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आज की पॉजिटिव खबर:10 साल नौकरी के बाद ‘बेटी’ नाम से शुरू किया स्टार्टअप, मशरूम से बनाया नूडल्स मसाला, पराली से कर रहीं पैकेजिंग

इंदौर3 दिन पहलेलेखक: निकिता पाटीदार

पराली। जिक्र होते ही सॉल्यूशन कम और परेशानियां ज्यादा सामने आती हैं। फिर चाहे वो पर्यावरण से जुड़ी हों या हमारे स्वास्थ्य से। प्रकृति के साथ जुड़कर इन परेशानियों का समाधान निकाल पाना थोड़ा मुश्किल है, लेकिन इस मुश्किल काम को ‘बेटी’ के साथ आसान कर दिखाया है इंदौर की पूजा दुबे ने।

पूजा ने साल 2017 में मालन्यूट्रिशन और प्रदूषण से लड़ने के लिए Biotech Era Transforming India (BETI) की शुरुआत की। जिसकी मदद से वो मशरूम की खेती कर हेल्थ से जुड़े इनोवेटिव आइडिया पर काम कर रही हैं। 15 साल से ज्यादा फील्ड की नॉलेज रखने वाली पूजा कभी भी अपने काम को रिसर्च के पन्नों तक सीमित नहीं रखना चाहती थीं।

मालन्यूट्रिशन और प्रदूषण का हल बना मशरूम

पूजा और उनके पति प्रदीप अपनी बेटी को वायु प्रदूषण के बीच पलते देख रहे थे। हवा के दूषित होने के पीछे एक बड़ी वजह हर साल सर्दियों में पराली से होने वाला प्रदूषण है। पूजा बताती हैं कि अब हम हर साल लोगों को पराली से हो रहे धुएं से परेशान होते देखते हैं। सरकार प्रदूषण और किसान पराली से परेशान रहते हैं। हम दोनों की परेशानियों को अच्छी से समझते हैं और बीच का कोई सॉल्यूशन निकालना चाहते थे। मैं काफी समय से अलग-अलग चीजों पर रिसर्च करती रही हूं। मैं अच्छी तरह से जानती थी कि इन दोनों चीजों का सॉल्यूशन मशरूम हो सकता है।

मशरूम की खेती पराली में आसानी से की जा सकती है, साथ ही ये मालन्यूट्रिशन से लड़ने में भी बहुत फायदेमंद होता है। हमने मशरूम की वर्टिकल फार्मिंग शुरू की। जिन्हें डाइट में आसानी से शामिल करने के साथ ही मोटापा, शुगर व ब्लड प्रेशर समेत विभिन्न बीमारियों की दवाई बनाने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। खासकर बटन मशरूम का खाने में उपयोग किया जा सकता है। जबकि ओयस्टर मशरूम का मेडिसिनल उपयोग काफी ज्यादा होता है।

पूजा और उनके पति ने घर के ग्राउंड फ्लोर को लैब में तब्दील किया और मशरूम उगाना शुरू किया। मशरूम की फसल के साथ उनकी बेटी।
पूजा और उनके पति ने घर के ग्राउंड फ्लोर को लैब में तब्दील किया और मशरूम उगाना शुरू किया। मशरूम की फसल के साथ उनकी बेटी।

पराली से तैयार किया पैकेजिंग का मॉडल

मशरूम से अब पूजा और प्रदीप मालन्यूट्रिशन की समस्या से निपट पा रहे थे और कुछ हद तक पराली की समस्या से भी, लेकिन प्रदूषण कम करने का उनका गोल अभी भी पूरा नहीं हो पा रहा था। वजह थी उनके प्रोडक्ट के लिए इस्तेमाल हो रही थर्माकोल पैकेजिंग, लेकिन जल्द ही उन्होंने इस परेशानी का भी समाधान निकाल लिया। पूजा बताती हैं, ‘हमने मशरूम कल्टीवेशन में इस्तेमाल हो रहे वेस्ट और किसानों के पास इकट्ठी हो रही पराली से पैकेजिंग का एक मॉडल तैयार किया।’

