अलविदा बीरा:उन्होंने कहा, ‘अब जो मैं बता रहा हूं वह छापने के लिए नहीं है…।’ उनकी वह शर्त उनके जाने के बाद भी कायम है…

नई दिल्लीएक वर्ष पहलेलेखक: मुकेश कौशिक

ये मेरी कहानी है बीरा के साथ की। सैन्य गलियारों में जनरल बिपिन रावत को लोग बीरा ही बोलते थे। बीरा, यानी बिपिन रावत। बस चार दिन पहले की बात है। नौसेना दिवस पर, यानी 4 दिसंबर को दिल्ली में नेवी चीफ के 12-राजाजी मार्ग स्थित घर पर रक्षा क्षेत्र के बड़े-बड़े अधिकारी जमा थे। ये सालाना समारोह था, तो चीफ आफ डिफेंस स्टाफ के नाते जनरल बिपिन रावत भी मौजूद थे। जाहिर है सेंटर आफ अट्रैक्शन उन्हें ही होना था, और वे थे भी। हम सब, यानी खबरिया बिरादरी उनके इर्द गिर्द इकट्‌ठा थी।

चीन के साथ तनातनी से लेकर तीनों सेना की थिएटर कमांड बनने और न्यूक्लियर कमांड अथॉरिटी में सैन्य सलाहकार जैसी जिम्मेदारी रखने वाले के पास खबरें तो होती ही हैं। और इसलिए हम उनसे बातें भी करते जा रहे थे।

मैंने उन्हें याद दिलाया कि पिछले वायु सेना दिवस, यानी 8 अक्टूबर को आपने दैनिक भास्कर को एक्सक्लूसिव इंटरव्यू देने का वादा किया था, लेकिन अब तक निभाया नहीं है… तो वे बेहद बेतकल्लुफी से बोले- ‘इसी महीने आपका इंटरव्यू पक्का।’

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ CDS बिपिन रावत। चार दिन पहले नेवी डे की तस्वीर है। यकीन करना मुश्किल है कि अब वे हमारे बीच नहीं हैं।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ CDS बिपिन रावत। चार दिन पहले नेवी डे की तस्वीर है। यकीन करना मुश्किल है कि अब वे हमारे बीच नहीं हैं।

मेरे से बात करते ही जनरल रावत अपने निजी सहायक की ओर मुड़े। यानी ब्रिगेडियर एलएस लिद्दर की ओर। ब्रिगेडियर लिद्दर से मैं पहले भी संपर्क में रहा हूं, लेकिन महज फोन से। आमने-सामने की यह मेरी पहली मुलाकात थी। दुर्भाग्य यही अंतिम साबित हुई। उन्होंने भरोसा दिलाया था कि वह जनरल रावत के साथ इंटरव्यू फिक्स कर देंगे, लेकिन अब वे भी नहीं हैं। इस हादसे ने उनकी भी जान ले ली।

इंटरव्यू की बात के बाद हम सीधे चीन के मुद‌्दे पर आ गए थे। मैंने जनरल रावत से पूछा- ‘सरहद पर क्या चल रहा है?’ इस पर अपने बिंदास अंदाज में जनरल रावत ने कहा- ‘आप जंग करा दो ना भाई।’ मैंने कहा- सर जंग तो सेना करती है, हम तो महज रिपोर्ट ही करते हैं। इस पर उन्होंने तपाक से जवाब दिया- ‘जंग तो आप ही कराते हो, हम तो सिर्फ जरिया होते हैं।’

इस बीच जनरल रावत के पास दूसरे पत्रकारों का घेरा बढ़ चला था। उसी हिसाब से सवाल भी बढ़ गए थे। मैंने पूछ लिया कि चीन के साथ यह सब कब तक चलता रहेगा? इस सवाल पर जनरल रावत संजीदा हो गए थे। बोले- ‘दुश्मन पहल कर सकता है, पर दुश्मनी खत्म करने का हक उसके पास नहीं होता।’ फिर उन्होंने कहा- ‘LAC पर डिसएंगेजमेंट होना इतना आसान भी नहीं है।’

इसके बाद उन्होंने कहा- ‘अब जो मैं बता रहा हूं वह छापने के लिए नहीं है…।’ और तब बहुत सारी बातें कहते चले गए, लेकिन उनकी वह शर्त उनके जाने के बाद खत्म कहां हुई है…। लिहाजा वह बात अब भी सिर्फ हमारे-उनके बीच रहेगी।

चाहे चीन हो या पाकिस्तान CDS रावत की स्ट्रैटेजी और प्लानिंग गजब की होती थी। उनसे चीन को लेकर जब भी सवाल करो हमेशा बिंदास अंदाज में जवाब देते थे।
चाहे चीन हो या पाकिस्तान CDS रावत की स्ट्रैटेजी और प्लानिंग गजब की होती थी। उनसे चीन को लेकर जब भी सवाल करो हमेशा बिंदास अंदाज में जवाब देते थे।

जनरल रावत ने जो बातें बताईं उससे साफ था कि स्ट्रैटेजी के मामले में वह चीन को कभी भी मात दे सकते हैं। कैलाश रेंज की तैनाती से उन्होंने यह साबित भी कर दिया था। चीन इससे मात खा चुका था। पाकिस्तान में उनसे नफरत करने वालों की कमी नहीं थी। मुझे पाकिस्तान के कई पत्रकार मिले जो बेहद हिकारत से उनका नाम जपते थे।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद संभालने के बाद उनके पास अनेक जिम्मेदारियां थीं। परमाणु कमांड अथाॅरिटी में पहली बार सैन्य सलाहकार को जगह मिली थी। तीनों सेनाओं की एयर, स्पेस, साइबर और मरीन कमांड की पहल उनका ब्रेन चाइल्ड था। वह सेना में कम्युनकेशन, ट्रेनिंग, लॉजिस्टिक्स, ट्रांसपोर्ट के बीच समन्वय कायम करने में जुटे थे। सेनाओं के लिए बजट बनाने के रोडमैप पर भी काम कर रहे थे। अब जो नए CDS होंगे उनके लिए इन चुनौतियों से निपटने की अपेक्षा रहेगी।

जनरल रावत सैन्य बिरादरी में बीरा कहलाते थे। यह बिपिन रावत का छोटा फार्म था। उनके जाने के बाद सैन्य प्रतिष्ठान का असली बीरा चला गया।

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