ब्लैकबोर्डहोली के दिन बेटा मरा, अंतिम संस्कार नहीं कर पाई:लोग छुआ पानी नहीं पीते, लेकिन अकेला देख जबरदस्ती कर देते हैं

16 दिन पहलेलेखक: शाश्वत
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''होली की तैयारी कर रही थी। बेटा भी घर आने वाला था, लेकिन कंपनी वालों ने उसे छुट्टी नहीं दी। उसने फोन पर कहा था- ‘मां तुम चिंता मत करना। मैं आ नहीं सकता, लेकिन पैसे भेजूंगा तुम सामान खरीद लेना।’

होली के चार दिन पहले फोन आया कि बेटे की तबीयत खराब है। वह अस्पताल में भर्ती है। मेरी तो सांस ही अटक गई कि ये क्या हो गया मेरे बच्चे को। उसके बाद मैंने कई बार फोन किया, पर बेटे से बात नहीं हुई।

होली के दिन काफी देर तक पैसे और बेटे के फोन का इंतजार करती रही, लेकिन ना तो पैसे मिले ना ही बेटे से बात हो सकी।

फिर मैं महाजन की दुकान पर चली गई उधार लेने। लौटकर आई तो देखा घर के सामने बड़ा सा ट्रक खड़ा है। ननद का लड़का चंदन भी वहीं था। मैं सोचने लगी अचानक चंदन कैसे आ गया। जैसे ही उसके पास पहुंची, वो लिपटकर रोने लगा। वहीं एक ऑटो खड़ी थी। उसमें झांक कर देखा तो बेटे की लाश थी। मैं चक्कर खाकर गिर पड़ी।

अपने पास फूटी कौड़ी भी नहीं थी, उसका अंतिम संस्कार कैसे करती। कुछ लोगों के आगे हाथ-पांव जोड़े कि दो-चार सौ रुपए दे दो, किसी ने साथ नहीं दिया। आखिर लाश घर पर कब तक रखती। अगले दिन बेटे के शव को गंगा में बहा दिया।''

गुड्डू की मां सुशीला बातचीत के दौरान इमोशनल हो जाती हैं।
गुड्डू की मां सुशीला बातचीत के दौरान इमोशनल हो जाती हैं।

इतना कहते-कहते 55 साल की सुशीला जोर-जोर से रोने लगती हैं। कहती हैं- ‘अरे बबुआ रे बबुआ, हमनी के छोड़ के कहां गईल रे बबुआ’( बेटा… हम लोगों को छोड़कर तुम कहां चले गए)।’

बनारस से सटे सेवापुरी विधानसभा के बिहड़ा गांव की रहने वाली सुशीला का बेटा गुड्डू (25) सूरत में मजदूरी करता था। होली के दिन डंपर ने टक्कर मार दी, जिससे उसकी मौत हो गई। सुशीला मुसहर कम्युनिटी से हैं।

ये वो कम्युनिटी है, जो सालों से अपनी जाति मुसहर (चूहे मारकर खाने वाली कम्युनिटी) का दंश झेल रही है। लोग इनका छुआ खाना नहीं खाते, पानी नहीं पीते। दबंग इनकी लड़कियों और महिलाओं के साथ बदतमीजी करते हैं। बड़े जाति के टीचर्स इनके बच्चों को स्कूल से भगा देते हैं। पूरे इलाके में इनकी कम्युनिटी का एक ही शख्स 10वीं तक पढ़ पाया है।

ब्लैकबोर्ड सीरीज में इन्हीं लोगों का हाल जानने मैं बनारस से 35 किलोमीटर दूर सेवापुरी विधानसभा पहुंचा...

करीब 1600 लोगों की आबादी वाले बिहड़ा गांव में 200 लोग मुसहर कम्युनिटी से हैं। इनमें ज्यादातर के पास राशन कार्ड, आधार कार्ड, वोटर कार्ड और घर नहीं है। मृतक गुड्डू की मां एक छोटी सी झोपड़ी के बाहर खड़ी हैं। इतनी छोटी कि मैं उसमें खड़ा भी नहीं हो पा रहा।

सुशीला बताती हैं, ‘गुड्डू हर महीने कुछ पैसे भेजता था। इस बार नहीं भेज पाया। उसकी कंपनी ने पैसे भेजने की बात कही है, लेकिन अभी तक एक रुपया भी नहीं मिला। पैसा नहीं आएगा तो बेटे की तेरहवीं भी नहीं हो पाएगी।’

