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खुद्दार कहानी:2 टिफिन से गरीबों की भूख मिटाने की पहल की, आज हर दिन 1 हजार लोगों को मुफ्त भोजन करा रहे हैं

एक वर्ष पहले

गुजरात के जामनगर के रहने वाले लवजी पटेल ने 35 साल पहले गरीबों की भूख मिटाने के लिए एक पहल की। वे अपने घर से ही टिफिन बनाकर गरीबों को खाने के लिए देते थे। उन्होंने महज 2 टिफिन से इसकी शुरुआत की थी। तब वे खुद भी अकेले थे और बजट भी कम था। कई बार उन्हें आर्थिक दिक्कतें भी आईं, लेकिन उन्होंने अपना काम जारी रखा। उनकी नेकी की पहल कामयाब भी हुई और अब हर दिन वे एक हजार से ज्यादा लोगों को मुफ्त भोजन करा रहे हैं। इसके लिए उन्होंने जामनगर में 'गंगामाता चैरिटेबल ट्रस्ट' की नींव भी रखी है।

ये महिलाएं भोजन बनाने का काम कर रही हैं। लवजी बताते हैं कि इस सेवा के काम में महिलाओं का भी भरपूर सपोर्ट है।
ये महिलाएं भोजन बनाने का काम कर रही हैं। लवजी बताते हैं कि इस सेवा के काम में महिलाओं का भी भरपूर सपोर्ट है।

लवजीभाई पटेल पहले हरिद्वार में रहते थे। वहां से जब वे जामनगर आए तो उन्होंने सड़कों पर कई लोगों को भूख से भटकते देखा। इसके बाद उन्होंने तय किया कि वे अब यहीं रहकर गरीबों की भूख मिटाने का काम करेंगे। शुरुआत में वह अपने घर से दिन में 2 टिफिन बनाते थे। फिर जीजी अस्पताल के बाहर खड़े होकर जरूरतमंदों को टिफिन देते थे। इसके बाद एक ट्रस्ट का गठन हुआ। जिसका नाम गंगामाता चैरिटेबल ट्रस्ट रखा गया।

घर-घर जाकर जरूरतमंदों को भोजन पहुंचाया जाता है

लवजी कहते हैं कि कई बार आर्थिक दिक्कतें आईं, लेकिन हमने कोशिश जारी रखी। काम बंद नहीं किया। पहले दो फिर चार, फिर दस इस तरह हम मदद का दायरा बढ़ाते गए। बाद में कई लोग भी मदद के लिए आगे आने लगे। इसके बाद कभी आर्थिक दिक्कत नहीं आई। फिलहाल जीजी अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले मरीजों के साथ ही उनके परिजनों को भी भोजन उपलब्ध कराया जाता है। इतना ही नहीं, लवजी कहते हैं कि हमारी टीम जरूरतमंद परिवारों को भी घर-घर जाकर टिफिन पहुंचाती है। भोजन के अलावा, ट्रस्ट अस्पताल में मरीजों को हम दवाएं भी मुहैया कराते हैं।

जो लोग ट्रस्ट के पास आकर खाना नहीं खा सकते हैं, उनके लिए घर पर ही टिफिन पहुंचाया जाता है।
जो लोग ट्रस्ट के पास आकर खाना नहीं खा सकते हैं, उनके लिए घर पर ही टिफिन पहुंचाया जाता है।

मरीजों के अलावा अनाथ, बेसहारा और बुजुर्गों को दोपहर में दाल-चावल, सब्जी, रोटी और शाम की सब्जी, खिचड़ी, सब्जी और रोटी उनके घर तक रोजाना पहुंचाई जाती है। टिफिन की समय पर डिलीवरी करने के लिए गुरु गोबिंद सिंह सरकारी अस्पताल के बगल में एक बड़ा ऑफिस खोला गया है। साथ ही ट्रस्ट के कार्यकर्ताओं को रोजाना 200 से अधिक टिफिन की डिलीवरी के लिए बैटरी से चलने वाले वाहन भी उपलब्ध कराए गए हैं। ताकि उन्हें टिफिन पहुंचाने में परेशानी नहीं हो।

हर महीने बांटे जाते हैं 200 से ज्यादा फूड किट

फिलहाल हर दिन एक हजार से ज्यादा लोगों का भोजन यहां बनता है। इसमें लवजी पटल की मदद के लिए कई लोग सपोर्ट करते हैं।
फिलहाल हर दिन एक हजार से ज्यादा लोगों का भोजन यहां बनता है। इसमें लवजी पटल की मदद के लिए कई लोग सपोर्ट करते हैं।

साथ ही संस्था 200 से ज्यादा जरूरतमंद परिवारों को फूड किट भी मुहैया करवाती है। एक किट में 15 से ज्यादा अनाजों होते हैं। मसलन, गेहूं, चावल, मूंग दाल, तुवर की दाल, चीनी, चाय, तेल, सभी तरह के मसाले लोगों को मुहैया कराती है। जब कोरोना काल में लॉकडाउन के चलते रोज कमाने-खाने वालों लोगों के सामने दो वक्त का खाना जुटाना भी भारी हो गया था, तब हर दिन 8 से 10 हजार लोगों को दोनों टाइम का भोजन परोसा गया। साथ ही अस्पताल में मरीजों की सेवा ट्रस्ट के जरिए की गई।

इलाके में लवजी के काम की पहचान है। दूर-दूर से लोग यहां भोजन के लिए आते हैं और लंबी लाइन लगती है।
इलाके में लवजी के काम की पहचान है। दूर-दूर से लोग यहां भोजन के लिए आते हैं और लंबी लाइन लगती है।

जिंदादिली की ये 2 स्टोरी भी जरूर पढ़िए

1. हैदराबाद के रहने वाले रामू दोसापाटी कोविड के टाइम से ही लोगों की मदद कर रहे हैं। उन्होंने ATM यानी एनी टाइम मील की शुरुआत की है। जहां लोगों को मुफ्त में राशन, दूध और दवाई मिलती है। अब तक वे 50 लाख रुपए से ज्यादा अमाउंट खर्च कर चुके हैं। इतना ही नहीं 900 से ज्यादा लोगों को उन्होंने आजीविका भी मुहैया कराई है। इसके लिए उन्होंने अपनी सेविंग्स खर्च कर दी, जो फंड जमा थे, उसे भी खर्च कर दिया। फ्लैट खरीदने के लिए जो पैसे रखे थे, उसे भी राशन और दवाई में लगा दिया। (पढ़िए पूरी खबर)

2. गुजरात के कच्छ जिले की रहने वाली राजीबेन वांकर प्लास्टिक वेस्ट से बैग, पर्स, चटाई सहित दो दर्जन से ज्यादा प्रोडक्ट बना रही हैं। वे ऑफलाइन और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए देशभर में इसकी मार्केटिंग करती हैं। देश के बाहर भी उनके प्रोडक्ट की डिमांड है। गरीबी और तंगहाली से ऊपर उठकर खुद के दम पर राजीबेन ने अपना कारोबार खड़ा किया है। इससे हर महीने वे एक लाख रुपए कमा रही हैं। इतना ही नहीं बड़ी संख्या में स्थानीय महिलाओं को उन्होंने रोजगार भी दिया है। (पढ़िए पूरी खबर)