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5 साल में 21 हजार BSF जवानों ने नौकरी छोड़ी:16 घंटे की ड्यूटी, 20 साल में प्रमोशन, गलती से भी गलती न हो जाने का खौफ

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: अक्षय बाजपेयी

जगह : भारत-पाकिस्तान बॉर्डर
पोस्ट : बॉर्डर प्वाइंट 000
ये तीन जीरो हमने गलती से नहीं छोड़े हैं, जान बूझकर सही नंबर नहीं लिख रहे। जवानों ने मना किया है, ताकि पहचाने न जाएं। यहां BSF के 40 जवान तैनात हैं। ​​​​​​

इसी के बहाने पहले दो सच साझा कर रहा…
पहला :
2016 से 2020 के बीच, यानी 4 साल में बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स, यानी BSF के 20,249 जवानों ने वॉलेंटरी रिटायरमेंट ले लिया है और 1708 ने तो रिजाइन ही कर दिया।
दूसरा : बीते 10 सालों में सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज, यानी CAPF (जिसमें BSF भी शामिल है) के 1205 जवानों ने सुसाइड कर लिया।
ये बातें डराती हैं। हम तो इनके गीत गाते हैं, फिर ऐसा हो क्यों रहा। इसकी सबसे भीतरी परतें जवानों से जुड़ी हैं। इसलिए हम उन्हीं के पास पहुंचे। अब आपको बॉर्डर नंबर 000 से चार वक्त की कहानी सुना रहा…

पहली कहानी: सुबह के 4.30 बजे हैं, जवान टॉयलेट के सामने अपनी बारी के इंतजार में खड़े हैं
मैं BSF कैंप में हूं। जिन जवानों को सुबह 6 बजे वाली शिफ्ट में ड्यूटी पर जाना है, वे उठ चुके हैं। टॉयलेट कॉमन है, इसलिए हर कोई अपनी बारी के इंतजार में कतार में खड़ा है। जो हालात हैं उसकी फोटो दिखा नहीं सकते। फोटो लेने से भी मना किया है। इसे भास्कर के आर्टिस्ट गौतम चक्रवर्ती की बनाई इस पेंटिंग से समझिए…

जो लोग तैयार हो चुके हैं, वे ब्रेकफास्ट कर रहे हैं। तय वक्त पर बॉर्डर पर पहुंचना है, इसलिए जवान 5.30 बजे से पैदल निकलना शुरू कर रहे हैं। हाथों में इंसास राइफल है, पैरों में काले रंग के जूते, सिर पर कैप जिस पर BSF लिखा है। कुछ के हाथ में पानी की बोतल और बाइनाकुलर भी है। इसी बीच कैंप में रात वाली शिफ्ट से लौट रहे जवानों का सिलसिला भी जारी है।

दूसरी कहानी: दोपहर के साढ़े बारह बजे तक सब लौट आए हैं, सोने के लिए महज 2 घंटे का वक्त
दोपहर के 12 बजे हैं। जो लोग सुबह 6 बजे गए थे, उनकी शिफ्ट ओवर हो गई है। जवान बॉर्डर से कैंप के लिए निकलना शुरू कर चुके हैं। 12.30 बजे तक सब लौट आए हैं।

कोई टॉयलेट में है, कोई अपने छोटे-मोटे काम निपटा रहा, तो कोई नहा रहा है। इन सब एक्टिविटी में दोपहर के 1.30 बज जाते हैं, फिर लंच शुरू होता है। बेड पर जाते-जाते किसी को 2 तो, किसी को 2.30 बज चुके हैं।

इस बीच कुछ जवान मोबाइल लेकर आसपास कोई जगह ढूंढ रहे, जहां नेटवर्क आए तो घर बात हो जाए। जवानों के पास सोने के लिए अब महज 2 घंटे का वक्त है, क्योंकि शाम 6 बजे उन्हें फिर दूसरी शिफ्ट के लिए निकलना जो है।

तीसरी कहानी : शाम के 4.30 बज रहे हैं, जवानों के उठने का सिलसिला शुरू हो चुका है
शाम के 4.30 बज रहे हैं, जो जवान दो घंटे पहले सोए थे, उनके उठने का सिलसिला शुरू हो चुका है। कुछ कैंप के मेंटेनेन्स में जुट चुके हैं। कुछ देर काम के बाद डिनर शुरू हो गया। डिनर के बाद शाम 5.30 बजे से जवान सरहद के लिए निकल रहे हैं। तय वक्त पर शाम 6 बजे जवान सरहद संभाल चुके हैं।

चौथी कहानी : रात के 12.30 बजे आने का सिलसिला शुरू
अभी रात के 12 बज रहे हैं, जो जवान शाम को गए थे, अब उनकी दूसरी शिफ्ट पूरी हो गई है। 12.30 बजे तक कैंप में जवानों के आने-जाने का सिलसिला लगा हुआ है। अगला एक घंटा रुटीन एक्टिविटी में जाता है। कोई रात के 2 बजे सोने गया है तो किसी को 2.30 बज गए।

