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खुद्दार कहानी:पति ने घर छोड़ा तो 3 बच्चों को सिलाई-बुनाई करके पाला, अब बेटी वर्ल्ड चैंपियनशिप में जीती, आज भी किराए के मकान में रहता है परिवार

झांसी5 महीने पहलेलेखक: विकास शर्मा

उत्तर प्रदेश के झांसी जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर एक गांव है पारीछा। करीब 1400 लोगों की आबादी वाले इस गांव में पिछले कुछ दिनों से चहल-पहल बढ़ी है, मीडिया वाले लगातार आ रहे हैं। वजह है यहां की बेटी शैली सिंह की कामयाबी। 17 साल की शैली सिंह ने हाल ही में नैरोबी में आयोजित वर्ल्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल हासिल किया है।

शैली को यह खिताब लॉन्ग जंप कॉम्पिटिशन में मिला है। महज एक सेंटीमीटर से वे गोल्ड जीतने से भले चूक गईं, लेकिन जिन मुश्किल हालातों से निकलकर उन्होंने यह कामयाबी हासिल की है, वह किसी गोल्ड से कम नहीं है। शैली की इस कामयाबी के पीछे उनकी मां की जीवटता, संघर्ष और समर्पण का पूरा-पूरा योगदान रहा है। आज की खुद्दार कहानी में पढ़िए कि एक छोटे से गांव से निकलकर शैली सिंह ने दुनिया में कैसे अपना परचम लहराया...

शैली सिंह का बचपन उनके ननिहाल पारीछा गांव में ही गुजरा। जब वे 6-7 साल की थीं तब किन्हीं कारणों से उनके पिता घर छोड़कर चले गए। इसके बाद शैली सिंह और परिवार की जिम्मेदारी उनकी मां विनीता सिंह के कंधों पर आ गई। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। पति के घर छोड़ने के बाद विनीता सिंह कुछ दिन अपने मायके में रहीं तो कुछ साल उन्हें किराए के घर में गुजारने पड़े।

आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, अकेली मां के ऊपर तीन बच्चों की जिम्मेदारी थी

हाल ही में शैली सिंह ने केन्या के नैरोबी में आयोजित वर्ल्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल हासिल किया है।
हाल ही में शैली सिंह ने केन्या के नैरोबी में आयोजित वर्ल्ड अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल हासिल किया है।

विनीता सिंह बताती हैं कि मेरे ऊपर तीन बच्चों की जिम्मेदारी थी। आमदनी का कोई जरिया नहीं था। मायके के लोगों ने मेरा सपोर्ट किया, लेकिन मैं खुद भी कुछ करना चाहती थी। किसी के आसरे पर नहीं रहना चाहती थी। सिलाई-बुनाई का काम मुझे आता था। इसलिए मैंने तय किया कि अब सिलाई-बुनाई करके ही इन बच्चों की परवरिश करूंगी। इसके बाद मैंने गांव में रहकर ही लोगों के कपड़े सिलने शुरू किए। इससे जो कुछ भी पैसे मिलते थे, उससे बच्चों की देखरेख करती थी।

शैली सिंह गांव के ही सरस्वती शिशु मंदिर में पढ़ती थीं। खेल-कूद में बचपन से ही उनकी रुचि थी। वे स्कूल की तरफ से अलग-अलग जगहों पर खेल-कूद के लिए जाती थीं। हर जगह उनकी तारीफ होती थी। कुछ लोगों ने विनीता सिंह से कहा कि आप अपनी बेटी को स्पोर्ट्स के फील्ड में भेजिए, वह अच्छा करेगी।

विनीता कहती हैं कि मैं भी चाहती थी कि मेरे बच्चे आगे बढ़ें। वे जिस भी फील्ड में जाना चाहते हैं जाएं, अपना मुकाम हासिल करें। इसके लिए मुझे जो कुछ करना पड़ेगा मैं करूंगी, क्योंकि मैं यह नहीं चाहती थी कि आर्थिक तंगी के चलते इनके सपने अधूरे रह जाएं या इनका जीवन भी मेरी तरह हो जाए।