इस मॉडल का जिक्र कर वो कहती हैं, 'हमने फल, सब्जी को पैक करने के लिए यूज होने वाली थर्माकोल ट्रे और पैकेट को पराली और एग्रो वेस्ट से तैयार पैकेजिंग से रिप्लेस किया है। हमने मशीन तैयार की है, जिसमें मशरूम के माइसीलियम (फफूंद) को लेकर लैब में पैकिंग तैयार की है। खास बात ये है कि ये मार्केट में इस्तेमाल की जाने वाली पैकेजिंग से वजन में कई गुना हल्की है और इससे प्रकृति को भी कोई नुकसान नहीं होता। सिर्फ इतना ही नहीं, इन्हें यूज करने के बाद पेड़-पौधों और फलों में बतौर खाद भी इस्तेमाल किया जा सकता है।'

भारत के किसानों के लिए बनाया सस्ता मॉडल

बायोटेक्नोलॉजी से पीएचडी करने वाली पूजा किसानों की मदद करना चाहती थी। वो बताती हैं कि पहले हमारे पास हैंडमेड टेक्नोलॉजी थी, लेकिन अब हम मशीन की मदद से काम करते हैं। हम बायोटेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर माइक्रो ऑर्गेनिज्म पर काम कर रहे हैं। चाइना जैसे डेवलप देशों में किसान इस तकनीक का काफी समय से इस्तेमाल कर रहे हैं। वहां बेहतर तकनीक के साथ ही किसानों के पास अच्छा खासा-पैसा भी है।

लेकिन हमने भारत के किसानों के लिए सस्ता और कारगर मॉडल तैयार किया है। विदेश में यही काम करवाने के लिए कम से कम 1 करोड़ रुपए लगते हैं, वहीं अब भारत के किसान फंगस और माइक्रो ऑर्गेनिज्म की मदद से आसानी से कर पा रहे हैं। ये एक सस्टेनेबल और लो-कॉस्ट टेक्नोलॉजी है।

पूजा 300 से ज्यादा किसानों को अभी तक मशरूम की खेती की ट्रेनिंग दे चुकी है।

मशरूम से बनाए नूडल्स मसाले से लेकर अचार तक

पूजा बताती हैं कि भारत में अभी मशरूम इंडस्ट्री पूरी तरह ग्रो नहीं कर पाई है। कुछ लोग इसकी खेती करते भी हैं तो उन्हें इसकी प्रोसेसिंग के बारे में जानकारी नहीं होती। इसलिए हमने खेती के साथ- साथ इसके प्रोडक्ट भी बनाए हैं। हमने लेबोरेटरी से कॉमर्शियल मशरूम स्पान (बीज), डायरेक्ट मशरूम प्रोडक्ट में पाउडर, फ्रेश और ड्राई ऑइस्टर मशरूम और वैल्यू एडेड प्रोडक्ट में मसाले, अचार और सूप तैयार किए हैं।

घर से की लैब की शुरुआत

पूजा मुंबई की एक नामी कंपनी में बतौर रिसर्चर काम कर चुकी हैं। 15 सालों से इस इंडस्ट्री का हिस्सा रहीं पूजा बताती हैं- मैं हमेशा से मालन्यूट्रिशन से जुड़ा काम करना चाहती थी। मैंने नौकरी छोड़ी और मुंबई से इंदौर वापस घर लौट आई। जब घर वापस आई तो परिवार में फैमिली को आगे बढ़ाने की बात चलने लगी।

‘मैंने इस बारे में बहुत सोचा और अपनी बेटी इरा से पूछा कि उसे भाई चाहिए या बहन? इरा का इस पर जवाब था- बहन। मैंने अपने स्टार्टअप ‘बेटी’ के जरिए अपनी बेटी यानी इरा को बहन दी। मैंने घर के ग्राउंड फ्लोर को लैब में तब्दील किया और शुरुआत हुई ‘बेटी’ की।

