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किसी तालिबानी का पहला इंटरव्यू:अमेरिकी ड्रोन हमलों के बीच मेरा बचपन बीता, हमेशा अफगानिस्तान के लिए लड़ना चाहता था; पर जंग के दौरान तो बीवी की ही याद आती है...

5 दिन पहलेलेखक: पूनम कौशल

ये है उकाब अल हनफी। अफगानिस्तान का तालिबानी लड़ाका। उमर 28 साल और इनमें से करीब 10 साल तालिबान के साथ बिता लिए। उकाब से हमने लंबी बात की। कई दफा वॉट्सऐप कॉल किए। दुभाषिए के जरिए फिर उसे समझा और लिखा।

हम बस ये समझना चाह रहे थे कि तालिबानी लड़ाकों की जिंदगी कैसी होती है? रोज वो क्या करते हैं? जाती जिंदगी में उनकी मुश्किलें क्या हैं? खुशियां कहां से बंटोरते हैं? किसे अच्छा कहते हैं और किसे बुरा? ऐसे ही कई और सवाल...। आखिर इंसान ही तो हैं।

उकाब से इन्हीं सब विचारों पर खुल के बातें हुईं। तालिबान ने भी अपनी सोशल मीडिया टीम बनाई है। उकाब उसका हिस्सा है। और हां… किसी तालिबानी से बात करने का ये पहला मौका है। छाेड़ते हैं इन बातों काे, सीधे सवाल-जवाब पर आते हैं। यह किसी तालिबानी लड़ाके का हिंदी मीडिया को दिया पहला इंटरव्यू भी है...

सवाल: सबसे पहले तो मैं आपके बारे में जानना चाहूंगी, आप कहां से हैं, क्या करते हैं?
जवाब :
मेरा नाम उकाब अल हनफी है। मैं 28 साल का हूं और दस साल से तालिबान से जुड़ा हूं। मैं परवान प्रांत से हूं और मेरे गांव का नाम मंडी है जो बगराम हवाई अड्डे से कुछ किलोमीटर दूर ही है। सुरक्षा कारणों से मेरा बचपन अलग-अलग जगहों पर गांव से दूर ही बीता। मेरी शादी हो चुकी है। मेरी दो बेटियां हैं और एक बेटा है। मैं 19 साल का था जब मेरी शादी हो गई थी। मैं अपने बच्चों का पेट भरने के लिए बहुत मेहनत करता हूं।

मुझे अच्छा लगता है कि मैं अपने परिवार का पेट भर पा रहा हूं और कुछ जरूरतमंद लोगों की मदद कर पा रहा हूं। मैं अपने परिवार को पालने के साथ-साथ तालिबान की सेवा भी कर रहा हूं।

अभी मैं काबुल में हूं। मैं चाहता हूं कि फिर से मैं अपने गांव जाऊं। मैं दस सालों से तालिबान के साथ हूं और अलग-अलग इलाकों में लड़ता रहा हूं। सुरक्षा कारणों से हम अपने ठिकाने बदलते रहते थे और छुपकर रहते थे। मैंने अपने गांव के कुछ रिश्तेदारों को लंबे समय से नहीं देखा है। उम्मीद है कि जल्द ही अपने गांव जा पाऊंगा। मैं दुनिया से अपने बारे में बात करके खुश हूं।

बीते बीस सालों से तालिबान और इस्लामी अमीरात अपना संदेश देने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन दुनिया में किसी ने उनसे बात नहीं की। ये हमारे लिए अच्छी खबर है कि अब दुनिया हमारी बात सुन रही है, हमारा संदेश दुनिया तक पहुंच रहा है।

काबुल एयरपोर्ट के एक गेट पर अन्य तालिबानियों के साथ तैनात उकाब अल-हनफी (सबसे दाएं)।
काबुल एयरपोर्ट के एक गेट पर अन्य तालिबानियों के साथ तैनात उकाब अल-हनफी (सबसे दाएं)।

