Sunday जज्बात:मैंने अमेरिका की नौकरी छोड़ दी, ताकि मेरे भाई की तरह सड़क हादसे में किसी और बच्चे की जान न जाए

7 महीने पहलेलेखक: पीयूष तिवारी

तारीख 5 अप्रैल 2007। तब मैं लॉस एंजेलिस की एक प्राइवेट इक्विटी फंड कंपनी में इंडिया का एमडी था। उस दिन मैं गुड़गांव (अब गुरुग्राम) स्थित अपने दफ्तर से अपने घर यानी नोएडा के लिए निकला था। गाड़ी खुद ही ड्राइव कर रहा था। जब धौला कुंआ पहुंचा तो रास्ते में पापा का फोन आया कि मेरे भाई (ममेरा भाई) का कानपुर में एक्सीडेंट हो गया है और वो काफी सीरियस है। मैंने पापा से कहा कि मैं घर पहुंच रहा हूं, फिर देखते हैं कि क्या करना है। हालांकि सीरियस शब्द सुनकर मैं डर गया था, फिर भी मन में लग रहा था कि सब ठीक हो जाएगा।

दस मिनट बाद पापा ने फिर से फोन किया। उन्होंने कहा कि अपनी मां से मत बताना, तुम्हारे भाई की मौत हो गई है। मैं सुन्न हो गया, मुझसे गाड़ी नहीं चल रही थी। 16 साल पहले रोड एक्सीडेंट में ही मेरे मामा की भी डेथ हो गई थी, उस वक्त मेरा ममेरा भाई महज 6 महीने का था। तब से मामी डिप्रेशन में रहती हैं। और अब पति के बाद उनका बेटा भी चला गया। इससे बड़ा सदमा उनके लिए और क्या हो सकता है। मेरे मन में यहीं सब ख्याल आ रहे थे।

मैंने गाड़ी धौला कुंआ में साइड में खड़ी कर दी और ऑटो करके घर गया। घर जाने के बाद हम कानपुर जाने की तैयारी करने लगे। हमें ट्रेन रिजर्वेशन नहीं मिला और ऐसे ही गेट के पास बैठकर दिल्ली से कानपुर के लिए रवाना हो गए। कानपुर पहुंचने पर सुबह उसका क्रिमनेशन हुआ। मुझे अभी भी यकीन नहीं हो रहा था ऐसा कैसे हो सकता है? क्रिमनेशन के बाद मैं उस जगह पहुंच गया जहां यह हादसा हुआ था। कानपुर बाइपास पर यह एक्सीडेंट हुआ था। हाईवे की तरफ एक बाइपास रोड था। वहां कुछ ठेले वाले थे, छोटे-मोटे खाने के स्टॉल लगे थे।

हमारे देश में ज्यादातर हादसों में मौत इसलिए होती है क्योंकि लोग कोट-कचहरी और थाने के डर से मौके पर मदद के लिए नहीं आते हैं।
हमारे देश में ज्यादातर हादसों में मौत इसलिए होती है क्योंकि लोग कोट-कचहरी और थाने के डर से मौके पर मदद के लिए नहीं आते हैं।

मैंने उन लोगों से पूछा कि क्या कल यहां कोई एक्सीडेंट हुआ था। ठेले वालों ने बताया कि कल एक टेंपो वाले ने एक बाइक वाले लड़के को टक्कर मार दी। लड़का गिर गया, उसे हल्की चोट आई थी। टेंपो वाला कुछ पल के लिए रुका भी, लेकिन जब लोग इकट्ठा होने लगे तो वह डर गया और भागने के चक्कर में उसने दोबारा लड़के के ऊपर टेंपो चढ़ा दी और भाग गया। इससे उसे सिर में गहरी चोटें आईं, लेकिन उसने हार नहीं मानी।

