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चुनाव से पहले दारुल उलूम के तालिबानी फतवे:'फरमानों' के दायरे से बच्चे भी नहीं बाहर, जेंडर जस्टिस से लेकर शिक्षा के अधिकार के कानूनों के खिलाफ 'फतवों' की भरमार

नई दिल्ली4 महीने पहले
  • पुरुष टीचर से लड़कियों का पढ़ना हराम। को एजुकेशन भी गैर इस्लामी
  • गोद लिए बच्चे का संपत्ति में नहीं अधिकार। बच्चा अगर लड़का है तो फिर वयस्क होने पर उसकी मां को उससे करना चाहिए परदा।
  • यूपी चुनाव से पहले दारुल उलूम के तालिबानी फतवे एक बार फिर चर्चा में

इस्लाम के मक्का कहे जाने वाले सऊदी अरब में सुधार की बयार जारी है। औरतों के अधिकारों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। लेकिन पश्चिमी यूपी में सहारनपुर,के देवबंद में दुनिया के सबसे बड़े इस्लामिक एजुकेशन सेंटर दारुल उलूम की वेबसाइट में ‘फतवों’ की भरमार है। बकायदा यहां 'दारुल इफ्ता' नाम का एक विभाग है। जहां से फतवे जारी किए जाते हैं।

मुसलमानों के सबसे बड़े इस्लामिक सेंटर दारुल उलूम का प्रवेश द्वार।
मुसलमानों के सबसे बड़े इस्लामिक सेंटर दारुल उलूम का प्रवेश द्वार।

वैसे तो इन फतवों को लेकर हमेशा हंगामा होता रहता है। लेकिन इस बार बच्चों के अधिकारों के हनन का दारुल उलूम पर आरोप लगा है। यह आरोप नेशनल कमीशन फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (NCPCR) ने लगाया है। हालांकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव आते ही दारुल उलूम चर्चा में आ ही जाता है। पिछले चुनावों से ठीक पहले पश्चिमी यूपी के ही एक नेता ने पठानकोट में हुए हमले में दारुल उलूम का हाथ होने की बात तक कह डाली थी।

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 4 जनवरी को देवबंद में एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (एटीएस) कमांडो ट्रेनिंग सेंटर की आधारशिला रखी। अब बाल आयोग ने सीधे दारुल उलूम पर निशाना साध दिया है। दारुल उलूम के मीडया प्रभारी अशरफ उस्मान से भी जब इस बारे में बातचीत की गई तो उन्होंने कहा, दारुल उलूम की चर्चा का मौसम तय है। हालांकि सीधे उन्होंने कुछ नहीं कहा।

आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो से जब पूछा गया कि इससे पहले क्या आयोग की नजर इस वेबसाइट पर नहीं पड़ी थी, उनके जवाब था, ‘एक शिकायत के आधार पर दारुल उलूम की वेबसाइट की पड़ताल हमने की। हम इसके कंटेंट को देखकर स्तब्ध थे। क्योंकि यहां भारतीय कानून को दरकिनार कर ऐसी सामग्री परोसी जा रही है जो तालिबानी फरमान जैसी लगती है।’

वे कहते हैं कि पूरी दुनिया में लगातार इस्लाम में सुधार जारी है। सऊदी अरब में तो सुधारों झड़ी लगी हुई है। और भारत जैसे लिब्रल देश में धार्मिक कानून शरिया को आधार बनाकर बच्चों और महिलाओं के अधिकार सीमित किए जा रहे हैं।

आखिर किन सवालों के जवाब में भड़का बाल आयोग?

