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भास्कर इंडेप्थ:कश्मीर, आतंक और अमेरिकी हथियार; दहशत का अफगान-तालिबान लिंक समझिए, इसमें पाकिस्तान का अहम रोल

एक महीने पहलेलेखक: निकिता अग्रवाल

19वीं सदी से ही अफगानिस्तान महाशक्तियों के लिए खेल का मैदान रहा है। 19वीं सदी में ब्रिटेन के लिए, तो 20वीं सदी में रूस और 21वीं सदी में अमेरिका के लिए। हालांकि, हर बार शुरुआती जीत के बाद आखिर में तीनों महाशक्तियों को मात खानी पड़ी। अफगानिस्तान में तालिबान के खिलाफ कई महीनों तक चले संघर्ष के बाद अगस्त 2021 में अमेरिकी फौज ने अफगानिस्तान छोड़ दिया। पीछे रह गया तो बस हथियारों और सैन्य उपकरणों का वो जखीरा जो अब पाकिस्तान के रास्ते भारत पहुंचकर दहशत फैला रहा है।

अफगानिस्तान की तालिबान सरकार पर पाकिस्तान को हथियार सप्लाई करने का आरोप लग रहा है। हथियारों का बाजार फल-फूल रहा है और जिन हथियारों की तस्करी की जा रही है, उनका इस्तेमाल भारत के खिलाफ झड़पों में हो रहा है।

आज के भास्कर इंडेप्थ हम ऐसी ही 4 घटनाओं के बारे में बता रहे हैं जहां आतंकियों ने अमेरिकी हथियार का इस्तेमाल किया। साथ ही जानेंगे कि ये हथियार भारत कैसे पहुंचे रहे हैं और हमारी सेना इससे निपटने के लिए क्या कर रही है…

सबसे पहले जानते हैं कि पिछले दिनों कब-कब भारत में अतंकियों के पास अमेरिकी हथियार पाए गए…

1. वैष्णो देवी यात्रियों की बस पर स्टिकी बम से हमला (13 मई, 2022): 13 मई को कश्मीर में वैष्णो देवी जा रहे तीर्थयात्रियों से भरी बस पर आतंकी हमला हुआ। इसमें 4 लोग मारे गए और 24 घायल हो गए। इस हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन जम्मू-कश्मीर स्वतंत्रता सेनानी (JKFF) ने ली। नेशनल इंवेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) का कहना है कि हमले में स्टिकी बम का इस्तेमाल हुआ था। कश्मीर में पिछले कुछ दिनों में स्टिकी बम का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है। कश्मीर पुलिस के आईजी विजय कुमार ने बताया कि फरवरी में भी घाटी में 15 स्टिकी बम बरामद किए गए थे।

तो क्या हैं स्टिकी बम: बेहद छोटे साइज के इन बमों में चुंबक या फिर चिपकाने वाला पदार्थ लगाकर आतंकी इसको वाहन और संवेदनशील जगह पर लगा देते हैं। बम का वजन करीब ढाई सौ ग्राम होता है और यह रिमोट के जरिए कंट्रोल किया जाता है। स्टिकी बम का इस्तेमाल दूसरे विश्व युद्ध और अफगान युद्ध के दौरान होता रहा है, लेकिन कश्मीर घाटी में इसका इस्तेमाल बिल्कुल नई बात है। इस बम को फटने में सिर्फ 5-10 मिनट लगते हैं और नुकसान बहुत बड़ा होता है।

स्टिकी बम का तालिबान कनेक्शन: न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक 2005 से ही मैग्नेटिक बमों का इस्तेमाल होना शुरू हो गया था। सबसे पहले इराक में इस तरह के बम से हमलों को अंजाम दिया गया था। फिर ये तकनीक तालिबानी आतंकियों के हाथ लग गई। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे से पहले उसके लड़ाके इन बमों का इस्तेमाल नाटो की सेना के खिलाफ करते थे। माना जाता है कि ISI को ये तकनीक तालिबान से मिली।

2. पंजाब पुलिस के इंटेलीजेंस हेडक्वार्टर पर RPG से हमला (9 मई, 2022): 9 मई को पंजाब पुलिस के इंटेलीजेंस हेडक्वार्टर पर हुए हमले के दौरान RPG 22 का इस्तेमाल हुआ था। हालांकि, इस हमले में कोई जनहानि नहीं हुई थी।

क्या है RPG: RPG यानी रॉकेट प्रोपेल्ड ग्रिनेड। ये रॉकेट से चलने वाला विस्फोटक होता है। ये एक एंटी-टैंक ग्रिनेड है जिसको कंधे पर रखकर लॉन्च किया जा सकता है। इसे इन्फैन्ट्री (पैदल सेना) इस्तेमाल करती है। अभी रूस और चीनी सेना के पास ऐसे हथियार ज्यादा हैं। टैंक के अलावा ये बंकर, छोटी बिल्डिंग को तुरंत ध्वस्त कर सकती है।