इन जवानों को दो घंटे बाद यानी 4.30 बजे तक किसी भी हाल में उठना होगा, क्योंकि सुबह 6 बजे फिर सरहद पर पहुंचना है। यानी दोनों शिफ्ट में जवान मुश्किल से 4 घंटे ही सो पाए। वो भी टुकड़ों में। जिन्हें तुरंत नींद नहीं आती, वे और भी कम सो पाते हैं।

नियम क्या है : BSF में कोई फिक्स ड्यूटी आवर्स नहीं हैं। आमतौर पर एक BOP यानी बॉर्डर आउटपोस्ट के पास तीन से साढ़े किमी का एरिया होता है, जिसे 18 से 20 जवान दिन-रात संभालते हैं। जवानों की संख्या के आधार पर वर्किंग आवर्स बदलते रहते हैं।

भास्कर रिपोर्टर ने BSF जवानों के साथ कई घंटे बिताए और यह जानने की कोशिश की कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है। इसके कई रीजन सामने आए हैं। सिलसिलेवार तरीके से हम आपसे शेयर कर रहे हैं। पढ़िए ये एक्सक्लूसिव रिपोर्ट।

चैलेंज नंबर 1 : घने जंगल से रेतीले बीहड़ में पोस्टिंग
बात पिछले साल की है। एक बटालियन 29 जुलाई को नॉर्थ ईस्ट से चलती है, और 4 अगस्त को वेस्ट में पहुंच जाती है। अगले दो दिनों बाद यानी 6 अगस्त को इन्हें बॉर्डर पर तैनात कर दिया जाता है। मतलब मौसम, भौगोलिक स्थितियां, खाना-पीना सब कुछ एकदम अलग। घनी हरियाली से रेतीले बीहड़ में पोस्टिंग।

जवानों को खुद को एडजस्ट करने के लिए एक वीक भी नहीं मिल पाया। न कोई प्री इंडक्शन ट्रेनिंग हुई और न ही इतना टाइम कि खुद को मौसम के मुताबिक थोड़ा ढाल सकें। बल्कि 10 अगस्त को तो बटालियन ने ऑपरेशन चार्ज ले लिया था।

नियम क्या है : एक महीने की प्री इंडक्शन ट्रेनिंग होनी चाहिए। इसमें जवानों को लोकल एरिया, टरेन, कल्चर और वहां के माहौल में ढलने का मौका मिले। हालांकि, कई दफा सिचुएशन ऐसी बनती है कि जवानों को एक जगह से दूसरी जगह सीधे तैनात कर दिया जाता है, क्योंकि बॉर्डर संभालने वाला कोई नहीं होता।

चैलेंज नंबर 2 : परिवार से सालों तक अलग
कई बटालियन के साथ ऐसा होता है कि उनकी किसी चुनौतीपूर्ण जगह पर पोस्टिंग की गई है, तो अगले 3 साल बाद दोबारा किसी चुनौतीपूर्ण जगह पर ही पोस्टिंग दे दी जाती है। ऐसे में परिवार के साथ उनकी दूरी लगातार बनी रहती है। ऐसे स्टेशन अक्सर नॉन फैमिली स्टेशन होते हैं।

यहां से इमरजेंसी में घर पहुंचना भी पड़े तो तीन से चार दिन लग जाएं। एक सीनियर ऑफिसर कहते हैं, पोस्टिंग ऐसी होनी चाहिए कि कोई 3 साल घर से दूर है तो अगले 3 साल परिवार के आसपास रह सके, लेकिन ऐसा नहीं हो रहा, इसलिए जवानों में आइसोलेशन की फीलिंग है। वे इंसान से मशीन बनते जा रहे हैं।

नियम क्या है : एक यूनिट के पास 14% फैमिली अकॉमडेशन का ऑथराइजेशन होता है। यानी, बाकी के जवान अपने परिवार को नहीं रख सकते। इनमें भी जो जवान बॉर्डर पर तैनात होते हैं, और उनकी फैमिली हेडक्वार्टर में रहती है तो परिवार से दूरी बनी रहती है।

चैलेंज नंबर 3 : 18 से 20 साल बाद तक भी पहला प्रमोशन नहीं
BSF में जवानों का पहला प्रमोशन ही 18 से 20 साल में होता है। मतलब यदि कोई सिपाही की पोस्ट पर जॉइन हुआ है तो वो अगले 20 सालों तक सिपाही ही रहेगा। अफसरों का प्रमोशन भी 10 से 12 साल में होता है। ऐसे में एक ही पोस्ट पर एक ही तरह का काम करते-करते जवान ऊब जाते हैं और फ्रस्ट्रेट हो जाते हैं।

