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बात बराबरी की:रेप की शिकायत के बाद दफ्तर में औरत की हैसियत वही रहती है, जैसे सब्जी में बिना गला टमाटर

नई दिल्ली8 दिन पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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पहले उन्होंने मेरे पति को मारा। फिर दोनों लड़कों को। इसके बाद वे मुझे और 10 साल की मेरी बच्ची को घसीटकर ले जाने लगे। हंसते हुए कह रहे थे- हम औरतों-बच्चियों का खून नहीं करते, हम सिर्फ उनका रेप करते हैं। जब हम सड़क पर पहुंचे तो देखा कि वहां जगह-जगह हथकड़ियों की तरह दिखने वाली बेड़ियां लगी हुई थीं। हमारे कपड़े फाड़ दिए गए और हाथ-पैर बांध दिए गए। अब हम सड़क का हिस्सा थीं- हर पांव के नीचे रौंदे जाने को तैयार।

'कितने सैनिकों, कितने मर्दों ने मेरा रेप किया, मुझे याद नहीं। जब-जब मैं बेहोश होती, मुझ पर पानी की बाल्टी फेंक दी जाती। होश में आते ही रेप का सिलसिला चल पड़ता। एक रोज पता लगा कि मेरी बेटी मर चुकी है। मैं भी मरना चाहती हूं।'

रेप में आंतें और आंखें दोनों ही खो चुकी मुकुनिन्वा (Mukuninwa) ने जब इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में ये कहा तो कमरे में सन्नाटा नहीं छाया, किसी के फफककर रो पड़ने की आवाज नहीं गूंजी, बल्कि छाती पर मुक्के की तरह एक सवाल आया- आपने इतने सालों तक आवाज क्यों नहीं उठाई? कई जज इस पर भी हैरत जताने लगे कि इतनी बर्बरता के बावजूद औरतें जिंदा कैसे रह गईं! ये बात ग्रेट अफ्रीकन वॉर के बाद की है। बता दें कि इससे कुछ साल पहले साल 1998 में आईसीसी ने रेप को ‘भी’ युद्ध से उपजी तकलीफ का दर्जा दिया था, लेकिन दर्जा देना अलग बात है, संवेदनशील होना दूसरी।

खूब पढ़े-लिखे और इंसाफ-पसंद जजों में से एक ने दलील दी- जब चोट लगती है तो चीख तुरंत निकलती है। वो किसी खास समय का इंतजार नहीं करती। ‘अगर’ रेप भी एक किस्म की चोट है, तो जख्म पाने-वालियां तुरंत क्यों नहीं चीखतीं? अगर आपके साथ किसी मर्द ने ज्यादती की तो आप सालोंसाल चुप क्यों रह जाती हैं?

सवाल वजनदार था। कम पढ़ी-लिखी और बात-बेबात बुक्का फाड़कर रो पड़ती औरतों के पास इसका जवाब नहीं था। लगभग 20 साल पहले उठा ये सवाल शायद दो हजार साल पहले भी उठा हो, और दो सौ साल बाद भी बना रहेगा। कम से कम फिलहाल हमारे यहां तो यही चल रहा है।

कुछ दिनों पहले पुरस्कार-प्राप्त पुरुष लेखक पर एक पिद्दी-सी लडकी ने यौन शोषण का आरोप लगाया। लड़की के मुताबिक, प्रेम का झांसा देकर साहित्यकार 10 सालों तक उसपर जुल्म करता रहा। अब वो शादी कर चुका और उससे कतरा रहा है।

एक बेहद गुमनाम सी लड़की ने जब ये खुलासा किया, तो उसे इंसाफ की उम्मीद रही होगी। शायद ये भोला भरोसा भी रहा हो कि लोग उस पुरुष को लताड़ेंगे। लेकिन हुआ उल्टा। लड़की से सवाल हुआ कि वो इतने सालों तक चुप क्यों रही! या फिर, 10 सालों में क्या उसे प्रेम और रेप में फर्क नहीं समझ आ सका! कथित साहित्यकार को अपने पक्ष में कुछ भी कहने की जरूरत नहीं पड़ी। लड़की का तुरंत चीख न पड़ना उसे कटघरे में खड़ा कर गया।

उस लड़की और साहित्यकार महाशय का सच-झूठ हम नहीं जानते। इसका फैसला कोर्ट करेगी, लेकिन इससे पहले जो फैसला मर्दाना अदालत में दिया जा चुका, वो उस अज्ञात वंश-कुल लड़की की हिम्मत तोड़ने को काफी है।

पांव पड़ने पर मामूली-सा गुबरैला भी बिलबिलाकर दांत चुभोता है, फिर लड़कियां क्या गुबरैला कीड़ा से भी गई-बीती हैं! हाथों में बगावत का झंडा लिए फिरती औरतें जबर्दस्ती पर मुंह क्यों छिपा लेती हैं! इसे समझने के लिए कई सर्वे हुए।

