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बात बराबरी की:मर्द बहुत भोले होते हैं; कामुक औरत ही नहीं, उनके हंसते-खिलखिलाते पुतले देखकर भी भटक जाते हैं

नई दिल्ली6 महीने पहलेलेखक: मृदुलिका झा
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दफ्तर से लौटते हुए ऊंघ रहे हों या फिर घर की सफाई में पराए प्रेम पत्र जैसा कुछ सनसनीखेज न मिले, तो भी दिल छोटा न करें। फटाफट मोबाइल लेकर तालिबान नाम की बला टाइप कर डालिए। लिखते ही एक से बढ़कर एक जिंदा प्रोग्राम आपका मन बहलाने को तैयार मिलेंगे। हाल में ऐसा ही एक वीडियो अफगानिस्तान के हेरात कस्बे से आया। वीडियो कपड़े की दुकान का है, जिसमें एक शख्स शॉप पर सजी मॉडलनुमा पुतलियों का सिर धड़ से अलग कर रहा है।

मैनेक्विन, यानी पुतले-पुतलियां हटाने का ये काम तालिबानी सरकार के 'सदाचार फैलाने और बुराई रोकने वाले मंत्रालय' की पहल है। मंत्रालय इसे मजहब के खिलाफ मानता है, साथ ही एक वजह ये भी है कि मुंह-उघाड़े और हवादार कपड़े पहनी इन पुतलियों को देखकर ईमानपसंद तालिबानी पुरुष राह भटक सकते हैं।

हेरात वही सूबा है, जहां के अनार और शराब दुनियाभर में मशहूर हैं। हेरात के बाजार भी बाकी अफगानिस्तान के मुकाबले ज्यादा गुलजार रहते थे। यहां की औरतें बनिस्बत ज्यादा आजाद रहीं, लेकिन अब औरतें या तो बाजार जाती ही नहीं, या जाएं भी तो सिर से पांव तक मोटे लबादे में ढंककर जल्दी-जल्दी डग भरती हुई, जैसे जरा देर हुई नहीं कि वे जहां की तहां बुत बन जाएंगी।

हेरात की गलियों में चाहे शहदभरी जलेबियां छन रही हों, या फिर गरमागरम कबाब की भूख-भड़काऊ महक फैली हो, औरतों का दुकानों में रुक कर खाना मना है। वजह! खाने के लिए चेहरे से परदा हटाना होगा। साथ ही हाथों का एक छोटा हिस्सा भी परदेदारी से बाहर हो जाएगा। अब स्त्री-देह का इतना हिस्सा देखकर अच्छे से अच्छे नेकनीयत पुरुष का मन डोल सकता है।

तिस पर अगर पसंदीदा खाना खाती औरत की आंखें खुशी से चमकने लगें और वो किसी बात पर खिलखिला उठे, तब तो कंचनजंघा से मजबूत इरादे वाले मर्द के भी डगमगाने का डर रहता है। तो इसी डर के इलाज के लिए बाजारों में औरतों के आने-जाने पर कई रुकावटें डाल दी गईं, लेकिन इतने से मजहबी आदमी का खौफ खत्म नहीं हुआ।

स्त्रियां बाजार में कम होंगी तो क्या, उन-सी दिखने वाली पुतलियां तो हैं रास्ता बहकाने को! चुस्त देह और खुली बांहों के साथ वे कांच की दुकानों में खड़ी होकर पुरुषों को धर्मच्युत करने की साजिश करती होती हैं। बस, ये राज खुलते ही मिनिस्ट्री ऑफ प्रमोशन ऑफ वर्च्यू एंड प्रिवेंशन ऑफ वाइस ने पुतलियों का सिर कलम करने का आदेश दे दिया। तो अफगानी बाजारों में अब पुतलियां तो होंगी, लेकिन उनके चेहरे गायब होंगे।

वैसे पुतलियों को देखकर डिगने वाला ईमान अकेले तालिबानी पुरुषों के हिस्से नहीं, बल्कि ये दुनिया के हर रक्बे में दिखता रहा है। पहले मैनेक्विन मोम से बनाए जाते थे। फ्रांस में साल 1899 में मोम की एक पुतली बनी। सांचे में ढली देह पर नींबू के चौथाई फांक की तरह आंखें भी जड़ी हुई थीं। होंठ ऐसे, जैसे बस खिलखिलाने को हों।