गांव के लोग अक्सर शैली सिंह और उनकी मां का मजाक उड़ाते थे

पारीछा गांव के इसी स्कूल में शैली सिंह की पढ़ाई हुई है। यहां के शिक्षकों ने शैली को खेल-कूद के लिए काफी सपोर्ट किया है।
पारीछा गांव के इसी स्कूल में शैली सिंह की पढ़ाई हुई है। यहां के शिक्षकों ने शैली को खेल-कूद के लिए काफी सपोर्ट किया है।

इस दौरान शैली सिंह की मां को गांव के लोगों के ताने सुनने पड़े। कई लोग उनका मजाक भी उड़ाते थे कि अपनी लड़की को बाहर भेज रही है, लड़कों के साथ खेलने और दौड़ने के लिए भेज रही है। दूसरी तरह गांव में या उसके आसपास स्पोर्ट्स की ट्रेनिंग की भी सुविधा नहीं थी। विनीता को इन बातों से तकलीफ जरूर होती थी, लेकिन उन्होंने अपना इरादा नहीं बदला। वे हर कदम पर शैली के साथ खड़ी रहीं, घर में भी और खेल के मैदान में भी।

शैली गांव के लड़कों के साथ सुबह रनिंग और लॉन्ग जंप की प्रैक्टिस के लिए जाती थीं। इस दौरान विनीता भी उनके साथ जाती थीं ताकि लड़की समझकर कोई कुछ हरकत न कर दे। एक वक्त ऐसा भी था जब शैली सिंह के पास एथलीट्स वाले जूते भी नहीं होते थे। उनकी मां महंगे जूते खरीद नहीं सकती थीं। इससे उन्हें तकलीफ भी होती थी तब शैली मां को हिम्मत दिलाती थीं और कहती थीं कि चिंता नहीं करो मां, जूते तो मैं अपने खेल की बदौलत जल्द ही हासिल कर लूंगी।

अंजू बॉबी जॉर्ज के पति ने पहचानी शैली सिंह की प्रतिभा
कम उम्र में ही शैली ने अपना परचम लहराना शुरू कर दिया था। वे स्कूल की तरफ से झांसी के बाहर भी जाने लगी थीं और खिताब भी जीतने लगी थीं। शैली जब 14 साल की थीं तब उन्होंने रांची में हुए नेशनल जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 5.94 मीटर की छलांग लगाकर रिकॉर्ड बनाया था। इसके अगले साल उन्होंने अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ते हुए अंडर-18 की श्रेणी में नया रिकॉर्ड बनाया। तब उन्होंने 6.15 मीटर की छलांग लगाकर सबको चौंका दिया था।

शैली सिंह अपने कोच रॉबर्ट बॉबी जॉर्ज के साथ। सबसे पहले उन्होंने ही शैली सिंह की प्रतिभा की पहचान की थी।
शैली सिंह अपने कोच रॉबर्ट बॉबी जॉर्ज के साथ। सबसे पहले उन्होंने ही शैली सिंह की प्रतिभा की पहचान की थी।

इसी दौरान एक इवेंट में भारत की स्टार लॉन्ग जंपर रहीं अंजू बॉबी जॉर्ज के पति रॉबर्ट बॉबी जॉर्ज की उन पर नजर पड़ी। रॉबर्ट को पता चल गया था कि 'झांसी की इस नई रानी' में कुछ खास है। उन्होंने शैली को बेंगलुरु में मौजूद अंजू बॉबी जॉर्ज एकेडमी ट्रेनिंग के लिए बुलाया। शुरुआत में शैली की मां इसके लिए राजी नहीं थीं, लेकिन रॉबर्ट ने उन्हें समझाया कि उनकी बेटी एक चैंपियन एथलीट बन सकती है। इसके बाद शैली ट्रेनिंग के लिए बेंगलुरु चली गईं और तब से लगातार वे एक के बाद एक मुकाम हासिल कर रही हैं।