सवाल : आपका बचपन कैसा रहा है, अफगानिस्तान में अपने बचपन की आपकी क्या यादें हैं?
जवाब :
मेरा पूरा बचपन और किशोरावस्था ड्रोन और लड़ाकू विमानों की बमबारी देखते बीता है। मैं कभी अपना बचपन जी ही नहीं पाया। मेरे पिता एक तालिबान कमांडर थे। जब अमेरिका ने हमला किया तब मैं बहुत छोटा था। मेरे पिता को हथियार छुपाने पड़े थे और पहाड़ों में जाकर छुपना पड़ा था। वो पहाड़ पर उसी गुफा में रहने चले गए थे जिसमें वो रूस के हमले के दौरान रहते थे। वो दिन में घर आते थे और रात को चले जाते थे। मुझे याद है एक दिन जब वो घर आए तो हमारे घर के ऊपर ड्रोन मंडरा रहा था।

बचपन से मेरा एक ही सपना था- मुजाहिद बनना और अपने लोगों के लिए लड़ना। मेरा देश लंबी गुलामी में था, मैं उसकी आजादी के अलावा कुछ और सोच ही नहीं पाता था। बचपन में मेरे पिता मुझे कुरान पढ़ना सिखाते थे। जब मैं कुछ आयत पढ़ देता तो वो बहुत ख़ुश होते थे।

मैं जवानी की दहलीज पर पहुंचते ही तालिबान के साथ जुड़ गया। दस साल तक अलग-अलग हिस्सों में लड़ता रहा। इतने लंबे संघर्ष के बाद मैंने अपने देश को आजाद देखा है। अब जब अमेरिका यहां से भाग गया है तो मेरे सभी सपने पूरे हो गए हैं। मेरी पीढ़ी ने बहुत कुछ देखा है, लेकिन अब जब मैं अपने देश को आजाद और अपने लोगों को सुरक्षित देख रहा हूं तो मैं सारे दर्द भूल गया हूं।

सवाल : तालिबान में आपकी भूमिका क्या है, क्या लड़ाके हैं, कमांडर हैं या फिर किसी खास यूनिट का हिस्सा हैं?
जवाब :
तालिबान में रैंक या पद मायने नहीं रखता है। सबसे ज्यादा मायने ये रखता है कि हम अपना काम कितना सही और लगन से कर रहे हैं। मैं अभी एक सिपाही हूं। मैंने पिछले कुछ समय से तालिबान के मीडिया के लिए बहुत काम किया है। मैं सुरक्षा ड्यूटी में भी रहा हूं। अभी मेरे पास दो जिम्मेदारियां हैं, एक तालिबान के मीडिया के लिए काम करना और दूसरा सुरक्षा ड्यूटी करना।

तालिबान को जहां मेरी जरूरत होती हैं, मैं वहां अपना योगदान देता हूं। हाल के दिनों में मैं काबुल एयरपोर्ट पर तैनात रहा हूं। मैंने अमेरिका के आखिरी विमानों को काबुल से उड़ते देखा है। जब आखिरी अमेरिकी विमान उड़ा तो वो मेरी जिंदगी का सबसे यादगार पल था। मुझे ऐसा लगा कि मेरी जिंदगी का मकसद पूरा हो गया है।

सवाल : एक तालिबानी के तौर पर आपका दिन कैसा होता है, आप क्या-क्या करते हैं?
जवाब :
हम सुबह फज्र की नमाज के साथ अपना दिन शुरू करते हैं। फिर कुरान पढ़ते हैं। सुबह सात-साढ़े सात बजे के बीच नाश्ता करते हैं और फिर राजधानी काबुल में सुरक्षा संभालने की अपनी ड्यूटी पर चले जाते हैं। हम सड़कों पर गश्त करते हैं और सुरक्षा का ख्याल रखते हैं। एक शिफ्ट में ड्यूटी खत्म होती है तो दूसरी शिफ्ट के लोग आते हैं। हमारे कुछ साथियों की नाइट ड्यूटी भी लगती है। अभी हमारा पूरा ध्यान अपने देश और अपने लोगों की सुरक्षा पर है।