वह अपने आपको घसीट कर एक पेड़ के पास ले गया और पीठ टिका कर बैठ गया। लोगों से मदद मांगनी शुरू की। कई लोगों ने मदद भी की, उसके चेहरे पर पानी फेंका, उसे पानी पिलाया। वह बार-बार बेहोश हो रहा था, लेकिन उसे कोई भी अस्पताल नहीं लेकर गया, किसी ने पुलिस को नहीं बुलाया न ही एंबुलेंस बुलाई। करीब 45 मिनट तक वह जिंदगी और मौत लड़ता रहा। उसके बाद जब उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वह पहले ही दम तोड़ चुका था।

मेरे लिए वो ममेरा भाई नहीं बल्कि मेरे बच्चे जैसा था। मेरे यहां ही पला-बढ़ा था। मैं उसके लिए एक मेंटर था। वह IPS ऑफिसर बनना चाहता था। इतना कुछ होने के बाद भी मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि ऐसा हो गया है। मेरे अंदर कई सवाल उथल-पुथल मचा रहे थे। मेरे अंदर गुस्सा था कि हम उसे क्यों नहीं बचा सकें। अगर वह वक्त पर अस्पताल पहुंच जाता, एंबुलेंस आ पाती, पुलिस आ जाती तो आज वह हमारे बीच होता। कई-कई रातें मैं सो नहीं पाता। उधर मेरी मां, मामी, नानी का रो-रोकर बुरा हाल था। मामी के लिए तो दुनिया ही खत्म हो गई थी।

मुझे लगा कि अगर देश के फ्यूचर को बचाना है, मेरे भाई की तरह किसी और बच्चों की जान नहीं जाए, इसलिए कुछ करना होगा।
मुझे लगा कि अगर देश के फ्यूचर को बचाना है, मेरे भाई की तरह किसी और बच्चों की जान नहीं जाए, इसलिए कुछ करना होगा।

काफी वक्त बितने के बाद भी मैं उसी के बारे में सोचता रहता था और अपने काम में फोकस नहीं कर पा रहा था। मैंने अपने बॉस से कहा कि मुझे लंबी छुट्टी चाहिए, मैं पता लगाना चाहता हूं कि आखिर हादसों के वक्त लोगों को मदद क्यों नहीं मिलती, वक्त पर उन्हें अस्पताल क्यों नहीं ले जाया जाता। फिर मुझे हैदराबाद में इमरजेंसी मेडिकल केयर के लीडींग अथॉरिटी डॉ. महेश जोशी के बारे पता चला। मैं हैदराबाद जाकर उनसे मिला और मन में जो सवाल थे, वो उनसे पूछे।

डॉक्टर महेश जोशी ने मुझे समझाया कि आखिर ऐसा क्यों होता है। उन्होंने कहा कि एक्सीडेंट के बाद आसपास खड़े लोग सबसे पहले मदद करने वालों में से होते हैं, लेकिन भारत में लोग ऐसा नहीं करते हैं, लोग डरते हैं। डरते इसलिए हैं क्योंकि पुलिस केस बन जाता है और कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने पड़ जाते हैं। डॉ. जोशी ने मुझे साउथ और मुंबई के भी कुछ डॉक्टरों से भी कनेक्ट किया। इसके बाद मैं दिल्ली एम्स ट्रॉमा सेंटर के डॉक्टरों से भी मिला। ऐसे परिवारों से भी मिला जिन्होंने रोड एक्सीडेंट में इसी तरह से अपने परिजनों को खोया था।

इसके बाद मैं कई जगहों पर गया, एक्सपर्ट्स से मिला। फिर मैंने मन में ठान लिया कि कुछ ऐसा करूंगा जिससे कि लोगों को इस तरह अपनी जान नहीं गंवानी पड़े। उसी साल देश में एक लॉ कमीशन की रिपोर्ट आई थी जिसमें कहा गया था कि सड़क हादसों में 50 फीसदी लोगों की मौत उन्हें वक्त पर मदद नहीं मिलने से होती है। इसके बाद मैंने तय किया कि सेव लाइफ फाउंडेशन बनाएंगे जिसमें सड़क सुरक्षा पर काम करेंगे। फरवरी 2008 में मैंने इसका बाकायदा गठन भी कर दिया।

