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आज की पॉजिटिव खबर:आर्मी से रिटायर्ड कर्नल इंटीग्रेटेड फार्मिंग से हर महीने लाख रुपए मुनाफा कमा रहे, 15 लोगों को रोजगार भी दिया

नई दिल्ली2 महीने पहले
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आमतौर पर रिटायरमेंट के बाद लोग आराम चाहते हैं। इस ऐज में प्रोफेशनल लाइफ की शुरुआत शायद ही कोई करना चाहता है, लेकिन हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में रहने वाले कर्नल प्रकाश चंद राणा की कहानी थोड़ी अलग है। आर्मी से रिटायरमेंट के बाद उन्होंने कॉमर्शियल फार्मिंग की शुरुआत की। वे पिछले 12 साल से इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल पर काम कर रहे हैं। लोग उन्हें द टर्मरिक मैन ऑफ हिमाचल के नाम से जानते हैं। अभी 74 साल की उम्र में वे हल्दी पाउडर, मसाले, अचार और शहद की प्रोसेसिंग से हर महीने लाख रुपए मुनाफा कमा रहे हैं।

प्रकाश चंद राणा एक बहुत ही साधारण परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनका बचपन तंगहाली में गुजरा। जैसे-तैसे करके उन्होंने 10वीं तक पढ़ाई की। इसके बाद उनका सिलेक्शन आर्मी में हो गया। आर्मी में जाने के बाद उन्होंने आगे बढ़ने की कोशिश जारी रखी। वे एक के बाद एक एग्जाम क्लियर करते गए और आगे बढ़ते गए। और 2007 में कर्नल की पोस्ट से रिटायर हुए।

इलाके के लोग प्रकाश चंद को द टर्मरिक मैन ऑफ हिमाचल के नाम से जानते हैं। अक्सर लोग उनसे मिलने और खेती के बारे में जानकारी लेने के लिए आते रहते हैं।
इलाके के लोग प्रकाश चंद को द टर्मरिक मैन ऑफ हिमाचल के नाम से जानते हैं। अक्सर लोग उनसे मिलने और खेती के बारे में जानकारी लेने के लिए आते रहते हैं।

प्रकाश चंद राणा कहते हैं कि रिटायरमेंट के बाद जब मैं गांव आया तो देखा कि लोगों का खेती से मन ऊब रहा है। ज्यादातर युवा पलायन कर रहे हैं। जो थोड़े बहुत लोग खेती कर रहे हैं, वे भी बस अपना निर्वहन ही कर रहे हैं। ऐसे में मैंने तय किया कि क्यों न कॉमर्शियल फार्मिंग की जाए ताकि लोगों को रोजगार से जोड़ा जा सके और पलायन रोका जा सके।

हल्दी के साथ फार्मिंग की शुरुआत

वे कहते हैं कि मैं नए सिरे से खेती करना चाहता था। इसलिए मैंने पहले अलग-अलग कई राज्यों का दौरा किया। वहां के किसानों से मिला और उनकी तकनीक को समझने की कोशिश की। इसी दौरान 2008 में आंध्र प्रदेश में मेरी मुलाकात टर्मरिक मैन ऑफ इंडिया चंद्रशेखर आजाद से हुई जो हल्दी की खेती के लिए फेमस हैं। उन्होंने मुझे हल्दी की विशेष वैराइटी प्रगति के बारे में जानकारी दी। वहां से मैं उसके बीज लेकर आया और दो एकड़ जमीन से हल्दी की खेती की शुरुआत की। वे बताते हैं कि पहली बार में ही 24 टन हल्दी का प्रोडक्शन हुआ था। जिसे पंजाब और हरियाणा में सप्लाई कर दिया।

वैल्यू एडिशन से ही किसानों को सही आमदनी मिलेगी

प्रकाश चंद खेती करने के साथ ही लोगों को फार्मिंग की ट्रेनिंग भी देते हैं। दूर-दूर से लोग उनसे खेती सीखने आते हैं।
प्रकाश चंद खेती करने के साथ ही लोगों को फार्मिंग की ट्रेनिंग भी देते हैं। दूर-दूर से लोग उनसे खेती सीखने आते हैं।

प्रकाश चंद कहते हैं कि किसान जब तक वैल्यू एडिशन पर जोर नहीं देगा, तब तक उसे बढ़िया मुनाफा नहीं मिलेगा। कच्ची हल्दी बेचकर या इस तरह का कोई भी प्रोडक्ट सीधे बेचने से लिमिटेड आमदनी होगी। इसलिए मैंने प्रोसेसिंग पर जोर दिया। हल्दी से पाउडर बनाना शुरू किया। कुछ अचार लॉन्च किए। इसी तरह अगले साल से लहसुन, अदरक, मिर्च और मेडिसिनल प्लांट की खेती और प्रोसेसिंग शुरू की। गांव के दूसरे किसानों को भी इससे जोड़ा। उनके उत्पाद मैंने खुद खरीदकर प्रोसेसिंग और मार्केटिंग शुरू की।

