ब्लैकबोर्डमैंने पराए की मौत पर रोने की ट्रेनिंग ली है:शादी के जोड़े के साथ काली चुनरी लेकर आई, ताकि कोई मरे तो उसे ओढ़कर रो सकूं

राजस्थान के रेवदर से2 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा

14 साल की थी, जब पड़ोसी गांव से ब्याहकर यहां आई। शादी की पोटली में चुनरी और गहनों के साथ काला जोड़ा भी था। मातम का जोड़ा। किसी भी मौत की खबर आते ही काली चुनरी ओढ़ निकल पड़ती। अपनी देहरी से उसके दरवाजे तक रोती जाती। लोग बुनाई-सिलाई, गाने-बजाने का रियाज करते हैं, हम रोने की टरेनिंग (ट्रेनिंग) लेतीं।

भरे-पूरे परिवार की सबसे बुजुर्ग दापू देवी की भौंहों पर वक्त की सफेदी पुती हुई है। आंखें रेतीले बवंडर के बाद सूनी पड़ी ढाणियों जैसी। निंबोड़ा गांव की ये महिला पैसे लेकर बड़े घरों में रोने की परंपरा से इनकार करती है।

हालांकि रोने का तरीका, खास कपड़े और ट्रेनिंग जैसी बातें अनजाने ही बता जाती है। बीच में वे अपने अंदाज में रोकर भी दिखाना चाहती हैं, फिर रुक जाती हैं। ‘घणा परिवार है मेरा। जीवित के सामने रोना अच्छा नहीं। मौत पर ही रोते हैं।’

मेघवाल समुदाय की ये तीन महिलाएं रोते हुए खास तरह का गीत गा रही हैं। वे कहती हैं कि गीत में जितना दर्द होगा, मरनेवाले को उतनी जल्दी शांति मिलेगी।
मेघवाल समुदाय की ये तीन महिलाएं रोते हुए खास तरह का गीत गा रही हैं। वे कहती हैं कि गीत में जितना दर्द होगा, मरनेवाले को उतनी जल्दी शांति मिलेगी।

दापू दुख का रियाज करने वालियों में से एक हैं, जिनसे मिलने हम राजस्थान की रेवदर तहसील पहुंचे। अरावली की बेहद सुंदर, हरी-भरी पहाड़ियों और रंग-रंगीले सैलानियों वाले माउंट आबू से बमुश्किल 100 किलोमीटर दूर है यहां का निंबोड़ा गांव।

मंजिल करीब आते-आते हरियाली घटने लगेगी। घने पेड़ों की जगह कांटेदार झाड़ियां और धूल। तेज धूप से आंखें मिचमिचाती हैं। इसी गर्मी और धूल के बीच बसा है दापू देवी का गांव। तकरीबन एक हजार वोटरों वाली जमीन के कई टुकड़े हैं। हर हिस्से पर किसी खास समुदाय के लोगों की बस्तियां।

मेघवाल समुदाय वो बिरादरी है, जिसकी औरतों की रुलाई में गीत से भी ज्यादा जुंबिश (हलचल) होती है।

हालांकि उन तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा। दो साल पहले यहां किसी ‘बड़े घर’ में हुई मौत के बाद रुदालियों का एक समूह कथित तौर पर अपनी ड्यूटी बजाने पहुंचा। ये बात अखबारों में आ गई, और फिर वो घमासान मचा, जो काफी मुश्किल से शांत हो सका।

निंबोड़ा गांव में एक हजार वोटर्स हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां महिला-पुरुष अनुपात राजस्थान के अनुपात से भी कम है। ये असमानता यहां बाकी चीजों में भी झलकती हैं।
निंबोड़ा गांव में एक हजार वोटर्स हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक यहां महिला-पुरुष अनुपात राजस्थान के अनुपात से भी कम है। ये असमानता यहां बाकी चीजों में भी झलकती हैं।

अब रुदाली टर्म सुनते ही यहां लोग ऐसे देखेंगे जैसे आप डायनासोर का पता पूछ रहे हों। ये बात अलग है कि बातों ही बातों में वहां के रसूखदार मान लेते हैं कि ‘प्रतिष्ठित’ लोगों की मौत पर गांव के गरीब दुख जताने आते हैं। क्यों? क्योंकि वे उनकी जरूरत में हमेशा साथ खड़े मिलते है।

