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  • She Had Reached Nepal While Wandering, The Police There Shifted To The Ashram, Not Only Fed And Fed For 12 Years But Also Got Treatment.

12 साल से लापता दो महिलाओं की कहानी:भटकते हुए नेपाल पहुंच गई थीं, वहां की पुलिस ने आश्रम में शिफ्ट कर दिया, 12 साल तक न सिर्फ खिलाया-पिलाया बल्कि इलाज भी करवाया

नईदिल्लीएक महीने पहलेलेखक: अक्षय बाजपेयी
  • झारखंड और UP की दो महिलाएं लापता थीं, एक 2009 तो दूसरी 2013 में लापता हुई
  • दोनों भटकते हुए नेपाल पहुंचीं, वहां की सरकार ने काठमांडू के एक आश्रम में रखा, इसी महीने घर वापस लौटीं

झारखंड और यूपी की दो महिलाएं लापता थीं। एक साल 2009 से गायब थी, तो दूसरी 2013 से। दोनों ही भटकते हुए नेपाल पहुंच गई थीं। वहां की पुलिस ने इन्हें काठमांडू के आश्रम में शिफ्ट कर दिया। आश्रम ने 12 साल तक न सिर्फ इन्हें खिलाया-पिलाया, बल्कि इनकी मानसिक स्थिति का इलाज भी करवाया।

जब मानसिक तौर पर ठीक हुईं तो अपने घर से जुड़ी कुछ-कुछ बातें बताईं। फिर दूतावास से शुरू हुई प्रोसेस हरियाणा क्राइम ब्रांच के एक असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर तक पहुंची और 4 सितंबर को दोनों महिलाएं अपने देश लौट आईं। दोनों के परिजनों और इस मामले में अहम रोल निभाने वाले सब इंस्पेक्टर ने भास्कर से पूरी कहानी साझा की।

सबसे पहले पढ़िए लापता होने की कहानी

पहली कहानी सुनीता की है, जो बरेली जिले के रधौली गांव की रहने वाली हैं, उनके बेटे आछू के मुताबिक…
मेरी मां सुनीता देवी 60 साल की हैं। मानसिक स्थिति ठीक न होने के चलते वे अक्सर इधर-उधर चली जाया करती थीं, लेकिन आसपास के लोग सूचना दे देते थे और हम उन्हें वापस घर ले आते थे।

एक बार गांव से पैदल-पैदल बरेली चली गई थीं। वहां से भी हम उन्हें ढूंढ लाए, लेकिन साल 2013 में न जाने कैसे भारत से नेपाल चली गईं। तब उन्हें ढूंढने की हमने तमाम कोशिशें कीं, लेकिन वे कहीं नहीं मिलीं। हम उनके मिलने की आस छोड़ चुके थे।

इस साल 21 मई को अचानक मेरे पास हरियाणा क्राइम ब्रांच से फोन आया। बात करने वाले ने अपना नाम असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर राजेश कुमार बताया। बोले, आपकी मां नेपाल के काठमांडू के एक आश्रम में मिली हैं। उन्होंने हमसे आधार कार्ड और दूसरे कई कागज मांगे। वीडियो कॉल पर मां से बात करवाई तो हम पहचान गए कि यह हमारी मां ही हैं।

3 सितंबर को उन्हें फ्लाइट से काठमांडू से दिल्ली लाया गया। राजेश जी ने हमें बोला आपको मां को लेने दिल्ली आना है तो मैंने कहा, मैं तो कभी दिल्ली गया नहीं। पैसे भी नहीं हैं। तो उन्होंने कहा चिंता मत करिए, आपके साथ कोई पुलिसकर्मी होगा। फिर हमारे थाने के ही एक पुलिसकर्मी के साथ मैं दिल्ली गया और अपनी मां को गांव ले आया।

