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खुद्दार कहानी:4 साल की उम्र में मां का साथ छूटा, 8वीं में पढ़ाई छूटी; आज अपने हुनर से 22 हजार महिलाओं की जिंदगी संवार रही हैं

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र

राजस्थान के बाड़मेर जिले की रहने वाली रूमा देवी, नाम जितना छोटा काम उतना ही बड़ा, जिसके सामने हर बड़ी उपलब्धि छोटी पड़ जाए। 4 साल की थीं तब मां चल बसीं, पिता ने दूसरी शादी कर ली और चाचा के पास रहने के लिए छोड़ दिया। गरीबी की गोद में पल रही रूमा को हंसने-खेलने की उम्र में खिलौनों की जगह बड़े-बड़े मटके मिले, जिन्हें सिर पर रखकर वो दूर से पानी भरकर लाती थीं। 8वीं में पढ़ाई छूट गई और 17 साल की उम्र में शादी।

पहली संतान हुई वो भी बीमारी की भेंट चढ़ गई। रूमा के सामने मुश्किलों का पहाड़ था, सबकुछ बिखर गया था लेकिन उन्होंने हौसले को नहीं टूटने दिया। खुद के दम पर गरीबी से लड़ने की ठान ली और घर से ही हैंडीक्राफ्ट का काम शुरू किया। आज वे अपने आप में एक फैशन ब्रांड हैं। देश-विदेश में ख्याति है और 22 हजार महिलाओं की जिंदगी संवार रही हैं। आज की खुद्दार कहानी में पढ़िए रूमा देवी के शून्य से शिखर तक पंहुचने की दास्तां...

अंदर से टूट चुकी थी, मन करता था कि आत्महत्या कर लूं

रूमा ने अपनी दादी से बचपन में ही सिलाई बुनाई और कशीदाकारी का काम सिखा था। शुरुआत में वे चादर पर कढ़ाई करके गांव में लोगों को देती थीं।
रूमा ने अपनी दादी से बचपन में ही सिलाई बुनाई और कशीदाकारी का काम सिखा था। शुरुआत में वे चादर पर कढ़ाई करके गांव में लोगों को देती थीं।

दैनिक भास्कर से बातचीत में 32 साल की रूमा देवी कहती हैं कि शादी के बाद भी मुसीबतें कम नहीं हो रही थीं। बच्चे को आर्थिक तंगी के चलते हम बीमारी से नहीं बचा सके थे। तब मुझे बड़ा सेटबैक लगा था। अंदर से पूरी तरह टूट चुकी थी, जिंदगी से तंग आ गई थी। जी करता था कि आत्महत्या कर लूं। ऐसी जिंदगी का क्या मतलब जब हम अपनी जरूरतें ही नहीं पूरी कर सकें।

लेकिन रूमा ने खुद को संभाला। तय किया कि मुश्किलों के सामने हार मानने की बजाय उससे लड़ना है। उन्होंने दादी से सिलाई-बुनाई और कशीदाकारी का काम सीखा था। इसी काम को आगे बढ़ाने का प्लान किया। वे सुई धागे से कुशन और कढ़ाई वाले बैग तैयार कर उन लड़कियों को देने लगीं जो पहली बार ससुराल जाती थीं। धीरे-धीरे रूमा का काम बढ़ने लगा, लेकिन दिक्कत ये थी कि उनके पास न तो पैसे थे न पर्याप्त संसाधन। सिलाई मशीन खरीदने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे।

100-100 रुपए जुटाकर सिलाई मशीन खरीदी
इसके बाद रूमा ने 2006 में 10 महिलाओं के साथ मिलकर एक स्वयं सहायता समूह बनाया। सभी महिलाओं ने 100-100 रुपए लगाकर एक हजार रुपए में सिलाई मशीन खरीदी। संसाधन की थोड़ी बहुत व्यवस्था तो हो गई, लेकिन दिक्कत ये कि 10 महिलाओं के लिए काम कहां मिलेगा? वे जो हैंडीक्राफ्ट तैयार करेंगी, उन्हें कौन खरीदेगा, मार्केट कहां मिलेगा?