पूजा अपनी रिसर्च को सिर्फ पेपर और लैब तक सीमित नहीं रखना चाहती थीं। वो अभी तक 300 से ज्यादा किसानों और कई रिसर्चर्स को ट्रेनिंग दे चुकी हैं।

मशरूम उगाने के बाद पूजा ने उससे नूडल्स पाउडर और कुछ और मसाले तैयार करने शुरू किए। जिसके चलते उनकी कमाई कई गुना बढ़ गई।
मशरूम उगाने के बाद पूजा ने उससे नूडल्स पाउडर और कुछ और मसाले तैयार करने शुरू किए। जिसके चलते उनकी कमाई कई गुना बढ़ गई।

नूडल्स मसाला का सब्सटीट्यूट किया तैयार

अपनी नई उपलब्धि के बारे में पूजा बताती हैं, ‘हमने मैगी मसाला जैसा देसी और हेल्दी वर्जन तैयार किया है। बच्चों को फास्ट-फूड की आदत होती है, लेकिन ये उनके स्वास्थ्य के लिए बहुत नुकसानदायक होती है। इसलिए हमने मशरूम और सहजन की पत्तियों से नूडल्स और पास्ता के लिए तैयार Sum-Mor नाम से मसाला तैयार किया है। हू-ब-हू नूडल्स मसाला का स्वाद देने वाले इस मसाले को मशरूम और मोरिंगा पाउडर से बनाया जाता है। दोनों ही सुपर फूड में आते हैं और सेहत के लिए काफी फायदेमंद होते हैं।

ये विटामिन ए, विटामिन डी और आयरन से भरपूर है। मशरूम अजीनोमोटो से भरपूर होता है, मैगी मसाला में भी इसी का इस्तेमाल किया जाता है। मशरूम इसका नेचुरल सप्लीमेंट है और इसे बच्चे खूब पसंद करते हैं।

पूजा की फर्म बेटी का मकसद था-कुपोषण और पराली से होने वाले प्रदूषण से निपटना। इसके लिए पहले तो उन्होंने मशरूम उगाने में पराली की मदद ली। फिर उसी पराली की मदद से पैकेजिंग करने वाली चीजें बनाईं। पैकेजिंग के लिए तैयार ये बॉउल पराली से बनाया गया है।
पूजा की फर्म बेटी का मकसद था-कुपोषण और पराली से होने वाले प्रदूषण से निपटना। इसके लिए पहले तो उन्होंने मशरूम उगाने में पराली की मदद ली। फिर उसी पराली की मदद से पैकेजिंग करने वाली चीजें बनाईं। पैकेजिंग के लिए तैयार ये बॉउल पराली से बनाया गया है।

कैसे तैयार करती हैं पैकेजिंग?

एग्रीकल्चर वेस्ट को हम सबसे पहले मशरूम कल्टीवेशन में यूज करते हैं। इसके बाद मायक्रोबियल ट्रीटमेंट किया जाता है। जिससे मटेरियल सॉफ्ट पड़ जाता है। इसके बाद प्रोसेसिंग शुरू होती है जिसमें पेस्ट को मोल्ड में डालकर आकार और टेक्सचर दिया जाता है। मोल्ड से निकाले गए पैकेट को सोलर और ओवन में सुखाया जाता है। जिससे इसमें किसी भी तरह का मॉइश्चर ना रहे। फिलहाल बेटी की टीम हाथों से ही इन इको-फ्रेंडली बैग को तैयार कर रही है।

पूजा इस मॉडल को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहती हैं। एक लाख रुपए की लागत से शुरू हुआ ये स्टार्टअप हर साल 10 लाख से ज्यादा का बिजनेस कर रहा है। उससे भी जरूरी, पूजा इसके जरिए एक स्वस्थ भविष्य की तरफ लोगों को जागरूक कर रही हैं।

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