वे कहते हैं कि किसान को खेती में उतरने के साथ ही बिचौलियों को खत्म करना होगा। फार्म टू डोर मॉडल पर काम करना होगा। मैं मार्केटिंग के लिए कभी किसी मंडी में नहीं गया। माउथ पब्लिशिंग और वॉट्सऐप के जरिए मेरे सभी प्रोडक्ट बिक जाते हैं। हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु सहित देशभर से ऑर्डर मिलते हैं। कई लोग तो फार्म हाउस से ही प्रोडक्ट्स खरीद ले जाते हैं।

इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल पर फोकस

प्रकाश चंद अभी करीब 6 एकड़ जमीन पर इंटीग्रेटेड फार्मिंग कर रहे हैं। इसमें बागवानी, मसालों की खेती, मधुमक्खी पालन, मुर्गी पालन, मछली पालन कर रहे हैं। वे कहते हैं कि कॉमर्शियल फार्मिंग का मतलब ही है इंटीग्रेटेड फार्मिंग यानी एक साथ एक समय पर कई फसलों का लाभ लेना। मैं जमीन के नीचे हल्दी, अदरक, लहसुन की खेती करता हूं। उसके ऊपर बागवानी की है, जिसमें आम, अमरूद, नींबू जैसे फल लगा रखे हैं। साथ ही राजमा, मकई जैसी फसलें भी हैं।

इसके अलावा मैं मछली पालन और मुर्गी पालन भी करता हूं। इसका फायदा ये है कि मुर्गियों के भोजन की जरूरत मकई से पूरी हो जाती है और मछलियों के भोजन की जरूरत मुर्गियों के मल से। इसी तरह खाद और पानी के लिए बाहर के रिसोर्सेज पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। यानी इस मॉडल में हर प्रोडक्ट एक दूसरे की जरूरतें पूरी करते हैं। इससे खर्च कम होता है और मुनाफा ज्यादा। ऊपर से जमीन और मैन पावर की भी बचत होती है।

इसके साथ ही उन्होंने चार सौ से ज्यादा मधुमक्खी की पेटियां लगा रखी हैं। इससे वे दो तरह की वैराइटी का शहद तैयार करते हैं। इसमें से एक पूरी तरह मेडिसिनल और जड़ी बूटियों से बनी होती है जबकि दूसरी मलबरी फ्लेवर की होती है। जो शुगर फ्री होती है।

फिलहाल 15 लोग कर्नल के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। इनमें 5 महिलाएं भी हैं जो अचार तैयार करने का काम करती हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें कोरोना में रोजगार गंवाना पड़ा था, आज वे खेती से जुड़कर अच्छी आमदनी कमा रहे हैं। प्रकाश चंद खेती करने के साथ ही दूसरे लोगों को खेती की ट्रेनिंग भी देते हैं। कई लोग उनके फार्म हाउस पर आते हैं और उनसे खेती के बारे में जानकारी हासिल करते हैं।

किस तरह बनता है शहद?

शहद तैयार करने के लिए फूलों की उपलब्धता जरूरी है। जहां मधुमक्खियों के बॉक्स रखे हों, वहां तीन किलोमीटर के रेंज में फूल उपलब्ध होने चाहिए। मधुमक्खियां सबसे पहले फूलों का रस पीती हैं। इसके बाद वे वैक्स की बनी पेटी में अपने मुंह से उल्टी करती हैं। इसे चुगली भी कहते हैं। इसके बाद दूसरी मधुमक्खी उसे ग्रहण करती है और वो भी वही प्रक्रिया दोहराती है। इसी तरह एक मक्खी से दूसरी, तीसरी और फिर बाकी मधुमक्खियां भी इस प्रक्रिया में भाग लेती हैं। आगे चलकर इससे शहद बनता है। शुरुआत में इसमें पानी की मात्रा अधिक होती है, लेकिन रात में मधुमक्खियां अपने पंख की मदद से शहद से पानी अलग कर देती हैं।

10 बॉक्स के साथ कर सकते हैं शुरुआत

शहद का बिजनेस 10 बॉक्स के साथ शुरू किया जा सकता है। इसके लिए करीब 30 हजार रु. खर्च होंगे। बाद में इनकी संख्या बढ़ाई जा सकती है। एक महीने में एक पेटी से चार किलो तक शहद मिल सकता है, जिसे बाजार में 200 से 300 रुपए प्रति किलो की दर से बेचा जा सकता है। इसके साथ ही अगर हम उसकी प्रोसेसिंग करने लगे तो 500 रुपए किलो के हिसाब से भी आसानी से बेचा जा सकता है।

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