भास्कर इंडेप्थ:एक गायब जीन की वजह से साउथ अफ्रीका के वैज्ञानिकों को मिला ओमिक्रॉन; जानिए कैसे होती है वैरिएंट हंटिंग

8 महीने पहलेलेखक: आदित्य द्विवेदी

नवंबर की शुरुआत में साउथ अफ्रीका के गाउटेंग राज्य की कोरोना लैब में कुछ अनोखा देखने को मिला। यहां एक्सपर्ट्स वायरस के एक जीन का पता नहीं लगा पा रहे थे। ये गायब जीन स्पाइक प्रोटीन बनाते हैं जो इंसानों की कोशिकाओं में रोगाणु डालते और फैलाते हैं। ठीक इसी समय इलाके में सरदर्द और थकान की शिकायत करने वाले मरीजों की बाढ़ आ चुकी थी।

15 नवंबर के आस-पास गुआटेंग प्रांत से 77 सैंपल लिए गए और इनकी सीक्वेंसिंग की गई। गहन जांच पड़ताल के बाद एक्सपर्ट्स इस नतीजे पर पहुंचे कि ये कोरोना वायरस का नया वैरिएंट है। इसका जीन इसलिए पकड़ में नहीं आ रहा था, क्योंकि यह म्यूटेट हो चुका है। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन ने इस नए वैरिएंट का नाम B.1.1.529, यानी ओमिक्रॉन रखा। 26 नवंबर को इसे चिंताजनक वैरिएंट घोषित किया गया। इसके बाद से 24 देशों में ये नया वैरिएंट पाया जा चुका है।

हम यहां आपको कोरोना के नए वैरिएंट की खोज के पीछे का विज्ञान आसान भाषा में बता रहे हैं। साथ ही ओमिक्रॉन वैरिएंट से जुड़े कुछ अन्य जरूरी सवालों के जवाब भी देने की कोशिश करेंगे…

वैरिएंट हंटिंग यानी वायरस के नए वैरिएंट की खोज की प्रोसेस भी बेहद रोमांचक है। इसे जानने से पहले हमें जीन, जीनोम और जीनोम सीक्वेंसिंग को समझना होगा…

क्या होते हैं जीन्स?

दुनिया में हर जीव की बनावट उसके जीन से तय होती है। कई बार आपको भी लोगों ने कहा होगा कि आपकी शक्ल आपके मम्मी या पापा से मिलती है। इसका मतलब आपके शरीर के कुछ जीन आपके मम्मी-पापा से मेल खाते हैं।

जीनोम किसे कहते हैं?

जीनोम का मतलब किसी भी जीव का पूरा जेनेटिक कोड। इस धरती पर मौजूद हर एक जीव का जीनोम अलग-अलग होता है। किन्हीं दो जीव के कुछ जीन तो एक जैसे हो सकते हैं, लेकिन उनका जीनोम एक जैसा नहीं होता।

जीनोम सीक्वेंसिंग क्या है?

किसी जीव के जीनोम की बनावट बेहद उलझी होती है। इसकी स्टडी करने के लिए वैज्ञानिक इसे एक कोड में बदल देते हैं। इस कोड को पता करने की तकनीक जीनोम मैपिंग या जीनोम सीक्वेंसिंग कहलाती है।

साधारण भाषा में कहें तो जीनोम सीक्वेंसिंग एक तरह से किसी जीव का बायोडेटा होता है। इससे उसके रंग-रूप के साथ-साथ व्यवहार का भी पता लगाया जा सकता है। कोरोना वायरस के सभी वैरिएंट्स के जीनोम कोड तय हैं।

दुनिया भर में वायरस के सैंपल्स की जीनोम सीक्वेंसिंग चलती रहती है। सीक्वेंसिंग के दौरान वैरिएंट के जीनोम कोड में कुछ बदलाव देखने को मिलता है, जिससे नए वैरिएंट का पता लगाया जाता है।

ओमिक्रॉन वैरिएंट का पता कैसे लगा?

साउथ अफ्रीका में जीनोम सीक्वेंसिंग के दौरान वायरस में कुछ बड़े बदलाव देखने को मिले। 4 नवंबर को लैंसेट की जूनियर साइंटिस्ट एलीशिया वर्मुलेन ने ओमिक्रॉन की शुरुआती जानकारी जुटाई। उन्हें सिंगल पॉजिटिव टेस्ट में कुछ गड़बड़ी दिखी और उसने यह जानकारी मैनेजर को दी।

एक हफ्ते तक ऐसी ही असामान्य चीजें दिखाई देने पर लैंसेट की मॉलिक्यूलर पैथोलॉजी के चीफ एलीसन ग्लास को खबर किया गया। इसके बाद लैंसेट ने नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर कम्युनिकेबल डिजीज के साथ मिलकर जब इनकी गहन जांच की तो इसमें एक जीन गायब दिखाई दिया। दरअसल, कई म्यूटेशन की वजह से ये जीन पकड़ में नहीं आ रहा था। इसके बाद ओमिक्रॉन वैरिएंट की पहचान की गई।

दक्षिण अफ्रीका हेल्थ डिपार्टमेंट के एक्टिंग डायरेक्टर जनरल निकोलस क्रिस्प को इस वैरिएंट के बारे में पहली बार जानकारी 24 नवंबर को दी गई। अगले ही दिन सरकार के अन्य प्रमुख अधिकारियों को यह जानकारी दी गई। इसके बाद हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में दक्षिण अफ्रीका के 2 जीनोम सीक्वेंसिंग संस्थानों के हेड टूलियो डि ओलिवेरा ने नए वैरिएंट के बारे में आधिकारिक घोषणा की। 26 नवंबर को WHO ने इसे वैरिएंट ऑफ कंसर्न घोषित कर दिया।

भारत में कहां होती है जीनोम सीक्वेंसिंग?

भारत सरकार ने 25 दिसंबर 2020 को कोरोना की जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए एक फोरम बनाया। इसका नाम INSACOG यानी Indian SARS-CoV-2 Consortium on Genomics रखा गया। ये देशभर में मौजूद जीनोम सीक्वेंसिंग लैब्स के कंसोर्टियम की तरह काम करता है। इसके तहत देशभर में 10 प्रयोगशालाएं काम करती हैं।

साउथ अफ्रीका से ही ज्यादा वैरिएंट ऑफ कंसर्न क्यों?

एक धारणा ये है कि कमजोर इम्यून सिस्टम के लोगों में वायरस लंबे समय तक रहता है। उनका शरीर वायरस को पूरी तरह से खत्म नहीं कर पाता। उनके शरीर के इम्यून फोर्स की वजह से वायरस मरता नहीं, बल्कि ज्यादा उन्नत हो जाता है। इसके अलावा ये भी माना जा रहा है कि साउथ अफ्रीका ने वायरस के फैलने और मॉनिटरिंग पर करीबी नजर बनाई हुई है, जिससे नए वैरिएंट का पता चलता है।

ओमिक्रॉन वैरिएंट को लेकर इतनी चिंता क्यों है?

एक्सपर्ट्स मानते हैं कि ओमिक्रॉन डेल्टा वैरिएंट का बेटा या पोता नहीं, बल्कि एक नए तरह का वायरस ही है। इसकी स्पाइक प्रोटीन में 30 म्यूटेशन हो चुके हैं। इस वैरिएंट की प्रोफाइल पहले से मौजूद स्ट्रेन से काफी अलग है। ये कितना खतरनाक और संक्रामक हो सकता है, इस पर अध्ययन चल रहे हैं। कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये डेल्टा वैरिएंट से 6 गुना ज्यादा संक्रमण फैला सकता है।

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