संडे जज्बातलव मैरिज की तो पापा बोले मेरी नाक कटा दी:ससुराल में रोज 400 रोटियां बनाती थी, नर्स की नौकरी की; फिर बनी मेयर

5 महीने पहलेलेखक: किशोरी पेडनेकर

मैं किशोरी पेडनेकर, मुंबई के वर्ली नाका की रहने वाली हूं। पिता मिल कामगार थे। मां घर का कामकाज देखती थीं। छोटे से एक घर में 20 लोग रहते थे। दसवीं की पढ़ाई खत्म होते ही मैंने अपने क्लासमेट के साथ घर से भागकर शादी कर ली।

मां-बाप ने मुझसे 12 साल तक बात नहीं की। उनका कहना था कि मैंने उनकी इज्जत के साथ खिलवाड़ किया, उनकी नाक कटा दी, क्योंकि मैं मराठा और पति ओबीसी।

जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे। पहले लव मैरिज, उसके बाद नर्स की नौकरी की, फिर राजनीति में आई।

मुझे आज भी याद है, बचपन में जब शाम के चाय-नाश्ते में आसपास के लोग बिस्किट या नमकीन खाते थे। गली से गुजरते हुए आते-जाते मेरी नजर उन पर पड़ जाती, तो मुंह में पानी आ जाता था। मां हमें चाय के साथ खाने के लिए बासी रोटी दिया करती थी।

तब कुछ बच्चों के पास लाल और नीले रंग की लंबी छतरी हुआ करती थी और हम बारिश में प्लास्टिक शीट ओढ़कर स्कूल जाते थे। मैं हमेशा सोचती कि काश ऐसी छतरी हमारे पास भी होती। पिता बोलते थे कि किताबों को भी प्लास्टिक में लपेट लो। मुझे बहुत बुरा लगता था। इसी वजह से मैं स्कूल जाने से भी बचती थी।

मैं पढ़ने में बहुत अच्छी नहीं थी, लेकिन कभी फेल नहीं हुई। 10वीं में गई, तो एक लड़के को दिल दे बैठी। वो भी 10वीं में था और ओबीसी समुदाय से ताल्लुक रखता था। हालांकि तब मुझे उसकी जाति पता नहीं थी।

10वीं हो गई, तो हमने तय किया कि दोनों अब शादी कर लेते हैं। तब मुझे पता लगा कि लड़का ओबीसी है। मैं जानती थी कि घरवाले किसी भी सूरत में इस शादी के लिए नहीं मानेंगे। उस दौर में ओबीसी से शादी करना वैसा ही था, जैसे आज किसी हिंदू-मुसलमान की शादी का मुद्दा हो।

हमने तय किया कि हम घर से भागकर शादी करेंगे। बड़ी बहन से बताया कि मैं घर से भाग रही हूं और अपनी क्लास में पढ़ने वाले एक ओबीसी लड़के से शादी कर रही हूं। इस पर बहन ने मुझे बहुत डांटा और समझाया भी, लेकिन मैं नहीं मानी।

मैंने बहन से कहा कि जब प्यार किया था, तब उसकी जाति नहीं पूछी थी। मैं जानती हूं कि मेरा पति मुझे खुश रखेगा। मेरे लिए इतना ही काफी है। ऐसा बोलकर मैंने अपनी बहन को चुप करा दिया।

मैं घर से भाग गई और हम दोनों ने शादी कर ली। उस वक्त मेरी उम्र 17 साल थी। मेरी सास काफी पहले ही गुजर चुकीं थीं। पति और ननद को उनकी नानी ने ही पाला पोसा। तब ससुराल में डिब्बा वाले आते थे। रोज 25 डिब्बेवालों के लिए 300 से 400 रोटियां घर पर बनती थीं। बदले में वे हमें पैसा देते थे।

शादी के बाद रोटियां बनाने का जिम्मा मेरे हिस्से आया। हर दिन 400 चपाती बनाना बहुत मुश्किल था, लेकिन मुझे पता था कि रिश्ता निभाना है, तो सब कुछ दिल से अपनाना पड़ेगा। मैं किसी भी बात पर ना-नुकर नहीं कर सकती थी, क्योंकि शादी का फैसला मेरा था।