उकाब अल-हनफी (सबसे बाएं) तालिबान की सोशल मीडिया टीम का हिस्सा भी है। वो टीवी पर तालिबान का पक्ष रखने के लिए भी जाना जाता है।
उकाब अल-हनफी (सबसे बाएं) तालिबान की सोशल मीडिया टीम का हिस्सा भी है। वो टीवी पर तालिबान का पक्ष रखने के लिए भी जाना जाता है।

सवाल : आप तालिबान के साथ कब जुड़े थे और क्यों जुड़े थे?
जवाब :
मैं जब 18 साल का था तब तालिबान के साथ जुड़ गया था। उस समय हमारे देश पर अमेरिका का कब्जा था और मुझे ये अहसास था कि अपने देश को कब्जे से छुड़ाना मेरी भी जिम्मेदारी है। देश के लिए स्वतंत्रता सेनानी बनना चाहता था। मैं हमेशा यही सोचता था कि देश को आजाद कराने में मेरी भी भूमिका होनी चाहिए।

बीते दस सालों में मैं अफगानिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में रहा। अमेरिका के खिलाफ लड़ता रहा। जिस तरह अमेरिका ने जापान पर कब्जा कर लिया था और जापान के लोगों ने अपने देश के लिए लड़ाई लड़ी थी उसी तरह मैं भी अपने देश के लिए लड़ रहा था। ये मेरी और हर अफगान नागरिक की जिम्मेदारी थी कि वो देश की आजादी के लिए लड़े। बीते दस सालों से मैं यही लड़ाई लड़ रहा था।

सवाल : क्या आप अपनी मर्जी से तालिबान में शामिल हुए थे या आपको मजबूर किया गया था?
जवाब :
विदेशी मीडिया, खासकर अमेरिकी मीडिया ये प्रोपेगैंडा करता है कि तालिबान जवान लड़कों को अपने साथ शामिल होने के लिए मजबूर करते हैं। ये सब झूठ है। अधिकतर तालिबान, भले ही वो बिलकुल युवा हैं, 18-20 साल के हों या फिर कमांडर हों, सब अपनी मर्जी से तालिबान का हिस्सा बनते हैं। मेरे जैसे युवा तालिबान से लड़ाई में शामिल होने के लिए भीख सी मांगते हैं। लड़ने की ख्वाहिश रखने वालों की वेटिंग लिस्ट होती है।

मुझे भी बहुत मिन्नत करने पर तालिबान में शामिल किया गया था। हम बीस साल से ये झूठ सुन रहे हैं कि तालिबान हमें लड़ने के लिए मजबूर करता है। सच ये है कि अपने देश के लिए लड़ना हर अफगान नागरिक की जिम्मेदारी है और हम अपनी मर्जी से तालिबान में शामिल होते हैं। अपने देश के लिए शहीद होना हमारे लिए फख्र की बात है।

काबुल पर काबिज होने के बाद तालिबान की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सामने दर्शक दीर्घा में तालिबानियों के साथ मौजूद उकाब अल-हनफी।
काबुल पर काबिज होने के बाद तालिबान की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सामने दर्शक दीर्घा में तालिबानियों के साथ मौजूद उकाब अल-हनफी।

सवाल : क्या आप तालिबान की तरफ से हिंसक हमलों में शामिल रहे हैं?
जवाब :
मैंने कई बार तालिबान की तरफ से अमेरिका के खिलाफ लड़ाइयां लड़ी हैं। इस दौरान अमेरिका ड्रोन हमले करता था, जिनमें कई बार ग्रामीण क्षेत्र के आम लोग मारे जाते थे। जब हम बेगुनाह औरतों और बच्चे को मारे जाते देखते थे तो बहुत अफसोस होता था।

जब हम IED धमाकों के जरिए अमेरिकी सैनिकों और उनके सहयोगियों को निशाना बनाते तो मुझे बहुत अच्छा लगता, क्योंकि ये हमारा बदला होता था। तालिबान की तरफ से लड़ते हुए मेरे पास अच्छी और बुरी यादें दोनों हैं। हमारी टुकड़ियों को अमेरिकी ड्रोन निशाना बनाते रहते थे। मैंने अपने कई दोस्तों को अमेरिकी हमलों में गंवाया है, लेकिन जब हम बदले का हमला करते तो हमें बहुत खुशी मिलती थी। जब हम उनके टैंकों और हमवी गाड़ियों को बर्बाद कर देते तो हमें लगता हमारा बदला पूरा हो गया है।