रूमा ने 10 महिलाओं के साथ 2006 में अपने सफर की शुरुआत की थी, आज उनके साथ 22 हजार महिलाएं जुड़ी हुई हैं।
रूमा ने 10 महिलाओं के साथ 2006 में अपने सफर की शुरुआत की थी, आज उनके साथ 22 हजार महिलाएं जुड़ी हुई हैं।

इसी बीच रूमा को जानकारी मिली कि बाड़मेर में ग्रामीण विकास चेतना संस्थान में हैंडीक्राफ्ट तैयार करने का काम होता है और ज्यादातर काम वहां महिलाएं ही करती हैं। रूमा अपने समूह की कुछ महिलाओं को लेकर वहां पहुंचीं। पहले तो संस्थान के अधिकारियों ने कोई खास तवज्जो नहीं दी। उन्हें लगा कि ये लोग यूं ही आ गए हैं।

रूमा ने अपने काम के बारे में जानकारी दी, मिन्नतें की तो उन्हें संस्थान की तरफ से सैम्पलिंग का काम मिला। तीन दिन के ऑर्डर को रूमा और उनकी सहेलियों ने एक रात में ही पूरा कर लिया। अगले दिन जब वे वापस संस्थान पहुंचीं तो अधिकारियों को लगा कि इनसे काम नहीं हो पाएगा, तभी ये लोग इतनी जल्दी लौट आई हैं, लेकिन जब उन्हें पता चला कि रातभर जाग कर इन महिलाओं ने काम पूरा कर दिया है, तो वे भी काफी प्रभावित हुए। और आगे से एक के बाद एक उन्हें सैम्पलिंग का ऑर्डर मिलने लगा।

मर्द नहीं चाहते थे कि उनके घर की महिलाएं काम करें

रूमा अलग-अलग शहरों में स्टॉल लगाकर अपने कारीगरी का प्रदर्शन करती थीं और उसके जरिए मार्केटिंग करती थीं।
रूमा अलग-अलग शहरों में स्टॉल लगाकर अपने कारीगरी का प्रदर्शन करती थीं और उसके जरिए मार्केटिंग करती थीं।

रूमा और उनके साथ काम करने वाली महिलाएं हैंडीक्राफ्ट तैयार करतीं और लोकल मार्केट में उसे सप्लाई करती थीं। बाद में उन्होंने प्रदर्शनी लगाकर भी अपने प्रोडक्ट बेचना शुरू कर दिया। रूमा कहती हैं कि पहले तो ज्यादातर महिलाएं काम के लिए राजी नहीं होती थीं। घर के मर्द नहीं चाहते थे कि उनके परिवार की महिलाएं काम करें। हमने उन्हें बहुत समझाया और अपने साथ जोड़ा। उन महिलाओं को ट्रेनिंग दी, काम सिखाया। इस तरह धीरे-धीरे महिलाओं की संख्या भी बढ़ने लगी। 2010 तक पांच हजार से ज्यादा महिलाएं हमारे समूह से जुड़ गईं।

काम बढ़ा तो दिल्ली जैसे बड़े शहरों में स्टॉल लगाना शुरू किया
रूमा देवी कहती हैं कि हमारे साथ जब अच्छी खासी संख्या में महिलाएं जुड़ गईं। प्रोडक्शन भी बढ़िया होने लगा। तो हमें लगा कि अब राजस्थान के बाहर मार्केट की तलाश करनी चाहिए। कुछ लोगों ने बताया दिल्ली जाइए बढ़िया रिस्पॉन्स मिलेगा। लेकिन दिक्कत ये थी कि हम न तो पढ़े-लिखे थे न कभी बड़े शहरों में गए थे। ऊपर से लैंग्वेज की समस्या। हमें तब न तो हिंदी आती थी न इंग्लिश, सिर्फ गांव की बोली और मारवाड़ी में बात करना जानते थे।

श्रीलंका, अमेरिका, जर्मनी सहित कई देशों में आयोजित फैशन शो में रूमा भाग ले चुकी हैं और लोगों की तारीफें बटोर चुकी हैं।
श्रीलंका, अमेरिका, जर्मनी सहित कई देशों में आयोजित फैशन शो में रूमा भाग ले चुकी हैं और लोगों की तारीफें बटोर चुकी हैं।

लेकिन अब काम बढ़ाना था तो तय किया कि दिल्ली चलेंगे। जो मुश्किलें आएंगी देखा जाएगा। बचपन से तो इन्हीं मुश्किलों के बीच जी रहे हैं। रूमा कहती हैं कि वहां हमने स्टॉल लगाए। दुकान पर आने वाली महिलाओं को लगता था कि ये गांव से आई हैं। हालांकि ज्यादातर महिलाओं ने हमारा सपोर्ट किया और हमारे हैंडीक्राफ्ट की तारीफ की। तब 15 से 20 हजार रुपए की सेल हमने की थी।

