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भास्कर एक्सक्लूसिवअंग्रेजों ने लिखा- डॉग्स एंड इंडियंस नॉट अलाउड:उस यूरोपियन क्लब को 21 साल की प्रीतिलता ने जला डाला; जहर खा लिया, पकड़ी नहीं गईं

एक महीने पहलेलेखक: बांग्लादेश के चटगांव से सूमी खान

पहले बंगाल में एक जगह थी चटगांव, अब बांग्लादेश में है। तब देश में अंग्रेजों का राज था और वहां एक यूरोपियन क्लब था, इसके बाहर लिखा था- ‘डॉग्स एंड इंडियंस नॉट अलाउड’, यानी कुत्तों और भारतीयों की एंट्री नहीं है।

क्रांतिकारियों को ये बात नागवार गुजरी। मास्टर दा ने उस यूरोपियन क्लब को जला के खाक कर दिया। उससे पहले मास्टर दा और प्रीतिलता अंग्रेजों के नाक में दम करके असम-बंगाल ट्रेजरी ऑफिस को लूट चुके थे। इसे आर्मरी रेड कहा जाता है।

इसलिए हम आजाद हैं कि 12वीं कड़ी में पढ़िए मास्टर दा और प्रीतिलता के शौर्य और शहादत की कहानी...

मैं जब इस ऐतिहासिक क्लब पहुंची, तो यहां सब सुनसान नजर आया। प्रीतिलता वड्डेदार की एक मूर्ति क्लब के बाहर लगी है। मूर्ति के साथ ही उनके अंग्रेजों से भिड़ने वाले किस्से को भी पत्थर पर उकेरा गया है।

यूरोपियन क्लब के बाहर प्रीतिलता वड्डेदार की मूर्ति लगी है। यह मूर्ति ब्रॉन्ज से बनी है और अक्टूबर 2012 में इसे इंस्टॉल किया गया था।
यूरोपियन क्लब के बाहर प्रीतिलता वड्डेदार की मूर्ति लगी है। यह मूर्ति ब्रॉन्ज से बनी है और अक्टूबर 2012 में इसे इंस्टॉल किया गया था।

ये वही 21 साल की लड़की है, जिसने 23 सितंबर 1932 की रात अपने साथियों के साथ मिलकर चटगांव के इस क्लब पर हमला बोला और इसे आग के हवाले कर दिया। जब उसे लगा कि वे अंग्रेजों की गिरफ्त में आ जाएगी, तो उन्होंने साइनाइड निगलकर जान दे दी।

अब रेलवे का दफ्तर बन गया है ये क्लब

ये ऐतिहासिक यूरोपियन क्लब अब रेलवे के डिवीजनल ऑफिसर का दफ्तर है। इसके रेनोवेशन की भी प्लानिंग चल रही है। हालांकि लोकल लोग इसका विरोध कर रहे हैं। लोगों को लगता है कि इससे क्लब की आइडेंटिटी ही खत्म हो जाएगी।

आजकल नई पीढ़ी के लोग इस क्लब को देखने आते हैं। यहां फोटो-वीडियो खिंचवाते हैं और अपने बच्चों को प्रीतिलता की बहादुरी के किस्से सुनाते हैं। हालांकि क्लब के नजदीक ही दुकान लगाने वाले जहांगीर आलम को प्रीतिलता के बारे में कुछ खास नहीं पता।

ये चटगांव का यूरोपियन क्लब है, जिसे 1932 में मास्टर दा और प्रीतिलता ने जला के खाक कर दिया था। अब यह रेलवे के डिवीजनल ऑफिसर का दफ्तर है।
ये चटगांव का यूरोपियन क्लब है, जिसे 1932 में मास्टर दा और प्रीतिलता ने जला के खाक कर दिया था। अब यह रेलवे के डिवीजनल ऑफिसर का दफ्तर है।

आगे हम यूरोपियन क्लब को जलाने की कहानी पढ़ेंगे, लेकिन उससे पहले मास्टर दा और चटगांव आर्मरी रेड के बारे में जान लेते हैं...