जर्नल ऑफ आक्युपेशनल हेल्थ साइकोलॉजी में ऐसा ही एक सर्वे छपा। रेजिंग वॉइस, रिस्किंग रेटिलिएशन... नाम से छपी रिपोर्ट में बताया गया कि महिला कर्मचारी अगर पुरुष बॉस या सहकर्मी के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत करती है, तो बहुत मुमकिन है कि किसी और कंपनी में उसे नौकरी ही न मिले। लोग उसे ट्रबलमेकर यानी मुश्किलें पैदा करने वाली मानते हैं और काम पर रखने से बचते हैं। अमेरिका में कुल 1,167 महिला कर्मचारियों पर हुए सर्वे में 72 प्रतिशत से ज्यादा ने ये बात कही।

ज्यादातर ने माना कि शिकायत के बाद दूसरे सहकर्मी भी उनसे बात करने से बचते हैं और वे अपने काम की एक्सपर्ट होकर भी ऐसे रह जाती हैं, जैसे सब्जी में बगैर गला टमाटर। वो स्वाद तो देगा, लेकिन खाने वाला उसे थाली में किनारे सरका देगा।

कई बार शोषणकर्ता कंपनी का सुपरस्टार होता है। कोई ऐसा, जो दफ्तर को खूब फायदे देता हो। ऐसे में कार, ड्राइवर और आलीशान घर के साथ-साथ कंपनी उसे ये छूट भी दे देती है कि वो जूनियर औरतों से थोड़ा मन बहला सके।

वैसे भी औरतों को करना ही क्या है! बस जरा-सा हंसना है। बॉस की हां में हां मिलानी है। और अगर वो बेबी-शेबी बोलकर करीब आना चाहे तो बिदकने की बजाय दो-चार रसभरी बातें कर लेनी हैं। बस यही काम, लेकिन इसी पर वे रो-धोकर ह्यूमन रिसोर्सेज तक पहुंच जाती हैं। कई बार कोर्ट तक चली जाती हैं। इसलिए ही ट्रबलमेकर औरतों से कंपनियां दूरी बनाने लगीं।

ये तो हुई दफ्तर की बात। अब सवाल ये आता है कि घरेलू मामलों में भी औरतें मुंह खोलने में महीनों-सालों क्यों लगा देती हैं। इसके जवाब में मेरे पास अपनी कहानी है। कुछ 9 साल की थी, जब पहली बार फैमिली-पिकनिक पर गई। ढेर सारे भाई-बहन झरने के किनारे खेल रहे थे। धूप में पिघलते पानी की तरह हमारी हंसी भी पिघलकर बह रही थी कि तभी मेरे एक रिश्तेदार लपककर आए और मुझे खींचकर ले गए। पता चला कि जब हम झरने में खेल रहे थे, तभी कुछ लड़के तस्वीरें खींच रहे थे। चूंकि उनके कैमरों का रुख मेरी तरफ था, तो अंदाजा लगाया गया कि मेरी ही तस्वीरें निकाली जा रही होंगी।

घरेलू पंचायत ने पूछा- ‘तू ही क्यों? यहां इतनी लडकियां हैं, फिर उन्होंने तेरी फोटो ही क्यों खींची’! मैं छोटी थी। भन्नाकर कोई जवाब देने की बजाए रोती रही। फैमिली ट्रिप खत्म हो गई, लेकिन ‘मैं ही क्यों’ का सवाल बरगदिया भूत की तरह सीने पर चढ़ा रहा। इसके बाद जाने कितनी ही बार, कितने ही हादसे बीते, लेकिन मैं कह नहीं सकी। डरती थी कि ज्यों ही बताया, तपाक से मुझे घर बिठा दिया जाएगा।

यौन शोषण दुनिया का अकेला ऐसा जुर्म है, जहां अपराधी की बजाय, अपराध सहने वाले को सजा मिलती है। कोई उसे बदचलन कहता है, कोई लालची। ‘अटेंशन की भूखी’ भी एक टर्म है, जो यौन शोषण की बात करती लड़कियों के माथे चिपक जाता है। हालांकि अब लड़कियां बोल रही हैं। कोई सालों बाद, तो कोई तुरंत।

इस बीच कई ऐतिहासिक इमारतों के तहखानों की तलाशी चल रही है। चर्चा है कि इसके जरिए इतिहास में दफन राज खोले जाएंगे। प्यारे मर्दों! क्या ही अच्छा हो, अगर तुम भी अपने दिमाग के तहखाने खंगाल डालो। क्या पता, जालों और सीलन से भरे किसी कमरे में बराबरी की चाबी बरामद हो जाए। या वो तस्वीर, जो हजारों साल पहले एक मर्द और एक औरत ने साथी की तरह खिंचवाई थी।