भास्कर एक्सक्लूसिवतस्लीमा बोलीं- इस्लाम का हर आलोचक खतरे में:सलमान रुश्दी पर US में हमला हो गया, यहां मुझ पर भी हो सकता है

नई दिल्ली6 महीने पहलेलेखक: पूनम कौशल

'सलमान रुश्दी पर अमेरिका में हाई लेवल सिक्योरिटी के बावजूद हमला हो गया। पश्चिमी देशों की सिक्योरिटी दुनिया में सबसे बेहतरीन है। अगर रुश्दी पर हमला हो सकता है, तो मुझे डर है कि मुझ पर भी हो सकता है।...'

ये फिक्र बांग्लादेश की राइटर तस्लीमा नसरीन की है, जो उन्होंने सलमान रुश्दी पर हमले के बाद जाहिर की। 'सैटेनिक वर्सेज' के राइटर रुश्दी के खिलाफ उनकी किताबों की वजह से फतवा जारी हुआ था। 33 साल पहले ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह खामेनेई ने उन्हें जान से मारने का आदेश दिया था।

तस्लीमा भी अपनी किताबों की वजह से कट्टरपंथियों के निशाने पर रहती हैं। हमने इस मसले पर उनसे बात की। वे कहती हैं कि रुश्दी पर हमला करने वाला सिर्फ 24 साल का है। जब उनके खिलाफ फतवा जारी हुआ था, तब वह पैदा भी नहीं हुआ था। उसने हमला किया, क्योंकि वह उस फतवे में यकीन रखता है। कट्टरपंथ में यकीन रखता है। इस कट्टरपंथ को खत्म करने के लिए उस माहौल को खत्म करना होगा, जिसमें ये पनपता है। वर्ना ऐसे ही हमले होते रहेंगे।

तस्लीमा नसरीन अभी भारत में रह रही हैं। उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलती रहती हैं। सलमान रुश्दी पर हमले पर उनकी क्या राय है, वे इस्लाम और कट्टरपंथ पर क्या सोचती हैं और इतनी धमकियों के बीच किस तरह जिंदगी जीती हैं? इस पर पढ़िए उन्हीं की बातें…

सवाल: आपको भी कट्टरपंथियों से धमकियां मिलती हैं। क्या पहले से ज्यादा खतरा महसूस कर रही हैं?
सलमान रुश्दी के खिलाफ 1989 में फतवा जारी हुआ था। वे पश्चिमी देशों में पुलिस की सिक्योरिटी में रह रहे थे। पहले यूरोप में रहे और अब अमेरिका में हैं। उन्हें हाई लेवल की सिक्योरिटी मिली हुई थी। मैं भारत में रह रही हूं। पश्चिमी देशों की सिक्योरिटी दुनिया में सबसे बेहतरीन है। अगर उन पर हमला हो सकता है तो मुझे डर है कि मुझ पर भी हो सकता है।

उन लोगों पर खासतौर से ज्यादा खतरा है, जो मुसलमान हैं और इस्लाम धर्म के आलोचक हैं। हर किसी को पुलिस की सुरक्षा नहीं मिली है। ऐसे लोगों पर खतरा ज्यादा है, जो बिना पुलिस की सिक्योरिटी नहीं मिली है। अब तो माहौल ऐसा हो गया है कि अगर आप सिक्योरिटी में हैं, तब भी आपको निशाना बनाया जा सकता है। सलमान रुश्दी पर हमले से यही साबित हुआ है। इस्लाम के ज्यादातर आलोचक सुरक्षा में नहीं रहते। इस घटना के बाद वे डरे हुए हैं।

सवाल: ये धमकियां कभी खत्म क्यों नहीं होतीं?
क्योंकि इस्लामी कट्टरवादियों की विचारधारा कभी खत्म नहीं होती। फतवा देने वाले लोग गुजर भी जाते हैं तो उनके अनुयायी जिंदा रहते हैं। सलमान रुश्दी के मामले में फतवा 1989 में जारी हुआ था। तीन दशक से ज्यादा का वक्त हो गया। मेरे खिलाफ फतवे को भी कई दशक हो गए हैं, लेकिन अब भी खतरा बरकरार है। इसलिए क्योंकि कट्टरवादी विचारधारा बढ़ रही है।