मास्टर दा गणित पढ़ाते थे, आंदोलन से जुड़े तो नौकरी छोड़ दी

पेशे से शिक्षक रहे सूर्य सेन को ज्यादातर लोग मास्टर दा कहकर पुकारते थे। 1930 की चटगांव आर्मरी रेड के नायक मास्टर सूर्य सेन ने अंग्रेज सरकार को सीधी चुनौती दी थी। बिपिन चंद्रा की किताब इंडियाज स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस के मुताबिक उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर 1930 में इंडियन रिपब्लिकन आर्मी (IRA) गठित की थी।

पढ़ाई पूरी करने के बाद मास्टर दा 1918 में चटगांव के नंदन कानन इलाके के एक स्कूल में गणित पढ़ा रहे थे। यहीं उन्हें मास्टर दा नाम मिला। क्रांतिकारी गतिविधियों में शामिल रहने के लिए उन्होंने ये नौकरी भी छोड़ दी। मास्टर दा जब ग्रेजुएशन कर रहे थे, तभी से इलाके के सबसे बड़े क्रांतिकारी संगठन युगांतर समूह के मेंबर बन गए थे।

स्कूल में पढ़ाने के दौरान ही उन्होंने इलाके के युवाओं को संगठित किया। इन लोगों ने अंग्रेजों से गोरिल्ला युद्ध लड़ना तय किया और 23 दिसंबर 1923 को असम-बंगाल ट्रेजरी ऑफिस को लूटकर अंग्रेजों को खुली चुनौती दी। इसके बाद अंग्रेजों ने सूर्य सेन की तलाश शुरू कर दी, लेकिन वे चकमा देते रहे।

सूर्य सेन के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने असम-बंगाल ट्रेजरी ऑफिस को लूटकर अंग्रेजी हुकूमत के खात्मे का ऐलान किया। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती
सूर्य सेन के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने असम-बंगाल ट्रेजरी ऑफिस को लूटकर अंग्रेजी हुकूमत के खात्मे का ऐलान किया। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती

18 अप्रैल 1930 को सूर्य सेन के नेतृत्व में दर्जनों क्रांतिकारियों ने चटगांव के शस्त्रागार को लूटकर अंग्रेज शासन के खात्मे की घोषणा कर दी। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर चटगांव को अंग्रेजी हुकूमत के शासन के दायरे से बाहर कर लिया और भारतीय झंडा फहरा दिया था। उन्होंने न सिर्फ इलाके में ब्रिटिश हुकूमत की संचार सुविधा ठप कर दी, बल्कि रेलवे, डाक और टेलीग्राफ जैसे संचार के साधनों पर भी कब्जा कर लिया।

हालांकि उन्हें बंदूकें तो मिलीं, लेकिन गोलियां नहीं मिल सकीं।1930 से 1932 के बीच 22 अंग्रेज अधिकारी और उनके लगभग 220 सहायकों की हत्याएं की गईं, इन सभी के लिए IRA को जिम्मेदार माना जाता है।

चलिए अब यूरोपियन क्लब को खाक करने की कहानी जानते हैं

प्रीतिलता का जन्म पूर्वी बंगाल के चटगांव (अब बंग्लादेश) में 5 मई 1911 को हुआ था। वे 6 भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थीं।
प्रीतिलता का जन्म पूर्वी बंगाल के चटगांव (अब बंग्लादेश) में 5 मई 1911 को हुआ था। वे 6 भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थीं।

प्रीतिलता बड़ी मुश्किल से क्रांतिकारी सूर्य सेन की इंडियन रिपब्लिक आर्मी में शामिल हुईं थीं। सूर्य सेन अंडर ग्राउंड रहते थे, इसलिए किसी का भी उनसे मिलना मुश्किल होता था। काफी कोशिशों के बाद प्रीतिलता 13 जून 1932 को सूर्य सेन और निर्मल सेन से उनके ढालघाट कैंप में मिली थीं।

90 साल के प्राइवेट ट्यूटर बिनोद बिहारी चौधरी ने बताया कि सूर्य सेन लिंगभेद में यकीन नहीं करते थे। इसलिए उन्होंने प्रीतिलता को अपने ग्रुप में एंट्री दे दी थी। वे पंजाबी पुरुष की वेशभूषा में तैयार होकर गईं थी।

मास्टर दा यूरोपियन क्लब पर तीन से चार बार हमले की कोशिश कर चुके थे, लेकिन हर बार नाकाम हुए। इसके बाद प्रीतिलता ने मास्टर दा से कहा कि ‘हमले का नेतृत्व मुझे करने दीजिए।’ कई दिनों तक सोचने के बाद प्रीतिलता को मिशन की कमान सौंप दी गई।