RPG 22 का तालिबान कनेक्शन: RPG का इस्तेमाल अफगानिस्तान में तालिबान लड़ाके करते रहे हैं। 2021 में पंजशीर से तालिबान के खिलाफ लड़ी जा रही जंग में अमेरिका ने पंजशीर में RPG 22 की सप्लाई की थी। फिलहाल, दुनियाभर के 12 देश इसका इस्तेमाल करते हैं। इनमें पाकिस्तान और अफगानिस्तान भी शामिल हैं। हालांकि, भारतीय सेना RPG 22 का इस्तेमाल नहीं करती।

3. कश्मीर में आतंकियों के पास से मिली M4 कार्बाइन राइफल (2021): पिछले साल अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे और नाटो सेनाओं के हटने के बाद भारतीय सेना ने कश्मीर के कई हिस्सों आतंकियों के पास से M4 कार्बाइन राइफल मिली। दिसंबर 2020 में भी आतंकियों के साथ हुई मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने 6 आतंकियों को मार गिराया था। इन सबके पास से अमेरिकी हथियार बरामद हुए थे।

क्या है M4 कार्बाइन राइफल: एम4 राइफल को सटीक निशाने और रात में निशाना साधने के लिए जाना जाता है। इसमें मामूली बदलाव कर इसे ग्रेनेड लॉन्चर भी बनाया जा सकता है। इसकी तुलना कई बार AK-47 से की जाती है। यह राइफल करीब 600 मीटर की दूरी तक लक्ष्य भेदने में सक्षम है। साथ ही ये लगातार 950 गोलियां भी दाग सकती है।

M4 कार्बाइन राइफल का तालिबान कनेक्शन: ये राइफल अमेरिका में बनी थीं। इस राइफल का इस्तेमाल दुनियाभर में 60 देशों की सेनाएं करती हैं। इनमें पाकिस्तान भी शामिल है। अगस्त 2021 में अफगानिस्तान से लौटने के बाद नाटो की सेना साढ़े 3 लाख से ज्यादा रायफल वहीं छोड़ दी थीं। इनमें भारी मात्रा में एम4 राइफल भी शामिल थीं।

4. आतंकी संगठन PAFF के वीडियो में दिखे अमेरिकी हथियार (जनवरी, 2022): जनवरी में आतंकी संगठन PAFF यानी पीपुल्स एंटी फैशिस्ट फ्रंट ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें इस गुट के आतंकी M29 ऑटोमैटिक राइफल, 509 टैक्टिकल गन, M1911 पिस्टल और M4 कार्बाइन राइफल लिए दिखाई दे रहे थे।

इन हथियारों का तालिबान कनेक्शन: नाटो सेना ने 2021 में अफगानिस्तान में 8.84 लाख हथियार छोड़े थे। इनमें PAFF के वीडियो में दिख रहे हथियार भी शामिल हैं। बता दें कि PAFF कश्मीर में एक आतंकी गुट है जिसे जैश-ए-मोहम्मद का नया मुखौटा कहा जा रहा है।

अब सवाल ये उठता है कि ये हथियार भारत में मौजूद आतंकवादियों तक कैसे पहुंच रहे हैं?

भारत में कैसे पहुंच रहे ये हथियार?
यूं तो तालिबान लगातार इस बात पर जोर देता आया है कि वो एक बेहतर तालिबान है और कोई भी हथियार आतंकियों के हाथों तक न पहुंचे, इसके लिए जरूरी कदम उठा रहा है। लेकिन, कनाडा के थिंक टैंक इंटरनेशनल फोरम फॉर राइट्स एंड सिक्योरिटी (IIFRAS) के मुताबिक अमेरिका के छोड़े हुए हथियारों को अफगान डीलर तालिबान के लड़ाकों से खरीदकर पाक-अफगान सीमा की दुकानों पर खुलेआम बेच रहे हैं।

इसी साल फरवरी में कश्मीर में 15 स्टिकी बम बरामद किए गए थे।
इसी साल फरवरी में कश्मीर में 15 स्टिकी बम बरामद किए गए थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान से पाकिस्तान में फल और सब्जियां ले जाने वाले ट्रकों में भरकर इन हथियारों की तस्करी की जाती है। ये हथियार पाक-अफगान बॉर्डर पर स्थित खैबर पख्तूनख्वा के रास्ते उत्तरी वजीरिस्तान और बाजौर होते हुए बलूचिस्तान पहुंचाए जाते हैं। इसके बाद यहां से ये हथियार PoK होते हुए भारत की सीमा में दाखिल होते हैं।

अफगानिस्तान से हथियारों की तस्करी का सबूत इस बात से भी मिलता है कि 2020 में ऑबजर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) की रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर में मौजूद आतंकी गुटों के पास हथियारों की कमी हो गई थी। अक्टूबर 2020 के अंत तक सुरक्षाबलों ने 176 आतंकवाद विरोधी अभियान चलाए थे। इस दौरान 245 हथियार बरामद हुए थे। इनमें 101 पिस्तौल थीं वहीं 144 अलग-अलग तरह की असॉल्ट राइफलें थीं।

इस ऑपरेशन के बाद कई दूसरी मुठभेड़ों में जो आतंकी मारे या गिरफ्तार किए गए थे उनके पास से कोई बड़ा हथियार बरामद नहीं हुआ था। लेकिन, 2021 में अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद से ये आतंकी फिर से हथियारबंद नजर आ रहे हैं।

भारत में लगातार मिल रहे अमेरिकी हथियार देश के लिए खतरे की घंटी है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि अफगानिस्तान में अमेरिका और कौन-कौन से आधुनिक हथियार छोड़कर भागा था जिनसे भारत को खतरा हो सकता है?