जिंदा होकर भी गायब इन्हीं रुदालियों से मिलने हम करोटी कस्बा पहुंचे, वहां से कुछ स्थानीय लोग हमें निम्बोड़ा लेकर गए। दापू देवी के गांव! उन बस्तियों तक, जहां जाने पर खाट बिछाकर आपको तो बिठाया जाएगा, लेकिन घरवाले खड़े रहेंगे। जहां, चाहे जितनी गर्मी हो, आपको पानी-चाय परोसने की ‘गलती’ नहीं की जाएगी। वजह समझना खास मुश्किल नहीं।

बहुत-से औरतों-बच्चों के बीच दापू बैठी हैं। हमारी बातचीत शुरू तो किसी और से होती है, लेकिन उन तक जाकर ठहर जाती है। लाल चुनरी पर नीले बॉर्डर वाली दापू बार-बार सबको शांत रहने का इशारा कर रही हैं। उम्र पूछती हूं तो कहती हैं- 70 पार होगी। इस गांव में कब से हैं? बचपन यहीं खेली। बताते हुए वे खिलखिला हंसती हैं। 70 पार वाली हंसी।

दापू बताती हैं- गांव में कोई गुजर जाए, तो हम 10-15 औरतें जमा होकर रोते-रोते उसके घर तक जातीं। कोई छाती कूटती, कोई धूल में सनकर पहुंचती। जो जितनी जोर से रोए, उसे उतना अच्छा माना जाता।

कई बार ऐसा भी हुआ कि जिसके घर मौत हुई, उसके आंसू जम गए। तब हमारा काम और जरूरी हो जाता। हम रोते हुए उसकी चूड़ियां तोड़ते, उसकी चुनरी हटाकर काली चुनरी डाल देते। ये सब ऐसे होता कि उसे भी रोना आ जाता। वो रोती, और इतना रोती कि बेहोश हो जाती। बीच-बीच में घर की औरतें पानी छींटकर उसे उठाती रहतीं ताकि रोने का सिलसिला न टूटे।

क्या रोते हुए आप लोग गाना भी गाते हैं?

गाते तो हैं, कहते हुए दापू छाती पर हाथ मारते हुए कुछ गुनगुनाती हैं, लेकिन एकदम से रुक जाती हैं। अपने आसपास देखकर हंसते हुए कहती हैं- ऐसे रोना अपशकुन (अपशगुन) है। मेरा घणा परिवार है। सब जीवित हैं। तुम भी बैठी हो (इशारा मेरी तरफ है)। रोना मरे हुए के लिए ही होता है।

दापू जब किस्से सुना रही हैं, मैं गौर से देख रही हूं। हाथों में लोहे के मोटे-मोटे कड़े। पैरों में लोहे की सांकली। एक उंगली पर लोहे का ही छल्ला। गले में काला धागा, जिस पर सेफ्टी पिन्स का गुच्छा हिलडुल रहा है। सोग का सिंगार!

वहीं बगल में बैठी महिला मेरी नजर ताड़ते हुए बोलती है- ये विधवा है। विधवाएं ऐसे ही रहती हैं। ये कहते हुए वो महिला अपने हाथ दिखाने लगी, जिस पर सफेद चूड़ियां थीं, पैरों में पायल और गले में प्लास्टिक की कई रंगीन मालाएं। साथ में वो अपनी फोटो खींचने को भी कहती है, जैसे जीवित पति कोई उपलब्धि हो।

दापू धीमी आवाज में टोकती हैं- लेकिन रोते हुए हम सबके कपड़े एक जैसे होते हैं। काली या आसमानी चुनरी। साथ में पूरी बांह का ब्लाउज, जिसे कौशली कहते हैं। और फेंटका, घाघरे की तरह दिखने वाला कपड़ा, जो उसे एक चौथाई घेरता है। ये सब पहनते हुए ही आंखें टपकने लगती हैं।

घाघरे से लगा हुआ लाल रंग का ये कपड़ा फेंटका कहलाता है, जो रोने की रस्म के दौरान पहना जाता है। मातम का एक पूरा ड्रेसकोड है।
घाघरे से लगा हुआ लाल रंग का ये कपड़ा फेंटका कहलाता है, जो रोने की रस्म के दौरान पहना जाता है। मातम का एक पूरा ड्रेसकोड है।