हालांकि मेरी नानी सास अच्छी थी। वह हमेशा बोलती थी कि दूसरे के घर की बेटी अपने यहां आई है, धीरे-धीरे सब सीख जाएगी। शादी के कुछ महीनों बाद ही मेरे पति की सरकारी नौकरी लग गई। उन्हें 6,000 रुपए मिलते थे। हमारे लिए यह बहुत बड़ी राहत की खबर थी, लेकिन यह पैसे इतने नहीं होते थे कि मैं अपने शौक पूरे कर सकूं।

जब दूसरी औरतों को सुंदर साड़ियों में देखती थी, तो मुझे भी वैसी साड़ी पहनने का मन करता था। मैं दादर में सड़क किनारे बैठने वालों से 100 रुपए में तीन साड़ियां खरीदती थी। इससे मेरा एक साल आराम से निकल जाता था। आज भी मैं 200 की साड़ी पहनती हूं और 10,000 की भी।

तब मेरे पास गोल्ड नहीं हुआ करता था, तो नकली गहनें पहनकर अपना शौक पूरा करती थी। एक दफा नकली गहने पहनने से शरीर में दाने और एलर्जी हो गई। दवा और इलाज में काफी पैसे लगे। उस दिन के बाद मैंने नकली गहने पहनना छोड़ दिया।

फिर मेरी बेटी हुई। उसकी देखभाल के साथ-साथ काम भी जारी रहा। जब वो ढाई साल की हुई, तो लगा कि मुझे भी कोई नौकरी करनी चाहिए। ताकि मैं उसकी जरूरतों को पूरा कर सकूं। इसके बाद मैंने नर्सिंग का कोर्स किया। इसके पीछे वजह यह थी कि इसकी फीस नहीं लगती थी और जल्द नौकरी का भी मौका था।

ढाई साल का कोर्स करने के बाद अलग-अलग प्राइवेट अस्पतालों में नर्सिंग की नौकरी की। फिर जेएनपीटी अस्पताल में काम करने लगी। मुझे याद है कि तब हमारा एक वॉर्ड बाॅय हुआ करता था चंदू।

एक दिन हम सब ने खाना खाया, चाय पी। चंदू की ड्यूटी ऑपरेशन थिएटर में हुआ करती थी। उस दिन उसने खुद को जहर का इंजेक्शन देकर ऑपरेशन थिएटर में ही आत्महत्या कर ली। मैं कई दिन तक सदमे से उबर नहीं पाई। हर दिन उसके साथ उठना-बैठना, खाना, चाय पीना रहता था। नर्स होने के नाते यह घटना मुझे आज भी डराती है।

उन दिनों मुंबई में मिल वर्करों और मिल प्रबंधन में ठनी हुई थी। मैं इससे वाकिफ थी, क्योंकि मेरे पिता मिल कामगार थे। मिलों के जरिए प्रदेश की राजनीति मेरे अंदर रची-बसी थी। बचपन से मैं बाला साहेब को सुनती आ रही थी। 12 साल की उम्र से ही मैं राजनीतिक रूप से सजग हो गई थी।

इसी बीच मेरी मुलाकात मंदाकिनी चौहान नाम की मिल नेता से हुई। वे मिल वर्करों की तरफ से लड़ रही थीं। मैं भी उनके साथ मिलों में जाने लगी, आंदोलनों में जाने लगी।

वो पांच फीट पांच इंच की मराठा महिला। रूई के फाहे से भी ज्यादा सफेद रंग था उनका, नव्वारी पहनती थीं। जब वो माइक पर बोलती थीं, तो मुंबई हिलती थी। उन्हें सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आते थे।

वह टेबल पर खड़े होकर भाषण दिया करती थी। मेरी ड्यूटी थी कि मैं उनका टेबल पकड़ कर खड़ी रहूं। मैं उन्हें भाषण देते हुए ताकती रहती थी। घर आकर वैसा ही बोलने की कोशिश करती थी।

साल 2002 में नौकरी छोड़ दी और शिवसेना में शामिल हो गई। हालांकि नौकरी छोड़ने की वजह से घर में पैसों की दिक्कत आने लगी। इसके बाद पति ने एक्स्ट्रा काम करना शुरू किया। जो भी खाली वक्त बचता, वे टैक्सी चलाने निकल जाते। इस तरह हमने जैसे-तैसे करके परिवार की आर्थिक स्थिति को संभाला।