सवाल-मेरी बेटी 14 साल की है। मदरसे में 9वीं क्लास में पढ़ती है। वह आगे आधुनिक एजुकेशन लेना चाहती है। रमजान के बाद वह 10वीं में प्रवेश कर जाएगी। वह मॉडर्न एजुकेशन लेना चाहती है। लेकिन दिक्कत यह है कि वहां सारे टीचर मेल हैं। बच्ची डॉक्टर बनना चाहती है। जवाब- आधुनिक शिक्षा ली जा सकती है। लेकिन ऐसी संस्था से जहां मेल टीचर न हों। गुजरात और अलीगढ़ में कुछ ऐसे कॉलेज हैं जहां परदे में लड़कियां पढ़ सकती हैं। मेल टीचर से पढ़ना इस्लाम में हराम है। सवाल-क्या शादी के कार्ड में दुल्हन का नाम वलीमाह यानी मैरिज सेरेमनी इनविटेशन कार्ड में लिखा होना इस्लाम में जायज है?

संपत्ति में अधिकार होगा या नहीं?

जवाब-अनाथालय से गोद लिए बच्चे को वयस्क होने पर मां बाप से अलग संबंध रखने होंगे। जैसे अगर बच्चा लड़का है तो उसकी मां को बच्चे के वयस्क होने पर उससे परदा करना चाहिए। संपत्ति में उसका अधिकार नहीं होगा।

सवाल-बैंकिंग जॉब करने वाले पिता की लड़की के मैरिज प्रपोजल को स्वीकार करना चाहिए?

जवाब-बैंकिंग जॉब इस्लाम के राह के खिलाफ है। इसलिए ऐसे प्रपोजल को स्वीकार न करें तो ज्यादा ठीक है। दरअसल, इसके पीछे तर्क है कि बैंकिग तंत्र ब्याज पर आधारित है। और, ब्याज इस्लाम में हराम है। सवाल-14 साल की मेरी बच्ची है। क्या वह अब आधुनिक परिधान पहन सकती है।

सवाल-वयस्क लड़की या फिर औरत का लिबास कैसा होना चाहिए।

जवाब-इस्लाम में परदे की बड़ी अहमियत है। कपड़े ढीले होने चाहिए। चुस्त बिल्कुल भी नहीं। एडल्ट लड़की या फिर औरतों के उभार नहीं जाहिर होने चाहिए। वे ऐसे कपड़े पहनें जिससे उनकी तरफ कोई गैर मर्द की नजर न जाए।

फतवों पर क्या सच में फैलाया जा रहा भ्रम?

दारुल उलूम के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी से जब बाल आयोग द्वारा उठाए गए कदम पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘ हम इस पर कुछ नहीं बोलना चाहते। अभी तक हमारे पास कोई नोटिस नहीं आया है। पर अगर भारत सरकार और यूपी पुलिस को आयोग ने चिट्ठी लिखी है तो उनकी मर्जी है। पहले हमें कुछ नोटिस आए तब हम जवाब देंगे।

दारुल उलूम में तैयार किए जाते हैं इस्लाम के जानकार और धर्म गुरु।
दारुल उलूम में तैयार किए जाते हैं इस्लाम के जानकार और धर्म गुरु।

लेकिन यह आरोप तो हमेशा आप पर लगता है कि भारत जैसे लिबरल देश में धर्म के आधार पर अपना समान्तर कानून चला हैं? बड़ी बेबाकी से उन्होंने कहा-तो सरकार दारुल उलूम बंद करवा दे! देखिए यह एक धर्मनिरपेक्ष देश है। यहां धार्मिक आधार पर सबको स्वतंत्रता दी गई है।

और हम केवल लोगों को वह बताते हैं जो इस्लाम में लिखा है। अपनी तरफ से कुछ नहीं कहते। वह भी अगर लोग पूछते हैं तो।

वे कहते हैं कि फतवों को लेकर लगातार भ्रम फैलाया गया। फतवे कोई ऐसा फरमान नहीं जो हम एक तरफ से जारी कर देते हैं। और न मानने वाले को अपने समुदाय से निष्कासित कर देते हैं। या फिर सजा देते हैं।

आयोग ने किन अधिकारों का दिया हवाला?

आयोग का तर्क है कि यह वेबसाइट संविधान के अनुच्छेद 14,15,16 का उल्लंघन करती है। बच्चों की सुरक्षा और बराबरी संबंधित कई कानूनों का सीधा उल्लंघन इस वेबसाइट में दर्ज सवालों के जवाब राइट टू एजुकेशन, एडॉप्शन लॉ और संपत्ति के अधिकार के अधिकार को सीमित करती है।

जेंडर जस्टिस के सीधा खिलाफ हैं। कानून के समक्ष समता के अधिकार, धर्म जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देती है।

फतवों की फैक्ट्री पर आखिर ‘चुनाव’ के समय ही सवाल क्यों?