किसी अनजान या दूर-दराज के शख्स की मौत पर रोना कैसे आ सकता है? मेरे सवाल में शहरी शक था, जिसे हवा में उछालता हुआ-सा जवाब मिलता है- रिश्ता तो सबसे होता है। और कुछ नहीं तो मानुख-मानुख (इंसान) का रिश्ता तो है। रोना अपने-आप आ जाता है।

ये बात कोई युवा लड़का कहता है, जो टोली में निगरानी कर रहा है। इधर दापू चुप हैं, मानो अंदर ही अंदर उन वक्तों का हिसाब कर रही हों, जब वे चाहकर भी रो नहीं सकीं। अधखाई रातों का। अधसोई किस्मत का। अधजगी उम्मीदों का। रुके हुए हर आंसू की कसर वे शायद दूसरों की मौत पर निकालती होंगी।

पूछना-पुछाना हो चुका। मैं जाने को होती हूं तो अपने खुरदुरे हाथों को मेरे हाथों पर मुलायमित से रखते हुए कहती हैं- मेरे साथ एक सेल्फी (वे इसे सैफी कह रही थीं) खींच लो। सेल्फी लेकर मैं बाहर निकल जाती हूं, जहां उसी गांव की दूसरी बस्ती में एक और चेहरा मेरा ठिकाना है।

कन्या देवी! पुरानेपन से पीली पड़ी सफेद चुनरी ओढ़े ये महिला दापू देवी की अधूरी बात को आगे बढ़ाते हुए रोने की ‘प्रेपरेशन’ को बताती हैं। किसी घर में रोते हुए बस आवाज ही नहीं निकालते हैं, बोलते भी जाते हैं।

जैसे अगर जवान लड़का गुजरा हो तो उसकी मां का दुख बताकर रोते हैं। पत्नी के उजड़े सुहाग को रोते हैं। बूढ़ा गया तो आंसू कम आता है, लेकिन रोना तो है! साथ में अपने पुराने आंसू भी मिला लेते हैं।

अपने लिए कब रोई थीं?

जब पति मरा! दिन रोती थी, रात रोती थी। झाड़ू लगाते रोती, खाना बनाते रोती। कोई आता तो जोर-जोर से रो पड़ती, वरना धीरे-धीरे सुबकती रहती। वही पहली बार था, जब खुलकर अपने नाम पर रोई।

कन्या देवी ये बताते हुए लगातार हंस रही हैं। वजह पूछती हूं तो तपाक से कहती हैं- अब मरने को हुई। रोई तो खूब। दांत गिर जाएं, उससे पहले हंस भी लूं।

बगल में ही उनकी पोती प्रवीणा बैठी हैं, जो मारवाड़ी की हिंदी करती जा रही हैं। वो कहती हैं - मुझे कभी रोना नहीं आता। ससुराल जाऊंगी, तब पता नहीं क्या हो। शायद मुझे भी दादी और मां की तरह जाना पड़े।

इतनी बातचीत में किसी ने भी पैसे लेकर रोने की बात नहीं बताई। कुरेदने पर सरपंच प्रतिनिधि (महिला सरपंचों के पति गांवों में खुद को इसी नाम से बुलाते हैं) गणपत सिंह कहते हैं- गांव में सब मिल-जुलकर रहते हैं। प्रतिष्ठित लोग हमेशा गरीबों के साथ रहते हैं। उनकी मदद करते हैं। ऐसे में अगर प्रतिष्ठित परिवार में कोई हादसा हो गया, तो गांववाले खुद उनके घर आकर रोते हैं। कोई जबर्दस्ती नहीं करता।

गणपत सिंह सज्जन शख्स हैं। गांव में विकास की कई झलकियां दिखाते हैं।

सड़कें पक्की हो चलीं। कच्चे घरों में ईंटें लगने लगीं। किसान अरंडी और टमाटर जैसी उपजाऊ फसलें लगाने लगे, लेकिन औरतें इन सबमें लगभग गायब हैं, जैसे खुद उनकी सरपंच पत्नी।

निकलते हुए मैं कन्या देवी की तस्वीर लेना चाहती हूं तो बगल के बुजुर्ग सज्जन पास आ बैठते हैं। चेहरे पर रुआब, मूंछें तनी हुईं। वहीं कन्या देवी समेत बाकी औरतें सिर पर अंचरा संभालते हुए सिमटकर खड़ी रह जाती हैं। एक पूरी, लेकिन बेरंग तस्वीर!

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