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खुद्दार कहानी:डेढ़ साल से गरीबों को मुफ्त राशन बांट रहे हैं रामू, पैसे कम पड़े तो फ्लैट खरीदने के लिए बचाए लाखों रुपए खर्च कर दिए

नई दिल्ली16 दिन पहलेलेखक: इंद्रभूषण मिश्र

कोरोना में कई लोगों की जॉब चली गई, काम-धंधे बंद हो गए। दूसरे राज्यों के जो लोग यहां नौकरी करते थे, वे बुरी तरह फंस गए। कई लोग ऐसे भी थे जो भूखे-प्यासे सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर जा रहे थे। मुझसे उन लोगों का दर्द नहीं देखा गया। हम घर में अपनी फैमिली के साथ मस्त जिंदगी जिएं और बाहर लोग तड़पते रहे, यह ठीक नहीं है।

मैंने ऐसे लोगों की मदद की ठान ली और तय किया कि चाहे जो भी हो अपने कदम पीछे नहीं खींचूंगा। मैंने अपनी सेविंग्स खर्च कर दी, जो फंड जमा थे, उसे भी खर्च कर दिया। फ्लैट खरीदने के लिए जो पैसे रखे थे, उसे भी राशन और दवाई में लगा दिया। अच्छी खासी सैलरी के बाद भी कई बार ऐसा होता है कि खाते में पैसे ही नहीं होते, लेकिन अब मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता। जितने ज्यादा लोगों की मदद कर सकता हूं, करूंगा। असली सेविंग्स ये लोग ही हैं, जिन्होंने मुझे कुछ अच्छा करने का मौका दिया।

ये कहानी है हैदराबाद के रहने वाले रामू दोसापाटी की। वे कोविड के टाइम से ही लोगों की मदद करते हैं। उन्होंने ATM यानी एनी टाइम मील की शुरुआत की है। जहां लोगों को मुफ्त में राशन, दूध और दवाई मिलती है। अब तक वे 50 लाख रुपए से ज्यादा अमाउंट खर्च कर चुके हैं। इतना ही नहीं 900 से ज्यादा लोगों को उन्होंने आजीविका भी मुहैया कराई है।

43 साल के रामू किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं। उनका बचपन गरीबी में बीता। साल 2002 में MBA की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनकी नौकरी लग गई। कुछ साल बाद एक बड़ी कंपनी में उन्हें अच्छी पोजिशन मिल गई। फिलहाल वे एचआर डायरेक्टर हैं।

एक हादसे से मिला जिंदगी को नया मकसद

रामू कहते हैं कि कोविड के वक्त कई ऐसे लोग थे जिन्हें खाने को नहीं मिल रहा था। ऐसे लोगों की मदद के लिए मैंने राशन बांटना शुरू किया।
रामू कहते हैं कि कोविड के वक्त कई ऐसे लोग थे जिन्हें खाने को नहीं मिल रहा था। ऐसे लोगों की मदद के लिए मैंने राशन बांटना शुरू किया।

रामू बताते हैं कि हमारी लाइफ अच्छी चल रही थी। पोजिशन और सैलरी दोनों बढ़िया। किसी चीज की कमी नहीं था। साल 2006 में मैं मार्केट जाने के लिए घर से निकला। पास में ही जाना था इसलिए हेलमेट नहीं पहना, लेकिन यही लापरवाही हादसे में तब्दील हो गए। मुझे सड़क पर एक गाड़ी से धक्का लगा और सिर में चोट आई। तब मेरी वाइफ प्रेग्नेंट थी और घर में अकेली थी। उस वक्त मुझे रियलाइज हुआ कि जिंदगी कितनी बेशकीमती है। उसके बाद मैंने तय किया कि जो हादसा मेरे साथ हुआ, वो दूसरों के साथ न हो।

वे कहते हैं कि कई लोग जानबूझकर तो कई लोग हेलमेट के अभाव में बिना हेलमेट पहने गाड़ी चलाते हैं और हादसे का शिकार होते हैं। मैंने इसको लेकर लोगों को अवेयर करना शुरू किया। अलग-अलग हाईवे पर जाकर लोगों को जागरूक करने लगा। जिसके पास हेलमेट नहीं होता, उसे मैं हेलमेट प्रोवाइड करने लगा। इसी तरह कई स्कूल-कॉलेजों में भी गया और वहां भी टीचर्स और स्टूडेंट्स के बीच हेलमेट बांटे। इसके लिए हर महीने मैं अपनी सैलरी से कुछ हिस्सा निकालकर अलग रख देता था।