आयोग के अध्यक्ष प्रियंक कानूनगो कहते हैं, ' बहुत सारी भ्रामक जानकारी सदियों से फैलाई जा रही हैं। समय समय पर उनमें सुधार भी हो रहे हैं। दरअसल, हमारे पास एक शिकायत आई, शिकायत करने वाला हिंदू नहीं बल्कि मुस्लिम ही है।

हम उनका नाम नहीं बता सकते। उसने इस वेबसाइट द्वारा फैलाई जा रही भ्रामक जानकारी के खिलाफ कार्रवाई करने की मांग की। हमने सीपीसीआर अधिनियम 2005 की धारा 13 (1) के तहत इस शिकायत के आधार पर वेबसाइट की जांच की और आरोप सही पाए। जब हमें पता चला तब हमने जांच की मांग की।' वे कहते हैं, देश में एक संविधान है, देश के हर नागरिक को उसी संविधान के अनुसार चलना है। कानून भी एक है। और दारुल उलूम भारत का ही एक हिस्सा है।

जहां भारत का कानून लागू होता है। ऐसे में जेंडर बायस्ड और संपत्ति के बंटवारे के अधिकार के कानून के खिलाफ भला कैसे कोई संस्था खुलेआम वेबसाइट पर कंटेंट कैसे परोस सकती है? हमने भारत सरकार के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी से अनुरोध किया है कि इस पर रोक लगे। आईटी नियम के तहत जांच हो।

यूपी में मतदान को एक महीना भी नहीं बचा है, ऐसे में दारुल उलूम के खिलाफ प्रचार क्या पोलराइजेशन की कोशिश की तरह नहीं देखा जाएगा? बाल आयोग के अध्यक्ष कानूनगो पूछते हैं-क्या चुनाव के दौरान बच्चों के अधिकार सीमित हो जाते हैं? क्या आयोग को इसलिए रुक जाना चाहिए क्योंकि चुनाव करीब हैं!

हमने भारतीय कानून और यहां मिले अधिकारों धज्जियां उड़ाने के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। जब हमारे संज्ञान में जहां से भी ऐसी बातें आएंगी हम जो कर सकते हैं करेंगे। हमारा चुनाव से कोई लेना देना नहीं।

आधुनिकता की तरफ बढ़ते दुनिया के बड़े इस्लामिक देश

साउदी अरब में औरतों को 2011 में मतदान का अधिकार मिला। इसे एक बड़ा सोशल रिफॉर्म माना गया। लेकिन इसके बाद तो 2016 में औरतों को ड्राइव करने का अधिकार मिला। अकेले मक्का यानी तीर्थ करने का अधिकार मिला। उसके बाद लिटरेचर में सेंशरशिप भी कम की गई। अभी लगातार सुधार जारी हैं। यहां केवल सभी धर्मों की पढ़ाई भी शुरू की गई है। ताकि यहां के लोग सभी धर्मों को समझ सकें।

संयुक्त अरब अमीरात ने साल 2021 में अपने यहां रहने वाले गैर मुस्लिमों को अपने धर्म के मुताबिक शादी विवाह करने का कानूनी अधिकार दिया।

इससे पहले मुस्लिम या गैर मुस्लिम सभी को शादी-तलाक शरिया लॉ के मुताबिक करनी पड़ती थी। इससे पहले शादी से पहले शारीरिक संबंध को अपराध मुक्त किया था। इसके अलावा जॉर्डन समेत कई और इस्लामिक कंट्री लगातार सुधार की तरफ हैं।

ऐसे में भारत जैसे उदारवादी देश में ‘दारुल उलूम’ के यह फतवे सुधार की तरफ बढ़ते इस्लामिक वर्ल्ड से अलग नजर आते हैं।