अब नए फतवे भले जारी नहीं हो रहे, लेकिन नए कट्टरपंथी पैदा हो रहे हैं। वे इन फतवों को मानने के लिए तैयार हैं। जब तक कट्टरपंथ खत्म नहीं होगा, इस्लामी समाज धर्मनिरपेक्ष नहीं बनेगा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, इस्लाम में सुधार नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसा खतरा रहेगा।

कट्टरपंथ खत्म होने की बजाय बढ़ क्यों रहा है?
कट्टरपंथ को खत्म करने के लिए उस माहौल को खत्म करना होगा जिसमें ये पनपता है। जब तक किसी भी धार्मिक पुस्तक को पवित्र माना जाता रहेगा, तब तक ये खत्म नहीं होगा। मुझे लगता है कि जब तक ऐसा नहीं होगा, इस्लाम के आलोचक खतरे में रहेंगे।

सलमान रुश्दी पर हमला करने वाला युवक सिर्फ 24 साल का है। सलमान के खिलाफ जब फतवा जारी हुआ, तब वह पैदा भी नहीं हुआ था। वह उस फतवे के असर से कट्टरवादी हुआ। ये कट्टरपंथ लोगों के दिमाग में है। उन्हें ब्रेनवॉश करके दिमाग में ये विचार डाला गया है कि इस्लाम के आलोचकों को मार दिया जाना चाहिए। असली समयस्या यही है।

सबसे पहले इस विचार को रोकना होगा कि इस्लाम आलोचना से परे है। इस्लाम में सुधार की जरूरत है। इस्लाम की आलोचना की अनुमति नहीं है। जब तक ये विचारधारा रहेगी ऐसे ही कट्टरवादी सोच के लोग पैदा होते रहेंगे और हमले करते रहेंगे। हर धर्म में आलोचना की गुंजाइश है, लेकिन सिर्फ इस्लाम की ही आलोचना नहीं की जा सकती। जब तक आलोचना के लिए जगह नहीं होगी, सुधार कैसे होगा।

आज के दौर में युवा धार्मिक हो रहे हैं। उनके कट्टरवादी बनने की आशंका है। वे जब तक सिर्फ कट्टरवादी विचारधारा के संपर्क में रहेंगे और आलोचना की इजाजत नहीं होगी, तब कैसे नए विचार के संपर्क में आएंगे?

सवाल: आप पब्लिक में बहुत दिखाई नहीं देतीं, हमेशा डर में रहना कैसा होता है?
मैं ये नहीं कहूंगी कि मैं हमेशा डर में रहती हूं। हां, जब सलमान रुश्दी जैसी घटनाएं होती हैं तो मैं जरूर सतर्क रहती हूं। हर समय, चौबीस घंटे डरे रहकर जीना मुमकिन नहीं है। कोई भी ऐसे नहीं रहता। मैं बाहर निकलती हूं, लेकिन हमेशा इसका ध्यान रखती हूं कि जब कहीं जाऊं, तो मेरे वहां जाने के बारे में जानकारी सार्वजनिक न की जाए। मेरे नाम की घोषणा न की जाए।

मैं लिटरेचर फेस्ट में शामिल होती हूं, लेकिन अपने नाम की घोषणा नहीं होने देती। मैं सरप्राइज गेस्ट होती हूं। स्पीकर लिस्ट में मेरा नाम नहीं होता है। मुझे लगता है कि सलमान रुश्दी को भी इस तरह अलर्ट रहना चाहिए था।

सवाल: क्या आपको लगता है कि कट्टरवाद बढ़ रहा है? इसका खतरा पहले से ज्यादा है?
हां, बिल्कुल ऐसा हो रहा है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ इस्लाम में कट्टरवाद बढ़ रहा है। सभी धर्मों में कट्टरता फैल रही है, लेकिन इस्लाम में सुधार की गुंजाइश नहीं है। वहां अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है। इसलिए इस्लामी कट्टरवाद का खतरा ज्यादा है। खासकर वे देश जहां इस्लाम का शासन है, वहां सत्ता में शामिल लोग धर्म का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे भी युवाओं के कट्टर होने का खतरा बढ़ रहा है।

इस्लामी दुनिया के शासक वर्ग के लोग पश्चिमी देशों में रहते हैं, लेकिन वहां के उदारवाद और धर्मनिरपेक्षता से कुछ नहीं सीखते। पश्चिमी देशों में रहने के बावजूद वे अपने समुदाय की कट्टरवादी विचारधारा के असर में रहते हैं।

