैं। दोनों की पसंद एक थी जिसने राहा के दरवाजे खोल दिए।

मध्यप्रदेश की रहने वाली कल्याणी बुनाई का काम करती हैं। वह अभी राहा फाउंडेशन के साथ जुड़कर काम कर रही हैं।
मध्यप्रदेश की रहने वाली कल्याणी बुनाई का काम करती हैं। वह अभी राहा फाउंडेशन के साथ जुड़कर काम कर रही हैं।

कहां से आया आइडिया?

राहा की शुरुआत जुलाई में लॉकडाउन के दौरान 5 बुनकरों के साथ हुई। इसके बारे में राधिका बताती हैं, 'लॉकडाउन लगा तो कारीगरों का काम रुक गया था। जो प्रोडक्ट उन्होंने लॉकडाउन से पहले बनाए थे, वो भी बिक नहीं पा रहे थे। इनमें ज्यादातर साड़ियां थीं। हमने इस दौरान बुनकरों को डिजिटल ट्रेनिंग देना शुरू किया। कारीगर पहले से ही अपनी कला में माहिर होते हैं, लेकिन उन्हें बिजनेस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती।

कोरोना काल में लॉकडाउन की वजह से ज्यादातर लोगों ने अपना बिजनेस सोशल मीडिया के जरिए आगे बढ़ाया। हमें आइडिया आया कि क्यों न हम बुनकरों को भी सोशल मीडिया के जरिए अपना प्रोडक्ट सेल करना सिखाएं। इससे न उन्हें किसी मिडिलमैन का शिकार होना पड़ेगा और न ही किसी कंपनी के भरोसे बैठना पड़ेगा। ये आत्मनिर्भरता की ओर उनका पहला कदम होगा।'

अब डिजिटल माध्यम से बिजनेस बढ़ाने के लिए जितनी दिलचस्पी राधिका और अमृता को थी, उससे कहीं ज्यादा आर्टिस्ट को। इस बारे में राधिका आगे बताती हैं, 'पिछले कुछ सालों में डिजिटलाइजेशन बढ़ा है। हमें इसका ये फायदा हुआ कि सभी आर्टिस्ट के पास पहले से फोन था। इंटरनेट की सुविधा भी पहले के मुकाबले अब बढ़ गई है जिससे कस्टमर ऑनलाइन शॉपिंग करने लगे हैं। जब हमने डिजिटल वर्ल्ड, ई-कॉमर्स और बिजनेस अकाउंट जैसी चीजों के बारे में बात करना शुरू किया तो हमें आर्टिस्ट को समझाने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई। उनके पास इसकी जानकारी पहले से थी, हमें तो सिर्फ इसे सही आकार देना था है। जितना हम इस नए मोड़ के लिए तैयार थे, उतना ही आर्टिस्ट भी। वो नई चीजें सीखने को बेताब थे और इस बात ने हमें भी बहुत प्रेरित किया।’

लॉकडाउन के दौरान ज्यादातर कारीगरों का काम ठप हो गया था। अब वे इस संस्था के साथ जुड़कर अपनी जीविका चला रहे हैं।
लॉकडाउन के दौरान ज्यादातर कारीगरों का काम ठप हो गया था। अब वे इस संस्था के साथ जुड़कर अपनी जीविका चला रहे हैं।

राधिका बताती है, ‘राहा शब्द के दो अर्थ है। पहला हिन्दी में राह। जिसके जरिए हम इंडियन आर्टिस्ट को एक राह दिखाना चाहते थे। वहीं पर्शियन में इस शब्द का मतलब है आजादी। हम राहा के जरिए गांव-देहात के टैलेंट को भी दुनिया तक पहुंचाना चाहते हैं।