कोविड में सिक्योरिटी गार्ड से मिली प्रेरणा
कोविड के चलते मार्च 2020 में जब लॉकडाउन लगा तो बाकी लोगों की तरह रामू भी अपने घर में फैमिली के साथ कैद हो गए। उन्होंने घर से निकलना बंद कर दिया। करीब 20 दिनों तक वे घर पर ही रहे, एक पल के लिए भी बाहर नहीं निकले, लेकिन 13 अप्रैल को उनके बेटे का जन्मदिन था। बच्चे की जिद के बाद चिकन लाने के लिए वे घर से बाहर निकले।

रामू कहते हैं कि जब मैं चिकन की शॉप पर पहुंचा तो देखा कि एक महिला 20 किलो चिकन पैक कराके ले जा रही है। मुझे बड़ा ताज्जुब हुआ कि अभी लोगों को एक किलो चिकन भी नहीं मिल रहा है। लाइन में लगना पड़ रहा है और यह अकेले 20 किलो चिकन ले जा रही है।

रामू कहते हैं कि हम लोग कोविड के वक्त खाना पैक कराके लोगों में बांटते थे। ताकि कोई भूखा नहीं रहे।
रामू कहते हैं कि हम लोग कोविड के वक्त खाना पैक कराके लोगों में बांटते थे। ताकि कोई भूखा नहीं रहे।

रामू ने उस महिला से पूछा कि इतना सारा चिकन? तब उस महिला ने बताया कि दूसरे राज्यों के कई लोग हैदराबाद में फंसे हैं। मैं उन्हें खाना बनाकर खिलाती हूं। उसी के लिए चिकन ले जा रही हूं।

रामू बताते हैं कि वह महिला सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करती थी। 6 हजार रुपए उसकी सैलरी थी, जिसमें से 4 हजार रुपए लोगों को खाना खिलाने के लिए खर्च कर रही थी। उसका यह जज्बा देखकर मेरा मन झकझोर गया। मुझे लगा कि हम तो अपने घर में फैमिली के साथ मस्त हैं। किसी चीज की दिक्कत नहीं है। वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं और सैलरी भी मिल रही है, लेकिन बाहर लोग भूखे तड़प रहे हैं। अगर हम इन लोगों के लिए कुछ नहीं कर सकते तो अच्छी नौकरी और पैसों का क्या मतलब है।

लोगों की मदद के लिए शुरू किया ATM यानी एनी टाइम मिल
उस महिला से मिली प्रेरणा के बाद रामू ने तय किया कि वे भी ऐसे लोगों की मदद करेंगे। उन्होंने उन मजदूरों और लोगों से बात की जो परेशान थे, भूखे थे और किसी भी कीमत पर अपने घर जाना चाहते थे। रामू ने उन्हें भरोसा दिलाया कि उन्हें पैदल चलकर गांव जाने की जरूरत नहीं है। वे यहीं पर उनके लिए भोजन का इंतजाम करेंगे। उन्होंने तत्काल अपने सेविंग्स से कुछ पैसे निकाले और भोजन की व्यवस्था में जुट गए।

वे ऐसे लोगों के लिए खाना पैक कराकर बांटने लगे। वे दूर-दूर तक जाकर लोगों को खाना, दूध और दवाई बांटते थे। इससे लोगों को काफी मदद मिली, लेकिन रामू को रियलाइज हुआ कि संक्रमण के दौर में यह सही नहीं है। इससे भीड़ बढ़ रही है और कई लोग संक्रमित हो सकते हैं। साथ ही सभी की पसंद भी अलग-अलग थी। कोई चावल खाना चाहता था तो कोई रोटी खाना चाहता था, तो किसी को दूध की जरूरत थी। खास करके छोटे बच्चों को।

अपने ATM यानी एनी टाइम मिल के जरिए रामू हजारों लोगों की मदद कर चुके हैं और अभी भी कर रहे हैं।
अपने ATM यानी एनी टाइम मिल के जरिए रामू हजारों लोगों की मदद कर चुके हैं और अभी भी कर रहे हैं।