सेव लाइफ फाउंडेशन शुरू करने का ही हमारा मकसद था कि अब चाहे जो भी मुश्किलों का सामना करना पड़े, कदम पीछे नहीं खीचेंगे।
सेव लाइफ फाउंडेशन शुरू करने का ही हमारा मकसद था कि अब चाहे जो भी मुश्किलों का सामना करना पड़े, कदम पीछे नहीं खीचेंगे।

हालांकि यह काम इतना आसान नहीं था। मैं एक मिडिल क्लास फैमिली से ताल्लुक रखता था। परिवार में सबसे बड़ा था। ऐसे बैकग्राउंड से किसी मल्टीनेशनल कंपनी का एमडी बनना परिवार के लिए बड़ी बात थी। बहुत सारी उम्मीदें भी थीं। पापा एक प्राइवेट कंपनी में सेल्स मैनेजर थे, मां हाउसवाइफ थीं। हमारे पास पैसे सीमित थे। ऐसे में नौकरी छोड़ना आसान नहीं था। क्योंकि मैं यह भी जानता था कि कि मुझे इस काम को करने के लिए कोई पैसे नहीं देगा। इसलिए ढाई साल तक मैंने नौकरी करते हुए सेव लाइफ फाइंडेशन के लिए काम किया। जो कुछ भी पैसे लगे मैंने अपनी तरफ से खर्च किए।

इसके बाद मुझे अहसास हुआ कि अगर इस काम को मुकाम तक ले जाना है तो मुझे फुल टाइम काम करना पड़ेगा। तब मां ने मेरा साथ दिया। उन्होंने कहा कि तुम अपने दिल की मानोगे तो खुश रहोगे। अगर तुम्हें लगता है कि सेव लाइफ फाउंडेशन से तुम्हें खुशी मिलेगी तो तुम इसे करो, हमारी चिंता न करो। इस बात से मुझे इससे बहुत मजबूती मिली। फिर मैंने सेव लाइफ फाउंडेश फुल टाइम ज्वाइन कर लिया। पहले डेढ़ साल खुद के लिए कोई सैलरी नहीं ली। इस दौरान बहुत उतार चढ़ाव आए। निराशा भी हुई।

दिल्ली में एक पुलिस ऑफिसर के पास गया। उनसे कहा कि वे हमारे संस्थान के लिए पुलिस ट्रेनिंग करवाएं, लेकिन उन्होंने मुझे दुत्कार दिया और कहा कि यह काम पुलिस का नहीं है। मैंने उनसे यह भी कहा कि आपको इसमें कोई खर्च नहीं करना है बस आपको अपने ऑफिसर भेजने हैं। इससे मुझे काफी निराशा हुई। कभी-कभी तो ऐसा भी लगा कि काम भी छोड़ दूं।

हमने सड़क हादसों को लेकर सड़क से लेकर कोर्ट तक अपनी आवाज उठाई और हमें कामयाबी भी मिली।
हमने सड़क हादसों को लेकर सड़क से लेकर कोर्ट तक अपनी आवाज उठाई और हमें कामयाबी भी मिली।

एक बार मैंने सरिया वाले ट्रकों के खिलाफ एक पीआईएल लगाई। क्योंकि देश में हर साल करीब 9500 मौतें सरिया की वजह से होती हैं। हमारे पीआईएल के बाद इस पर पाबंदी लग गई। इसको लेकर ट्रक यूनियन वालों ने खूब हंगामा किया। उनका कहना था कि सरिया काट कर अगर ट्रक में रखेंगे तो कस्टमर से इतने पैसे नहीं मिलंगे। खैर इस लड़ाई में भी हमें कामयाबी मिली। अब ऐसे ट्रक कम ही दिखाई देते हैं।