अपने बच्चे के साथ गुड्डू की पत्नी।
अपने बच्चे के साथ गुड्डू की पत्नी।

नीचे बैठी 18-19 साल की महिला दुधमुंहे बच्चे को दूध पिला रही है। उसके चेहर पर मक्खियां भिनभिना रही हैं, लेकिन वो उन्हें हटा भी नहीं पा रही। ये महिला मृतक गुड्डू की पत्नी है। पास ही जमीन पर उसके दो बेटे लेटे हैं। दोनों की उम्र 5 साल से कम है।

मैं गुड्डू की पत्नी से बात करने की कोशिश करता हूं, लेकिन वह ज्यादा बोल नहीं पाती। बस इतना ही कहती है- ‘सुबह से बच्चे भूखे हैं। कुछ भी खाने को नहीं है। समझ नहीं आ रहा क्या करूं। मांगने भी जाऊं तो किससे मांगू, लोग हमें देखते ही गाली देकर भगा देते हैं।’

सुशीला मुझे PM आवास का कागज दिखाती हैं। कहती हैं- ‘देख बेटवा सरकार से घर बनाने के लिए कागज मिल गया है, लेकिन गांव के दबंग घर नहीं बनने देते हैं। धमकी देकर भगा देते हैं।’

सुशीला मुझे उस जगह भी ले जाती हैं, जहां PM आवास योजना के अंतर्गत उनके लिए घर बनाने की जमीन अलॉट हुई है।

सुशीला PM आवास योजना का पेपर दिखा रही हैं। कहती हैं- जमीन अलॉट हो गई है, लेकिन दबंग घर नहीं बनने दे रहे।
सुशीला PM आवास योजना का पेपर दिखा रही हैं। कहती हैं- जमीन अलॉट हो गई है, लेकिन दबंग घर नहीं बनने दे रहे।

सुशीला से बात करने के बाद मैं यहां से 10 किलोमीटर दूर जोगापुर पहुंचा। करीब 1200 लोगों की आबादी वाले इस गांव में 40 घर मुसहर समाज के हैं। एक झोपड़ी में बैठी सेवकिया अपने पांच साल के पोते की मालिश कर रही थीं।

मैंने बात करने के लिए उनकी तरफ माइक बढ़ाया तो कहती हैं- ‘हमनी के हाल कुकुर-बिलार से भी खराब बा। हमनी के खबर छाप के का करब।’ (हम लोगों का हाल कुत्ते-बिल्ली से भी खराब है। आप खबर छाप के क्या करिएगा।)

सेवकिया बताती हैं, ‘हैंड पंप पर गांव वाले पानी नहीं भरने देते हैं। गाली देते हैं, वेश्या बोलते हैं। पिछले साल मैं पोती के साथ राशन लेने प्रधान के घर गई थी। पोती को प्यास लगी, तो हैंडपंप से पानी पीने लगी। इस पर प्रधान ने उसे इतना मारा कि कई दिनों तक वह बिस्तर पर पड़ी रही। प्रधान का कहना था कि उसने हैंडपंप अशुद्ध कर दिया।

हैंडपंप लगाने के लिए मेरे पति ने बहुत संघर्ष किया, लेकिन दबंगों ने हैंडपंप लगने नहीं दिया। अब उनकी भी मौत हो चुकी है। हम लोग शौच करने जाते है, तो प्रधान का बेटा गंदी-गंदी गालियां देता है। ये लोग हमारे लिए शौचालय बनने नहीं देते और अपने खेत में जाने नहीं देते। आप ही बताइए हम कहां शौच करें…?

कई बार दिन में शौच जाना होता है, लेकिन उनके डर से हम नहीं जा पाते। अंधेरा होने का इंतजार करते हैं।'

सेवकिया कहती हैं कि गांव के प्रधान अपने खेत में शौच जाने से मना करते हैं।
सेवकिया कहती हैं कि गांव के प्रधान अपने खेत में शौच जाने से मना करते हैं।

पास में ही सेवकिया की बहू चूल्हा जलाने की कोशिश कर रही हैं। वे बार-बार जोर लगाकर फूंकती हैं, पर आग नहीं जलती।

मैं पूछता हूं- क्या नाम है आपका?

