9 महीने की थी, तब रीढ़ की हड्डी टूटी:गर्दन से नीचे के हिस्से में सेंसेशन नहीं रहा, आज शूटिंग में 6 मेडल; अब ओलंपिक की तैयारी

2 महीने पहलेलेखक: नीरज झा

दशहरा का दिन था। आज से 14 साल पहले की बात है। मैं 9 महीने की थी। माउंट आबू से कार में हम लोग नीचे की तरफ लौट रहे थे। तभी अचानक जंगल से निकलकर सामने ऊंट आ गया। ऊंट को बचाने की वजह से कार ट्रक से टकरा गई। ​​​​

मुझे अंदरूनी चोटें आई, जबकि मम्मी-पापा को फ्रैक्चर हो गया। दो-तीन दिन बीतने के बाद भी मैं पैर नहीं हिला पा रही थी। बुखार भी नहीं उतर रहा था। जब पापा ने डॉक्टर को दिखाया, तो स्पाइनल इंजरी का पता चला। डॉक्टर ने ऑपरेशन किया।

इसी दौरान मेरी स्पाइन क्रैश हो गई और गर्दन से नीचे के हिस्से में कोई सेंसेशन नहीं रहा। मतलब यदि आप गर्दन से नीचे के हिस्से में कहीं सूई भी चुभा देते, तो मुझे पता नहीं चलता।

13 साल की पैराशूटर सिमरन शर्मा राजस्थान के जयपुर में पैदा हुईं, लेकिन वो पूरी फैमिली के साथ फरीदाबाद में रहती हैं। सिमरन अपनी ये कहानी राइफल शूटिंग की ट्रेनिंग में जाने से ठीक पहले हमारे साथ शेयर कर रही हैं।

सिमरन कहती हैं, जब ये हादसा हुआ, तब तो मैं बहुत छोटी थी। मुझे कुछ याद नहीं है। ये सारी बातें मैंने पापा को दूसरों से कहते हुए ही सुनी हैं, लेकिन आज भी पापा उन बातों को बताते हुए सिहर जाते हैं।

खैर, अब मैं बड़ी हो गई हूं। धीरे-धीरे ठीक भी हो रही हूं। कमर से ऊपर का हिस्सा पूरी तरह से काम करने लगा है, लेकिन निचले हिस्से में अभी भी सेंसेशन नहीं है। इन सारी चुनौतियों के बावजूद मैंने अपनी पहचान पैराशूटर के तौर पर बनाई।

सिमरन स्टेट और नेशनल लेवल पर राइफल शूटिंग में 6 से ज्यादा मेडल जीत चुकी हैं। इन दिनों वे वर्ल्ड कप और 2024 के ओलिंपिक में जाने की तैयारी कर रही हैं।
सिमरन स्टेट और नेशनल लेवल पर राइफल शूटिंग में 6 से ज्यादा मेडल जीत चुकी हैं। इन दिनों वे वर्ल्ड कप और 2024 के ओलिंपिक में जाने की तैयारी कर रही हैं।

सिमरन अपनी कहानी में आगे दाखिल होती हैं। कहती हैं, ढाई साल की हुई, तो पापा स्कूल में एडमिशन करवाना चाह रहे थे, ताकि मैं पढ़ने-लिखने में बिजी रहूं और मुझे मानसिक तनाव से नहीं गुजरना पड़े। यहां भी शुरुआत में काफी दिक्कतें आईं। पापा ने मेरे लिए एक स्पेशल चेयर बनवाई थी, क्योंकि मैं उस वक्त व्हीलचेयर पर नहीं बैठ सकती थी। कुछ स्कूलों ने तो एडमिशन देने से ही मना कर दिया था। उन्हें लगता था कि मैं मेंटली डिसटर्ब्ड हूं।

किसी तरह से मेरा एडमिशन एक स्कूल में हुआ। मैं पढ़ने लगी, लेकिन मुझे बच्चे चिढ़ाते थे। कोई मेरा दोस्त नहीं बनना चाहता था। जब मैं उनके साथ खेलना चाहती थी, तो वे कहते थे, ' जब तुम अपने पैरों पर ही नहीं चल सकती हो, तो खेलोगी कैसे।' जिसके बाद मैंने हाथों से अपनी किस्मत बदलने का फैसला कर लिया। पहली बार राइफल उठाने का वाकया आज भी याद है। तब तक मैं 9 साल की हो चुकी थी। चौथी क्लास में थी। स्कूल में राइफल शूटिंग का कैंप लगा था।

जब मैंने निशाना साधा, तो 10.9 का गोल टारगेट किया, यानी मेरा निशाना लगभग सटीक था। इसके बाद मेरे स्कूल टीचर ने प्रिंसिपल से बात की और वहां से मेरे राइफल शूटिंग करिअर की शुरुआत होती है। हालांकि, तब तक ना तो घर वालों को और ना ही मुझे राइफल शूटिंग की ABCD पता थी। इसकी वजह से स्टेट लेवल पर मेरा सिलेक्शन नहीं हो पाया।

सिमरन के पापा ने उनका एडमिशन हरियाणा के अंबाला स्थित एक राइफल शूटिंग ट्रेनिंग सेंटर में करवा दिया। यहां वो एक साल तक रही।
सिमरन के पापा ने उनका एडमिशन हरियाणा के अंबाला स्थित एक राइफल शूटिंग ट्रेनिंग सेंटर में करवा दिया। यहां वो एक साल तक रही।

सिमरन कहती हैं, मेरी ट्रेनिंग की वजह से पूरी फैमिली को यहां शिफ्ट होना पड़ा। घर वालों ने कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया। पापा फरीदाबाद में जॉब करते थे, तो वे मुझसे मिलने हर सप्ताह आते थे।