सवाल: आपको लगता है कि अब लेखकों और कवियों के लिए वक्त और मुश्किल हो गया है?
सातवीं सदी में भी इस्लाम के आलोचकों की हत्या हुई है। 21वीं सदी में भी इस्लाम के आलोचक मारे जा रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि इस्लामी दुनिया में कोई प्रगति या सुधार हुआ है। ये सच है कि आज रेडिकल इस्लामिस्ट दुनिया के हर कोने में हैं, लेकिन इस्लाम में फ्री थिंकर्स (खुली सोच वाले) की संख्या भी बढ़ रही है। बहुत से मुसलमान धर्म छोड़ रहे हैं। वे हिंसा और इस्लामी विचारों का विरोध कर रहे हैं। ये प्रगतिशील लोग हैं। ये अच्छा संकेत है।

दूसरी तरफ आम मुस्लिम परिवारों में भी कट्टरवादी विचारधारा के लोग बढ़ रहे हैं। बावजूद इसके एक अच्छा संकेत ये है कि इस्लामी समाज से बड़ी तादाद में फ्री थिंकर, नास्तिक और उदारवादी लोग आगे आ रहे हैं। पहले हम इतनी बड़ी तादाद में मुसलमानों को धर्म छोड़ते हुए या नास्तिक बनते हुए नहीं देखते थे।

आगे बढ़ने से पहले इस सवाल पर आपकी राय जरूरी है...

सवाल: आज के हालात देखते हुए, क्या आप वह लिखतीं जो आपने लिखा है?
मैं तो लिखती हूं, लेकिन अखबार और पब्लिशर्स मेरे विचारों को पूरा नहीं छापते। बांग्लादेश में मेरी कई किताबें बैन हैं। भारत में भी खुलकर लिखना और पब्लिश होना मेरे लिए आसान नहीं हैं। पहले भारत में पब्लिश होना आसान था। धर्म की आलोचना करते हुए भी आप छप सकते थे।

अब पब्लिशर्स बहुत सचेत रहते हैं। वे कोई समस्या नहीं चाहते। वे नहीं चाहते कि सरकार या कोई कट्टरवादी समूह समस्या खड़ी करे। उन्हें कट्टरवादियों के हमले का भी डर रहता है। ऐसे में किसी भी धर्म की आलोचना करने वाली किताबों का पब्लिश होना अब बहुत आसान नहीं है।

सवाल: कई लोग ऐसे हैं जो बिना आपकी या सलमान रुश्दी की किताबें पढ़े विरोध करते हैं, उन्हें इसके लिए क्या प्रेरित करता है या धार्मिक नेता उनका इस्तेमाल करते हैं?

मैं निश्चित तौर पर ये कह सकती हूं कि सलमान रुश्दी पर हमला करने वाले ने उनकी किताब नहीं पढ़ी होगी। सैटेनिक वर्सेज या कोई भी किताब। बहुत से लोग, जो मुझे जान से मारने की धमकी देते हैं, उन्होंने कभी मेरी किताबें नहीं पढ़ीं। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्होंने मेरी किताबें पढ़ी हैं, वे गुस्सा होते हैं और फिर मुझे मारने की धमकी देते हैं।

मैं कह सकती हूं कि सलमान रुश्दी पर हमला करने वाले ने सैटेनिक वर्सेज नहीं पढ़ी है। वह सिर्फ 24 साल का है। सैटेनिक वर्सेज कोई धार्मिक या ऐतिहासिक किताब नहीं है। वह फिक्शन हैं। सलमान रुश्दी ने सीधे तौर पर पैगंबर के बारे में कुछ भी नहीं कहा है। मुझे नहीं लगता कि सैटेनिक वर्सेज पढ़ने के बाद किसी के भी मन में उनकी हत्या करने का विचार आएगा। इस सबके पीछे प्रोपेगेंडा है।

उस हमलावर का फेसबुक अकाउंट भी अब फेसबुक ने हटा दिया है। उस अकाउंट पर उसने अयातुल्लाह खामेनेई की तस्वीर लगाई है। इसका सीधा मतलब है कि वह खामेनेई का सम्मान करता है। खामेनेई ने सलमान रुश्दी के खिलाफ फतवा दिया था। हमलावर उनका अनुयायी है और उनसे ही प्रभावित होकर उसने हमला कर दिया।

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