वे ग्रुप के लिए काफी अहम थीं, क्योंकि लड़की होने के चलते प्रीतिलता पर अंग्रेज ज्यादा शक नहीं करते थे। हथियार लाने और ले जाने की जिम्मेदारी भी प्रीतिलता ने अपने कंधों पर ले रखी थी। IRA की इस जंग में दो लड़कियों-प्रीतिलता वड्डेदार और कल्पना दत्त ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जब प्रीतिलता वड्डेदार और मास्टर दा उर्फ सूर्य सेन की मुलाकात हुई। प्रीतिलता बहुत दिनों से उनसे मिलना चाहती थीं। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती
जब प्रीतिलता वड्डेदार और मास्टर दा उर्फ सूर्य सेन की मुलाकात हुई। प्रीतिलता बहुत दिनों से उनसे मिलना चाहती थीं। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती

24 सितंबर 1932 का दिन यूरोपियन क्लब पर हमले के लिए मुकर्रर हुआ। इसके लिए 15 क्रांतिकारियों की टीम तैयार की गई, जिसका नेतृत्व प्रीतिलता के कंधों पर था। हमले के पहले सूर्य सेन ने सभी क्रांतिकारियों को पोटेशियम साइनाइड दिया और कहा कि ‘अगर पकड़े जाओ तो यह निगलकर जान दे देना, लेकिन अंग्रेजों की गिरफ्त में मत आना।’

जब तक अंग्रेज उन्हें पकड़ते प्रीतिलता साइनाइड निगल चुकी थीं

हमले वाले दिन प्रीतिलता ने एक पंजाबी पुरुष का गेटअप बनाया। उनके सहयोगी कालीशंकर डे, बिरेश्वर रॉय, प्रफुल्ल दास, शांति चक्रवर्ती ने धोती-शर्ट पहनी, जबकि महेंद्र चौधरी, सुशील डे और पन्ना सेन ने लुंगी-टीशर्ट पहनी थी। सभी 15 क्रांतिकारी रात 11.45 बजे यूरोपियन क्लब पहुंच चुके थे। उस वक्त क्लब में 40 अंग्रेज थे, जो नाच-गाने में मशगूल थे।

क्रांतिकारियों ने खुद को अलग-अलग तीन समूहों में बांट लिया और गोलियां चलाने के पहले क्लब को आग के हवाले कर दिया। प्रीतिलता ने क्लब की खिड़की में बाहर से बम लगाया था। इस हमले में 15 अंग्रेज घायल हो गए, एक की मौत हुई थी।

प्रीतिलता के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने यूरोपियन क्लब को आग के हवाले कर दिया। ये अंग्रेजी हुकूमत को सीधा-सीधा चैलेंज था। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती
प्रीतिलता के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने यूरोपियन क्लब को आग के हवाले कर दिया। ये अंग्रेजी हुकूमत को सीधा-सीधा चैलेंज था। इलस्ट्रेशन : गौतम चक्रबर्ती

हमला होते ही ब्रिटिश सेना के जवानों ने भी जवाबी फायरिंग शुरू कर दी। इसमें प्रीतिलता को एक गोली लगी। जब तक अंग्रेज उन्हें पकड़ते वो साइनाइड निगल चुकी थीं।

पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, इस हमले में एक महिला की मौत हुई थी। 4 पुरुष और 7 महिलाएं घायल हो गई थीं। प्रीतिलता के शव से अगले दिन उनकी पहचान उजागर हुई। उनके पास कुछ कागज भी मिले थे, जिसमें हमले का प्लान और साथियों के नाम थे।

उनकी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि गोली लगने से उन्हें कोई खास चोट नहीं आई थी, लेकिन साइनाइड निगलने से उनकी मौत हुई।

प्रीतिलता के परिवार का क्या हुआ

यूरोपियन क्लब के बाहर एक पट्टी पर प्रीतिलता की तस्वीर और उनके साहस के बारे में कुछ पंक्तियां उकेरी गई हैं। ये पंक्तियां बांग्ला में हैं।
यूरोपियन क्लब के बाहर एक पट्टी पर प्रीतिलता की तस्वीर और उनके साहस के बारे में कुछ पंक्तियां उकेरी गई हैं। ये पंक्तियां बांग्ला में हैं।