रामू कहते हैं कि मैं जहां रहता हूं, वही पास में किराने का एक स्टोर है। कोरोना में उसकी दुकान बंद हो गई थी। ग्राहक नहीं आ रहे थे। मैंने उससे कहा कि जब तक लॉकडाउन है वह अपनी दुकान मुझे दे दे। जितना भी खर्च होगा मैं वहन करूंगा। इसके बाद उन्होंने उस दुकान पर ATM यानी एनी टाइम मिल, एनी टाइम मिल्क और एनी टाइम मेडिसिन का पोस्टर चिपका दिया। इसके बाद तो लोगों की भीड़ लग गई। लोग राशन, दूध और मेडिसिन के लिए आने लगे।

सेविंग्स खत्म हुई तो प्लैट खरीदने के लिए रखे पैसे भी खर्च कर दिए
रामू बताते हैं कि मैं लोगों की लगातार मदद कर रहा था। यह नहीं देख रहा था कि पैसे कहां से और कितने खर्च हो रहे हैं। कभी पीएफ से निकालकर खर्च करता था तो कभी अपने फंड से पैसे खर्च कर रहा था। जब ये भी खत्म हो गए तो मैंने थोड़ा-थोड़ा करके उन पैसों को भी खर्च करना शुरू कर दिया जो नया फ्लैट खरीदने के लिए सेव करके रखा था। हालांकि जब हमारी मुहिम के बारे में लोगों को जानकारी मिली तो कई लोग मदद के लिए आगे आए और राशन के लिए पैसे दिए। कई लोग अभी भी मदद कर रहे हैं। धीरे-धीरे कारवां बढ़ता जा रहा है। अब तक वे 60 हजार से अधिक लोगों की मदद कर चुके हैं।

सिर्फ राशन ही नहीं, लोगों को रोजगार भी मुहैया करा रहे हैं

राशन के साथ ही रामू महिलाओं को सिलाई-मशीन और ठेले प्रोवाइड कर उन्हें लाइवलीहुड सपोर्ट दे रहे हैं।
राशन के साथ ही रामू महिलाओं को सिलाई-मशीन और ठेले प्रोवाइड कर उन्हें लाइवलीहुड सपोर्ट दे रहे हैं।

रामू कहते हैं कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद ज्यादातर लोग अपने-अपने घर चले गए। लोगों की भीड़ कम हो गई, लेकिन अभी भी कई लोग ऐसे थे जो यहीं के रहने वाले थे और कोविड के चलते उनकी नौकरी चली गई। इनमें ठेले लगाने वाले, ऑटो चलाने वाले और कुछ पुजारी लोग थे। कई लोग ऐसे भी थे जो अनाथ थे, कोविड में उनके माता-पिता या पति की मौत हो गई थी। ये लोग भोजन और राशन के लिए इधर-उधर भटक रहे थे।

रामू बताते हैं कि ऐसे लोगों को कुछ दिनों तक मैं राशन मुहैया कराया, लेकिन फिर लगा कि आखिर हम कब तक इनकी मदद कर सकते हैं। कितना राशन दे सकते हैं। इससे बेहतर होगा कि इन्हें कुछ काम-धंधा मुहैया कराया जाए ताकि ये लोग खुद से अपने लिए कमा सकें। इसके बाद उन्होंने कुछ परिचितों से बात की और लोगों को उनकी योग्यता के मुताबिक जॉब दिलवाया।

इसके साथ ही उन्होंने लोगों के लिए लाइवलीहुड सपोर्ट सिस्टम भी तैयार किया। किसी को सिलाई मशीन दिलाई, किसी को ठेले दिलाए, किसी के लिए टिफिन सर्विस खोली ताकि लोग खुद अपनी जीविका चला सकें।

लोगों को प्लास्टिक वेस्ट और पॉल्यूशन को लेकर जागरूक भी कर रहे हैं
रामू कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से पॉल्यूशन काफी बढ़ा है। आपको पता होगा कि दिल्ली जैसे शहरों में कोरोना के पहले भी मास्क लगाकर बाहर निकलना पड़ता था और अब तो और भी बुरा हाल है। मैं चाहता था कि ये स्थिति हैदराबाद और उसके आसपास न हो। इसको लेकर पिछले 3-4 साल से मैं अभियान चला रहा हूं। लोगों को जागरूक करता हूं, बच्चों को जागरूक करता हूं और सभी को प्लांट लगाने के लिए मोटिवेट करता हूं। हमने सैकड़ों प्लांट लगाए भी हैं।

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