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  • Kashmir's Little Horsewoman; Mother Is Not There And Father Is Ill, At The Age Of 8, The Responsibility Of The Family Is On The Shoulders

खुद्दार कहानी:जिस हाथ में पेंसिल होनी चाहिए, उसे पेट की भूख मिटाने के लिए थामनी पड़ती है घोड़े की लगाम

श्रीनगर7 महीने पहलेलेखक: रउफ डार और वैभव पलनीटकर

ये कुदरत की कैसी मार है। जिस हाथ में पेंसिल होनी चाहिए। उस नन्ही सी जान को अपने पेट की भूख मिटाने के लिए घोड़े की लगाम थामनी पड़ रही है। यह कहानी कश्मीर के पहलगाम की रहने वाली 8 साल की रूही की है, जिसकी मां की दो साल पहले मौत हो चुकी है। पिता बीमार रहते हैं। पिता के अलावा 4 साल के भाई को भी पालने की जिम्मेदारी रूही पर ही आ पड़ी है। घर में बर्तन, कपड़े धोने से लेकर पूरे परिवार का पेट भरने का जिम्मा यही बच्ची उठा रही है। इसलिए रूही की जिंदगी खुद्दार कहानी है।

अपने पिता और छोटे भाई के साथ रूही। अब रूही के कंधे पर ही परिवार की जिम्मेदारी है।
अपने पिता और छोटे भाई के साथ रूही। अब रूही के कंधे पर ही परिवार की जिम्मेदारी है।

रूही के पिता की दोनों किडनी खराब हो चुकी हैं और वे रोजी-रोटी कमाने की हालत में नहीं हैं। जब भास्कर उसके घर पहुंचा तो वहां का दृश्य परेशान करने वाला था। कड़ाके की सर्दी और बर्फबारी के बीच टीन की शेड का टूटा-फूटा घर। इसी घर के बाहर कड़कड़ाती ठंड में 8 साल की रूही कपड़े धो रही है। सुबह से खाना नहीं खाया है, लेकिन अपने घोड़े को तैयार करके अपने छोटे भाई और बीमार पिता के साथ 8 किमी. दूर टूरिस्ट स्पॉट पर जाने की जल्दबाजी है। उसे दिनभर अपने घोड़े पर टूरिस्ट लादकर साथ में कई किलोमीटर पैदल चलना है। उसे उम्मीद है कि शाम को 200-300 रुपए कमा कर वह घर लौटेगी।

जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर से 80 किमी दूर अनंतनाग जिले में मशहूर टूरिस्ट डेस्टिनेशन पहलगाम है। रूही अपने भाई और पिता के साथ पहलगाम से 8 किमी दूर फ्रिसलाना में रहती है। रूही ने सरकारी स्कूल में चौथी क्लास में दाखिला तो लिया है, लेकिन वो कभी-कभार ही स्कूल जा पाती है। सुबह उठने के साथ ही रूही की जिंदगी से जद्दोजहद शुरू हो जाती है। कपड़े-बर्तन धोने से लेकर अपने बीमार पिता की देखभाल और छोटे भाई का लालन-पालन सब कुछ रूही के ही जिम्मे है।

रूही अपने हम उम्र बच्चों के साथ खेलना चाहती है, लेकिन हालात ऐसे हैं कि उसे वक्त ही नहीं मिल पाता है।
रूही अपने हम उम्र बच्चों के साथ खेलना चाहती है, लेकिन हालात ऐसे हैं कि उसे वक्त ही नहीं मिल पाता है।

2 साल पहले ही चल बसी मां

रूही जब 6 साल की थी तब उसकी मां मुबीना बानो की तबीयत बिगड़ी। बीमारी के कुछ दिन बाद 21 जून 2020 को मां का निधन हो गया। एक तरफ रूही की गोद में 4 साल का नन्हा अयान था और दूसरी तरफ 41 साल के पिता मोहम्मद यूसुफ कई सालों से किडनी और गॉलब्लेडर में बीमारी से जूझ रहे थे। मोहम्मद की सेहत और भी ज्यादा खराब होती जा रही है। अयान अब फ्रिसलाना के सरकारी स्कूल में पहली क्लास में पढ़ता है। वो भी कभी-कभार ही स्कूल जाता है। दोनों बच्चे सुबह से शाम तक अपने पिता के साथ ही घोड़ा लेकर पहलगाम जाते हैं। पिता मोहम्मद जब थक जाते हैं तो रूही घोड़े की लगाम थामती है और दिन भर ये सिलसिला चलता रहता है। कोई टूरिस्ट खुश हो जाता है तो टिप वगैरह भी मिल जाती है।

पढ़ाई करने की चाह तो है, लेकिन हालात नहीं

रूही पढ़-लिखकर कुछ करना चाहती हैं, लेकिन घोड़े चलाने और घर का काम करने से उसे छुटकारा ही नहीं मिलता।
रूही पढ़-लिखकर कुछ करना चाहती हैं, लेकिन घोड़े चलाने और घर का काम करने से उसे छुटकारा ही नहीं मिलता।

रूही बताती है- ‘मुझे अपने बीमार पिता की मदद तो करनी ही है, साथ में पढ़ाई भी करनी है।’ हम जब रूही के घर पहुंचे तो उत्साह से उसने अपनी किताबें, नोटबुक निकाली और लिख-पढ़कर दिखाने लगीं, लेकिन थोड़ी ही देर में उसे ख्याल आया कि पहनने वाले कपड़े गंदे हो चुके हैं, तो वो झट से कपड़े धोने लगी। रूही बताती है कि उसका दिन पहलगाम की बेताब घाटी में घोड़ा घुमाते हुए बीत जाता है और शाम को आस-पड़ोस के लोग खाने की मदद भी कर देते हैं। बस ऐसे ही जिंदगी का गुजर-बसर हो रहा है।

खुद का घर तक नहीं, PM आवास योजना से आस

पिता मोहम्मद यूसुफ शेख मायूसी के साथ कहते हैं कि- ‘हम घोड़ेवाले हैं। अपने गुजर बसर के लिए अपने बच्चों को लेकर दिन भर घोड़ा चलाता हूं। दिन की 200-300 कमाई के अलावा हमारे पास और कोई कमाई नहीं है। हमारे पास खुद का घर तक नहीं है। टीन शेड के टूटे-फूटे से घर में रहना पड़ता है। हमने अपने सरपंच से मांग की है कि सरकारी सहायता से हमें घर बनाने में मदद की जाए।’

रूही का अपना घर भी नहीं है। वे टीन शेड में अपने पिता और भाई के साथ रहती है।
रूही का अपना घर भी नहीं है। वे टीन शेड में अपने पिता और भाई के साथ रहती है।

फ्रिसलाना गांव के पंच शेख तारिक ने कहा- ‘हमने मोहम्मद यूसुफ शेख के डॉक्यूमेंट प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए भेजे हैं। उनका आवेदन हमारी प्राथमिकता है, लेकिन अब तक बात आगे नहीं बढ़ पाई है।’

रूही के पड़ोसी बिलाल अहमद शेख बताते हैं कि- ‘मैं रोज देखता हूं कि रूही सी नन्ही जान अपने पिता और भाई के साथ रोजाना रोजी-रोटी कमाने जाती है। पिता की तबीयत खराब है वो सिर्फ एक वक्त का खाना ही पका पाता है। इसलिए बच्चे सुबह भूखे पेट ही पहलगाम कमाई करने पिता के साथ चल देते हैं। दिनभर थका देने वाली मेहनत के बाद ये लौटते हैं।’