अफगानिस्तान में अमेरिका के कितने हथियार
2001 में अमेरिकी सेना ने अफगानिस्तान में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन शुरू किया था। 20 साल तक अफगानिस्तान में तैनात रहने के बाद 30 अगस्त 2021 को अमेरिकी सेना के आखिरी 4 विमानों ने काबुल एयरपोर्ट से उड़ान भरी थी। इसी के साथ बीस साल पहले शुरू हुआ अमेरिका का युद्ध भी समाप्त हो गया था। अफगानिस्तान से लौटते वक्त अमेरिकी सेना भारी मात्रा में हथियार, हेलिकॉप्टर, लड़ाकू विमान, नाइट विजन, कम्युनिकेशन और सर्विलांस डिवाइस जैसे लाखों सैन्य उपकरण वहीं छोड़ गई थी।

फोर्ब्स के आकलन के मुताबिक, अमेरिका अफगानिस्तान में 8,84,311 आधुनिक सैन्य उपकरण छोड़ आया था। इनमें M16 रायफल, M4 कार्बाइन, 82 mm मोर्टार लॉन्चर जैसे इंफेंट्री हथियारों के साथ humvee जैसे सैन्य वाहन, ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टर, A29 लड़ाकू विमान, नाइट विजन, कम्युनिकेशन और सर्विलांस में इस्तेमाल होने वाले उपकरण शामिल हैं। वहीं, इस दौरान कई तालिबानी लड़ाके अमेरिकी बख्तरबंद फौजी गाड़ी हमवी पर अमेरिका में ही बनी M16 रायफल के साथ नजर आए थे।

दरअसल, 2003 के बाद से ये सभी सैन्य उपकरण अफगान सेना और पुलिस के लिए खरीदे गए थे। फोर्ब्स ने ये आंकड़ा अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन के डिपार्टमेंट लॉजिस्टिक्स एजेंसी (DLA) के डेटाबेस को स्टडी कर इकट्‌ठा किया था। दरअसल, तालिबान के खिलाफ युद्ध छेड़ने वाले अमेरिका ने 2001 के बाद से अफगान सेना और पुलिस को हथियार और ट्रेनिंग पर 83 अरब डॉलर, यानी 6 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए थे।

अफगानिस्तान में छूटे सैनिक साजो सामान में 6 लाख से ज्यादा खालिस हथियार, 76 हजार से ज्यादा सैन्य वाहन और 208 सैन्य विमान शामिल हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इनमें से ज्यादातर हथियार अफगान फौज के घुटने टेकने और सरकार ढहने के बाद तालिबान के हाथ लग गए। हथियारों की इतनी तादाद एक मजबूत फौज खड़ी करने के लिए पर्याप्त है।

इस खतरे से निपटने के लिए भारतीय सेना क्या कर रही है?
अफगानिस्तान से आ रहे इस नए खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार कश्मीर पुलिस को नए और एडवांस्ड हथियार उपलब्ध करा रही है।

  • जम्मू-कश्मीर पुलिस देश की पहली पुलिस फोर्स होगी, जिसके पास अमेरिका में बनी सिग सॉअर 716 राइफल और सिग सॉअर MPX 9MM पिस्टल होंगी।
  • इसके अलावा सेना अपने सैनिकों के लिए बड़ी संख्या में लेवल 4 जैकेट ऑर्डर कर रही है क्योंकि इससे सैनिकों को स्टील कोर गोलियों से सुरक्षा मिलेगी।
  • रिपोर्ट्स के मुताबिक, अफगानिस्तान से आ रहे इन हथियारों की तस्करी तो हो ही रही है, साथ ही बॉर्डर पार से ड्रोन के जरिए भी हथियार और कई सैन्य उपकरण आतंकियों के ठिकानों के पास गिराए जा रहे हैं। ऐसे में BSF के जवानों को इन्यूमिनेशन बम यानी रौशनी फैलाने वाले बम दिए गए हैं। ये बम 200-300 मीटर के एरिया में रौशनी फैलाते हैं जिससे तस्करों के लिए ड्रोन से हथियार भेजना मुश्किल हो जाता है।
  • इससे पहले अक्टूबर 2021 में एक कॉन्क्लेव को संबोधित करते हुए आर्मी चीफ जनरल नरवणे ने कहा था कि कश्मीर में मिलिटेंट्स को मिल रहे हथियारों और आतंकियों की बढ़ती घुसपैठ से निपटने के लिए सेना पूरी तरह से तैयार है। हमारे पास एक मजबूत घुसपैठ और आतंकवाद-रोधी ग्रिड है। साथ ही हमारे सैनिक भी एडवांस्ड वेपन्स से लैस हैं।