बेटी की कामयाबी की कहानी उसकी ही जुबानी सुनना पसंद करती हूं
विनीता सिंह की बड़ी बेटी बनारस में नौकरी करती हैं। हाल ही में उनकी जॉब लगी है। जबकि सबसे छोटा लड़का अभी 7वीं में पढ़ता है। विनीता अब अपनी बेटी के साथ बनारस में ही रहती हैं। वे कहती हैं कि पिछले तीन साल से शैली गांव नहीं आई है। वह खेल में ही व्यस्त रहती है। हम भी नहीं चाहते कि उसका ध्यान बंटे। फोन पर ही उससे बातचीत होती है।

इस बार जब वह मेडल जीती तो सबको टीवी और मोबाइल के जरिए पहले ही जानकारी मिल गई थी, लेकिन मुझे तब पता चला जब शैली ने फोन किया। हर मैच के बाद शैली फोन पर मुझसे बात करती है। इसलिए मैं टीवी वगैरह से जानकारी लेने की बजाए उसकी कहानी उसकी ही जुबानी सुनना पसंद करती हूं।

आज भी शैली सिंह का अपना घर नहीं है

पारीछा गांव के इसी घर में शैली का बचपन बीता है। इसी कमरे में वे रहती थीं और पढ़ाई करती थीं।
पारीछा गांव के इसी घर में शैली का बचपन बीता है। इसी कमरे में वे रहती थीं और पढ़ाई करती थीं।

विनीता सिंह कहती हैं कि बेटी की कामयाबी के बाद हर जगह उसकी चर्चा हो रही है। मीडिया वाले लगातार फोन कर रहे हैं, गांव भी आ रहे हैं। यह सबकुछ देखकर बहुत खुशी होती है। दिल को तसल्ली होती है कि बेटी हमारा मान बढ़ा रही है, लेकिन अभी भी हमारी तकलीफें कम नहीं हुई हैं। आज भी हमारा खुद का घर नहीं है। बनारस में भी किराए पर बेटी के साथ रहती हूं और गांव में भी जो कुछ है वह मेरे मायके पक्ष का है। मैं वहां भी किराए पर रहती हूं।

गांव वालों की जुबान पर शैली का नाम छाया है
गांव में घुसते ही जैसे ही लोगों को पता चलता है कि मीडिया के लोग आए हैं, या उन्हें प्रेस का स्टीकर दिखता है, वे सीधे एक ही बात कहते हैं। क्या आपको शैली सिंह के घर जाना है? चलिए आपको हम छोड़ देते हैं। शैली सिंह के घर पहुंचने पर उनकी नानी मीरा सिंह मिलती हैं। वे बर्तन धो रही हैं। नातिन की कामयाबी से बहुत खुश हैं, हमें हाथ के इशारे से कहती हैं कि इसी आंगन में शैली का बचपन बीता है। वह यहां रस्सी बांधकर खेला करती थी। आज उसे जो भी कामयाबी मिली है, उसमें उसकी मां का सबसे बड़ा हाथ है।

ये शैली सिंह की नानी मीरा सिंह हैं। शैली के बचपन के दिनों को याद करके वे भावुक हो जाती हैं।
ये शैली सिंह की नानी मीरा सिंह हैं। शैली के बचपन के दिनों को याद करके वे भावुक हो जाती हैं।

शैली सिंह के छोटे मामा सनी सूर्यवंशी बताते हैं कि वह दौड़ और रेस की प्रतियोगिताओं में हमेशा फर्स्ट आती थी। उसकी इस प्रतिभा को देखकर उसे स्कूल की तरफ से काफी सपोर्ट मिला। उसके बाद कानपुर, लखनऊ आदि जगहों पर भी उसने बहुत अच्छा प्रदर्शन किया। इसी गांव के रहने वाले नितिन सिंह कहते हैं कि शैली तो हमारे साथ दौड़ी है। जब वह गांव में रहती थी तो हमारे साथ ही प्रैक्टिस करती थी। उसके जज्बे को देखकर हमें बहुत पहले ही एहसास हो गया था कि वह आगे जरूर कुछ करेगी।

गांव के लोग अब शैली सिंह के यहां आने का इंतजार कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जब शैली यहां आएगी तब हम सब मिलकर जश्न मनाएंगे। हमें पूरा भरोसा है कि एक दिन शैली ओलिंपिक में भी मेडल जरूर जीतेगी, उसे कोई रोक नहीं सकता है।

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