सवाल : क्या आपको कभी लगा कि आप लड़ाई में मारे भी जा सकते हैं, क्या आपको डर लगता था?
जवाब :
मैं जब भी जंग में होता था तो बस अपनी बीवी के बारे में ही सोचा करता था। मेरे पिता इलाके के एक चर्चित और सम्मानित व्यक्ति थे। लड़ाई के दौरान सोचता रहता था कि अगर मैं शहीद हो गया तो मेरे परिवार का क्या होगा, लेकिन जब मैं अपने देश को अमेरिका के कब्जे में देखता था और अपने लोगों को रोज मरते हुए देखता था तो खुद को अपने परिवार के मुकाबले अपने देश के प्रति अधिक जिम्मेदार पाता था। मैं ये तय कर चुका था कि मैं कभी भी शहीद हो सकता हूं और मेरे परिवार को मेरी मौत का दुख झेलना पड़ सकता है।

सवाल : क्या आपके कुछ दोस्त लड़ते हुए मारे गए हैं? आप उन्हें किस तरह याद करते हैं?
जवाब :
मेरे कई करीबी दोस्त और साथ लड़ने वाले इस लड़ाई में शहीद हुए हैं। इनके नामों की फेहरिस्त इतनी लंबी है कि नाम लेते-लेते बहुत वक्त लग जाएगा। मेरे बचपन का एक दोस्त था जिसका नाम हबीबुल्लाह था। वो कुरान का हिफ्ज कर रहा था। एक दिन मुझे पता चला कि वो शहीद हो गया है। उसने एक होटल पर आत्मघाती हमला किया था जहां अमेरिकी रुके थे। इस हमले में कई अमेरिकी मारे गए थे। मैं उसकी मौत की खबर से बहुत उदास हुआ था।

जब मैं गम जाहिर करने उसके घर गया तो मैंने देखा कि वहां सभी लोग बहुत खुश थे और उसकी शहादत पर एक-दूसरे को मुबारकबाद दे रहे थे। जब मैंने उसकी मां से संवेदना प्रकट करने की कोशिश की तो उन्होंने कहा कि मेरे बेटे की मौत पर दुखी मत हो बल्कि मुझे मुबारकबाद दो, वो एक शहीद की मौत मरा है। मैं बहुत खुश हूं कि मैंने ऐसे बेटे को पैदा किया जिसने अपने लोगों के लिए अपनी शहादत दी। मैं बहुत खुशनसीब मां हूं।

हमारी माओं के दिल बहुत बड़े हैं, जब वो अपने बेटों को तालिबान के लिए, देश के लिए लड़ते हुए देखती हैं तो उन्हें खुशी होती है। वो उनकी शहादत का जश्न मनाती हैं। मेरे कई दोस्तों ने आत्मघाती हमले किए हैं। वो अब दुनिया में नहीं है। मैं भी एक इंसान हूं, मुझे उनकी मौत का दुख होता है। मैं कई बार उन्हें बहुत याद करता हूं।

सवाल : आपके पास कौन-कौन से हथियार हैं, आपका पसंदीदा हथियार कौन सा है?
जवाब :
मेरे पास AK-47 है। मैं जब लड़ाई में शामिल था तब हर वक्त AK-47 ही मेरे साथ थी, लेकिन मेरी पसंदीदा बंदूक M-4 है जो अमेरिकी है। अभी अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार सभी M-4 राइफलों को इकट्ठा कर रही है और उम्मीद है कि भविष्य में अमीरात के सैनिकों को यही राइफल दी जाएगी।