मां ने बताया, पुलिस उन्हें आश्रम ले गई थी। वहां उनका इलाज भी हुआ। जब उन्हें कुछ बातें याद आईं तो उन्होंने आश्रम वालों को बता दीं। फिर उन्होंने खोजबीन शुरू की और हम यहां तक आए। नेपाल में सुनीता का नाम लीलावती था। सब उन्हें लीलावती कहकर बुलाते थे। जब उन्हें अपना असली नाम याद आया तब उन्होंने इसकी जानकारी आश्रम के लोगों को दी।

एतबरिया का परिवार उनके मिलने की उम्मीद खो चुका था। 12 साल बाद वो मिलीं तो सबकी आंखें भर आईं।
एतबरिया का परिवार उनके मिलने की उम्मीद खो चुका था। 12 साल बाद वो मिलीं तो सबकी आंखें भर आईं।

दूसरी कहानी झारखंड के लोहरदगा जिले में रहने वाली एतबरिया की है, उनके जीजा विजय के मुताबिक…
सुनीता की ही तरह झारखंड के लोहरदगा जिले के मसमोना गांव की एतबरिया उराव भी बीते 12 सालों से लापता थीं। एतबरिया 32 साल की हैं। अभी तक उनकी शादी नहीं हुई है।

उनके जीजा विजय ने बताया कि, एतबरिया दिमाग से थोड़ी कमजोर हैं। वो 12 साल पहले अपने पिता के साथ ईंट के भट्‌टे पर मजदूरी करने गई थीं। वहीं से गुम हो गई थीं। कैसे नेपाल पहुंच गईं, ये अब तक पता नहीं चल सका।

वो अब यही कहती हैं कि किसी ने नेपाल छोड़ दिया था। वहां की पुलिस उन्हें काठमांडू के मंगला साहना आश्रम ले गई। हमें भी हरियाणा क्राइम ब्रांच के सब इंस्पेक्टर राजेश सिंह का फोन आया था उन्होंने डॉक्युमेंट्स वैरिफाई करने और पहचान साबित होने के बाद एतबरिया को हमें सौंप दिया। हमें उसे घर ले आए हैं।

12 साल बाद जब वो गांव आई तो उन्हें देखने के लिए भीड़ लग गई। हमें अब भी यकीन नहीं हो रहा कि वो वापस आ गई हैं।

दोनों को काठमांडू से दिल्ली तक फ्लाइट से लाया गया। पहली बार दोनों ने हवाई सफर किया।
दोनों को काठमांडू से दिल्ली तक फ्लाइट से लाया गया। पहली बार दोनों ने हवाई सफर किया।

अब पढ़िए इन्हें ढूंढने की कहानी, इन्हें ढूंढने वाले असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर राजेश कुमार की जुबानी…
मेरे पास हमारे DGP ऑफिस से 5 मई 2021 को एक लेटर आया था। यह नेपाल दूतावास का पत्र था। इसमें लिखा था कि, भारत की दो महिलाएं सालों से नेपाल के एक आश्रम में रह रही हैं। हम इन्हें घर तक पहुंचाना चाहते हैं।

मैं स्टेट क्राइम ब्रांच की एंटी वुमन ट्रैफिकिंग सेल में काम करता हूं। साल 2016 से अब तक 550 लापता लोगों को ढूंढ चुका हूं। इसलिए इस काम में मुझे लगाया गया।

दूतावास के पत्र में दो महिलाओं के नाम, उम्र और जिले का जिक्र था। इसी जानकारी के आधार पर मैंने खोजबीन शुरू की। एक से दूसरे की लिंक के जरिए इनके परिवार तक पहुंच गया। परिजनों की वीडियो कॉलिंग पर बात करवाई। कानूनी प्रक्रिया फॉलो करते हुए इन्हें 4 सितंबर को परिजनों को सौंप दिया।

ASI राजेश के मुताबिक, महिलाओं को ढूंढ़ने में इतने साल लगने की दो वजह रहीं। पहली तो यह कि मानसिक स्थिति ठीक न होने के चलते लंबे समय तक ये अपने घर का पता आश्रम को बता नहीं पाई थीं और दूसरी, इन्हें ढूंढने के लिए कोई कोशिश भी नहीं कर रहा था।