एक दफा जब मैं मुंबई के एक परिवार से मिला जिसने अपनी दस साल को सड़क हादसे में खोया था। इसी तरह दिल्ली में एक रिटायर्ड एयरफोर्स ऑफिसर जो स्कूट्स से घर जा रहे थे, एक गाड़ी ने उन्हें टक्कर मार दी। उनका पांव अलग हो गया, कोई मदद नहीं मिली और सड़क पर उन्होंने दम तोड़ दिया। फिर दिल्ली में निर्भया का केस सामने आया। काफी देर तक मदद न मिलने के चलते उसकी भी जान चली गई। ऐसी घटनाओं ने मुझे झकझोर कर रख दिया। जब कभी मैं काम छोड़ने का इरादा करता तब-तब ऐसी घटनाएं मुझे याद दिलाती कि पीछे नहीं हटना है।

हमने 2012 में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की। चार साल बाद 30 मार्च 2016 को सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट आया कि देश भर में सभी अदालतें इस कानून का पालन करें कि जो भी इंसान आगे बढ़कर घायलों की मदद करता है उससे किसी भी प्रकार की पूछताछ, अस्पताल में रोके रखना और कोर्ट कचहरी के चक्कर नहीं लगाने होंगे। यह हमारी सबसे पहली, सबसे बड़ी कानूनी जीत थी। इसके बाद 2019 में इसको लेकर सरकार को कानून भी बनाना पड़ा।

शुरुआत में पुलिस हमारी मदद नहीं कर रही थी, लेकिन अब हम साथ मिलकर काम कर रहे हैं।
शुरुआत में पुलिस हमारी मदद नहीं कर रही थी, लेकिन अब हम साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

इसके बाद हमने खराब सड़कों पर फोकस किया। जहां हमें खराब सड़कें मिलती हैं, उसे हम एडॉप्ट करके कॉरिडोर बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं। जहां पुलिसिंग, हेल्थकेयर और ट्रॉमा सेंटर जैसी सुविधाएं सुनिश्चित कर रहे हैं। ताकि एक्सीडेंट को कंट्रोल किया जा सके। हमने खुद सबसे पहले मुंबई-पुणे एक्सप्रेस हाईवे को एडॉप्ट किया। हमारे प्रोजेक्ट के बाद वहां एक्सीडेंट से होने वाली 52 फीसदी मौतें कम हुई हैं। फिर नेशनल हाईवे-48 में अडॉप्ट किया जहां 54 फीसदी मौतों में कमी आई।

इसी तरह दिल्ली में भलस्वा नाम के स्ट्रेच में 100 फीसदी मौतों को कम कर दिया है। अब इस मॉडल को भारत सरकार ने अडॉप्ट कर लिया है। सरकार ने हमारे साथ एक एमओयू साइन किया है। इसमें 15 राज्य सिलेक्ट किए गए हैं। जहां हम भारत सरकार के साथ मिलकर देश के सबसे खतरनाक हाईवे अडॉप्ट कर रहे हैं। हम देश की सबसे खतरनाक सड़कों को सबसे सेफ सड़कें बनाना चाहते हैं। यही हमारा फ्यूचर प्लान है।

हमारे देश में ट्रक ड्राइवर 35 फीसदी एक्सीडेंट के लिए जिम्मेदार हैं। उनकी सेफ्टी संबंधी विशेष ड्राइविंग की ट्रेनिंग जारी है। हम लोग रोड इंजीनियरिंग पर काम कर रहे हैं। राइट टू इमरजेंसी मेडिकल केयर पर काम कर रहे हैं। चाहे इंश्योरेंस हो या न हो। मैं यह सब इसलिए कर रहा हूं कि जैसे मेरे घर का बच्चा गया ऐसे कभी किसी और के घर का बच्चा नहीं जाना चाहिए।

पीयूष तिवारी सेव लाइफ फाउंडेशन के फाउंडर हैं। वे देशभर में सड़क हादसों को रोकने को लेकर काम कर रहे हैं। उनकी पहल और कई सालों के संघर्ष के बाद ही सरकार ने सड़क हादसों को लेकर 2019 में कानून बनाया। उन्होंने ये सारी बातें भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से शेयर कीं...

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