मेरी हाइट काफी कम थी। लोग मुझे गुटकी-फुटकी बोलते थे, लेकिन राजनीति में आने के बाद तय किया कि मैं इतनी बड़ी लकीर खींचूंगी, जो मेरी हाइट पर भारी पड़ेगी।

2002 में मुझे नगर सेविका बनाया गया। इसके बाद कारवां बढ़ता ही गया। मैंने औरतों की समस्याएं सुननी और सुलझानी शुरू की। नब्बे के दशक का वो दौर ऐसा दौर था कि लोग शादी के बाद औरतों को सड़क पर छोड़ दिया करते थे। मेरे पास ऐसी बहुत सी औरतें आने लगीं।

अनुराधा नाम की एक तेलुगू लड़की थी। रोती-धोती मेरे पास आई। बगैर किसी मतलब के उसके पति ने उसे छोड़ दिया। मैंने उसके पति से बात की, तो उसने मुझसे कहा कि बस पसंद नहीं है। मैंने कहा कि यह कोई वजह नहीं होती है कि पसंद नहीं है, तो सड़क पर छोड़ दो।

एक दिन मैं उस लड़की से अपने ऑफिस में बात कर रही थी कि उसके पति ने मुझे पिटवाने के लिए दस गुंडे भेज दिए। मेरे ऑफिस में उस वक्त तीन और महिला कार्यकर्ता थीं। गुडों को लगा कि औरते हैं, डर जाएंगी, लेकिन हम तीन औरतों ने उन दस गुंडों की जो पिटाई की, उसे वे आज भी याद करते होंगे।

जिन औरतों ने राजनीति में किसी भी तरह के समझौते कर लिए, वह रास्ते में ही रह गईं, लेकिन मेरी जैसी औरतें जो जरा सा किसी को आउट ऑफ ट्रैक होता देख लेती हैं, तो बारूद बन जाती हैं। किसी और पर जुल्म होता नहीं देख सकती हूं।

एक दफा मैंने विपक्षी पार्टी के एक नेता की गाड़ी पर पटाखे जलाकर फेंक दिए। उसकी गाड़ी जल गई। ऐसे अनगिनत किस्सों से भरी है जिंदगी। बस एक ही ताकत रही मेरी कि मुझे कभी डर नहीं लगा।

राजनीति में कई मर्दों ने पीछे धकेलने की कोशिश की, अपमान भी किया, लेकिन मैंने कभी 2C का नियम नहीं छोड़ा। यानी न तो करप्शन की और न कैरेक्टर से समझौता किया। इन दो पंखों से औरतें लंबी उड़ान उड़ती हैं। मैं नगर सेविका से महापौर और अब तीन विधानसभा की उपनेता बनी हूं। शिवसेना में पहली महिला हूं, जो उपनेता बनी हूं।

कोविड का दौर मेरे लिए बहुत अच्छा नहीं था। अस्पतालों में नर्स और डॉक्टरों की कमी हो गई थी। ऐसे में मैंने अपनी जिम्मेदारी निभाने की ठानी और वापस से नर्स की ड्रेस पहन ली। अपने एरिया के सभी अस्पताल वालों को बोल दिया कि जहां जरूरत हो मुझे कॉल किया जाए।

मैं दिन में अपने वॉर्ड में काम करती थी और फिर नर्स की यूनिफॉर्म पर्स में रख लेती थी। जहां से भी मुझे कॉल आता था, बिना दिन-रात की परवाह किए काम के लिए निकल जाती थी। कई बार तो ऐसा हुआ कि तीन-तीन दिन सोई ही नहीं।

मेरे लिए सबसे खराब रहा कि मेरे भाई को कोविड हो गया। अच्छा-भला खुद चलकर अस्पताल गया। मैं उसी आईसीयू में थी, जहां वो एडमिट था, लेकिन मैंने हर दिन उसे मरते हुए देखा। मैं उसे नहीं बचा सकी।

किशोरी पेडनेकर ने भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से ये सारी बातें शेयर की हैं।

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