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भास्कर एक्सक्लूसिव:तीरथ के इस्तीफे के पीछे संतों की नाराजगी बड़ी वजह है, सतपाल महाराज और केंद्रीय मंत्री निशंक CM की रेस में सबसे आगे

नई दिल्ली4 महीने पहलेलेखक: संध्या द्विवेदी
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तीरथ सिंह रावत के इस्तीफे की वजह संवैधानिक संकट है या फिर उत्तराखंड का नाराज पुरोहित समाज, साधु-संत और उनके भक्तों का गुस्सा...सीधे तौर पर यह कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तो साफ है कि त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिलाकर तीरथ सिंह रावत को CM बनाने के पीछे यही पुजारी और संत समाज की नाराजगी बड़ी वजह थी। उम्मीद थी कि तीरथ सिंह रावत संत समाज को साध लेंगे। लेकिन 115 दिनों में तीरथ सिंह रावत कोई कमाल नहीं कर पाए। बल्कि उन्होंने विवादित बयान जरूर दिए।

लिहाजा अब तीरथ सिंह रावत के इस्तीफे के बाद उत्तराखंड को एक ऐसे CM की जरूरत होगी जो अगले चुनाव में संत समाज और उनके भक्तों को साध सके और चुनाव जिता सके। दूसरी तरफ तीरथ की असफलता के बाद केंद्र अब किसी सधी हुई इमेज वाले व्यक्ति को भी चुन सकता है। सूत्रों की मानें तो पहली पसंद अगर सतपाल महाराज हैं तो दूसरी पसंद केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' हैं। लेकिन दिक्कत ये है कि वे सांसद हैं, तो उनको भी 6 महीने में चुनाव लड़ना पड़ेगा।

अपने नेता की साख बचाने के लिए तीरथ के साथ खड़े लोग कहते हैं कि नवंबर में चुनाव नहीं हो सकता है, इसीलिए उन्हें जाना पड़ा। कहा तो ये भी जा रहा है कि विधानसभा चुनाव एक साल के अंदर होना है ,इसलिए चुनाव आयोग मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए उपचुनाव नहीं करवा सकता। इन सब के बीच तीरथ का इस्तीफा भाजपा की अंदरुनी लड़ाई के कारण ज्यादा लग रहा है। अगर चुनाव नहीं कराना है या नहीं हो सकता है तो निशंक को लाने में भी दिक्कत होगी।

देवास्थानम बोर्ड पर सरकारी नियंत्रण से पुरोहित समाज नाराज

शुक्रवार को तीरथ सिंह रावत उत्तराखंड की राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को अपना इस्तीफा सौंपते हुए।
शुक्रवार को तीरथ सिंह रावत उत्तराखंड की राज्यपाल बेबी रानी मौर्य को अपना इस्तीफा सौंपते हुए।

सतपाल महाराज के पास सबसे बड़ा धार्मिक आधार है। फिलहाल वहां देवास्थानम बोर्ड पर सरकारी नियंत्रण से पुरोहित समाज नाराज है। हालांकि तीरथ सिंह रावत इसी साल जब 9 अप्रैल यानी अपने जन्मदिन पर हरिद्वार के एक आश्रम में साधु संतों से आशीर्वाद लेने पहुंचे थे तो आश्वासन दिया था कि वे जल्द ही उत्तराखंड के 51 मंदिरों और देवास्थानम बोर्ड को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करेंगे। लेकिन यह फैसला अब तक नहीं लिया जा सका।

लिहाजा पुरोहितों ने अभी धरना शुरू कर दिया है। 29 जून को चारधाम तीर्थ पुरोहित महापंचायत समिति ने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर देवस्थानम बोर्ड को भंग करने की मांग की। महापंचायत ने पीएम मोदी के साथ ही संघ प्रमुख मोहन भागवत, गृह मंत्री अमित शाह समेत विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष को भी पत्र लिखकर उत्तराखंड सरकार पर दबाव बनाया था।

चारधाम यात्रा निरस्त होने से भी पुजारी बेहद नाराज हैं। हालांकि यात्रा को रद्द करने का आदेश उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिया था। तीरथ सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की पूरी तैयारी कर ली थी। लेकिन संत समाज के बीच यह मैसेज गया कि तीरथ सिंह रावत संत समाज को संरक्षण नहीं दे सकते। सूत्रों की मानें तो सतपाल महाराज से भी कुछ संत समाज के लोगों ने मुलाकात की थी।

सतपाल महाराज को आगे करती है उनकी धार्मिक लीडरशिप
सरकार से जुड़े सूत्रों के मुताबिक उत्तराखंड के पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज CM पद के मजबूत दावेदार हो सकते हैं। उत्तराखंड में सतपाल महाराज की संत समाज के बीच अच्छी पकड़ होने के साथ ही उन्होंने उत्तराखंड गठन में भी अहम भूमिका निभाई थी। फिलहाल दावेदारों की लिस्ट में सतपाल महाराज का नाम सबसे आगे माना जा रहा है।

सतपाल महराज एक मानव उत्थान संस्था भी चलाते हैं। 1975 में इसका गठन विशुद्ध रूप से धार्मिक आयोजनों के लिए किया गया था। इस संस्था की उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश में मजबूत पकड़ है। इस संस्था से देशभर के 3,000 से ज्यादा आश्रम जुड़े हैं।

सतपाल महाराज और धन सिंह रावत से केंद्रीय नेतृत्व ने अभी मुलाकात भी की थी। कुछ लोग जो सतपाल महाराज के खिलाफ हैं, वे बिशन सिंह चुफाल का नाम भी आगे कर रहे है।

CM पद को लेकर मंत्री धन सिंह रावत के नाम की भी चर्चा है। केंद्रीय नेतृत्व से इनकी मुलाकात भी हुई थी।
CM पद को लेकर मंत्री धन सिंह रावत के नाम की भी चर्चा है। केंद्रीय नेतृत्व से इनकी मुलाकात भी हुई थी।

निशंक पर केंद्र इसलिए खेल सकता है दांव
पोखरियाल की छवि उत्तराखंड में साहित्यिक मिजाज वाले नेता की है। मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए पोखरियाल ने 44 किताबें भी लिखीं थीं। हालांकि यह बात अलग है कि साहित्यकार बिरादरी उनकी रचनाओं को खास तवज्जो नहीं देती। कोरोना काल में CBSE बोर्ड की परीक्षाओं को लेकर जिस तरह से ऊहापोह की स्थिति थी, पोखरियाल ने उसे बेहद सधे हुए ढंग से डील किया। सूत्रों की मानें तो छात्रों से सोशल मीडिया पर फीडबैक लेने के बाद निशंक ने केंद्रीय नेतृत्व को परीक्षा कैंसिल करने के लिए मनाया था।

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