डिजाइन, मार्केटिंग और फोटोग्राफी के लिए वर्कशॉप

डिजिटल वर्ल्ड और दुकान पर अपने प्रोडक्ट बेचने में बहुत अंतर है। राधिका और अमृता पहले से यह जानती थीं कि आर्टिस्ट बहुत क्रिएटिव होते हैं। जरूरत है तो बस उन्हें डिजिटल वर्ल्ड के मुताबिक तैयार करने की। अमृता बताती हैं, ‘हमने सबसे पहले आर्टिस्ट के लिए दो फोटोग्राफी वर्कशॉप करवाई। इस दौरान हमने ध्यान रखा कि वर्कशॉप 10 से 12 लोगों के छोटे- छोटे ग्रुप में ही हो, जिससे हमारे आर्टिस्ट चीजों को अच्छे और बेहतर तरीके से सीख सकें।

साथ ही इस महीने हम कलर थ्योरी वर्कशॉप करवा रहे हैं। जिससे वो अपने प्रोडक्ट की अच्छी तस्वीरें लेने के साथ ही कलर कॉम्बिनेशन का भी ध्यान रख सकें। अच्छी बात यह है कि जब से राहा की शुरुआत हुई है, तब से डिजाइन, मार्केटिंग, फोटोग्राफी जैसी अलग-अलग फील्ड के एक्सपर्ट हमसे जुड़ रहे हैं। वो फ्री में आर्टिस्ट की मदद करना चाहते हैं।’

आर्टिस्ट को बनाना चाहते हैं ‘हेल्प फ्री’

अमृता का कहना है कि वो राहा के जरिए आर्टिस्ट को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं। वो कहती हैं, ‘हम नहीं चाहते कि आर्टिस्ट अपने काम के लिए कभी ‘हेल्प’ शब्द का इस्तेमाल भी करें। वो सिर्फ आज ही नहीं बल्कि भविष्य के लिए भी पूरी तरह तैयार रहें और भारत के बाहर भी अपने प्रोडक्ट बेच सकें। राहा के जरिए हम एक ऐसा सपोर्ट सिस्टम खड़ा करना चाहते हैं जिससे आर्टिस्ट हर चुनौती का डटकर सामना कर सके।

इन कलाकारों को राहा के माध्यम से डिजिटल ट्रेनिंग दी जाती है, उन्हें काम सिखाया जाता है। फिर वे प्रोडक्ट तैयार करने लगते हैं।
इन कलाकारों को राहा के माध्यम से डिजिटल ट्रेनिंग दी जाती है, उन्हें काम सिखाया जाता है। फिर वे प्रोडक्ट तैयार करने लगते हैं।

बिजनेस छोटा हो या बड़ा, कोरोना के कारण लगाए गए लॉकडाउन ने सभी पर गहरा असर डाला है। इसके बारे में राधिका बताती हैं, ‘पहली बार लॉकडाउन लगा तो उस समय पिछले साल के प्रोडक्ट का रेवेन्यू कारीगरों के पास था, लेकिन सेकेंड लॉकडाउन में चीजें बदल गई थीं। प्रोडक्ट रखे हुए थे, सेल नहीं थी, नया बिजनेस मिल नहीं रहा था और सेविंग्स भी खत्म होती जा रही थी। ग्राउंड लेवल पर चीजें बहुत बिगड़ गई थीं। बिजनेस 100 से 0% पर चला गया था। आर्टिस्ट को सबसे ज्यादा चिंता पहले से तैयार रखे प्रोडक्ट की थी, क्योंकि वो प्रोडक्ट बिक भी नहीं पा रहे थे और उन्हें मेंटेन करना भी महंगा पड़ रहा था। आर्टिस्ट की हालत इस कदर खराब हो गई थी कि उनके घर में राशन खत्म होने लगा।’