सहमी आवाज में जवाब देती हैं- मंजू

शादी कब हुई?

अब साल तो नहीं पता। 10-12 साल की थी, तो पापा ने शादी करा दी। तब मैं स्कूल में एबीसीडी, कखगघ पढ़ रही थी। बहुत तेज थी पढ़ने में, लेकिन मुझे पढ़ने ही नहीं दिया गया। मास्टर साहब पीछे बैठाते थे। पानी पीने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था। जब सब लड़के-लड़कियां पानी पी लेते थे, तब हमें पानी मिलता था। लड़के हमें मुसहरिन बोलते थे।

पढ़ने का मन करता है?

अब क्या मन करेगा पढ़ने का। दो बच्चे हैं एक पांच साल का और एक दो महीने का। वे पढ़ जाएं, तो बहुत है।

पति क्या करते हैं?

पति और ससुर दोनों शराब पीते हैं। मजदूरी करने के बाद पति घर लौटता है तो मनमानी करता है। मुझे मारता-पीटता है। यही हाल ससुर का भी है। वे भी गांजा पीकर पड़े रहते हैं।'

मंजू के पास संपत्ति के नाम पर एक झोपड़ी है, जिसमें सब लोग रहते हैं। दहेज का एक पलंग है, जो बारिश में भीगने से खराब हो गया है।

मंजू कहती हैं कि मुझे सिलाई-बुनाई करने का मन करता है। फिर सोचती हूं कि जब लोग हमें देखकर दूर भागते हैं, रास्ता बदल लेते हैं, अछूत मानते हैं, तो फिर मेरा सिला कपड़ा कैसे पहनेंगे।

जैसे ही मंजू के सामने कैमरा आया वो अपना दर्द छुपाते हुए हंसने लगती हैं।
जैसे ही मंजू के सामने कैमरा आया वो अपना दर्द छुपाते हुए हंसने लगती हैं।

गांव से बाहर निकलने पर मेरी मुलाकात 35 साल के रोहित से हुई। रोहित ने 10वीं तक पढ़ाई की है। बातचीत में पता चलता है कि रोहित पूरे इलाके में मुसहर कम्युनिटी से ताल्लुक रखने वाले पहले शख्स हैं, जिन्होंने 10वीं की परीक्षा पास की है। वे अपनी कम्युनिटी के लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिलाने के लिए काम करते हैं।

हमारा अगला पड़ाव था यहां से 6 किलोमीटर दूर चित्रसेनपुर। पटेल बाहुल्य इस गांव की आबादी 1600 है। यहां 50 घर मुसहर कम्युनिटी के हैं। गांव के बाहर चाय की एक दुकान मिली। चाय पीने के लिए मैं भी वहां बैठ गया। वहां मौजूद लोगों से पूछा मुसहर कम्युनिटी के लोगों की बस्ती किधर है…?

गाली देते हुए एक शख्स ने कहा, ‘ये सब नान्ह जात (नीच जाति) हैं, हमारी जमीन पर कब्जा कर रखा है। मेरी दुकान के पीछे बस्ती बसा ली है।’

यहां से जब मैं बस्ती पहुंचा तो लगभग सन्नाटा पसरा था। एक-दो लोग अपनी झोपड़ियों में मिले। पूछने पर पता चला गांव के ज्यादातर युवा दूसरे राज्यों में काम करते हैं। महिलाएं दिनभर मजदूरी की तलाश में या भीख मांगने के लिए इधर-उधर घूमती रहती हैं।

सामने एक मिट्टी की दीवार पर लिखा था- महिला की आजादी, महिला का अधिकार। बस्ती में एक मात्र यही दीवार है जो मिट्टी की है, बाकी घास-फूस की झोपड़ियां हैं। ऐसा लगता है ये दीवार इसी भारी-भरकम स्लोगन को लिखने के लिए खड़ी की गई है। आगे बढ़ने पर 10-12 साल के कुछ बच्चे मिले। वे बोतल चुन रहे थे।

गांव में एक मात्र मिट्टी की दीवार, जहां ये स्लोगन लिखा है। बाकी घर घास-फूस के बने हैं।
गांव में एक मात्र मिट्टी की दीवार, जहां ये स्लोगन लिखा है। बाकी घर घास-फूस के बने हैं।

मैंने पूछा- स्कूल नहीं गए?