BSF में अभी करीब 20 से 22 हजार पद खाली हैं। 2016 के बाद से कोई सीधी भर्ती नहीं हुई। हर यूनिट में एवरेज 100-125 जवानों की वैकेंसी है। खाली पद न भरने से काम का एक्स्ट्रा बर्डन आ रहा है। शिफ्ट टाइम पर खत्म नहीं हो पाती। छुटि्टयां मिलने में दिक्कत होती है। हर साल खाली पद भर लिए जाएं तो ऐसी नौबत न आए।

नियम क्या है : प्रमोशन होगा ही ऐसा कोई रूल नहीं है। एलिजिबिलिटी का रूल है। 7 से 8 साल में एलिजिबिलिटी पूरी हो जाती है, लेकिन प्रमोशन 20 साल में हो पाता है। हालांकि, 10 साल बाद अश्योर्ड करियर प्रमोशन के तहत बढ़ी हुई सैलरी जरूर मिलने लगती है, लेकिन पद नहीं मिल पाता।

चैलेंज नंबर 4 : गलती से भी गलती न कर देने का दबाव
BSF में कहा जाता है कि गलती से भी गलती नहीं होनी चाहिए। जीरो एरर पर काम होता है। छोटी सी भी गलती में बड़ी सजा मिलती है। मान लीजिए दो जवानों के बीच में बहस ही हो गई और यदि ये बात कमांडेंट तक पहुंच गई तो जवानों को एक से तीन महीने तक की जेल हो सकती है। गलती होने पर 7 दिन की जेल देना प्रैक्टिस में है। कैंपों में अंदर ही जेल होती है।

जेल होने पर सैलरी मिलना भी बंद हो जाती है। इसलिए हर जवान के दिमाग में एक प्रेशर हमेशा बना रहता है कि गलती से भी गलती न हो जाए। एक तरह से जवान की थिंकिंग प्रॉसेस ही खत्म हो जाती है। डर के माहौल मे जीता है। अधिकारी आंख उठाकर किसी को देख भी ले तो वो कई दिनों तक टेंशन में रहता है कि, मैंने कुछ गलती तो नहीं कर दी।

नियम क्या है : गलती न करने का कोई रूल नहीं है, लेकिन सीनियर्स हमेशा जवानों पर एक प्रेशर बनाकर रखते हैं, ताकि वे किसी मुसीबत में न पड़ें। हालांकि, अनुशासनहीनता की सजा तय है।

चैलेंज नंबर 5 : सरहद पर रहने के बावजूद अधिकार न के बराबर
BSF में जवानों को सरहद पर तैनात तो कर दिया है, लेकिन उनके पास पावर कुछ भी नहीं हैं। यदि वे किसी क्रिमिनल को भी पकड़ते हैं तो उन्हें उसे स्थानीय पुलिस को ही सौंपना होगा।

जवानों में इस बात का भी फ्रस्ट्रेशन है कि हमारा काम आर्मी की तरह है, लेकिन फेसिलिटी उनसे आधी भी नहीं। न शहीद का दर्जा दिया जाता है और न ही कोई दूसरी सुविधाएं। मसलन आर्मी कैंटीन में जिस रेट पर सामान मिलता है, उस रेट में BSF कैंटीन में नहीं मिलता।

कनेक्टिविटी अच्छी नहीं होने से परिवार से मुश्किल से बात हो पाती है। टाइम पर छुटि्टयां नहीं मिल पातीं। कहने को रिजर्व फोर्स भी है, लेकिन उन्हें अक्सर चुनाव और दूसरे कामों में लगाकर रखा जाता है।

चुनाव के टाइम बॉर्डर पर तैनात जवानों को भी शहरों में बुला लिया जाता है, इससे जितना स्टाफ बॉर्डर पर बचता है, उनके वर्किंग आवर्स बढ़ जाते हैं। एक जवान भरी आंखों से कहता है, हमें समझने वाले अफसर ऊपर नहीं हैं।

नियम क्या है : CrPC के तहत फॉरेनर्स एक्ट, द पासपोर्ट एक्ट, फॉरेक्स लॉ और कस्टम लॉ जैसे कानूनों के जरिए अरेस्ट और सर्च का अधिकार मिला है। जवान अपनी आत्मरक्षा में भी गोली चला सकता है, लेकिन इसे साबित करना होगा।

(नियमों की जानकारी BSF में ADG के पद से रिटायर हुए एसके सूद के मुताबिक।)

निष्कर्ष : जवान BSF में बदलाव चाहते हैं। आर्मी की तुलना में वे खुद को काफी कम पाते हैं। वे अपनी बातें अफसरों से नहीं कह सकते। अफसर अपनी बातें टॉप अथॉरिटी से नहीं कह सकते। ऐसे में उन्होंने भास्कर के जरिए अपनी बातें सरकार तक पहुंचाने की कोशिश की है।