मम्मी-पापा की वजह से मैं मोटिवेट होती रही। इसी का नतीजा रहा कि मैंने नेशनल लेवल पर 2 गोल्ड, 2 सिल्वर और 2 ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किए। सोफिया वर्ल्ड कप में भी सिलेक्शन हो गया था, लेकिन कोरोना की वजह से नहीं जा पाई थी। अब आगे ओलिंपिक में देश के लिए गोल्ड मेडल लाने का सपना है।

आज भी वो दिन याद हैं, जब मैं अपने गांव जाती थी, तो वे लोग मुझ पर तरस खाते थे। कहते थे, 'इस लड़की के साथ भगवान ने बहुत अन्याय किया। यह इस शरीर से कैसे कुछ कर पाएगी।'

स्कूल में भी टीचर भेदभाव करते थे। मुझे किसी भी एक्टिविटी में सबसे आखिर में बुलाया जाता था। पूछने पर कहते थे, 'सभी बच्चों के बीच ये लड़की व्हीलचेयर के सहारे कैसे पार्टिसिपेट करेगी। तुम ये सब एक्टिविटी नहीं कर पाओगी।'

आज भी मैं अपने पैरों पर चल तो नहीं सकती, लेकिन जिंदगी को खुलकर जी रही हूं। मेरे नाम से अब मेरा परिवार पहचाना जाता है। अपने मम्मी-पापा की पहली संतान हूं। जब ये हादसा हुआ, तो वो लोग करीब 2 साल तक डिप्रेशन में थे, लेकिन उन्होंने वास्तविकता को स्वीकारा। मैंने भी उनके हौसले को कभी टूटने नहीं दिया।

तस्वीर में सिमरन के साथ उनके मम्मी-पापा हैं। सिमरन स्विमिंग भी करती हैं। 20 फीट तक बिना किसी सपोर्ट के वो स्विमिंग कर सकती हैं।
तस्वीर में सिमरन के साथ उनके मम्मी-पापा हैं। सिमरन स्विमिंग भी करती हैं। 20 फीट तक बिना किसी सपोर्ट के वो स्विमिंग कर सकती हैं।

सिमरन कहती हैं, पैरों में बगैर जान के भी मैंने स्विमिंग में मेडल जीते हैं। ऐसा मैं रिलैक्स फील करने के लिए भी करती हूं। पियानो बजाती हूं। डांस करती हूं। ‘डांस इंडिया डांस’ रियलिटी शो के जज ने मुझे इसके लिए गाइड किया था, जिसके बाद स्कूल वाले भी डेली एक्टिविटिज में मुझे पार्टिसिपेट करवाने लगे।

कई बार ऐसा भी हुआ कि दिव्यांग होने की वजह से कई जगहों पर रिजेक्ट होना पड़ा। बहुत-सी जगहों पर चढ़ने-उतरने के लिए रैंप नहीं होने की वजह से काफी दिक्कतें हुई।

आज भी फिजिकल चैलेंजेज तो हैं ही, साथ ही फाइनेंशियल क्राइसिस से भी गुजरना पड़ता है। मेरी प्रैक्टिस के खर्च की वजह से मेरी फैमिली को भी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है। ट्रेनिंग में मुझ पर हर महीने करीब 50 हजार रुपए खर्च होते हैं।

राइफल शूटिंग की प्रैक्टिस काफी महंगी है। सरकार और कॉर्पोरेट इंडस्ट्री को आगे आकर मदद करनी चाहिए। आज भी जब अखबार में पढ़ती हूं कि किसी प्लेयर को अपना घर चलाने के लिए दूसरा काम करना पड़ रहा है, तो निराशा होती है।

अब खुद्दार कहानी की ये तीन स्टोरी भी पढ़ सकते हैं...

1. जानवरों से बदतर खाना मिला:मंदिर के प्रसाद से भूख मिटाई, बोरी पहनकर रातें काटीं; एक अनाथ के पिज्जा स्टॉल शुरू करने की कहानी

जब 5 साल का था, तो मां की मौत हो गई। एक-डेढ़ साल बाद पापा भी चल बसे। उम्र इतनी छोटी कि समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। घर के लोग बताते हैं कि किसी गंभीर बीमारी ने दोनों की जान ले ली। (पूरी खबर पढ़िए)

2. क्रैम्ब्रिज जाने से पहले पिता की मौत:मां पापड़ बनाती, मैं पटना की गलियों में बेचता; स्लम के 2 बच्चों से 'रामानुजन कोचिंग' शुरू किया

1993-94 का साल था। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में एडमिशन के लिए ऑफर आया था। मेरे जाने की तैयारी चल रही थी। मां खुश थी कि बेटा कैम्ब्रिज जाएगा, लेकिन हमारे पास हवाई जहाज के टिकट तक के पैसे नहीं थे। (पूरी खबर पढ़िए)

3. मुझे लड़के नहीं, लड़कियां पसंद हैं:16 पन्नों का लेटर लिखकर पापा को बताई अपनी आइडेंटिटी, मुझे एक्सेप्ट करने में मां को भी लगे 4 साल

राजस्थान के जोधपुर की अंकिता मेहरा की कहानी- 2017-18 का साल था। मैंने पापा को मुंबई में एक चाय की टपरी पर बुलाया। उन्हें 16 पन्नों का एक लेटर दिया। लेटर में मैंने अपनी आइडेंटिटी के बारे में लिखा था। (पूरी खबर पढ़िए)

खबरें और भी हैं...