जवाब मिला- स्कूल जाकर क्या करेंगे। बोतल चुनेंगे तो पैसे मिलेंगे।

फिर मेरी मुलाकात 18 साल की विद्या से हुई। विद्या बताती हैं, ‘पेट (गर्भ) में बच्चा है। डिलीवरी होने में कुछ ही दिन बचे हैं। अस्पताल बहुत दूर है और हमारे पास पैसे भी नहीं है कि हम डॉक्टर को दिखाने जाएं। जब कभी दर्द होता है, तो बुआ के पास चली जाती हूं। वे मुझे जड़ी देती हैं, दर्द ठीक हो जाता है।’

मैं पूछता हूं कितने बच्चे हैं?

जवाब मिलता है- दो बच्चे हैं। तीन साल का बेटा और एक साल की बेटी।

पति क्या करते हैं?

सड़कों पर घूम-घूमकर दातुन बेचते हैं।

18 साल की विद्या दो बच्चों की मां हैं। तीसरा बच्चा गर्भ में है।
18 साल की विद्या दो बच्चों की मां हैं। तीसरा बच्चा गर्भ में है।

मैं विद्या से बात कर ही रहा था कि एक महिला 2 साल की बच्ची को गोद में लिए पास आ गई। देखने से उसकी बच्ची अधमरी लग रही थी। मानो उसे कई दिनों से कुछ खाने को नहीं मिला हो।

महिला कहने लगी- ‘दो दिन से कुछ खाने को नहीं मिला है। पति की मौत हो चुकी है। शरीर साथ नहीं दे रहा। आप कुछ मदद कर सकते हैं तो कर दीजिए। वीडियो बनाने वाले तो बहुत हैं, उससे हमारा पेट भरेगा क्या?’

मेरे पास कुछ पैसे थे, मैंने उस महिला को देते हुए कहा कि बच्चे को खाना खिला दो और खुद भी खा लो।

इसी गांव के मुहाने पर मुझे 17 साल की हंसा मिली। मांग में चटक सिंदूर। गोद में दोनों तरफ एक-एक बच्चा। हंसा बताती हैं- मेरे चार बच्चे थे। दो बच्चे बीमारी की वजह से खत्म (मर गए) हो गए। अब दो बच्चे बचे हैं। पता नहीं, आगे इनका क्या होगा।

किसी से मदद नहीं मिली?

जवाब मिलता है- कहां कोई मदद करता है। गांव के लोग तो दूर से ही भगा देते हैं।

हंसा बताती हैं कि बीमारी की वजह से उनके दो बच्चे मर चुके हैं।
हंसा बताती हैं कि बीमारी की वजह से उनके दो बच्चे मर चुके हैं।

राजकुमारी पटेल चित्रसेनपुर गांव की प्रधान हैं, लेकिन सारा काम-काज उनके पति रूपनारायण पटेल देखते हैं। वे कहते हैं- ‘प्रधान पत्नी है, लेकिन बात मैं ही करूंगा, क्योंकि सारा कामकाज मैं करता हूं। लोग मुझे ही प्रधान के रूप में जानते हैं।’

मैंने पूछा- मुसहर कम्युनिटी के लोगों की हालत बहुत खराब है। कुछ करते क्यों नहीं?

जवाब मिलता है- ये लोग यहां रहते कहां हैं। महीने-दो महीने गांव से गायब रहते हैं। कभी खुद रहते हैं तो कभी अपने रिश्तेदार को यहां रख देते हैं। आप बताइए इनके लिए हम कैसे काम करें?

इनके पास तो राशन कार्ड भी नहीं है?

गांव में रहते ही नहीं तो कहां से राशन कार्ड और आधार कार्ड बनेगा।

इनका आरोप है कि गांव के दबंग हैंडपंप नहीं लगने दे रहे?

देखिए हैंडपंप पास हो गया है, लेकिन जिस जगह पर लगना है वो जमीन एक पटेल की है। वे अपनी जमीन नहीं दे रहे हैं। मामला कोर्ट में है। अब कोर्ट के कहने पर ही कुछ होगा। हम इसमें कुछ नहीं कर सकते।

(सहयोग - अजय पटेल, रोहित कुमार और नीरज रेहान)

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