प्रीतिलता की कोई संतान नहीं है। एडवोकेट राणा दासगुप्ता प्रीतिलता के भतीजे हैं। वे बांग्लादेश में प्रीतिलता के परिवार की आखिरी जनरेशन हैं। वे बताते हैं- वड्डेदार एक उपाधि थी, जो प्रीतिलता को अपने पूर्वजों से मिली। ओरिजिनली उनका सरनेम दासगुप्ता था। उनके पिता जगबंधु चटगांव म्यूनिसपैलिटी में क्लर्क थे और मां होममेकर थीं। वे 6 भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थीं। घर में सब प्यार से उन्हें रानी कहते थे।

प्रीतिलता ने स्कूल एजुकेशन ढाका से पूरी की थी। उनकी क्लासमेट कल्पना दत्ता ने बायोग्राफी में लिखा है कि ‘स्कूल के दिनों में हमें अपने फ्यूचर के बारे में कोई आइडिया नहीं था। आर्ट्स और लिटरेचर उनके फेवरेट सब्जेक्ट थे।’

हायर एजुकेशन कोलकाता के बेथ्रून कॉलेज से पूरा किया। सब्जेक्ट था फिलॉसफी। पढ़ाई पूरी होने के बाद वे स्कूल टीचर बन गईं। हालांकि, वे कॉलेज में पढ़ने के दौरान ही क्रांतिकारी समूह को जॉइन करने का फैसला कर चुकी थीं। वे सूर्य सेन से बहुत प्रभावित थीं और किसी भी हाल में उनका ग्रुप जॉइन करना चाहती थीं। कुछ समय के लिए उन्होंने एक इंग्लिश मीडियम सेकेंडरी स्कूल में हेडमिस्ट्रेस की जॉब भी की।

प्रीतिलता ने सूर्य सेन के साथ मिलकर कई हमलों में हिस्सा लिया। जैसे टेलीफोन और टेलीग्राफ ऑफिस में अटैक। रिजर्व पुलिस लाइन को कैप्चर किया। जलालाबाद बैटल में उन्हें क्रांतिकारियों को एक्सप्लोसिव सप्लाई करने की जिम्मेदारी मिली थी।

मास्टर दा धोखे से पकड़े गए, अंग्रेजों ने तड़पा-तड़पा कर मारा

ये तस्वीर मास्टर दा यानी सूर्य सेन की है। इनका जन्म 22 मार्च 1894 को चटगांव में हुआ था। ये पेशे से गणित के टीचर रह चुके थे।
ये तस्वीर मास्टर दा यानी सूर्य सेन की है। इनका जन्म 22 मार्च 1894 को चटगांव में हुआ था। ये पेशे से गणित के टीचर रह चुके थे।

चटगांव शस्त्रागार पर कब्जे और यूरोपियन क्लब पर हमले के बाद अंग्रेज काफी बौखला गए थे। उन्होंने सूर्य सेन और उनके 6 साथियों को पकड़वाने वाले को 10,000 रुपए का इनाम देने का ऐलान कर दिया। मास्टर दा के साथी रहे नेत्र सेन ने ही गद्दारी कर दी और अंग्रेजों को उनका पता बता दिया।

ब्रिटिश पुलिस ने 16 फरवरी 1933 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। अंग्रेजों ने उन पर कई अत्याचार किए, उनके जबड़े को तोड़ दिया। हाथों के नाखून खींच लिए।

12 जनवरी, 1934 को चटगांव सेंट्रल जेल में सूर्य सेन को साथी तारकेश्वर के साथ फांसी की सजा दी गई। क्रूरता और अपमान का चरम ये था कि उन्हें बेहोशी की हालत में फांसी दी गई और उनकी मृत देह को लोहे बक्से में बंद करके बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया गया। आजादी के बाद चटगांव सेंट्रल जेल के उस फांसी के तख्त को बांग्लादेश सरकार ने मास्टर सूर्य सेन स्मारक घोषित किया था।

फांसी पर चढ़ने से ठीक एक दिन पहले अपने मित्र को लिखे खत में भी उन्होंने आजादी के आंदोलन को और तेज करने की अपील की थी। उन्होंने लिखा था कि वह अपने पीछे आजादी का सपना छोड़े जा रहे हैं।

रिफरेंस

  • बिपिन चंद्रा की किताब इंडियाज स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस
  • एडवोकेट राणा दासगुप्ता

एडिटर्स बोर्ड: निशांत कुमार, अंकित फ्रांसिस और इंद्रभूषण मिश्र

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