वे कहती हैं कि मैंने कहीं अपने काम की ट्रेनिंग नहीं ली है। जो कुछ भी सीखा है वो काम करते-करते सीखा है। लोगों की डिमांड और फैशन ट्रेंड के मुताबिक हम हमेशा कुछ नया करने की कोशिश करते रहते हैं।

10 महिलाओं से सफर शुरू हुआ, आज 22 हजार महिलाएं जुड़ी हैं
इसके बाद रूमा देवी का कारवां बढ़ता गया। वे एक के बाद एक शहरों में प्रदर्शनी लगाती गईं। कई फैशन शो में भी उन्होंने भाग लिया। 2011 में दिल्ली फिर से गईं। इस बार जबरदस्त मार्केटिंग हुई और करीब 11 लाख रुपए की सेल उन्होंने की। इसके बाद रूमा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। भारत के बाहर भी कई देशों में वे गईं। उन्होंने अमेरिका, मलेशिया, जर्मनी, सिंगापुर, श्रीलंका सहित दर्जनभर देशों में अपनी प्रदर्शनी लगाई और लोगों की वाहवाही बटोरी।

रूमा भले 8वीं तक पढ़ी हैं लेकिन कई बड़े स्कूल-कॉलेजों में उन्हें बुलाया जाता है। वे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी भी जा चुकी हैं।
रूमा भले 8वीं तक पढ़ी हैं लेकिन कई बड़े स्कूल-कॉलेजों में उन्हें बुलाया जाता है। वे हार्वर्ड यूनिवर्सिटी भी जा चुकी हैं।

आज रूमा के साथ 22 हजार से ज्यादा महिलाएं जुड़ी हुई हैं। जो पारंपरिक से लेकर मॉडर्न तक साड़ियां, दुप्पटें, कुर्ता, कर्टेन्स सहित दर्जनों फैशन प्रोडक्ट तैयार कर रही हैं। कोरोना आने के बाद उन्होंने rumadevi.com नाम से एक ई कॉमर्स वेबसाइट तैयार की है, जहां वे अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करती हैं। जिस संस्थान से जुड़कर रूमा ने काम करना शुरू किया था, आज वे उसकी अध्यक्ष भी हैं। और करीब 1.5 करोड़ रुपए उनके संस्थान का सालाना टर्नओवर है।

वे कहती हैं हम लोग देशभर में अलग अलग शहरों से रॉ मटेरियल लाते हैं। फिर समूह में जुड़ी महिलाएं उनसे प्रोडक्ट तैयार करती हैं। इसके बाद महिलाएं खुद अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग करती हैं। जिन महिलाओं के प्रोडक्ट्स नहीं बिकते या जो खुद सक्षम नहीं होती हैं, हम अपने प्लेटफॉर्म के जरिए उनकी मार्केटिंग करते हैं। साथ ही डिमांड और ऑर्डर के मुताबिक हम खुद भी महिलाओं से प्रोडक्ट खरीद लेते हैं।

2018 में नारी शक्ति सम्मान, 2019 में KBC की हॉट सीट पर मिला स्थान

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद रूमा देवी को नारी शक्ति सम्मान से सम्मानित करते हुए। रूमा को साल 2018 के इस अवॉर्ड से नवाजा गया था।
भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद रूमा देवी को नारी शक्ति सम्मान से सम्मानित करते हुए। रूमा को साल 2018 के इस अवॉर्ड से नवाजा गया था।

रूमा देवी को इस काम के लिए कई सम्मान मिल चुके हैं। ज्योतिराव फुले यूनिवर्सिटी जयपुर से उन्हें पीएचडी की मानद उपाधि मिली है। 2018 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें नारी शक्ति सम्मान से नवाजा था। वे 2019 में अमिताभ बच्चन के साथ केबीसी में हॉट सीट पर भी बैठ चुकी हैं और इनाम भी जीत चुकी हैं। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में बतौर पैनलिस्ट वो शामिल हो चुकी हैं। इसके साथ ही श्रीलंका, नीदरलैंड जैसे देशों ने भी उन्हें सम्मानित किया है।

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