बिगड़ते हालात को देखकर शुरुआत में अमृता और राधिका ने अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मदद ली और 250 से ज्यादा परिवारों की मदद की। इनमें से 150 महिलाएं थीं। कुछ दिनों तक फंड रेजिंग से काम चला, लेकिन जब लॉकडाउन नहीं खुला तो उन्हें जल्द ही समझ आ गया कि आगे चीजें और भी ज्यादा मुश्किल होने वाली हैं। उन्हें समझ आ गया था कि आर्टिस्ट की सही तरीके से मदद सिर्फ उनके प्रोडक्ट बेच कर ही की जा सकती है।

आर्टिस्ट और कंज्यूमर को एक दूसरे से जोड़ती है ‘द आर्टिजन शॉप’

अभी तक 20 आर्टिस्ट इससे जुड़े चुके हैं। जो खुद के रोजगार के साथ छोटे-छोटे कारीगरों को भी जीविका चलाने में मदद कर रहे हैं।
अभी तक 20 आर्टिस्ट इससे जुड़े चुके हैं। जो खुद के रोजगार के साथ छोटे-छोटे कारीगरों को भी जीविका चलाने में मदद कर रहे हैं।

आर्टिस्ट के पास प्रोडक्ट थे, स्किल था, आगे काम करते रहने का जज्बा था, लेकिन कंज्यूमर तक अपने हाथों से बनाए गए प्रोडक्ट पहुंचाने का जरिया नहीं। इसलिए अब राहा की टीम में एक और सदस्य जुड़ीं करिश्मा शहानी खान। इस टीम ने मिलकर आर्टिजन शॉप नाम से एक नया इनिशिएटिव शुरू किया है। यह शॉप एक इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म है, जिसमें 20 देशों के लोग डायरेक्ट इंटरनेशनल पेमेंट और शिपिंग की सर्विस ले सकते हैं।

राधिका बताती हैं कि यह एक नॉन प्रॉफिट इनिशिएटिव है, इसलिए इसमें सामान के स्टॉक से लेकर कीमत तक सब कारीगर ही निर्धारित करते हैं। इसके बाद हमारी टीम उन्हें पैकेजिंग से लेकर शिपिंग तक में मदद करती है। पिछले 20 दिनों में हम 100 से ज्यादा आर्ट पीस बेच चुके हैं। हमें भारत समेत US, सिंगापुर, मिडिल ईस्ट और यूरोप से सबसे ज्यादा ऑर्डर मिल रहे हैं। ये वेंचर हमने करिश्मा साहनी खान के साथ मिलकर शुरू किया। करिश्मा 'काशा' की फाउंडर है, जो बुनकरों के साथ पहले से काम करती आई हैं।

अमृता बताती हैं कि इस ‘द आर्टिजन शॉप’ का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह है कि इसके जरिए हम महिला आर्टिस्ट को फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट कर सकें। शॉप से अभी तक 20 आर्टिस्ट जुड़े चुके हैं। जो न सिर्फ खुद रोजगार पा रहे हैं बल्कि अपने साथ काम कर रहे और भी बहुत से छोटे-छोटे कारीगरों को रोजगार दे रहे हैं।

अमृता कहती हैं कि हम राहा के जरिए लोगों का लुप्त होते आर्ट की तरफ ध्यान लाना चाहते हैं। हमें रिसर्च के दौरान पता चला कि US में अच्छा-खासा गिफ्ट कल्चर है। राहा अब इंडियन आर्टिस्ट के लिए वहां दो नई मुहिम शुरू करने की तैयारी में है। पहला, US में इंडियन आर्टिस्ट के लिए गिफ्टिंग मटेरियल की शॉप, जहां से लोग अच्छे और सस्टेनेबल प्रोडक्ट खरीद सकेंगे। वहीं दूसरा ई-लर्निंग एक्सपीरियंस। जिसमें कॉरपोरेट से लेकर, स्कूल, कल्चर ग्रुप तक सभी लोग आर्टिस्ट की वर्कशॉप अटैंड कर सकते हैं। इससे न सिर्फ आर्टिस्ट की इनकम बढ़ती है बल्कि उनका तजुर्बा भी लोगों तक पहुंचता है।

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