मोम की इस नारी-देह ने लंबी-लंबी ऊंगलियों वाले हाथों से अपना चेहरा आधा ढंका हुआ था। दरअसल ये मॉडल महिलाओं के अंतर्वस्त्रों का विज्ञापन कर रही थी। पुतली को नाम मिला- मिस मॉडेस्टी। यानी वो औरत, जो अपनी कामुकता को जानते हुए छिपा रही थी।

मोम की इस मॉडल ने बाजार में तहलका मचा दिया। पुरुष इसे देखने को जाते और लौटते हुए उनके हाथों में महिलाओं के भीतरी कपड़ों के पैकेट्स होते, साथ में होती हसरत- कि उनकी प्रेमिका या पत्नी भी मिस मॉडेस्टी की लहरदार बन जाए। मियांलाल की ये हसरत वक्त के साथ थमी नहीं, बल्कि कुछ उस तेजी से भड़की, जैसे कनाडियन जंगलों में आग फैलती है।

साल 1920 में फ्रांस में स्ट्रीट्स ऑफ पेरिस नाम से कला प्रदर्शनी लगी। वहां ऐसी पुतलियां थीं, जिनके शरीर ही नपे-तुले नहीं थे, बल्कि जिनके अदाएं भी कामुक थीं। उनकी पत्थर की आंखें जैसे इशारा करती हों और अधखुले होंठों में बुलावा साफ दिखता। उनके पैर एक पर एक चढ़े हुए थे और कभी-कभार हाथों में शराब का नाजुक-सा ग्लास भी दिख जाता।

ये मॉडल वैसे तो महिलाओं के कपड़ों की थीं, लेकिन डिजाइन में पुरुष-मानसिकता थी। इसके तुरंत बाद फ्रांस समेत पूरे यूरोप की महिलाओं में एक खास मर्ज ने हमला बोला। वे डायटिंग पर जाने लगीं, ताकि उनकी कमर हथेलियों के घेरे में समाने लायक बन जाए। जो महिलाएं खाने पर काबू नहीं कर पाती थीं, वे बाथरूम में जाकर उल्टियां करके खाना बाहर करने लगीं। इस सबका असर गहरे अवसाद के रूप में दिखने लगा। इस बात का जिक्र स्मिथसोनियन मैगजीन में मिलता है।

महिलाएं डिप्रेशन में थीं क्योंकि उनका मुकाबला प्लास्टिक और फाइबर-ग्लास की पुतलियों से था। वे कांच के कमरों में बंद बेजान पुतलियों जैसा शरीर चाहने लगीं, जिसके कंधे सीधे हों, पेट तबले की खोल की तरह सपाट। जिसके शरीर का ऊपरी और निचला हिस्सा भारी, लेकिन तना हुआ हो। पुतलियों से कॉम्पिटिशन करती औरतों ने भूल से खुद को भी पुतली ही बना दिया। अब जब औरतें ही खुद को बिसारे हुई थीं तो भला मर्दों को क्या पड़ी थी, जो वे उन्हें जगाकर अपने मजे में किरकिराहट लाएं। लिहाजा ट्रेंड चलता रहा। औरतें उपासी-तिरासी होकर भी अपने मर्द की नजर में प्लास्टिक की गुड़िया बनी रहीं।

अब लौटते हैं तालिबान पर। तो तालिबानी हुकूमत में बाजार तो औरतों से खाली हो ही चुके, जल्द ही बाजार में सजी मॉडल्स भी गायब हो जाएंगी। हालांकि औरतें होंगी- अफगानिस्तान के घरों में, खिड़कियों से झांकने या छतों पर टहलने पर पाबंदी के साथ। औरतें होंगी- दुनिया के दूसरे मुल्कों में भी। बाजारों में खरीदी और दफ्तरी खुशगप्पियों के बीच। औरतें होंगी- अफगानी स्त्रियों समेत उन तमाम बदकिस्मत लड़कियों को भूले हुए, जो अनजाने ही सांस लेने वाली पुतलियों में बदल रही हैं।

नए साल का पहला हफ्ता बीत गया। एक और साल बीत जाए, इसके पहले उठो लड़कियों। अपनी सोच से क्लोरोफॉर्म का फाहा हटाकर उठो। ऐसे उठो कि बीते तमाम वक्त की बेहोशी केंचुली की तरह झड़ जाए- तुम्हारी देह और तुम्हारे वजूद से भी।