सवाल : क्या आपको तालिबान की तरफ से कोई वेतन मिलता है?
जवाब :
तालिबान सरकार में शामिल सभी लोग, एक सैनिक से लेकर कमांडर तक किसी को भी वेतन नहीं मिलता है। ये दुनिया की एकमात्र सरकार और नेतृत्व है जहां कोई वेतन नहीं लेता है, सिर्फ देश की सेवा के लिए लोग काम करते हैं। मैंने तालिबान से कभी कोई वेतन नहीं लिया है।

मेरे भाई का छोटा सा कारोबार है, हमारा परिवार उसी से चलता है। जो थोड़ा-बहुत हमारे पास है उससे हमारी जिंदगी बहुत अच्छी चल रही है। मेरे परिवार ने और अफगानिस्तान के हर परिवार ने देश के लिए बहुत बलिदान दिया है। अगर एक भाई कुछ रोजगार करता है तो दो तालिबान के लिए लड़ते हैं। तालिबान कमांडर को, जज को, सांसद को किसी को वेतन नहीं देता है। सभी लोग दूसरे स्रोतों के जरिए अपनी जिंदगी चलाते हैं। कुछ के पास छोटे-मोटे कारोबार हैं, तो कुछ के पास खेती करने के लिए जमीन हैं।

सवाल : अपनी जिंदगी में मनोरंजन के लिए आप क्या करते हैं, क्या आप फिल्में देखते हैं, संगीत सुनते हैं, बॉलीवुड फिल्में पसंद हैं?
जवाब :
मेरा एक ही शौक है- अपने दोस्तों और साथी तालिबान के साथ पहाड़ों पर टहलना। इसके अलावा मेरे पास किसी मनोरंजन के लिए वक्त नहीं हैं। मैं हॉलीवुड या बॉलीवुड फिल्में नहीं देखता हूं। मैंने जिंदगी में इतना गम और दर्द देखा है कि इस तरह के मनोरंजन के लिए जगह ही नहीं है। मेरे कई दोस्त शहीद हो गए हैं और अब इस दुनिया में नहीं है। मैं उन्हें बहुत याद करता हूं। पिछले दस सालों से मैंने एक ही काम किया है- मैं अफगानिस्तान के लिए लड़ता रहा हूं। खाली समय में हम अपने नेताओं के संदेश सुनते हैं।

सवाल : महिलाओं को लेकर आपकी राय क्या है, क्या आप अपनी बेटी को डॉक्टर, शिक्षक या इंजीनियर बनाना चाहेंगे?
जवाब :
दुनियाभर का मीडिया, खासकर पश्चिमी मीडिया, अफगानिस्तान की महिलाओं को लेकर बहुत प्रोपेगैंडा करता है। मैं आपको एक उदाहरण देता हूं, इसे आप एक चुटकुला समझ सकती हैं। मेरा एक दोस्त एक दुकान पर गया और उसने दुकानदार से ऐसी प्याज देने के लिए कहा जो बिलकुल गोल हो, इस पर हंसते हुए दुकानदार ने कहा कि ऐसी प्याज होती ही नहीं है। मेरे दोस्त ने हंसते हुए उससे कहा कि मैं ऐसी प्याज लेना चाहता हूं जिसे काटने में मेरी बीवी को आसानी हो। इसका मतलब ये है कि हम अपनी औरतों का बहुत ख्याल रखते हैं।

हम औरतों से कोई ऐसा काम नहीं करवाना चाहते जो उनके लिए मुश्किल हो। हम हर वक्त उनकी आसानी के बारे में सोचते हैं। ये पश्चिमी प्रोपेगैंडा है कि हम अपनी औरतों को अधिकार नहीं देते हैं। मैं भी चाहता हूं कि मेरे बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले, लेकिन मेरे लिए सबसे अहम बात ये है कि मैं ये नहीं चाहता कि हमारी आने वाली नस्लें देशद्रोही बनें और पश्चिम के प्रभाव में आएं। जैसा कि पिछली सरकार के दौरान हुआ। मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे देश के लिए वफादार रहें, इस्लाम के लिए वफादार रहें। मैं चाहता हूं कि वो कामयाब हों, लेकिन मैं सबसे पहले ये चाहता हूं कि मेरे बच्चे अच्छे किरदार वाले इंसान बनें।

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